उद्योग ने बनाया सीईओ
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बसंत कुमार तिवारी
पत्रकारिता
को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना गया है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका
के कार्यों की नीतिगत आलोचना कर पत्रकारिता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इन तीन
स्तंभों को नियंत्रित कर चौथें स्तंभ की भूमिका अदा करती है। दरअसल, लोकतंत्र
ही क्यों, यह भूमिका देवकलाओं में ‘नारद’
ने और महाभारत में ‘संजय’
ने भी निभाई है, पर उनका स्परूप लोकतंत्र की भूमिका से कुछ अलग दिखाई देता है।
भारत में अंग्रेजों के शासनकाल में भी कमोबेश यही स्थान रहा है, पर आजादी की
लड़ाई के दौर में पत्रकारिता की भूमिका बहुत स्पष्ट हुई और शायद यहीं आकर वह
मिशन बन गई । भारत के आधी सदी के लोकतंत्र के वर्तमान मोड़ पर पत्रकारिता के
मिशन या व्यवसाय होने को लेकर जो सवाल उठता है, उसी से जुड़ा सवाल संपादक नाम
की संस्था के समाप्त होने का भी उठाया जाता है।
मेरी अपनी
मान्यता यह है कि जहां तक पत्रकारिता का प्रश्न है, वह आज भी मिशन ही है।
समाचार पत्र अवश्य ही व्यवसाय हो गये हैं। अतः पत्रकारिता और समाचार पत्रों के
भीच उनकी पूरक भूमिका की जगह स्थिति कुछ भिन्न नजर आती है। समाचार पत्र अब
उद्योग बन गये हैं, अतः उनका स्वरूप व्यवसायी ही है, पर पत्रकारिता अभी भी आम
आदमी के लिए संघर्ष करती है। अतः उसका स्वरूप मिशन का ही है। यह जरूर है कि
दोनों के भीच जो संतुलन अपेक्षित था, वह नहीं रह गया है। पत्रकार कभी भी
यथास्थिति को स्वीकार नहीं करता और बेहतरी और उससे बेहतरी के लिए निरंतर काम
करता रहता है। व्यवसाय कुछ समय यथास्थिति को स्वीकार करना है, पर उसकी बेहतरी
अर्थ अर्जन तक सीमित रहती है। समाज की बेहतरी उसका मूल विषय नहीं रह गया है, पर
पत्रकार और पत्रकारिता का ध्येय तो आम आदमी ही है।
आजादी के दौर
में पत्रकारिता का लक्ष्य आजादी हासिल करना और कराना था । आजादी के बाद लगभग एक
दशक तक पत्रकारिता भी उसी तरह व्यस्त रही जैसी की देश की अन्य व्यवस्था। विधि
विधान के लोक कल्याण कार्य राज्य की स्थापना में। फिर दूसरे दशक में जब देश,
विकास और निर्माण को लेकर आगे बढ़ा तब पत्रकारिता भी उसी दिशा में रही । यह
स्थिति तीसरे दशक के साथ बदल गई। आपातकाल के दौरान पत्रकारिता की भूमिका,
स्वरूप और रचनात्मक प्रतिपक्ष से बदलकर आक्रामक प्रतिपक्ष की हो गई।
परिस्थितियों के कारण ऐसा हुआ। आपातकाल के दौर में देश के संस्थाओं की समाप्ति
शुरू हुई, जो संस्थागत व्यवस्था थी उसे सत्ता ने क्रमशः समाप्त किया और सस्थाओं
की भी प्रतिपक्ष की भूमिका बदल गई । यही वह समय था जब समाचार पत्रों और
पत्रकारिता में संपादक की संस्था भी नेपथ्य में आने लगी और अब तो लगभग नगन्य
होकर रह गई है।
आपातकाल ने
तमाम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और संस्थाओं को नियंत्रित कर दिया और उनकी
प्रतिपक्ष की भूमिका का नुकीलापन समाप्त कर दिया । सत्ता के समक्ष समझौते के
लिए अनिवार्य और अपरिहार्य स्थितियां पैदा कर दी। लोकतंत्र का विपक्ष तो
धीरे-धीरे उग्र हुआ और 77 के आम चुनाव में सभी ने विपक्ष की विजय दर्ज भी कराई
। एक अल्पकालीन उपलब्धि के बाद विपक्ष बिखरता गया और पत्रकारिता का भी स्वरूप
