निर्बल का प्रथम सहायक है संपादक
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बबन प्रसाद मिश्र
खबरपालिका का एक शाश्वत सिद्धांत है कि उसके अधिष्ठाता यानी संपादक या संपादकीय
मंडल ज्ञानधारक, निर्भय हो एवं राग-द्वेष से परे रहे और वह केवल मानवता और समाज
के कल्याण के लिए लिखे। उसे ज्ञात रहे कि यह कौन है और पत्रकारिता में क्यों
आया है। पत्रकारिता में उभरी गलाकाट और हिताहितों से जुड़ी प्रतिस्पर्धा में
पत्रकारिता के मूल्यों को बचाना और अपनी साख कायम रखना संपादक का सत्ता और
महत्ता के लिए इन दिनों हिमालय पर चढ़ने जैसा उपक्रम दिखाई दे रहा है। अब खबरें
चाहे वे इंटरनेट पर आई हों या अखबारों में या टीवी पर, उन्हें हाईटेक करने
वालों का बोलबाला कुछ बढ़ गया है। मेरे एक अभिन्न मित्र पत्रकारिता के इस दौर
को सुपारी-युग में प्रवेश का फतवा देने लगे हैं। यह अकारण भी नहीं है, सचमुच आज
की पत्रकारिता में यह सर्वत्र परिरक्षित है।
हम विश्व के महानतम जनतंत्र के पत्रकार हैं, जिन्हें सौभाग्य से बड़े करीने से
सजी-धजी पत्रकारिता विरासत में मिली थी । श्री माधवराव सप्रे, श्री माखनलाल
चतुर्वेदी एवं श्री गण्श शंकर विद्यार्थी से लेकर पं. रूद्रदत्त जी के शंखनाद
“जिये
जब तक लिखे खबरनामे, चल दिए हाथ में कलम थामे,”
से युगबोध धारण करने वाला आज का संपादक अपनी निर्बाध सत्ता के लिए आकुल-व्याकुल
होकर छटपटा रहा है। एक ओर समय के झंझावतों को झेलता भारतीय गणतंत्र है, जहां
सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय, व्यक्ति की गरिमा, अवसर की समानता, राष्ट्र
की एकता व अखण्डता, राष्ट्र जीवन के मूल्य, धार्मिक सद्भाव से जुड़ी
धर्मनिरपेक्षता और सुबंधुता भारतीय जनमानस में आत्मार्पित व अंगीकृत होने के
बदले क्षत-विक्षत व लहूलुहान दिखाई दे रही है। जब लोकहित निज हित में परिवर्तित
हुआ हो और जहां ‘नेता’
की परिभाषा बदलकर ‘लेता’
हो गई हो वहां जनतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका और
न्यायपालिका अवांछित उष्मा को झेल रहे हैं तो ऐसे में चौथा स्तंभ खबरपालिका
कैसे अछूती रहे। हम वैचारिक स्वतंत्रता के युग में प्रवेश तो कर चुके हैं,
तीसरी दुनिया की अंतिम पंक्ति में हैं और सुरक्षा परिषद जैसी विश्व संस्था में
स्थान चाहते हैं किन्तु हमारी आजादी का आधी सदी का सच यह है कि प्रभुसत्ता
सम्पन्न राष्ट्र होने के बाद भी हम प्रायः चारों स्तंभों में कदाचरणों की
विषबेल से घिर गए हैं। हमारी लोक कल्याण की लोकतंत्रात्मक समाजवादी राष्ट्र
व्यवस्था जन भावनाओं के अनुरूप परिलक्षित नहीं हो रही है। अपने संविधान के
प्रति हम उतने आस्थावान नहीं रह गए। हमारे दक्षिण के एक नेता श्री करुणानिधि
राष्ट्र के धर्मग्रंध हमारे संविधान की पूरी इबारत ही बदलने की वकालत कर रहे
हैं। जिन चार स्तंभों पर हमारे राष्ट्र के गणतंत्र की इमारत टिकी है, वे
एक-दूसरे के बुरे दौर में चले जाने की बात तो कहते हैं पर हकीकत यह है कि सभी
के सुकोमल वाद्ययंत्र इन दिनों टूटे स्वर व टूटे तार दिखा रहे हैं। इस
राग-विराग के दौर में कोई अगर वैरागी है तो वह है
‘जन’।
बात है संपादक की सत्ता और महत्ता की । उत्तर निहित है अब उसकी भूमिका में ।
स्थिति है कि उसकी भी नैय्या का संतुलन बिगड़ रहा है। वह खेवनहार होने के बदले
उन मदारियों की भीड़ को सामने देख रहा है जो अपने डमरू और काग से उसे
उछलता-कूदता देखना चाहते हैं । एक बार का किस्सा है । मैं और मेरे दो-दीन
संपादक मित्र देश की राजधानी दिल्ली में देश के सर्वोच्च सत्तासीन व अपने समय
के राजधर्म निभाने वाले एक शिखर पुरुष से मिले । उनसे सहज ही हमने पूछा कि
रोटी, कपड़ा व मकान के साथ जब देश को राष्ट्रिय चरित्र की आवश्यकता है तब उनके
बयानों में जातिवाद पर ज्यादा चर्चा क्यों हो रही है
?
