Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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स्मृति-शेष

 

 

 

हनुमान-भाव के साधक थे भानु जी

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राजनाथ सिंह 'सूर्य'

 

 

भानुप्रताप शुक्ल राष्ट्रीय विचारों की अविरल अभिव्यक्ति करने वाले हिन्दी के प्रख्यात स्तंभकार था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उन्होंने जो वैचारिक दृढ़ता और आचरण की पारदर्शिता प्राप्त की थी, उसका जीवन के अंतिम क्षण तक निर्वाह करते रहे । इन दोनों ही प्रसंगों में उन्होंने कभी किसी स्तर पर किसी के भी साथ समझौता नहीं किया ।

 

बस्ती जनपद के अत्यंत पिखड़े इलाके में जन्मे और सुलतानपुर में पले-बढ़े । भानु जी, यही उनके लिए आम संबोधन था- बाल्यकाल में ही माता-पिता के स्नेह से बंचित हो गये थे, लेकिन उनका स्वयं का जीवन स्नेह का अथाह सागर था। यही कारण है कि जो एक बार भी उनके संपर्क में आया, भले ही उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता भिन्न रही हो, उनका निकट मित्र हो गया ।

 

भानु जी से मेरी भेंट 1953 के संघ शिक्षा वर्ग कानपुर में हुई थी। यहां देखा-देखी मात्र ही थी। हम दोनों उनके शिक्षार्थी थे। लेकिन 1956 से लेकर 1664 तक प्रत्येक वर्ष संघ शिक्षा वर्ग में शइक्षक के रूप में हमारी न केवल भेंट होती रही, वरन प्रगाढ़ता भी बढ़ती गयी।

 

कठिन परिस्थितियों में इन शिक्षावर्गों में कार्यक्रमों से थकान के कारण केवल शिक्षार्थी ही नहीं, शिक्षक भी शिथिल हो जाया करते थे । भानु जी के साथ प्रत्येक वर्ग में शिक्षकों का एक गैंग-यही नाम दिया था (स्व.) माधव जी ने-बन जाया करता था, जो हास-परिहास से बोझिल वातावरण को शिथिल कर देता था और लोगों की थकान दूर हो जाया करती थी । अस्वस्थता के कारण असह्य पीड़ा के दौर में भी नयी दिल्ली के बंगाली मार्केट स्थित उनके आवास पर चार-छह मित्रों की मंडली ठहाकों में डूबी रहती थी ।

 

अस्वस्थता भानु जी के साथ युवावस्था से ही मानों चिरसंगिनी बन गयी थी। पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वे संघ के प्रचारक बन गये थे और जब स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया, तो इलाज के लिए 1972 में लखनऊ आ गये। संघ कार्य करते हुए यहां पर राष्ट्रधर्म प्रकाशन से जुड़े और बाद में तरूण भारत तथा पाञ्चजन्य के संपादक भी रहे । मैं भी 1962 में हिन्दुस्तान समाचार का संपादक बनकर लखनऊ आ गया था। तब से लेकर मृत्यु के एक महीने पूर्व तक हमारी भेंट, वार्ता, चिंतन, मनन की निरंतरता बनी रही।

 

कुछ काल 1970 से 1974 तक उनके संपादकत्व में निकलने वाले तरूण भारत से भी मैं जुड़ा रहा। इस अवधि में अनेक चढ़ाव-उतार और अभावग्रस्तता के होते हुए भी तरूण भारत (सान्ध्य दैनिक) की प्रतीक्षा राजनीतिक और समाचार पत्रों से जुड़े लोगों को उत्सुकता से रहती थी । प्रतिदिन तरूण भारत में ऐसे समाचार प्रकाशित होते थे, जिनकी धमक काफी समय तक बनी रहती थी ।

 

तरूण भारत ने ही सबसे पहले यह समाचार दिया कि उत्तर प्रदेश पुलिस में विद्रोह हो सकता है तथा यह भी कि पंडित कमलापति त्रिपाठी मुख्यमंत्री पद से हटाये जा रहे हैं । आपात-स्थिति के आने की चेतावनी भी सबसे पहले तरूण भारत ने ही दी थी ।

