अमेरिकी मीडिया की मायामयी दुनिया
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बृजकिशोर कुठियाला
‘पत्रकार
होने के नाते मेरा कार्य सत्य की खोज करना है और मेरा कर्तव्य है कि मैं सत्य
की शुद्ध प्रस्तुति अपने समाचार पत्र में करूँ, इसके परिणामों से मेरा कोई लेना
देना नहीं है।’
लगभग तीन दशक पूर्व यह वक्तव्य एक प्रतिष्ठित व पुरस्कृत अमेरिका पत्रकार ने
न्यायालय में दिया था । मामला रंगभेद पर भड़के दंगे का था जिसमें यह माना जा
रहा था कि उक्त पत्रकार की ‘सत्य
की शुद्ध’
रिपोर्टिंग के कारण शिकागो नगर की एक छोटी घटना ने देशव्यापी दंगों का रूप ले
दिया था और 79 अमेरिका नागरिकों की हत्या हुई थी । तीस वर्षों में अमेरिका
मीडिया की सोच में परिवर्तन हुआ है। सत्य की खोज व प्रस्तुति तो पहले से भी
अधिक जोश से होती है परन्तु परिणामों के प्रति चेतना भी बढ़ी है। आज का अमेरिका
मीडिया कहीं न कहीं समाज के प्रति अधिक सजग व जिम्मेदार दिखता है। अकल्याणकारी
सत्य की प्रस्तुति का आग्रह काफी कम हुआ है और मीडिया के कार्य में परिणामों से
भी उसका लेना-देना है, ऐसी अनुभूति पाठक व दर्शक को होती है।
पिछले वर्षों
में भी अमेरिका जाना हुआ था। उस समय मीडिया ने ऐसा बातावरण बना रखा था, मानो
सद्दाम का ईराक मानवता का घोर शत्रु है और उसके पास सामूहिक संहार के आयुधों का
ऐसा भण्डा रहै जो विश्व को कई बार नष्ट करने की क्षमता रखता है। उस समय के
अमेरिकी प्रशासन की ईराक के प्रति आक्रामक नीति को पूरा मीडिया ने केवल समर्थन
देता दिखता था परन्तु ऐसा आभास होता था कि मानो मीडिया अमेरिका प्रशासन को ईराक
पर हमला करने के लिए प्रेरित कर रहा हो। बाद में जो तथ्य सामने आए उससे सिद्ध
हुआ कि सब मिथ्या प्रचार था और अमेरिका प्रशासन के पास ऐसे तथ्य नहीं थे जो
पूर्ण रूप से यह सिद्ध करते हों कि इराक के पास जनसंहार की क्षमताएं हैं।
परन्तु हाल ही
में अमेरिका फिर जाना हुआ और अधिकतर अमेरिका मीडिया आत्मविश्वेषण, पश्चाताप व
क्षमा याचना की स्थिति में नजर आया। लगभग हर समाचार व टेलीविजन वाहिनी में
नित्यप्रति चर्चा रहती थी कि किन परिस्थितियों में अमेरिकी मीडिया ने एक ऐसा
आडम्बर खड़ा किया था जिससे अधिकतर अमेरिका तत्कालीन सरकार के ईराक के प्रति
आक्रामक रवैये को समर्थन देने लगे। मीडिया में ऐसे उदाहरणों की भरमार थी कि किस
प्रकार व्हाइट हाऊस, विदेश विभाग व सीआईए ने मीडिया कर्मियों को काल्पनिक, गढ़ी
गई व आधी-अधूरी सूचनाएं दी और इस असत्य को प्रस्थापित किया कि ईराक में न केवल
सामूहिक संहार के हथियारों के उत्पादक केन्द्र हैं वरन ईराक सरकार उनके प्रयोग
की योजना भी रखती है। विश्व की पत्रकारिता के इतिहास में मीडिया द्वार
सार्वजनिक रूप से आत्मविश्लेषण करना व अपनी त्रुटियों को मानने का यह एक अनूठा
उदाहरण है। ऐसा लगता है कि मीडिया के विकास की यह एक नई दिशा भी है।
इसी संदर्भ
