Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 3, मार्च - मई, 2007)

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प्रसंगवश

 

सच और रियालिटी का कारोबार

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देवव्रत सिंह

 

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ये मीडिया साक्षरता का मसला भी है कि दर्शकों की मीडिया क्या भूमिका होगी । क्या आम लोग मीडिया को बिना सवाल उठाए बस ग्रहण करते रहेंगे या उसके निर्माण में एक सक्रिय दर्शक की भूमिका भी निभाएंगे ? सक्रियता के लिए जरूरी है मीडिया और उससे जुड़े कारोबारी स्वार्थों की समझ 

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भारतीय अदाकारा शिल्पा शेट्टी जब ब्रिटेन के ख्यातिनाम रियलिटी शो बिग ब्रदर में चुनी गयीं तो कुछ अखबारों ने इस घटना की बड़ी खबरें छापी थीं । खबरों में शिल्पा की इस उपलब्धि का दो तरीके से बयान किया गया था । एक तो शो में भाग लेने के लिए शिल्पा को साढ़े तीन करोड़ रुपये की शानदार राशि मिलेगी, जो भारत में शिल्पा की कई फिल्मों के मेहनताने के बराबर होगी और दूसरी बड़ी उपलब्धि थी कि शिल्पा को एक विदेशी टेलीविजन शो में भूमिका मिलना । अनुमान लगाया जाने लगा कि इस शो में काम करके ना केवल शिल्पा अंतर्राष्ट्रीय स्टार बन जाएगी बल्कि भारत में उनके डोलते कैरियर को भी सहारा मिलेगा । लेकिन किसको पता था कि नस्लभेद की टिप्पणी के बाद शिल्पा के आंसू पोंछते विजुअल  दुनियाभर के लोगों की भावनाओं को इस कदर उद्वेलित कर देंगे कि वो सच में एक अंतर्राष्ट्रिय व्यक्तित्व बन जाएंगी । इस पूरे घटनाक्रम ने एक साथ नस्लभेद और रियालिटी शो के बाजार दोनों विषयों पर विमर्श गरमा दिया।

 

सन् 1982 में भीभीसी के अनेक चैनलों से हटकर ब्रिटेन का चैनल फोर इसलिए खोला गया था ताकि वहां बसे ऐसे सभी समुदायों को टेलीविजन के पर्दे पर प्रतिनिधित्व मिल पाये जो दशकों से ब्रिटेन में रह रहे हैं और भाषा, धर्म या नस्ल में अल्पसंख्यक हैं । ब्रिटेन में भारतीय अल्पसंख्यक हैं और इसी तरह अन्य एशियाई-अफ्रीकी लोगों के लिए भी ये एक प्रकार का चैनल आरक्षण था । चैनल फोर का मकसद अल्पसंख्यक समाज के मुद्दों, सरोकारों और कहानियों को केवल टेलीविजन उद्योग में साझेदारी देना भी था। अनेक भारतीय मूल के लोगों ने चैनल फोर के लिए डाक्यूमेंटरी व अन्य शो का निर्माण करके टेलीविजन में एक अच्छा मुकाम हासिल किया है । इस चैनल के दर्शक भी अल्पसंख्यक समुदाय के लोग ही अधिक हैं और ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोगों की तादाद काफ़ी है । स्वाभाविक है बिग ब्रदर के निर्माता के दिमाग में शो में एक भारतीय अभिनेत्री को शामिल करने का आइडिया आया । तलाश थी एक ऐसी अदाकारा की जो अंग्रेजी भी अच्छी जानती हो और आकर्षक हो । और ये तलाश खत्म हुई शिल्पा शेट्टी के नाम पर ।

 

भारतीय दर्शकों के लिए भले ही रियलिटी शो थोड़ा सा नया टेलीविजन फार्मेट है लेकिन पश्चिमी देशों में ये काफी पहले ही आजमाया जा चुका है । अब धीरे-धीरे विदेशी रियलिटी शो के भारतीय संस्करण हमारे सामने हैं । अमेरिकन आइडल का भारतीय स्वरूप इंडियन आइडल हम देख चुके हैं । फीयर फैक्टर का भारतीय चेहरा इस समय टेलीविजन पर चल रहा है । बिग ब्रदर का भी भारतीय रुप बिग बॉस सोनी  टेलीविजन पर चल रहा है और काफी चर्चित हो रहा है । नाटकीयता से ऊबा पाश्चात्य समाज अब रियलिटी पर फिदा है । रियलिटी शो दरअसल बाजार की मांग के अनुरुप हैं । ये ना केवल हकीकत के जीवन से अधिक सनसनीखेज, रसीले और चटपटे हैं बल्कि कुछ हद तक वीभत्स और अमानवीय भी हैं । दरअसल ये शो डर, ईर्ष्या, द्वेष, बैर, दुश्मनी, क्रोध, विश्वासघात जैसे सारे नकारात्मक भावों का कारोबार कर रहे हैं । कुछ मामले में इस प्रकार के कार्यक्रम प्रतिस्पर्धा के नाम पर आदिम समाज की तरह अपने वजूद के लिए दूसरों से लड़ना सिखाते हैं ।

