राष्ट्र का एकमात्र अंग राजनीति ही
नहीं
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बाबूराव विष्णु पराड़कर
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“राष्ट्रियता
की अलख जगाने के लिए श्री शिवप्रसाद गुप्त ने 5 सितम्बर 1920 की काशी से हिन्दी
दैनिक समाचार पत्र ‘आज’
का प्रकाशन आरंभ किया । 1917 में स्थापित ज्ञानमंडल इसका प्रकाशक बना और श्री
बाबूराव पराड़कर संपादक नियुक्त हुए ।
‘आज’
के मुखपृष्ठ पर रामचरितमानस की चौपाई की यह अर्द्धाली छपती थी -
“पराधीन
सपनेहु सुख नाहीं ।”
तत्कालीन अन्य समाचार पत्रों की तुलना में
‘आज’
का कलेवर बहुत बेहतर था और एक अच्छे दैनिक समाचार अभिकरण
‘रायटर’
की सेवाएं ली थीं । संवाददाताओं की भी नियुक्ति प्रायः सभी प्रमुख स्थानों पर
की गई थी । प्रवेशांक में प्रकाशित ‘आज’
का पहला अग्रलेख उसका पाथेय स्पष्ट करने में समर्थ है और इस पथ से वह राष्ट्रीय
आंदोलन के काल में कठिन कष्ट सहकर भी विमुख नहीं हुआ ।
‘आज’
का यह प्रथम अग्रलेख मीडिया विमर्श के लिए हम प्रकाशित कर रहे हैं ।”
- संपादक
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जब
कोई नया संसार में प्रवेश करने का साहस करता है तो यह साधारण नियम हो गया है कि
प्रथम वह अपना उद्देश्य बतलाए अर्थात उसको दिखलाने का यत्न करे कि वह किसी अभाव
को पूर्ण करने को आया है । सारांश यह है कि प्रत्येक नए पत्र को क्षमाप्रार्थी
के रुप में आना पड़ता है । हम इस परम्परा को तोड़ने की धृष्टता नहीं कर सकते और
आज कृष्ण जयंती के शुभ अवसर पर सर्वसाधारण के सम्मुख उपस्थित होते हुए हमको जो
कुछ प्रार्थना करना है, सो करेंगे । प्रथम तो हमने अपना नाम क्यों रखा, सो
बतलाना चाहिए । हमारा पत्र दैनिक है । प्रत्येक दिन इसका प्रकाशन होगा ।
संसारभर के नए से नए समाचार इसमें रहेंगे । दिन-प्रतिदिन संसार की बदलती हुई
दशा में नए-नए विचार उपस्थित करने की आवश्यकता होगी । हम इस बात का साहस नहीं
कर सकते कि हम सर्वकाल, सर्वदेश, सर्वावस्था के लिए जो उचित, युक्त और सत्य
होगा, वही सर्वदा कहेंगे । हमको रोज-रोज अपना मत तत्काल स्थिर करके बड़ी-छोटी
सब प्रकार की समस्याओं को समयानुसार हल करना होगा । जिस क्षण जैसी आवश्यकता
पड़ेगी, उसी की पूर्ति का उपाय सोचना और प्रचार करना होगा। अतएव हम एक ही रोज
की जिम्मेदारी प्रत्येक अंक में ले सकते हैं । वह जिम्मेदारी प्रत्येक दिन केवल
आज की होगी, इस कारण इस पत्र का नाम ‘आज’
है ।
दूसरा प्रश्न
यह है कि हम जन्म क्यों ले रहे हैं ?
क्या और पत्र नहीं है ?
क्या हम उनसे प्रतिद्वंद्विता के भाव से आगे बढ़ रहे हैं
?
इसका उत्तर हमें यह देना है कि हमारा भाव कदापि ऐसा नहीं है । हम अन्य पत्रों
को हटाना नहीं चाहते । हम उनके समकक्ष बैठना चाहते हैं । हम नम्रतापूर्वक आशा
करते हैं कि देशोन्नति के शुभ कार्य में हमारा उनका सहयोग होगा । वे हमारी और
हम उनकी त्रुटियों की पूर्ति करेंगे और हम सब साथ चलकर देश की स्वतंत्रता के
युद्ध में विजय पाने का यत्न करेंगे ।
तीसरी बात यह
है कि हमारे विशेष उद्देश्य क्या हैं ?
