Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 3, मार्च - मई, 2007)

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पत्रिका/समीक्षा

 

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अंतर्कथा

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समीक्षकःश्रीकांत सिंह

लेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्य करने वाले रिपोर्टरो, एंकरो, प्रबंधकों, समाचार निर्देशकों, प्रोड्यूसरों आदि के कार्य व्यवहार को लेकर समय-समय पर विचार मंथन होता रहता है । टी.आर.पी. की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में चैनल्स अपने दर्शकों को जो कुछ भी परोस रहे हैं उसमें से अधिकांश ऐसा है जिसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने पत्रिका के जनवरी 20007 के अंक में टेलीविजन इतिहास में पहली बार शीर्षक से विशेषांक प्रकाशित कर वस्तुस्थिति की वास्तविक तस्वीर पेश करने का सराहनीय कार्य किया है।

 

इस विशेषांक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके लेखकों में प्रायः इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत दक्ष वृत्यिज्ञ (प्रोफेशनल) हैं जो मीडिया जगत की वास्तविकता से सरोकार रखने वाले हैं। इसलिए उनके स्वयं के अनुभव पर आधारित वृत्तांत(कहानी) से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में घट रही घटनाओं का वास्तविक लेखा-जोखा हंस के पाठकों को मिला। इस विशेषांक में संपादक श्री राजेन्द्र यादव ने मेरी-तेरी उसकी बात, कठपुतलियों का खेल नामक शीर्षक से संपादकीय लिखा है, जिसमें प्रसार भारती निगम के सदस्य के रूप में अपने अनुभव का उल्लेख किया है। पृष्ठ संख्या 6 पर उन्होंने लिखा है फैक्ट और फिक्शन की जो परिभाषाएं बदलने का सिलसिला बीजेपी ने मीडिया में शुरू किया, उसका नतीजा है कि हम भारतीय मीडिया में सच्चाई देखने को तरस गए हैं । संपादक का भारतीय मीडिया के चरित्र पर यह एक प्रकार का मनगढ़ंत एवं पूर्वाग्रह पर आधारित आरोप है जिससे बीजेपी के साथ मीडिया जगत की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो रहा है। इससे सम्पादक की मानसिकता स्वयं प्रमीणित होती है। इसके अतिरिक्त इस विशेषांक में कुल 29 कहानियां, 5 आमने-सामने स्तम्भ, तमाशा मेरे आगे स्तम्भ से 5 आलेख, 2आलेख विमर्श पर आधारित, 2 आलेख पंचायतनामा, 3 आलेख अंदाज-ए-हकीकत, 1 आलेख विकल्प के अंतर्गत अल जजीरा की चुनौती तथा समरेन्द्र सिंह द्वारा लिखित 3 लघु कथाएं हैं।

 

उपरोक्त सभी कहानियां एवं आलेख इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के अंदर की दास्तां का बयां करते हैं । विशेष स्तम्भ में टीवी पत्रकारिता में स्त्री नामक आलेख से टीवी पत्रकारिता में महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश पड़ता है । इसमें लेखक ने लिखा है सूचना तकनीक में आए क्रांतिकारी परिवर्तन ने खबरों की दुनिया ही बदल दी है। इस बदलाव ने संभावनाओं का पूरा का पूरा कैनवास महिला पत्रकारों के नाम कर दिया है। महिला पत्रकारों के लिए पत्रकार बनने का रास्ता इतना आसान कभी नहीं रहा, जितना आज है। लेकिन इन सबमें एक कैजुअल्टी भी हो गई है। न्यूज चैनलों की बात करें तो महिला पत्रकारों के लिए खुली जबरदस्त संभावनाओं की वजह उनका पत्रकार होना कम और महिला होना ज्यादा हो गया है। उसकी एक बड़ी बजह टेलीविजन पत्रकारिता पर बाजारवाद का कब्जा है।

 

आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में लड़कियों पर आगे बढ़ने के लिए शार्टकट रास्ता अपनाने का आरोप प्रायः लगता रहता है । कई लेखकों ने अपनी कहानी में ऐसे रास्तों का जिक्र भी किया है किन्तु इसी विशेषांक में पृष्ट संख्या 92 पर स्पष्ट किया गया है कि लड़कियों पर ही शार्टकट अपनाने के आरोप लगते हैं लेकिन बॉस हर लड़की को तरक्की नहीं दिलाते, उन्हें ही आगे बढ़ाते हैं जो सुंदर दिखने के साथ दिमाग भी रखती है ।

 

आज ब्राडकास्ट बिल पास करवाने की चर्चा काफी तेजी से हो रही है क्योंकि आज चैनलों ने कई भ्रष्ट अधिकारियों एवं नेताओं के पाल स्टिंग ऑपरेशन के माध्यम से खोले हैं । प्रस्तावित बिल स्टिंग ऑपरेशन पर लगाम करने का एक तरीका है । हां स्टिंग ऑपरेशन करने के लिए यदा-कदा कुछ गलत तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है । उन गलत तरीकों पर रोक लगानी चाहिए किन्तु स्टिंग ऑपरेशन पर रोक लगाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता । श्री अजीत अंजुम ने बड़े ही बेबाक ढंग से इस प्रश्न पर अपने विचार व्यक्त किए हैं जो सराहनीय है ।

 

 उन्होंने लिखा है स्टिंग ऑपरेशन होना चाहिए या इस पर लगाम लगाना चहिए... अगर इसी मुद्दे पर जनमत संग्रह हो जाए तो इस पर देश के नब्बे फीसदी लोग स्टिंग के पक्ष में होंगे । लोगों को लगने लगा है कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ एक हथियार का नाम है स्टिंग ऑपरेशन । वैसे लेखक ने अपने विचार में इस बात को भी महत्व दिया है कि निश्चित रुप से किसी के बैडरुम में खुफिया कैमरा नहीं पहुंचना चाहिए किन्तु यदि किसी बैडरुम में हथियारों की डील हो रही है, ठेके पास कराने का सौदा हो रहा  है तो उसे आप नीजि मामला नहीं बता सकते । उन्होंने इस संदर्भ में एक गाइड लाइन बनाने की बात स्वीकार की है, जो प्रशंसनीय सुझाव है । चैनलों के अंदर की सामाजिक बुराईयों की चर्चा समाज में होती रहती है । लेखकों ने बड़े ही साहस के साथ उस वास्तविकता से पाठकों को परिचित कराने का कार्य किया है । इसके साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के महत्व को भी जगह-जगह रेखांकित किया गया है । भाषा के स्तर पर वास्तविकता को परोसने की शैली में जरुर कुछ फूहड़ एवं अश्लील शब्दों का प्रयोग किया गया है,  जिसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता ।

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पत्रिकाः हंस (अंक-जनवरी 2007)

विशेषांकः  खबरों की दुनिया में पहली बार

संपादकः राजेन्द्र यादव

प्रकाशकः अक्षर प्रकाशन प्रा.लि.2/36, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली

मूल्यः 50 रुपये

पृष्ठः 256

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रवंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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