में एक और चिन्ताजनक प्रक्रिया का भी खुलासा हुआ । ऐसे तथ्य खुल कर सामने आ रहे
हैं जिससे यह सिद्ध होता है ईराक युद्ध से पूर्व तत्कालीन बुश प्रशासन ने
मीडिया विशेषज्ञों की सेवाओं का मीडिया को अवांछनीय रूप में प्रयोग करने का
भरपूर प्रयोग किया है। ‘चेनी
कम्यूनिकेशनस’की
निदेशिका केथरीन जे मार्टीन ने अपने ब्यानों में विस्तृत जानकारी दी है कि किस
प्रकार व्हाईट हाऊस में प्रेस सचिव अरी फेलेशर ने प्रतिष्ठित पत्रकारों को
मनगढ़ंत समाचारों को लीक करके मीडिया में जूठ का प्रसार करवाया। यहां तक कि
न्यूयार्क टाइम्स के डेविड सिंगर व वाशिंगटन पोस्ट के वाल्टर पिंकस (दोनों
अमेरीका के अति प्रतिष्ठित पत्रकारों में अग्रणी) भी इस मायाजाल के चंगुल में आ
गए ।
कैथरीन ने एक
और खुलासा किया है जो कि मीडिया प्रबन्धन के विशेषज्ञों के लिए अध्ययन का विषय
बन सकता है। उसने बताया कि प्रशासन की यह नीति थी कि ऐसी खबरें जो प्रशासन के
विरोध में हो पर उनका देना जरूरी हो उन्हें सप्ताह के अन्तिम दिनों में दिया
जाता था। शनिवार और रविवार को समाचारों को अपेक्षाकृत कम लोग देखते या सुनते है
और इस प्रकार नकारात्मक कम लोग देखते या सुनते है और इस प्रकार नकारात्मक खबरों
का प्रभाव कम हो जाता है।
समग्र दृष्टि
से देखा जाए तो अमेरिका समाज में मीडिया का उपयोग और प्रभाव अत्याधिक है।
आंकड़ों के अनुसार एक आम अमेरिकी नागरिक 24 घंटे में से लगभग 8 घंटे मीडिया के
संपर्क में व्यतीत करता है। इन आठ घंटों में समाचार पत्र पढ़ने में केवल आधा
घंटा ही लगता है, आधा घंटा वह पूर्व रिकार्डिंड संगीत को सुनता हा, लगभग तीन
घंटे रेडियो सुनता है। यह रेडियो सुनना अधिकतर कार में कार्यस्थान को आने-जाने
के समय होता है। घर पर बैठ कर आम अमेरिकी लगभग चार घंटे टेलीविजन देखता है।
समाचारों, सूचनात्मक कार्यक्रमों या शैक्षणिक विषयों के प्रति अमेरिकी जनता की
रूचि बहुत अधिक नहीं है। टेलीविजन के प्रयोग में अधिकतर अमेरिका जनता की रुचि
बहुत अधिक नहीं है। टेलीविजन के प्रयोग अधिकतर हंसाने-वाले अधिकतर कार्यक्रमों
की पृष्ठभूमि परिवार ही होती है, जिनमें पति-पत्नि, मां-बाप व बच्चों, पुरूष या
महिला मित्रों के सम्बन्धों के मजाक व हास्यास्पद स्थितियों का चित्रण होता है।
धारावाहिकों में सास-दामाद को काफी उजागर किया जाता है। सास-बहु के तनाव पर
आधारित कथानक लगभग अनुपस्थिति हैं। लगभग हर धारावाहिक में पूर्व पति या पूर्व
पत्नी के आपसी प्रेम व नराजगी को भी हंसने-हंसाने के लिए प्रयोग होता है। कुल
मिला कर लगभग सभी धारावाहिकों व लोकप्रिय फिल्मों में स्त्री को पुरूष से अधिक
प्रभावी व समझदार दर्शाया जाता है। समाज में वास्तविक स्थिति भी ऐसी ही है या
नहीं-यह शोध का विषय हो सकता है। वालमार्ट व अन्य बाजारों में पुरूषों व
स्त्रियों के व्यवहार को देखें तो आप पाएंगे कि पुरूष तो अधिकतर ट्राली धकेलते
नजर आते हैं । क्या लेना है, कितना लेना है यह तो स्त्रियां ही देती दिखती हैं।