 

जैसे ही बिग ब्रदर का वो एपिसोड दिखाया गया, जिसमें शिल्पा शेट्टी पर साथी प्रतिभागी गुड़ी और डेनियल ने आपत्तिजनक टिप्पणियां की हैं । ब्रिटेन के साथ-साथ भारते में इसे नस्लभेद की संज्ञा दी गई । बवाल मच गया । आम लोगों के साथ-साथ दोनों देशों के नेता, मंत्री और राजनयिक भी इस मसले पर अपनी राय देने के लिए कूद पड़े । यहां तक कि ब्रिटेन की संसद में प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर को इस बारे में बयान देना पड़ा । समाचार चैनलों और अखबारों ने इसे एक राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया । पटना की सड़कों पर जुलूस निकाले गये । हालांकि अभी तक शिल्पा शेट्टी की राय बाहर नहीं पहुंच पाई थी । कार्यक्रम में केवल शिल्पा के आंसू पोंछते हुए कुछ शाट्स दिखाये गए थे । इस पूरे घटनाक्रम से ये तो साबित हुआ कि कानूनी तौर पर खत्म होने के इतने साल बाद भी नस्लभेद की संवेदनशीलता कम नहीं हुई है । साबित हुआ कि ब्रिटेन और भारत  दोनों देशों में नस्लभेद ज्वलनशील मुद्दा है ।

 

लेकिन बिग ब्रदर के निर्माता इस तथ्य से पहले से परिचित थे । इसीलिए उन्होंने कार्यक्रम के इन अंशों को संभावित विरोधी पृष्ठभूमि और विचारों वाले लोगों को ही शामिल किया जाता है और अगर फिर भी इनके भीच किसी प्रकार टकराव पैदा नहीं होता है, तो उन्हें उकसाया जाता है । जितना विवाद पैदा होगा कार्यक्रम उतना ही हिट होगा । इसलिए जब सब लोग शिल्पा के पक्ष में बयानबाजी में व्यस्त थे, तब कार्यक्रम के निर्माता एंडेमोल और चैनल फोर के अधिकारी खुशियां मना रहे थे । क्योंकि विवाद के कारण बिग ब्रदर की दर्शकता सीधे दोगुनी हो गयी । फोन कॉल्स से अलग कमायी हो रही थी । ये सही है कि स्पांसरशिप वापस ले ली लेकिन अनेक दूसरी कंपनियों ने कार्यक्रम की लोकप्रियता के मद्देनजर तुरंत स्पांसरशिप दे दी । दरअसल आलोचनाओं के इस सारे अंधड़ में कोई उस प्लेटफार्म की आलोचना नहीं कर रहा, जो नस्लभेदी टिप्पणियों को प्रचारित करने का माध्यम बना । अगर गुडी नस्लभेद की कसूरवार है तो क्या इस प्रकार के कार्यक्रम और उनको प्रायोजित करने वाली कंपनियां बेकसूर हैं । एक मदारी की भूमिका में बाजार हर उस मुद्दे, समस्या, भावना का कारोबार करने को तैयार बैठा है, जिसको लेकर हम उद्वेलित या गुस्सा हो जाते हैं । लगभग नासमझ-नादान बंदरों की तरह ।

 

