Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 3, मार्च - मई, 2007)

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कहानी

 

वधस्थल से छलांग

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 हृषीकेश सुलभ

 

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मैं पिछले तीन-चार वर्षों से उन तीनों को इस शहर के भीतर मंडराते हुए देख रहा हूं। अक्सर तीनों एक साथ होती हैं। चाहे कोई भी मौसम हो, तीनों पंख फैलाए उड़ती फिरती हैं। शहर का कोई भी कोना उनसे अछूता नहीं । दिन पर दिन शहर बड़ा होता जा रहा है। फिर भी, सुबह से सांझ तक वे कहीं न कहीं दिख ही जाती हैं। उन्हें देखते ही रामप्रकाश तिवारी की आंखें चमक उठती हैं। वह बछड़े की तरह हुमकने लगता है।

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मैं यह ठीक-ठाक तय नहीं कर पा रहा हूं कि बात कहां से शुरु करूं । कहीं से भी आरंभ किया जा सकता है । उससे मेरी पहली मुलाकात या उसके आरंभिक जीवन में ऐसा कुछ भी विशिष्ट नहीं है, जिसके बल पर एक अच्छी शुरुआत हो सके । वैसे सूक्ष्मता से देखा जाए तो उसके अभी के जीवन में भी कुछ उत्तेजक या रोमांचक नहीं मिलेगा । पत्रकार बन गए एक कवि में ऐसा भी कुछ विशिष्ट हो सकता है क्या ?  मुझे नहीं लगता ऐसा । यही कि उसकी सुबह दस बजे होती है ? शराब के नशे से बोझिल सिर पर टूटती देह लिए वह बिना कुल्ला किए भरपेट पानी पी लेता है ...? ... कि वह गुल में दो घंटे लगाता है । पिए और बिना पिए, दोनों हालातों में वह भरपूर नशे में रहता है । मैं उलझन में हूं कि इन प्रसंगों में क्या विशिष्ट हो सकता है, जिससे मैं अपनी बात शुरु कर सकूं ।

 

मेरे लिए ज्यादा सहज है कि मैं रामप्रकाश तिवारी से बात शुरु ही न करूं । बात संपादक जी के आगमन से शुरु करता हूं । यही बेहतर होगा। हर दृष्टि से उपयोगी और रोचक भी होगा । ... सो  बात संपादक जी के आने से शुरू होती है ।

 

नए संपादक जी के आने की खबर से हम सब बेहद उत्साहित थे । इस खबर के पुख्ता होते ही हमारा उत्साह शहर में फैल चुका था । उनके आते ही हम सब उत्साह के झूले पर पेंग मारने लगे थे । पहले दिन जब वह दफ्तर आए, हम सबों का हाल-चाल पूछा और यूनियन के सचिव रमेश वर्मा को साथ लेकर अपने घर चले गए । इस शहर को उनके जन्म-स्थान और आरंभिक कार्य-क्षेत्र होने का गौरव प्राप्त था । जिन दिनों वह यहां हुआ करते थे, रमेश पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा था । संपादक जी ने उन दिनों उसे प्रोत्साहित किया था ।

एक नया माहौल शुरु हो रहा था । यूनियन और संपादक के बीच पिछले तीन वर्षों से चली आ रही दुश्मनी के बाद सहयोग और विश्वास की संस्कृति का नया युग शुरु हो रहा था । संपादक की गाड़ी में बैठते हुए रमेश वर्मा ने हम सबों को प्रसन्नता और विश्वास भरी नजरों से देखा था । रमेश जब लौटा, काफी संतुष्ट और उत्साहित था । उसके दूसरे दिन कि रात तक मुख्य समाचार संपादक सूर्यनारायण जी को छोड़ शेष घर पर संपादकों और संवाददाताओं से एक-एक कर उन्होंने घर पर ही बातें कीं । सबों के लिए अलग-अलग बुलावा आया । इस समय हम नए युग में प्रवेश कर चुके थे ।

 