पूरूषों के चेहरों को पढ़ने का प्रयास किया तो ऐसा लगा मानों वे खरीददारी करते
हुए आसपास के वातावरण से उदासीन परन्तु परिवार का कोई आवश्यक कार्य करने में
सन्तुष्टि प्राप्त कर रहे हों।
भारतीय मीडिया
की तुलना में दो भिन्नताएं अमेरिकी मीडिया में देखने में आई । एक तो यह कि
दुर्घटनाओं का वीभत्स समाचारों में न दिखाने की परम्परा है । 11 दिसम्बर की
भयंकर दुर्घटनाओं को दर्शाते हुए अमेरिकी मीडिया ने जो आत्म संयम रखा था, उसी
की परम्परा में बलात्कार या हत्या की घटनाओं में ऐसे दृश्य देखने को नहीं मिलते
जिनसे घिन आती हो या मन खराब होता हो । परन्तु स्त्री-पुरुष के शारीरिक
सम्बन्धों को दिखाने में यह संयम अमेरिकी मीडिया में नहीं है । जिन दृश्यों की
शब्दों में भी चर्चा आम भारतीय अंतरंग मित्रों से नहीं कर सकता वे अमेरिकी
टेलीविजन स्क्रीन पर भरपूर व खुले रुप से देखे जा सकते हैं । शायद मान्यताओं व
परम्पराओं का अन्तर है ।
दूसरी बात
भाषा की है । दो स्थितियों संभव है । या तो मीडिया समाज में आम बोलचाल की भाषा
का अनुयायी बने और जिस प्रकार के शब्दों व वाक्य रचना को साधारण पाठक आपसी
वार्तालाप प्रयोग करता है वही भाषा मीडिया भी प्रयोग करे जैसे-
‘हास्टलों
के वार्डनों ने रिजायन किया।’
या फिर मीडिया
ऐसे दायित्व के प्रति सजग हो कि जो भाषा मीडिया में प्रयोग होगी उसका प्रभाव
समाज में बातचीत में अवश्य होगा । ‘प्रजिडेट
ने कान्फ्रेंस का इनआगुरेशन किया’
या ‘राष्ट्रपति
ने सम्मेलन का उद्घाटन किया ।’
कौन सा उचित है ?
अमेरिकी मीडिया दूसरी स्थिति का समर्थक प्रतीत होता है । अमेरिकी समाज में
बोलचाल में कई तरह के विकृत शब्दों-स्लैंग का प्रयोग होता है परन्तु वहां के
समाचारों में प्रयोग होता है वे समाचार पत्रों में देखने को नहीं मिलते ।
उदाहरणस्वरुप जब कोई काम गलत हो जाता है तो आमतौर से जो शब्द प्रतिक्रिया के
रुप में निकलता है वह है ‘शिट’
। यह एक अभिव्यक्ति है शब्द के अर्थ के रुप में प्रयोग नहीं होता। परन्तु यह
शब्द समाचार पत्रों में नहीं दिखा, वास्तविक वक्तव्य का उद्धृत करते हुए भी
नहीं । टेलीविजन के धारावाहिकों में भी यह शब्द या इसी तरह के अन्य अभद्र शब्द
सुनने को नहीं मिलते । कुछ पत्रकारों से इस विषय में चर्चा उठाई तो पता लगा कि
आमतौर से हर समाचार पत्र में रिपोर्ट व उपसम्पादक से अपेक्षा की जाती है कि वे
शुद्ध व भद्र भाषा का प्रयोग करें । शब्दों का सही लेखन व उच्चारण, सरल वाक्य
रचना व व्याकरण के नियमों का पालन हर मीडियाकर्मी की अनिवार्य योग्यता मानी
जाती है ।
टेलीविजन
समाचारों में प्रस्तुतकर्ता (एंकर) के हाव-भाव व व्यवहार पर मेरा विशेष ध्यान
केन्द्रित था क्योंकि मैं भारतीय समाचार वाहिनियों में समाचार प्रस्तुति से
अपने आप में कुछ अटपटा महसूस करता हूं । मैंने पाया कि अमेरिकी समाचार
प्रस्तुतकर्ता अपने हाथों को इतना नहीं हिलाते जितना की अपने देश में होता है ।