हमारे संचालकों की ओर से प्रकाशित कर्त्तव्य सूचना पत्र में लिखा है कि
“भारत
के गौरव की वृद्धि और उसकी राजनीतिक उन्नति
‘आज’
का विशेष लक्ष्य होगा ।”
भारत का राजनीतिक आकाश इस समय घनघोर घटाओं से आच्छादित है । हम किधर जा रहे हैं
इसका पता नहीं लग रहा है । भिन्न-भिन्न लोग अपनी बुद्धि और शक्ति के अनुसार
भिन्न-भन्न मार्गों पर हमें ले जा रहै हैं । साधारण स्त्री-पुरुष जो अपने
प्रतिदिन के कर्त्तव्य पालन में लगे हैं और जिनको राजनीति आदि गूढ़ विशयों पर
विचार करने का अवकाश बहुत नहीं मिलता, वे किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गऐ हैं । वे
नहीं समझ रहे हैं कि क्या हो रहा है और क्या होगा
?
ऐसी अवस्था में हमको यह आशा है कि दिन-प्रतिदिन की समस्याओं को हमारा पत्र
स्पष्ट रुप से दर्शाएगा और उन सबको आगे चलने का मार्ग दिखलाएगा । वे आज सशंक
साधारण तौर से स्वराष्ट्र दल के हैं । स्वराष्ट्र दल से हमारा मतवब नहीं कि जो
कांग्रेस कहेगी, इसका हम अवश्य ही पालन करेंगे । संभव है कि कांग्रेस कहेगी,
उसका हम अवश्य ही पालन करेंगे । संभव है कि कांग्रेस आज नहीं तो कल अधिकतर ऐसे
सज्जनों से भर जाए जो राष्ट्रीयता के पक्षपाती नहीं हैं । उस रोज हमारा साथ
कांग्रेस का नहीं रहेगा । हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए हर प्रकार से
स्वतंत्रता पाने का है । हम हर बात में स्वतंत्र होना चाहते हैं । हमारा लक्ष्य
यह है कि हम अपने देश का गौरव बढा़एं । हम अपने देशवासियों में स्वाभिमान का
संचार करें । उनको ऐसा बनाएं कि भारतीय होने का उन्हें अभिमान हो, संकोच नहीं ।
यह स्वाभिमान स्वतंत्रता देवी की उपासना करने से मिलता है । जब इसमें आत्मगौरव
होगा तो अन्य भी हमको आदर और सम्मान की दृष्टि से देखेंगे ।
“जब
हमारा पद, हमारा घर ऊंचा होगा तो बाह हमको कोई निरादर करने का साहस न करेगा ।
इस दक्षिण और ”पूर्वी
अफ्रीका में भारतवासियों की दुर्दशा का दुःसमाचार रोज न सुनना पड़ेगा । अतः हम
अपने देश का गौरव अपनी आंखों में और दूसरों की आंखों में बढा़ते हुए स्वतंत्रता
प्राप्त करने का पूरे तौर से यत्न करेंगे । यह तो राजनीति के संबंध में हमारा
सिद्धांत हुआ । राजनैतिक सुधार, नई परिषदों आदि के संबंध का गौरव बढ़े । भारत
और भारतीयता का नाम संसार में आदर के साथ लिया जाए । जिन-जिन कार्यों से ऐसा
होगा, उसके हम पक्षपाती हैं । जिससे इसके विपरीत होगा, उसके हम विपक्षी हैं ।
साथ ही यह कहना अत्यावश्यक है- क्योंकि इसी से समझ में फरक पड़ जाता है कि हम
जाति-जाति में देश में किसी प्रकार का झगड़ा नहीं चाहते, न हम व्यक्ति-व्यक्ति
में वैमनस्य ही पसंद करते हैं । यथासंभव हम यह यत्न करेंगे कि व्यक्ति विशेषों
पर कटाक्ष न हो, केवल उनके विचारों की ही समीक्षा-परीक्षा हो । हमारा यह यत्न
रहेगा कि किसी के चरित्र को और उसके रहस्य जीवन की बातों को प्रकाशित करके उसका
अनादर न किया जाए । स्वामी विवेकानंद के वाक्य से हम सहमत हैं कि किसी व्यक्ति