तीसरे दिन संपादक जी के साथ बैठक हुई थी । इस बैठक के लिए प्रदेश के सारे जिला संवाददाताओं को तार देकर बुलवाया गया था । अस्सी हजार प्रसार संख्या वाले सवेरा टाइम्स की सारी शक्ति सवेरा हाउस के चौथे फ्लोर पर एकजुट बैठी थी । संपादक जी के आते ही सबों ने मेजें थमथपाकर हर्षनाद किया । एक रामप्रकाश तिवारी था, जो सबसे पिछली कतार में बैठा ऊंघ रहा था । उसकी दिनचर्या भंग हुई थी । दस बजे सोकर उठने वाला आदमी दस बजे बैठक में उपस्थित था, इससे ही उसकी कष्ट का अंदाजा लगाया जा सकता है । बहरहाल, संपादक जी ने हमें संबोधित किया ।

 

मैं यहां एक विशेष मिशन पर आया हूं । एक अखबार बंद होने जा रहा था । पिछले संपादक की कारगुचारियों के कारण मैनेजमेंट ने लगभग तय कर लिया था कि अखबार बंद कर दिया जाए ।.... पर अंतिम कोशिश के रुप में मुझे यहां भेजा गया है । मैंने यह जिम्मा आप सबों के बल पर लिया है । मैं आपका आदमी हूं.... आपके बीच का आदमी । और फिर यह शहर, मेरा अपना शहर भी है । मैनेजमेंट यूनियन से भयभीत है । यह भय मैंने यहां आने से पहले ही लगभग खत्म कर दिया है । मैंने मैनेजमेंट को यह बात बता दिया है कि यूनियन अब चैन में हैं । अब मेरा और आपका काम है कि मैनेजमेंट को चैन से रहने दें । ....और वह सब कुछ धीरे-धीरे हासिल करें, जो हमें चाहिए ।

 

हम सब दम साधे सुन रहे थे । संपादक जी ने नाटकीय विराम के साथ पूरी सभा को अपनी नजरों से सहलाया । ऊंघता हुआ रामप्रकाश तिवारी थोड़ा सजग हुआ । उसे खांसी आ गई । उसके खांसने तक सब कुछ रुका रहा । उसकी खांसी थमते ही संपादक जी ने बोलना शुरु किया,मैं यहा राजनीति करने नहीं आया हूं और ना ही यह चाहूंगा कि इस दफ्तर में किसी तरह की राजनीति हो । यहां होने वाली राजनीति से मैं परिचित हूं । आपके बीच बैठे उन लोगों को मैं अच्छी तरह जानता हूं, जो पत्रकारिता नहीं सिर्फ राजनीति करते हैं । राजनीति के बल पर संपादकों की गोद में बैठकर चुम्मा-चाटी करने वाले पत्रकारों को मैं आगाह करना चाहता हूं कि वे लोग इस अखबार से इस्तीफा देकर और कहीं चले जाएं या अपना रंग-ढंग बदलें । मैं ऐसी ताकतों को किसी भी कीमत पर यहां नहीं टिकने दूंगा । मैं यहा आया ही इसलिए हूं कि उन्हें बदल दूं या उखाड़ फेंकूं । मैं उन सब लोगों को वाजिब हक दूंगा जो पत्रकारिता के लिए कमिटेड हैं ।.... हां तो मैं कह रहा था.... यहां राजनीति नहीं चलेगी । मैं आप सबों के कई गुना ज्यादा मजा हुआ और पुरानी राजनीतिबाज हूं । मैंने इस प्रदेश के दो-दो मुख्यमंत्रियों के साथ राजनीति की है और उनकी सत्ता को चुनौती दी है । उन दिनों में विशेष संवाददाता था, पर अब तो संपादक हूं ।...यहां कुछ गुण्डे भी हैं, जिन्होंने पिछले संपादक के साथ मिलकर आतंक मचाया था । मैं उन गुण्डों को भी होशियार करना चाहता हूँ कि वे चूहों की तरह बिल में घुस जाएं । उनके दिन अब लद गए । उनसे ज्यादा ताकतवर आदमी अब इस अखबार का संपादक है । मैं राजेन्द्र नगर की सड़कों पर रामपुरिया चाकू लेकर भी घूमता रहता हूँ । मैं चाहूं तो अभी, इसी समय उन गुण्डों की बांहें उखाड़कर सबेरा हाउस के नीचे फेंक दूं । पर फिलहाल उन्हें एक मौका देना चाहता हूं... ।