अपने यहां को हाथों को आपस में बांधना, खोलना, बाजुओं को भिन्न-भिन्न स्थितियों
में अलग-अलग गति से ऊपर-नीचे लाना-प्रस्तुत की शैली बन गई है और नए
प्रस्तुतकर्ता इसी हाव-भाव को अपनाते हैं । इस तरह का नाटकीय अभिनय अमेरिकी
समाचारों की प्रस्तुति में लगभग अनुपस्थित है । कौन सी शैली उचित या अनुचित है
इस पर टिप्पणी करने की समझ मुझ में नहीं है परन्तु अन्तर और इसकी चर्चा भी
होनी ही चाहिए ।
दूसरी बात,
इसे भी मूल्यांकन न समझा जाए, एक ही प्रस्तुति में सूचना को बारम्बार देने की
है । अपने यहां पहले प्रोमो में समाचार देखने व पढ़ने को मिलता है, कई बार, फिर
प्रस्तुतकर्ता उसकी घोषणा करता है । फिर वायस ओवर में वही सूचना मिलती है । ऐसा
लगता है कि बार-बार बात को बता कर दर्शक के मन-मस्तिष्क में जानकारी को बिठा
देने का एक प्रयास रहता है । यदि इसी प्रक्रिया को अमेरिकी मीडिया में देखें
तो लगता है कि सूचना की हर प्रस्तुति और अधिक सूचना के लिए उत्सुकता पैदा करती
है । समाचारों के प्रोमो कम ही होते हैं । एंकर
समाचार की केवल घोषणा मात्र करते हैं और फिर ऐसा कुछ कहते हैं कि चलिए देखते
हैं घटनास्थल पर उपस्थित हमारे संवाददाता का क्या कहना है। संवाददाता घटना का
कुछ वितरण देता है और दर्शक को बाइट के द्वारा प्रत्यक्षदर्शी या विशेषज्ञ से
रूबरू करवाकर बात को और आगे बढ़ता है। वायस ओवर बहुत कम होते हैं और स्टूडियो
में किये गए ऐसे वायस ओवर जिनके द्वारा दर्शक को मिथ्यारूप से यह जताया जाए
मानो कि क्षेत्र से ही रिपोर्टिंग हो रही है, यह तो बिल्कुल नहीं होता। भारत
में हमें तय करना होगा कि टेलीविजन पत्रकारिता की व्यवहारिकता में व्यवसायिक
सिद्धान्त और सर्वमान्य मूल्य व धारणाएं क्या हों। व्यवसायिकता व सार्वजनिक हित
में सामंजस्य किस स्तर पर स्थापित होगा इस बात पर निर्भर करेगा कि कुल मिलाकर
हमारा बौद्धिक विकास कहां तक पहुंचा है।
अमेरिका में
पत्रकारिता 317 वर्ष पुरानी है, पहला समाचार पत्र
‘पब्लिक
अकेरेंस बोथ फारन एण्ड डोमेस्टिक’
1690 में एक दिन चला और तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने इसे बन्द कर दिया। इतिहास के
कई परिवर्तनों को झेलते हुए 1950 में कुल 1752 दैनिक थे। टेलीविजन के आगमन से
समाचार पत्रों की संख्या व पाठकों की संख्या दोनों की कमी आई है। वर्तमान में
लगभग 1400 समाचार पत्र चल रहे हैं परन्तु ऐसा लगता है कि यह संख्या और कम होगी।
पाठकों की संख्या में भी निरन्तर कमी आ रही है। फिर भी वर्तमान में लगभग 115
करोड़ दैनिक पत्र नित्य वितरित होते हैं जो कि विश्व में सबसे अधिक हैं। विशेष
बात यह है कि या तो समाचार पत्र मुफ्त में मिलता है या फिर भारतीय मापदण्ड से
काफी महंगा होता है। एक अच्छा समाचार पत्र पांच डालर (लगभग रूपये 225) का खरीदा
जा सकता है। घर-घर समाचार पत्र बांटने की सुविधा भी बहुत कम है और महंगी भी है।