बदल गया। यही वह समय था जब समाचार पत्र के मालिकों और व्यवस्था ने सत्ता से
समझौतों की शुरुआत की और 80 के बाद तो स्वरूप पूरी तरह बदल गया। समाचार जगत में
संपादक कमोबेश विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों की मिलीजुली भूमिका
अदा करता था, वह सिमटकर व्यवस्था का एक अंग बनकर रह गया। समाचार पत्र की नीति
का निर्धारण और उस पर अमल करने की संपादक की भूमिका समाप्त हो गई। नीति का
निर्धारण और क्रियान्वयन समाचार पत्रों के मालिक करने लगे और संपादक की भूमिका
एक सलाहकार की रह गई । पर मालिकों पर सलाह मानने की कोई बाध्यता नहीं रही।
यह सही है कि
आजादी के बाद संपादक की वह स्थिति नहीं रह गई, जो लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की
‘केसरी’
में थी या महात्मा गांधी की ‘हरिजन’
में और माधवराव सप्रे जैसे की ‘छत्तीसगढ
मित्र’
में थी। आजादी के लगभग ढाई दशक तक इसमें बहुत परिवर्तन नहीं आया था, जो संपादक
समाचार पत्र के मालिक नहीं थे, उनकी भी सलाह मानी जाती रही और उन्हें नीति
निर्धारण में स्वायत्तता पुनः प्राप्त हो सकती है और संपादक नामक संस्था की
पूर्नस्थापना हो पाएगी।
इस प्रश्न का
दो टूक उत्तर दे सकना शायद ही संभव है। कठिनाई यह है कि यह
‘प्रयोजन’
का दौर है। सब कुछ प्रायोजित हो रहा है। विज्ञापन और व्यापार का प्रायोजित
होना स्वाभाविक है, पर जब राजनीति भी प्रायोजित हो जाए, तब स्थिति विसंगत हो
जाती है। “राजनीति
दरअसल जननीति”
होनी है, क्योंकि वह जनहित में होती है और होना ही चाहिए। जनहित स्वप्रेरित
होता है उसे प्रायोजित और सुविधानुसार परिभाषित नहीं किया जा सकता। समाचार पत्र
उद्योग यदि अपने व्यवसायिक हितों और ‘जनहित’
को स्पष्ट रूप से अलग कर सकें तो स्थिति बदल सकती है। समाचार पत्र उद्योग जनहित
के मुद्दों को लेकर सत्ता पर दबाव पैदा करता है, पर अपने हित में जनहित में
अपेक्षाकृत कम ही। जनहित की संपादक की परिभाषा और समाचार पत्र उद्योग की
परिभाषा में अंतर नहीं हो, तब काफी कुछ सुधार हो सकता है। आज भी काफी
बुद्धिजीवी संपादक हैं जो संपादक नामक संस्था का महत्व बनाए हुए हैं। यद्यपि
उन्हें काफी कठिनाई होती है। यही वह वर्ग है जो स्थितियां बदल सकता है। समाचार
पत्र और पत्रकारिता से जुड़े लोगों को निराशाजनक रूख नहीं अपनाना चाहिए ।
समाचार पत्र
उद्योग ने संपादक को जो सी.ई.ओ. बनाकर रख दिया है, उसे बदलकर पुनः संपादक बनाने
का प्रयास निरंतर पत्रकारों को करना चाहिए । सत्ता से समझौता करके लोकतंत्र में
जनहित नहीं किया जा सकता । सत्ता के सामने प्रतिपक्ष की भूमिका से ही आम आदमी
का हित साधा जा सकता है। पत्रकारिता ही सही प्रतिपक्ष है यह सदैव स्मरण रहना
चाहिए । जनहित उसका लक्ष्य है। संवाद और संप्रेषण पत्रकारिता का मूलमंत्र है।
उसके बिना कोई भी तंत्र नहीं चल सकता। यही वह रजतरेखा है जो संपादक और
पत्रकारिता की स्वायत्तता पुनर्स्थापित कराएगी।
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(बसंत
कुमार तिवारी -
छत्तीसगढ़ के वरिष्ठतम पत्रकारों में से एक । देशबंधु के
संपादक रहे । कई पुस्तकें प्रकाशित । इन दिनों रायपुर में रहकर स्वतंत्र लेखन
।
संपर्कः 93 विवेकानंद नगर, रायपुर,
छत्तीसगढ़ )
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