क्या यह उचित है ?
तब उन्होंने एक आंख दबाकर कहा कि इसका जवाब देश के दूसरे सत्ताधिकारी प्रमुख से
पूछें । संयोग से उसी दिन दूसरे सत्ताधिकारी महोदय से भी भेंट हो गई । हमारे एक
सहयोगी संपादक ने मेरा नाम उल्लेख करते हुए पहले सत्ताधइकारी की वार्ता और उनके
जवाब को इन्हें सुना दिया । इनका जवाब था वो पागल इससे ज्यादा क्या कर सकता
है । अपने दो राष्ट्र प्रमुखों के बीच जो हमारे अपने राष्ट्र के सत्ता प्रमुख
थे, वार्ता की यह स्थिति देखकर हम संपादकों की मानसिकता यह थी कि देश यदि ऐसे
शिखर पुरुषों में इस तरह बंटा है तो राष्ट्र का भविष्य क्या होगा । बात सही
निकली। देश का जो कुछ हो रहा है वह सामने है ।
कुछ अरसे बाद एक दैनिक समाचार पत्र जिसका आकाश बहुत बड़ा है, के संपादक से
मिलने का सौभाग्य मिला । प्रारंबिक चर्चा के पश्चात उन्होंने कहा कि आज हमार
मालिक के बेटे समाचार पत्र के संपूर्ण स्वरुप को देकेंगे, चलो उनके चेम्बर में
आपकी भेंट उनसे करवा देते हैं । इंटरकाम पर उन्होंने उनके निजी सचिव से बात की
। उन्होंने पन्द्रह मिनट बात आने की स्वीकृति दिलवाई । उनके कक्ष में जाते ही
समाचार पत्र के स्वामी-पुत्र ने मुझे तो बैठने का इशारा किया किन्तु उनसे काफी
बड़े और आयु में मुझसे भी बड़े संपादक को खड़ा ही रखा । उनके तेवर ये जो मुझे
शर्मसार कर रहे थे । अपने संपादक के लिए उनके बोल थे
“श्रीमान
जी अपना संपादकीय-वंपादकीय अब अलग रखिए आज से जैसा मैं चाहूंगा वैसा अखबार
निकलेगा । मुझे पहले पेज पर 6-7 रोचक खबरें चाहिए । पेज थ्री मैं आपको समझाऊंगा
और अंतिम पृष्ठ पर बिकनी पहने रोज एक फिल्म एक्ट्रेस की फोटी मुझे चाहिए ।
प्रथम पृष्ठ पर कुछ नंबर छपेंगे जो एक अज्ञात फोन से मिलेंगे । वे सटोरिए
कारोबारी के होंगे ।”
जी-जी कहते हुए संपादक अपने कक्ष में लौट गए । कुछ देर मीडिया के इस नये
खिलाड़ी के सारहीन प्रवचन को सुनकर मैं भी लौट आया। पुनः संपादक जी से मिलने पर
चाय की चुस्कियों का दौर चलाते भग्न ह्रदय और भग्न-मन से संपादक जी अपना दर्द
मुझसे बांट रहे थे ।
मैंने वह दौर देखा है जब मेरी विचारधारा से जूड़े मेरे कुछ मित्र मेरी संपादकीय
नीति से बिफर कर मुझे हटाने व मिटाने मेरे मुख्यालय नागपुर दौड़े थे, पर मेरे
प्रबंध तंत्र ने मेरे किंचित वांछित-अवांछित स्वभाव दोष झेलते हुए भी मुझे
संपादक बनाए रखा । आपातकाल लागू होने के दिन मेरे द्वारा प्रखर समाजवादी चिंतक
स्वर्गीय मधु लिमये की उपस्थिति में डंडा इंदिरा रुल और मेटेनेंस आफ इंदिरा
सावैनिटी (डीआईआर और मीसा के बदले हुए शब्द पर्याय) से
‘जनता
विद्रोह’
को शीर्षक से निकाले गए विशेष बुलेटिन और शाम को ही रायपुर शहर में उनके वितरण
के बावजूद तथा दिल्ली से इंदिराजी के मीडिया सलाहकार एच वाई शारदा प्रसाद के
कार्रवाई करने स्पष्ट निर्देश के बावजूद मध्यप्रदेश की सेठी सरकार द्वारा
गिरफ्तार करने का साहस न जुटा पाते । ऐसा मेरे अनेक मित्रों ने देखा है ।
संपादक ने जो लिख दिया वह पत्थर की लकीर होती थी । अब पिछले कुछ दशकों से
पत्रकारिता की यह सत्ता धनबल वाले समाचार पत्र मालिक और जरूरतमंद पत्रकारों के
बीच परोक्ष व प्रत्यक्ष रुप से प्रभावित है । अपराधी, असामाजिक तत्व व