आमतौर से चौराहों पर या बड़ी दुकानों पर मशीन में डेविट कार्ड या पैसा डाल कर
लेना होता है। वहां के चोटी के पांच समाचार पत्र है
‘वाल
स्ट्रील जरनल’(17,62,751)
‘यूएसए
टुडे’
(16,92,666), ‘द
न्यूयार्क टाइम्स’
(1,079,180), ‘लास
एन्जिलस टाइम्स’
(10,33,338) और ‘वाशिंगटन
पोस्ट’
(7,62,009) ( यह आंकड़े वर्ष 2000 के हैं)। टेक्नालॉजी व पृष्ठ सज्जा की दृष्टि
से यूएसए टुडे की अपनी पहचान है। इसमें शीर्षक व चित्र आदि मुख्य रूप से उभरते
है और समाचार लेखन छोटे-छोटे फीचर के रूप में होता है। टेलीविजन की समाचार लेखन
कला का सीधा प्रभाव इसमें दिखता है जिसे धीरे-धीरे अन्य समाचार पत्र भी अपनाते
नजर आते हैं।
अमेरिका में
लगभग 13 हजार पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है जिनमें से 90 की वितरण संख्या
10लाख से अधिक है। उल्लेखनीय है कि सबसे अधिक वितरण संख्या की पत्रिकाएं
सेवानिवृत लोगों के लिए हैं- ‘एनआरटीएस
बुलेटिन’(दो
करोड़ 14लाख) व ‘माडर्न
मैच्योरिटी’(एक
करोड़ 83 लाख)। अमेरिका में विशेष विषयों पर आधारित न्यूजलेटर्स का भी बहुत
प्रचलन है जो साप्ताहिक या पाक्षिक निकलते हैं।
पिछली शताब्दी
के तीसरे व चौथे दशक में अमेरिका में रेडियो का बोलबाला रहा। दूसरे विश्वयुद्ध
में रेडियो का भरपूर प्रयोग सूचना व प्रचार के लिए हुआ । उस समय के राष्ट्रपति
फ्रैन्कलिन रूजवेल्ट की रेडियो पर ‘फायरसाइड
चैट’
अत्यन्त लोकप्रिय कार्यक्रम था जिसके द्वारा प्रशासन की बात जनता तक प्रभावी
ढंग से जाती थी। टेलीविजन के आगमन से रेडियो का महत्व बहुत कम हो गया परन्तु
1970-80 में रेडियो का एफएम के रूप में पुनर्जन्म हुआ और आज संगीत, स्थानीय
समाचारों, मौसम के समाचार व सड़कों पर आवागमन की स्थितियों के बारे में वाहनों
में रेडियो महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है । कुल मिलाकर अमेरिका में दस हजार से
अधिक रेडियो स्टेशन विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों द्वारा चलाए जाते हैं।
जनसंचार के माध्यम के रूप में अमेरिका में टेलीविजन के हैं और औसतन हर 100 घरों
में 240 टेलीविजन हैं। चैनलों की संख्या का आंकड़ा तो है ही नहीं क्योकि नित्य
चैनल बन्द होते हैं और नए खुलते हैं। विषय आधारित चैनलों की संख्या अत्याधिक
हैं। अधिकतर चैनल केबल से ही प्राप्त होते हैं, 350 से अधिक टेलीविजन चैनल
सार्जनिक क्षेत्र में हैं जिनकी विषयवस्तु मुख्यतः सूचनात्मक व शैक्षणिक होती
है।
टैक्नालॉजी
का अद्वितीय संगम यहां देखने को मिला। होटल के कमरे में इंटरनेट की तीन तरह की
सुविधाएं हैं। अपने लेपटॉप पर यदि आपके पास वाई-फाई प्रणाली है तो पूरे होटल
में कहीं भी इंटरनेट आपको बिना किसी भी शुल्क के उपलब्ध है और वैंडविड्थ अच्छी
होने के कारण स्पीड भी मजेदार हैं। वाई-फाई होने पर आप कमरे में लगे टेलीफोन से
तार जोड़कर इंटरनेट का प्रयोग कर सकते हैं। लैपटॉप न होने की स्थिति में कमरे