विशेष के रहस्य जीवन का निपटारा उसका स्वामी परमेश्वर और वह स्वयं कर ले । हमको
उसके सामाजिक जीवन से ही केवल मतलब है । अतः हमारा यह विशेष प्रयत्न रहेगा कि
किसी व्यक्ति के ऊपर कटु वाक्य का प्रयोग न हो और न किसी जाति विशेष से द्वेष
फैलाया जाए । हम अपना सम्भालने उठे हैं दूसरों का ढहाने नहीं । हां, यदि अपना
घर ठीक करने में हमारी कोई बाधा करे तो उसके प्रतिकार का यत्न हमें अवश्य करना
होगा ।
पर राष्ट्र का
एकमात्र अंग राजनीति ही नहीं है । पाठकों का प्रश्न यह अवश्य होगा कि
आध्यात्मिक, आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक विषयों में हमारी नीति क्या है । इसका
उत्तर देना आवश्यक है । शिक्षा, जिससे मानसिक उन्नति होगी, वाणिज्य, व्यवसाय,
कृषि आदि इस विषयों की तफसील न देकर इतना कहना पर्याप्त होगा कि हम उचित देशकाल
अनुकूल शिक्षा के नितांत पक्षपाती हैं । हम चाहते हैं कि देश में सर्वव्यापक और
उपयुक्त शिक्षा हो जिससे लोग अपने कर्त्तव्य और अपने अधिकार को पूरी तौर से
समझें, कर्त्तव्य पालन में अपने अधिकार न भूलें और अधिकारों पर अड़े रहते हुए
भी अपने कर्त्तव्य से कदापि विमुख न हों । हमारे पत्र में शिक्षा संबंधी सब
प्रकार के विचारों के लिए स्थान सदा खुला रहेगा और उच्च, माध्यमिक और प्रारंभिक
शिक्षा के प्रस्ताव हम सहर्ष छापेंगे । साथ ही साथ हमारा यह उद्देश्य रहेगा कि
शिक्षा ऐसी दी जाए, जिससे शिक्षित लोगों को उचित रोजगार मिलने में कठिनाई न हो
और वे अपना जीवन आनंद और गौरव के साथ काट सकें । व्यापार, व्यवस्था, कृषि आदि
की उन्नति पर यह पत्र सदा जोर देगा और इनको बढ़ाने के उपायों को बराबर बतलाने
का यत्न करेगा क्योंकि हम यह मानते हैं कि बिना धन के, बिना धन-धान्य से पूरा
करना है और प्रत्येक नर-नारी को पर्याप्त अस्त्र-वस्त्र और उचित आमोद-प्रमोद की
सामग्री देनी है ।
प्रश्न अब
सामाजिक और धार्मिक सुधारों और परिवर्तनों का रह गया है । इन विषयों पर हमारी
क्या नीति होगी ?
एक वाक्य में यदि हमें बताना हो तो हम यह कहेंगे कि इस विषयों में भी हम
स्वतंत्रता चाहते हैं । हम यह नहीं चाहते कि किसी व्यक्ति पर उसका समाज अनुचित
दबाव डाले या उससे ईर्ष्या कर उसे नाश करने का यत्न करे । हमारी ह्रदय से इच्छा
है हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी और अन्य अनेक मत-मतांतर जो हमारे देश में हैं,
उनके अनुयायी परस्पर स्नेह से रहें । अपना मत दूसरे पर जबर्दस्ती न लादें । हम
चाहते हैं कि अपनी-अपनी रस्मों का अनुसरण करते हुए एक-दूसरे के विश्वासों का
आदर करें और निष्कारण एक-दूसरे को कष्ट न दें । हम सबको भारत की उन्नति और
राष्ट्र के वैभव को ही सर्वश्रेष्ठ धर्म मानना चाहिए कि किसी प्रकार से इस
महाधर्म के प्रादुर्भाव में कोई बाधा न पड़े । इस प्रकार की स्वतंत्रता और एकता
की सिद्धि के अतिरिक्त समाज और धर्म की तफसीलों पर प्रकाश करना चाहेंगे । उनको
पत्र में स्थान अवश्य मिलेगा पर संपादकीय नीति सामाजिक और धार्मिक अर्थात जाति