 

सभा मौन थी । स्तब्ध ! पिछले संपादक के प्रियजनों के चेहरे हल्दी पिसे सिल की तरह पियराने लगे थे। संपादक जी ने फिर एक नाटकीय विराम के साथ सिकुड़कर छोटी हुई आंखों से पूरी सभा को बेध डाला। लगभग सारे लोग हांफ रहे थे। मरने-मरने को हो रहे थे। उनके प्राण हुक-हुका रहे थे। सिर्फ एक रामप्रकाश तिवारी था, जो जीवित था। उसकी ऊंघ खत्म हो चुकी थी। वह पूरी तरह सतर्क था। तनकर  बैठा हुआ रामप्रकाश तिवारी संपादक जी को एकटक घूर रहा था।

 

संपादक जी ने सभा समाप्ति की घोषणा की और अपने कक्ष में चले गए। लोगों के प्राण लौटने शुरू हुए । मुख्य समाचार संपादक सूर्यनारायण जी का कहना था कि सवेरा टाइम्स के लिए अपनी पत्राकारिता का दौर अब शुरू हो रहा है। बाहर की साख भीतरी संघर्ष के कारण नहीं बन पा रही था। अब बनेगी साख । प्राण लौटते ही सूर्यनारायण जी उत्साहित हो गए थे। बिना यह गौर किए कि लोग उन्हें सुन रहे हैं या नहीं, वह बोलते ही जा रहे थे, पहली बार किसी संपादक ने इतना जोरदार भाषण दिया ।...पहली बार इस अखबार को दमदार संपादक मिला है। अब काम करने में मजा आएगा। पिछले दिनों संपादक तो लल्लू जगधर थे। आए और गए।

 

शेष लोग अभी स्वस्थ नहीं हुए थे। हो रहे थे। मैं भी स्वस्थ होने के लिए संघर्ष कर रहा था कि रामप्रकाश तिवारी ने अपने दोनों हाथों से मेर कंधे को स्पर्श किया । गलबहियां डालते हुए बोला- चलो डार्लिंग, नींबू वाली चाय पीते हैं।

 

मैं पिछले तीन-चार वर्षों से उन तीनों को इस शहर के भीतर मंडराते हुए देख रहा हूं। अक्सर तीनों एक साथ होती हैं। चाहे कोई भी मौसम हो, तीनों पंख फैलाए उड़ती फिरती हैं। शहर का कोई भी कोना उनसे अछूता नहीं । दिन पर दिन शहर बड़ा होता जा रहा है। फिर भी, सुबह से सांझ तक वे कहीं न कहीं दिख ही जाती हैं। उन्हें देखते ही रामप्रकाश तिवारी की आंखें चमक उठती हैं। वह बछड़े की तरह हुमकने लगता है। उसका ऐसा मानना है कि उन तीनों से उसे जीवन की ऊर्जा मिलती है।आप इसे रामप्रकाश तवारी का पागलपन समझ सकते हैं।...पर मैंने स्वयं अनुभव किया है कि उसके लिए यह सच है । अक्सर वह हमारा साथ छोड़कर उन तीनों के पीछे घंटों घूमता है। कभी-कभी जब वह बेहद उदास और थका-टूटा होता है, उन तीनों की खोज में निकल पड़ता है। जब तीन के बदले वे दो होती हैं, रामप्रकाश तिवारी का मन चिंता से भर उठता है कि तीसरी का क्या हुआ ? मैंने ऐसी स्थिति में उसे बुदबुदाते हुए सुना है कि कहीं वह बीमार तो नही पड़ गई। शहर के असामान्य मौसम की भेंट चढ़ गई या किसी शरारती ने उसके पंख नोंच लिए । वह उन्हें तितलियां कहता है।