में उपलब्ध टेलीविजन
पर भी
इंटरनेट कर सकते हैं । टेलीविजन
के साथ
की-बोर्ड है, तयशुदा शुल्क के कम्प्यूटर पर ही भुगतान करके आपको इंटरनेट की
सुविधा उपलब्ध हो जाएगी।
टेलीविजन
के
कार्यक्रमों की विविधता व उनके निर्माण का स्तर भी उल्लेखनीय है किसी भी भारतीय
को कुछ कार्यक्रम तो चौकाने वाले लगते हैं पर कुछ ऐसे भी कार्यक्रम हैं जिनमें
भारतीय धारावाहिकों की झलक दिखती है। वृद्धों के लिए बनाए गए कार्यक्रम में
चर्चा के विषय होते हैं कि उस सामान का क्या करें जो आपके बच्चे आपके घर में
छोड़ गए हैं और न तो उसे उठाते हैं और न ही उसे कबाड़ में फेकने देते हैं । एक
और कार्यक्रम है जिससे ऐसे नुस्खे बताए जाते हैं कि कर्जा अधिक होने पर दिवालिए
होने पर भी किस प्रकार लाभ उठाया जा सरता है। विज्ञापनों में भी मजेदार
विरोधाभास है। अनेक विज्ञापन ऐसे हैं जिनमें अनेक प्रकार के भोजनों का प्रचार
होता है। इनके साथ ही ऐसे विज्ञापनों की भी भरमार है जिनमें मोटापा कम करने या
पतला रहने के उपकरणों का प्रचार होता है। ऐसा लगता है कि टेलीविजन के विज्ञान
दर्शकों को खूब खाने के लिए प्रेरित करते हैं और फलस्वरूप मोटापा आता है और वजन
बढ़ता है इसके लिए उपकरणों को प्रबंध भी कर दिया जाता है। कुल मिलाकर मूलभूत
आवश्यकताओं की पूर्ति समस्या नहीं लगती परंतु समस्या बनाना फिर उसका समाधान
देना यही अमेरिका के बाजार का दर्शन समझ में आता है।
मीडिया की
दृष्टि से देखें तो अमेरिका के युवा वर्ग में आई-पॉड का प्रचलन बहुत बढ़ा है।
सार्वजनिक स्थानों पर कानों में इयर प्लग लगाए आस-पास के वातावरण से अनभिज्ञ
युवक युवतियां बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं। यह माध्यम व्यक्तिगत हैं और
निजी रूचियों के अनुसार प्रयोग किए जा सकते हैं। विद्यार्थियों के लिए कक्षा के
भाषण भी इन उपकरणों पर हो सकते हैं।
कुल मिलाकर
अमेरिका में कुछ सप्ताह बिताने पर ऐसा आभास तो होता है कि वहां के समाज की
भौतिक निवास की मायामयी रचना में मीडिया एक मुख्य कारक है। यदि वर्तमान अमेरिका
समाज अभी तक मीडिया संचालित नहीं भी हुआ है तो भी तीव्र गति से इस स्थिति की ओर
अग्रसर है। जिस आदर्श समाज की रचना की योजना व कामना अमेरिका नेतृत्व ने
समय-समय पर की है मीडिया उसको साकार बनाने में अपना सहयोग करता हुआ दिखता है।
क्या ऐसा कुछ अनुभव हमें अपने मीडिया से भी होता है
!
शायद नहीं !
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बृजकिशोर
कुठियाला -
जनसंचार शिक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्म नाम। संप्रति
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पत्रकारिता
एवं जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष हैं।
संपर्क : पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
कुरूक्षेत्र विवि, कुरूक्षेत्र
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