 

आपातकाल के दौरान तरुण भारत और पाञ्चजन्य बंद हो गये  थे । आपातकाल समाप्त होने पर तरुण भारत का लखनऊ से पुनः प्रकाशन हुआ, लेकिन पाञ्चजन्य दिल्ली चला गया और उसी के साथ भानू जी का भी लखनऊ छूट गया । वे एक दशक से भी अधिक समय पाञ्चजन्य के संपादक रहे । मैं जब 1988 में स्वतंत्र भारत का संपादक बना, तो उनसे नियमित लिखने का आग्रह किया । उन्होंने अस्वीकार कर दिया । बोले पाञ्चजन्य के अलावा कहीं नहीं लिखूंगा । मैंने उनके पाञ्चजन्य के संपादकीय लेख को ही संशोधित कर प्रकाशित करना शुरु कर दिया ।

 

पाञ्चजन्यके संपादक के दायित्व से मुक्त होने के उपरांत, यही प्रकाशन उनके व हिन्दी के विभिन्न समाचार पत्रों में लेखन का आधार बना । पहले उन्हें संकोच था । लेकिन दिल्ली में रहकर उन्होंने समाचार पत्रों से जुड़े लोगों से जिस प्रकार का संपर्क बना रखा था, उनके कारण उनके लेखों की मांग बढ़ती गयी और शायद ही ऐसा कोई हिन्दी का समाचार पत्र होगा, जिसने भानू जी के विचारों को प्रकाशित करने में संकोच किया हो ।

 

स्तंभकार बनने के पूर्व से ही उन्होंने वैचारिक पृष्ठभूमि तो सकमझने-समझाने वाली अनेक पुस्तकों का संपादन किया । संघ के द्वितीय सरसंघचालक प.पू.गुरुजी उनके आदर्श थे, दीनदयाल जी उनके प्रेरणा और दत्तोपंत ठेगड़ी उनके लिए वैचारिक भावना के नूतन स्वरुप के मार्गदर्शक । नाना जी के प्रति श्रद्धा और फिर साध्वी ऋतंभरा द्वारा स्थापित वात्सल्य ग्राम योजना के लिए पूर्ण समर्पण । भानु जी हनुमान भक्त थे । उनका स्वयं सेवकत्व भी इसी भक्ति भावना से ओतप्रोत था । इसलिए किसी भी कार्य का श्रेय लेने से जहां उनका परहेज बना रहा वहीं शासकीय मान्यताओं, अलंकरणों और उपहारों को स्वीकार करने का आग्रह  विभिन्न मित्रों द्वारा भी दिए जाने पर उन्होंने स्वीकार नहीं किया ।

 

अस्वस्थता उनके शरीर को क्षीण करती जा रही  थी । जब चार वर्ष पूर्व कैंसर होने की जानकारी मिली, तो भी उनके क्रियाकलापों में अंतर नहीं आया ।  डेढ़ वर्ष पूर्व से उनका हाथ काम नहीं कर रहा था । उन्होंने लेखन बंद करने का इरादा हम लोगों पर जाहिर किया । हम सभी ने इसका विरोध किया और उन्होंने हमारा आग्रह स्वीकार कर बोलकर लिखाना जारी रखा ।

 

उनकी मृत्यु के उपरांत जो अंतिम लेख प्रकाशित हुआ, यद्यपि वह बहुत पहले लिखा गया था, लेकिन ऐसा लगता है कि उसे उन्होंने प्रयाण के समय के लिए संजोकर रखा था । संघ के सच्चे स्वयंसेवक के समान उन्होंने जिस कार्य को भी हाथ में लिया, उसे पूरी प्रमाणिकता से पूरा किया और फिर हनुमान-भाव से प्रशंसा और पुरस्कार से दूर चले जाते रहे । उनके रुप में वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ संघ बाह्म व्यापक संपर्क और प्रतिष्ठा अर्जित करने वाले स्वयंसेवकों की वर्तमान समय में सर्वाधिक आवश्यक है । भानु जी का जाना एक अपूर्णीय क्षति है ।

      

 

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रबंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन- जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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