 

हम दोनों साथ निकले थे। मैं क्राइम रिपोर्टर हूं। कोतवाली के अलावा रोज पांच-सात थानों की सैर करता हूं । मुझे गांधी मैदान थाना जाना था। और रामप्रकाश तिवारी गांधी मैदान में उन तीनों का मजमा ढूंढने निकला था। वह सांस्कृतिक संवाददाता है और एक साप्ताहिक कालम शहरनामा भी लिखा करता है। उन तीनों पर वह अपने कालम में अक्सर हां लिखा करता है। वे तीनों शहरनामा के प्रमुख पात्रों में हैं।

 

गांधी मैदान की बलयनुमा भीतरी राह के किनारे खड़े एक वृक्ष की घनी छांह में मजमा लगाए तीनों दिखी थीं। उनके हाथों में पत्थर के छोटे-छोटे चपटे टुकड़े थे, जिन्हें अपनी अंगुलियों में कलात्मक ढंग से फंसाकर ताल देती हुई तीनों गा रही थीं। भीड़ जुटी थी। कुछ बैठे, कुछ खड़े लोगों की भीड़ । पुष्पदलों के बीच पुंकेसर-सी तीनों झूम रही थीं। उनकी आवाज लहरा रही थी । मोर चढ़लबा जबनिया गवना ले जा रहा राजा जी।

 

 रामप्रकाश तिवारी मंत्रमुगध उन्हें सुन रहाथा। वे बीच-बीच में चुहल कर रही थीं लोग उन्हें छेड़ रहे थे। वे तीनों छेड़ती आवाजों, भद्दे संकेतों और बहशी नजरों को मुंह चिढ़ाती हुई गूंज रही थीं । मैं उस मजमें से बाहर निकलना चाहता था। पर तिवारी के कारण मेरा निकल पाना मुश्किल था। अगर निकल जाता, तो कई दिनों तक तिवारी मुझसे गुम-सुम रहता। हालांकि, जब उन तीनों को सुनते हुए मुझसे बेखबर था।

 

उन तीनों ने अपने आवाज को समेटा । कुछ लोगों ने जेब टटोलने का बहाना किया और खिसक लिए। कुछ लोगों ने पांच-दस या चवन्नी-अठन्नी का सिक्का फेंका। कुछ ने पैसा देने के बहाने उनकी अंगुलियों को छुआ। आंचल खींचे और कुछ ने चिकोटी काटकर ठहाके लगाए। वे तीनों पैसे सहेज कर भीड़ के बीच राह बनाती हुई एक्जीविशन रोड की ओर निकलीं और सिनेमा हाल के अहाते पास जाकर लोप हो गईं।

 

लोग उन तीनों के जीवन, यौवन और चरित्र पर टिप्पणियां करते हुए चले गए। मजमा बिखरने के बाद रामप्रकाश तिवारी बेंच पर धप्प से बैठ गया।

क्यों, चलना नहीं है क्या ?” मैं खीझ रहा था।

देखा तुमने ? तीनों का साहस देखा ? वामन अवतार की तरह तीन डग में पूरी नापकर चली गईं तीनों । वह स्वप्रिल स्वर में बोल रहा था।

उसका कंधा पकड़ कर झमझोरते हुए मैंने कहा, तू चलेगा या मैं जाऊं ? देर हुई तो थाना इंचार्ज निकल जाएगा और मैं पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाता फिरूंगा।

मेरी फटकार से वह बेमन उठा और मेरे साथ हो गया।

 

एक जवान लड़की ने प्रेम मे असफल होने पर आत्महत्या कर ली थी। बस यही एक खबर लेकर दोनों थाने से वापस लौट रहे थे। लड़की का प्रेमी उसकी सहेली के साथ भाग गया था। लड़की यह सदमा नहीं झेल सकी। वह जहर खाकर अस्पताल पहुंचते-पहुंचते असफल प्रेमिकाओं के इतिहास में दर्ज हो गई। वापस लौटते हुए रामप्रकाश तिवारी ने टिप्पणी, दुनिया से सारी अच्छी चीजें तेजी से नष्ट हो रही हैं ।

मैंने पूछा, जैसे ?”