और पंथ संबंधी झगड़ों में कुछ नहीं है । इस विषय पर हमारे संचालकों ने अपने
कर्त्तव्य सूचना पत्र में लिखा है कि सामिजिक और धार्मिक विषयों में सब प्रकार
के मतों को इसमें स्थान मिलेगा । उन्होंने साथ ही यह भी लिखा है कि और इस पर हम
अपने पाठकों का ध्यान विशेष प्रकार से दिलवाना चाहते हैं कि लेखन शैली, विचार
गांभीर्य और सभ्य भाषा की रक्षा करते हुए सब प्रकार के पुराने-नए मतों को
‘आज’
में स्थान दिया जाएगा कि मतों के प्रकाशन में राग-द्वेष प्रेरित दलबंदी-तटबंदी
न होने पाए ।
अब केवल एक
बात और रह गई है । संसार की सामाजिक गति के संबंध में हमारा क्या विचार है । इस
पर कुछ प्रारंभ में ही लिख देना उचित होगा । नए आविष्कारों के कारण अब पृथ्वी
मण्डल का कोई भी अंश दूसरे अंशों से पृथक नहीं है । एक स्थान की घटनाओं का
प्रभाव हरेक अन्य स्थान पर पड़ता है । एक स्थान पर युद्ध हो तो चारों ओर हलचल
होती है । अतः इस संबंध में भी अपनी नीति कुछ बतला देनी चाहिए । हमने पहिले ही
लिखा है कि हम स्वातंत्र्य चाहते हैं, हम अपने घर का प्रबंध स्वयं करना चाहते
हैं । अब हम यह भी स्पष्ट कह देना चाहते हैं कि जहां-जहां स्वतंत्रता के लिए
लोग यत्न करते हैं वहां-वहां हमारी सहानुभूति है । हम यह मानते हैं कि एक जाति
या देश पर अनुचित आक्रमण नहीं करना चाहिए । संसार में इस समय दो ही तो प्रश्न
हैं । एक यह कि प्रत्येक देश स्वतंत्र रहे, दूसरों के आक्रमण से संरक्षित रहे
और अपने-अपने घर का प्रबंध जिस प्रकार करना चाहें, कर सकें । इसका उत्तर तो हो
गया अर्थात यह कि आधुनिक संसार के इस लक्ष्य से हमारी पूरी सहानुभूति है ।
दूसरा प्रश्न यह है कि प्रत्येक देश में अभ्यातंरित शांति हो अर्थात स्त्री और
पुरुष, पूंजी वाले और श्रमजीवी, हाकिम, और महकूम, अमीर और गरीब आदि में परस्पर
उचित प्रकार से कर्त्तव्य और अधिकार, काम और दाम, मेहनत और ईनाम, एषणाओं और
पारितोषिकों का बंटवारा हो ।
सारांश यह कि
ऐसा न हो कि कतिपय लोगों को सब कुछ मिले और बहुतों को कुछ भी नहीं । ऐसा होने
से ईर्ष्या और द्वेष बढ़ता है और समाज के अभ्यंतर युद्ध खड़ा हो जाता है ।
हमारा पत्र इस लक्ष्य से भी सहमत है और यह चाहता है कि मनुष्य समाज के
पुनर्व्यूहन में ऐसा उचित प्रबंध हो कि किसी को उचित से बहुत अधिक और दूसरों को
साधारण आवश्यकता से भी बहुत अधिक और दूसरों को साधारण आवश्यकता से भी बहुत कम ल
मिले । संभव है इस शुभ कार्य में हमारे देश में पुरातन विचारवानों से आधुनिक
संसार को बहुत कुछ सहायता मिल सके । सारांश यह है कि यह पत्र संसार में प्रवेश
करते समय भारत के पूर्व आदर्शों को स्मरण रखते हुए भारत के भविष्य को सर्वांग
सुंदर और वास्तविक आभूषणों से अलंकृत करने में उचित भाग लेने की आशा करते हुए,
वर्तमान समय में भारत की मान-मर्यादा और उसकी गौरव वृद्धि कराने का भीड़ा उठाता
है ।
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(भारतीय पत्रकारिताःनींव के पत्थर से साभार)
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