सारे मामले में सबसे हैरान करने वाली भूमिका शिल्पा शेट्टी की रही । शिल्पा की आंसू बहाती तस्वीरों ने सारी दुनिया में भावातिरेक तो पैदा कर दिया लेकिन जब स्वयं शिल्पा की बारी आई तो कह दिया कि उन्हें तो कुछ भी नस्लभेदी नहीं लगा । भावुक जनता बेचारी इस अर्थशास्त्र को कैसे समझे कि जिसे वो देश का प्रतीक समझे थी, उसके लिए तो साढ़े तीन करोड़ रुपये की राशि ही सबसे बड़ी प्रतीक है । यहां या तो शिल्पा गलत हैं या फिर दूसरे लोग प्रतिक्रिया करने में अतिशय और भावुकता के शिकार हुए हैं । सवाल ये उठता है कि क्या जब कोई अदाकारा विदेश के किसी कार्यक्रम में पेशेवर तरीके से भाग लेने जाए, तो उसे भारत का प्रतिनिधि माना जाए ?  क्या किसी शो में दो लड़कियों के भीच की बातचीत को दो देशों के भीच का वार्तालाप मान लिया जाए और यदि नहीं तो भारत सरकार और मीडिया की प्रतिक्रिया उतावलेपन का नतीजा कही जानी चाहिए । सवाल तो ये भी उठना चाहिए कि यदि उतना ही राष्ट्र का अपमान हुआ है, तो शिल्पा को भारत की प्रतिष्ठा की खातिर शो छोड़कर वापस नहीं आ जाना चाहिए था, लेकिन शिल्पा को इस प्रकार के शो में ये सामान्य बात लगी । और शायद वो अपने भोले देशवासियों की तरह भारतीयता को लेकर उतना भावुक पागलपन की शिकार नहीं है, जो इतनी मोटी रकम छोड़कर शो छोड़ दे ।

 

इस घटना में नस्लभेद को लेकर हम भारतीय काफी आहत हो गये लेकिन क्या हम कभी अपने गिरेबान में भी झांकते हैं ?  क्या हम स्वयं नस्लभेद से मुक्त होने का दावा कर सकते है ?  हैरानी की बात है कि जब अनेक भारतीय शहरों में अफ्रीकी देशों से छात्र पढ़ने आते हैं तो हमारा भी उनके प्रति रवैया लगभग वैसा ही होती है जैसा यूरोपीय देशों में भारतीयों के साथ । नस्लभेद का अर्थ है कि किसी से उसके रंग और जन्म के आधार पर भेद करना । समाचार पत्रों में छपने वाले अधिकांश वैवाहिक विज्ञापनों में अक्सर चाहत होती है गौर वर्णी लड़की की । फेयरनैस के कारोबार ने सांवलेपन को कलंक बना दिया है । यही नहीं, उत्तर भारते में दक्षिण भारतीयों के बारे में एक अजीब किस्म का पूर्वाग्रह हम आसानी से सामान्य व्यवहार में चुटकलें और कहानियों के रिप में देख सकते हैं । जाति आधारित भेदभाव स्वयं नस्लभेद का ही एक दूसरा रुप है । उड़ीसा में पिछले दिनों जब दलितों ने एक मंदिर में आराध्य के दर्शन कर लिए तो वहां के पुजारी सत्याग्रह पर उतर आए । वहां दक्षिण के एक मंदिर में एक अभिनेत्री के प्रवेश के बाद तो सारे मंदिर को पुनः पवित्र करने के लिए यज्ञ किया गया ।

 

ब्रिटेन के समाज ने इस मामले में अभूतपूर्व सक्रियता दिखाई और जता दिया कि वो किसी भी सत्र पर नस्लभेद को पनपने या स्थापित नहीं होने देगा । ब्रिटेन के मीडिया नियंत्रण संगठन ऑफकॉम में मात्र तीन दिनों में वहां के 40 हजार दर्शकों ने फोन करके अपना विरोध दर्ज कराया । मीडिया वॉचडॉन की रिपोर्ट का किसी भी टेलीविजन कार्यक्रम की नेकनामी और बदनामी  में काफी महत्व रहता है । वहां के अखबारों में प्रमुखता से छापीं गई खबरों में ना केवल गूडी और डेनियल को विलेन बना दिया बल्कि शिल्पा को आकर्षक कहते हुए उनके व्यवहार की प्रशंसा भी की । नतीजा ये निकला कि दर्शकों ने गुडी को बड़ी तादात में राय भेजकर शो से बाहर कर दिया । टेलीविजन दर्शकों से किसी मसले पर क्या इस प्रकार की सक्रियता की अपेक्षा भारत में की जा सकती है ? ये मीडिया साक्षरता का मसला भी है कि दर्शकों की मीडिया में क्या भूमिका होगी । क्या आम लोग मीडिया को बिना सवाल उठाए बस ग्रहण करते रहेंगे या उसके निर्माण में एक सक्रिय दर्शक की भूमिका निभाएंगे ?  सक्रियता के लिए जरूरी है मीडिया और उससे जूड़े कारोबारी स्वार्थों की समझ ।

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(देवव्रत सिंह - माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल में व्याख्याता हैं । मीडिया के संदर्भों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लिखते हैं । संपर्कः जी-2, चाणक्य अपार्टमेंट त्रिलंगा, भोपाल, मध्यप्रदेश)

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

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