उसका संक्षिप्त उत्तर था, जैसे प्रेमिकाएं ।

हम चुपचाप पैदल चलते हुए अखबार के दफ्तर पहुंचे थे । मैं डाक संस्करण के लिए खबरें बनाकर सूर्यनारायण को सौंपने के बाद ताजा खबरों के लिए बाहर निकल गया । रामप्रकाश तिवारी अपना कालम लिखने में जुटा हुआ था ।

 

संपादक जी विशेष बैठक को संबोधित करने वाले थे । पहली बैठक के लगभग डेढ़ माह बाद यह दूसरी बैठक हो रही थी । इस बीच जो महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं, उनकी संक्षिप्त सूचना बिना किसी ताम-झाम  के आपको देना चाहता हूं । संपादक  जी ने यूनियन सचिव रमेश शर्मा को अपना दाहिना हाथ घोषित किया था । अपने ऊपर संपादक जी का विश्वास और स्नेह उसके गले में मछली के कांटे की तरह फंसा था। पूर्व संपादक द्वारा की गई प्रोन्नतियों की पुनर्समीक्षा तक वेतन में हुई बढ़ोतरी के भुगतान पर रोक लगा दी गई थी। मुख्य संवाददाता नगरपालिका के बाबुओं की तरह दफ्तर आते, पान चबाते और सारे दिन ऊंघते रहने के बाद चल जाते । संपादक जी के अनुसार उन्हें फ्रीज कर दिया गया था। कुछ जिला संवाददाताओं के तबादले हुए। कुछ लोगों को प्रदेश-बदर करने के लिए मैनेजमेंट की रिपोर्ट भेज दी गई थी। सवेरा हाउस के चौथे फ्लोर पर ठहाकों, चुहलों, विचार-विमर्श, गर्म बहसों और खबरों को लूटने-लुटाने का दौर ठिठका हुआ था। लोग फुसफुसाहटों से काम चला रहे थे। संपादक जी को शोर से नफरत थी। वह अपने मातहतों को मौन देखना चाहते थे। डेढ़ माह में किसी के सामने, किसी दूसरे से उन्होंने कोई बात नहीं की थी । हर किसी से वह अकेले में बातें करते थे।

 

 अपना भाषण शुरू करने से पहले संपादक जी ने रामप्रकाश तिवारी से कहा,आप आगे आ जाएं।

 

पिछली कतार में बैठे तिवारी के लिए अगली कतार में बैठे सूर्यनारायण जी ने जगह खाली कर दी। वह चुपचाप आकर बैठ गया। आज मजमावाली लड़कियों पर उसकी रिपोर्ट उसके कॉलम शहरनामामें छपी थी । कल गाँधी मैदान में उसकी तन्मयता देखकर ही मुझे लगने लगा था कि पट्ठा कोई जबर्दस्त पीस लिख रहा है। मेरा यह विश्वास कि रामप्रकाश तिवारी की प्रतिभा का लोहा संपादक जी को मानना ही पड़ेगा-सही साबित होने जा रहा था।

 

संपादक जी बोल रहे थे,मैं यह बात साफ-साफ बता देना चाहता हूं कि रंडियों के बल पर राजनीति में पद और बीवियों के बल पर नौकरी में प्रमोशन पाने वालों का मैं सख्त विरोधी हूं। एक पत्रकार पिछले दिनों अपनी बीवी के साथ मेरा हाल-चाल पूछने मेरे घर गए थे। मैं नाम नहीं बताऊंगा। ऐसे लोगों को मैं हाशिये पर ही रखूंगा । वे बीवियों के बल पर अखबार की मुख्यधारा में नहीं रह सकते।