भ्रष्टाचारी इस कारोबार में न केवल घुसपैठ कर रहे हैं वे संपूर्ण पत्रकारिता
ग्रसित कर रहे हैं । प्रायः यह भी देथा जा रहा है इस गिरावट के लिए स्वयं
पत्रकार भी जिम्मेदार हैं । उनका ज्ञान सीमित है । तार्किकता कम है,
विश्वसनीयता कम है और लाचारियां हैं । सच कहें तो वे अपने आचरण व धर्म को,
भ्रष्ट राजनेताओं व नौकराशाही के समक्ष गिरवी रख चुके हैं। पत्रकारिता न तो
भीड़ में और न हवा में मुक्केबाजी का हथियार है न वह पुलिस का रोजनामचा है न
वात्स्यायन ने उन्हें कामसूत्र के नए दस्तावेज परोसने का दायित्व सौंपा है। वह
समाज का दरका हुआ दर्पण भी नहीं है । वह यथार्थबोधक ज्ञान-दीप है जिसके प्रकाश
में समाज अपना मार्ग प्रशस्त करता है, प्रगति के नए सोपान गढ़ता है तथा सर्वजन
हिताय सर्वजन सुखाय सोचता है। पत्रकार एवं संपादक सही अर्थों में निर्बल का
प्रथम सहायक है।
आपाधापी के इस युग में प्रजातंत्र का यह तौथा स्तंभ व्यापार व राजनीतिक के
विस्तार से अपनी प्रभुसत्ता कुछ अलग ढंग से दिखला रहा है। यह भूमंडलीकरण का युग
है, जिसमें उसकी ईमानदारी, उसकी तटस्थता और निष्पक्षता सब कुछ दांव पर लगी हुई
है। स्थिति निराशाजनक है परन्तु सुधार की हवा के सारे रास्ते बंद नहीं हुए हैं।
जनसंचार साधनों की व्यापकता और मानव जीवन की विविधता ने संपादकों के लिए काफी
काम बढ़ा दिया है सुधारवादी बाल स्तंभों से लेकर विश्व व्यापार के मंच तक उसकी
महत्ता के रास्ते खुले रखे हैं। बशर्ते संपादक या पत्रकार केवल समय के साक्ष्य
और निर्विकार न बने रहें बल्कि उनका व्यवहार और लेखन जनतांत्रिक, पारदर्शी और
मानवहित सीमाओं से जुड़ा हो । मीडिया और वैश्वीकरण में आज भी गहराती वैचारिक
एकजुटता समय की आवश्यकता है। जीवन की चाहत और बाजार की स्पर्धा में अस्तित्व
बचाए रखने की गरज आज जितनी संपादक की सत्ता और महत्ता को है, उतनी पहले कभी
नहीं रही। आगे ईश्वर जाने । फिर भी आशा जीवन का विश्वास है। उम्मीद है कि
भविष्य अच्छा ही होगा। यह न भूलें कि पिछले साल दुनियाभर में 580 पत्रकारों की
हत्या हुई। हर साल लगभग 40 पत्रकार हिंसा के शिकार होते हैं। गांवों व कस्बों
के पत्रकारों का पहला व अंतिम मित्र उनका संपादक होता है। अतः जब समाज में
सहिष्णुता कम हो रही हो तब समाज के लिए और उसके अपने क्षेत्र के लिए संपादक की
सत्ता और सहत्ता का प्रभावशाली बने रहना अत्यावश्यक है। केवल संपादक के लिए ही
जरूरी नहीं, राष्ट्र की सार्वभौमिकता, उसके गणतंत्र की पवित्रता, उसकी
अक्षुण्णता के लिए अति आवश्यक है। संपादक अब समाज को रोग-निरोधक शक्ति का औषधि
दाता या धन्वन्तरी है। इसी ज्ञान-गरिमा ही समाज को, मानवता को एवं भावी जीवन को
प्राणवान, गतिवान एवं निष्कंटक रखेगी।
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बबन प्रसाद मिश्र
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छत्तीसगढ़ के
वरिष्ठतम पत्रकार, युगधर्म और नवभारत-रायपुर के संपादक रहे। संप्रति पदुमालाल
पन्नालाल बख्शी सृजनपीठ, भिलाई के अध्यक्ष हैं।
कई
पुस्तकें प्रकाशित।
संपर्क :10-ए,
रविनगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)
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