सारी सभा को सांप सूंघ गया। सबने एक-दूसरे को कनखियों से देखा। विवाहित पत्राकार पर संकट के गहरे बादल छा गए। कौन था ? कौन था। सिर्फ रामप्रकाश तिवारी निश्चिंत था।मुस्कुरा रहा था। मेरी तो दहशत से टांगें थरथराने लगी थीं। सबों ने मन-ही-मन अपनी समझ के अनुसार कोई एक नाम रेखांकित किया कि हो सकता है यही अपनी बीवी के साथ गया हो। संदेह के घने बादल छा चुके थे।

 

संपादक जी ने भाषण जारी रखते हुए,मेरे अखबार में कुछ कवि-साहित्यकार वगैरह घुस आए हैं। मेरा ऐसा मानना है कि ऐसे लोग पत्रकारिता की दुनिया के लिए कोढ़ होते हैं। समाज के सच में इनकी कोई जगह नहीं, मुझे साहित्यकारों और कुत्तों से नफरत है। मैं इनसे अपने अखबार को बचाना चाहता हूं। किसी भी कीमत पर मैं इन्हें अपने अखबार के दफ्तर में नहीं देखता चाहता ।.... जो लोग अपने कवि-लेखक होने के गरूर में इतराए फिरते हैं, वे अपना चाल-चलन बदल दें, वर्ना उन्हें सवेरा हाउस से नीचे फेंक दिया जाएगा।

 

अगली कतार में बैठा  रामप्रकाश तिवारी बड़ी उत्सुकता से संपादक जी को सुन रहा था। उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव थे। वह नन्हें शिशु की तरह उत्साहित था जबकि शेष सारे लोग अस्वस्थ होने लगे थे। सूर्यनारायण जी का तो प्राण ही अटका हुआ था। संपादक जी ने तनकर बैठे हुए रामप्रकाश तिवारी  पर अपनी नजरें टिका दीं और सारी शक्ति केन्द्रित करते हुए गरजे, मिस्टर रामप्रकाश तिवारी ! आप कविता झाड़ना बंद करके पत्रकारिता शुरू कर दीजिए, नहीं तो....

 

क्रोध के मारे संपादक जी के शेष शब्द गुम हो गए। उनके कंठ से गों-गों की आवाज निकली । उनकी आंखें अंधेर में चमकती किसी शातिर लकड़बग्घे की आंखों जैसी चमक रही थीं। रामप्रकाश तिवारी ने अटके हुए आगे के शब्दों को सुनने के लिए अधीर होते हुए पूछा, नहीं तो ? नहीं तो क्या होगा संपादक जी ?”

 

दो कौड़ी की रंडियों के पीछे रात-दिन घूमते-फिरते हो और मुझसे जुबान लड़ा रहे हो।....पत्रकार बने फिरते हो तुम ?” संपादक जी अपनी सारी शक्ति संचित करके बोल रहे थे, तुम्हारे बारे में एक-एक खबर है मेरे पास । दारू फीकर बाजारू औरतों के पीछे रात भर डोलते हो और साहित्कार-पत्रकार बनते हो?”

 

संपादक जी हांफने लगे थे । जैसे-तैसे अपनी सांसों पर काबू पाते हुए उन्होंने अपने सामने रखा आज का अखबार बीच टेबल पर फेंक दिया। आप से तुम के बात तुम से आप पर उतरते हुए बोल रहे थे, यही रिपोर्ट है ?....यही है अखबार की भाषा इसमें खबर कहां है ? रंडियों पर लिखने के लिए नहीं है यह अखबार । समझे आप ?...मैं जनता का पत्कार हूं। जनता पर लिखिए, जनता पर रंडियों और जनता के बीच फर्क होता है। कविता नहीं होती है पत्रकारिता । ...बहुत फर्क होता है कविता नहीं होती है के सच में।..आज से आपका यह शहरनामा कालम बंद। ....और आप सांस्कृतिक प्रतिनिधि का काम भी नहीं करेंगे। आप क्राइम देखेंगें आज से । सूर्यनारायण जी ! .....सबों की बीट बदल दीजिए आज से । आइए मेरे चैम्बर में। मैं बिल्कुल नए ढंग से अलाटमेंट करना चाहता हूं।

 

संपादक जी अपने चैम्बर में चल गए । रामप्रकाश तिवारी ने सूर्यनारायण जी को सहारा देकर उठाया और संपादक जी के चैम्बर के दरवाजे तक पहुंचा आया।

 

रमेश वर्मा सबसे पहले उत्तेजित हुआ था। तत्काल उसकी उत्तेजना ने रंग दिखाया और कुछ गिने-चुने लोगों को छोड़कर शेष लोग उत्तेजित हो गए ।मैं तत्काल संपदाक को जूते लगाने के पक्ष मे था। कुछ लोग घेराव के लिए तो कुछ लोग नारेबाजी के उतावले थे। कुछ मत था कि मैनेजमेंट को नोटिस देकर कल से कल बंद हड़ताल कर दी जाए । सिर्फ रामप्रकाश तिवारी की राय बिल्कुल विपरीत थी । वह कुछ भी करने के पक्ष में नहीं था।

 

क्राइम रिपोर्टर रामप्रकाश तिवारी का अपराध की दुनिया में प्रवेश धमाकेदार ढंग से हुआ । जिस दिन उसे क्राइम बीट पर लगाया गया, उसी शाम शहर के व्यस्ततम इलाके के चौक पर एक घटना घटी। अपने पिता के साथ रिक्शे पर बैठकर चौक से गुजरती एक खूबसूरत लड़की को गुण्डों ने घेरकर नीचे उतार लिया । लड़की का बाप गिड़गिड़ाता रहा, गुण्डे नहीं माने। हिन्दी फिल्मों में दिखाया जाने वाला एक ऐसा दृश्य, जिसे देखकर दर्शक सीटियां बजाएं और सिसकारी भेरं-गुण्डों ने रचा। उन्होंने लड़की की साड़ी बीच चौक में उतार दी।  ब्लाउज-पेटीकोट पहने लड़की दोनों हाथों से अपने वक्ष को छुपाती सड़क पर लुढ़क गई। गुण्डे मोटरसाइकिल पर उड़ गए। साड़ी लेते गए, जाते-जाते कह गए, हरामजादे। आज तो छोड़ दिया। अगली बार एक भी कपड़ा नहीं बचेगा।..तेरी बेटी को नंगा नचाएंगे इसी चौराहे पर ।

 

रामप्रकाश तिवारी ने यह सब घटित होते हुए अपनी आंखों से देखा। जुल्मी राजा के घुड़सवारों की तरह गुण्डे आए और बूढ़े पिता की जवान बेटी को फसल की तरह रौंदकर चले गए। बाप-बेटी भीड़ से घिरे थे। सब कुछ देखते-सुनने के बाद वह बदहवास सवेरा हाउस पहुंचा । खबर बनाकर सूर्यनारायण जी को सौंपी। सूर्यनारायण जी बोले, तिवारी प्रभु ! भाग्यशाली हैं आप। पहले ही दिन ऐसी महत्वपूर्ण खबर।

 

उसने घूरकर सूर्यनारायण जी को देखा। मेरे पास आया । मैं अपने काम से फूर्सत पाकर उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। मैं अपराध की दुनिया से खेलों की दुनिया में भेज दिया गया था। स्कूली बच्चों का क्रिकेट मैच देखकर लौटा था। पिछले कई दिनों का तनाव बच्चों को खेलते हुए देखकर घुल गया था। मैंने तिवारी को छेड़ा, वैलकम क्राइम किंग।

 

वह गंभीर था। कुछ-कुछ उदास और थका हुआ भी। मेरे जुमले पर कोई प्रतिक्रिया दिए बिना उसने कहा, चलो, चाय पीते हैं।

 

हम दोनों चाय पीकर यूं ही बेमतलब सड़कों पर टहलते रहे । घटना के बारे में संक्षिप्त देकर वह चुप लगा गया था। मैं उसकी मनःस्थिति समझ रहा था, लड़की के साथ जो घटित हुआ, ऐसी एक भी घटन&