Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 3, मार्च - मई, 2007)

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इत्यलम्

 

 

छपने और बोलने तक की असहमतियां

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 अष्टभुजा शुक्ल

 

त्रिकाओं के शुरू में ही अक्सर नारे की तरह लिखा हुआ मिलता है प्रकाशित रचनाओं से संपादकीय सहमति आवश्यक नहीं और इस वाक्य से मुझे बहुत कोफ्त होती है। यह नीति सिर्फ कानूनी अड़चनों से बचाव भर की नहीं लगती बल्कि एक नैतिक सूक्ति का विमल पाठ तैयार करती प्रतीत होती है। गरज यह कि संपादक असहमति को भी आवाज देने की नैतिकता से लबरेज है, भले ही वह उस विचार अथवा विचारधारा का पैरोकार न हो। क्या वास्तव में कोई संपादक इतना निरपेक्ष या नादान होता है कि वह प्रकाशित रचना से सहमत नही होता या न चाहते हुए भी छाप देता है ? अथवा उसे प्रकाशित करने के लिए मजबूर हो जाता है ? याकि सहमति और असहमित कोई जुड़वा हैं। क्या प्रवेश निषेध के बोर्ड सबके लिए होते हैं। देखने में तो यही आता है कि ऐसे बोर्डों के अंतःपुर में प्रायः उन्हीं लोग की घुसपैठ बनी रहती है जिनके लिए यह टंगा रहता है। जिसकी ओर हमारे तीर की नोक होती है, वही हमारे समारोहों का मुख्य अतिथि बन जाता है। वास्तव में हमारा जनतंत्र ऐसी ही विडम्बनाओं के हवाले है। असहमतियां छपने औरौ बोलने तक सीमित हो चुकी हैं। ऐरे जनतंत्र की सारी पगडंडियां भूमंडलीकरण के राजपथ का हार बन चुकी हैं।

 

कुछ हो पहले ये असहमतियां घटित भी होती थी और विघटित भी, लेकिन वह जमाना गुजरा हुआ हो गया जब साहित्य की पत्रिकाएं भी गिनी चुनी ही निकलती थीं। अल्पसंख्यक होने के नाते उनके संपादकों की भी एक धाक, हैसियत और सत्ता थी। उन संपादकों की नीयत, विवेक और निर्णय पर सबका भरोसा था।  निराला जी तक को लौटी रचना लेकर उदास का सामना करना पड़ा था। लेकिन न तो निराला जी ने उन संपादकों की सार्वजनिक थू-थू की और न उनके समर्थकों ने । ऐसा था असहमति का निर्णय और उसके विवेक तथा परख का समादर। बरबस इसके आज इतनी पत्रिकाएं हैं कि कहीं न कहीं तो हर लिखने वाले की रचना छप जाने वाली है। न आपको संपादक निराश या उदास करेगा, न मित्र हतोत्साहित । छंटनी करने वाले संपादकों की खेप ही विदा हो गई और पापान्निवारयति वाली मित्रता की परिभाषा भी बासी हो चुकी है। पत्र-पत्रिकाएं संपादकीय सहमति अनिवार्य नहीं की तख्ती लगाए मचल रही हैं और यह भी ध्यान नहीं कि उन पर लिखा हुआ चूना कब का विरंजित हो चुका है। लेकिन हम चौबीस कैरेट वाले हिन्दुस्तानी परंपरा को अक्षशः ढोते रहने की वसीयत पा चुके हैं। लिखते और छपते जाना है। बाबा ने कहा है कि सरसों का ही व्यापार करना है तो करना है। और व्यापार अब उतना वस्तु से संबंधित नहीं, जितना कि विपणन की कला से। वह कला हमारे खून में है तो कौन सी बात प्रासंगिक है और कौन सी अप्रासंगिक। तमाम अप्रासंगिक चीजों को प्रसंगिक बनाए रखना ही तो हमारा कमाल है। चाहे वह लेखन के नाम पर हो, नीतियों के नाम पर हो अथवा धर्म, संस्कृति, तथाकथित आदर्शों या नैतिकताओं के नाम पर हो।

 

हम चलते तो हैं पूरे गाजे-बाजे के साथ लेकिन तमन्ना यही रहती है कि पहुंचेंगे वहीं जहां से चले थे। आवर्तन के इस दर्शन में हमारा घुरचते रहना तय है। जब किसी प्रतिरोध की भी वही शैली और शब्दावली हो जो स्थापनाओं की, तब हमें समझ लेना चाहिए कि यह प्रतिरोध नहीं बल्कि उसका एक खेल ही है। श्लीलता की भी वही इच्छाएं हैं जो अश्लीलता की, मूल्यों के भी वही लक्ष्य हैं जो पतन के और विरोध के भी वही हेतु हैं जो स्थापनाओं के। ऐसी कला से असहमति के फ्रेम में जड़े सहमति के रेखांकन और भी आकर्षण हो जाते हैं। लेकिन निहुरे ऊंट चराने वाले कलाकार भी अपनी उपस्थिति और मन्तव्यों को तोप  या ढंक नहीं सकते क्योंकि आज गुप्त रोगों का विश्वसनीय इलाज करने वाले विज्ञापन चौक से लेकर पेशाब घरों तक पटे हुए हैं। इसीलिए पहले के वे संपादक किसी तरह के सत्ता केंद्र नहीं प्रतीत होते थे क्योंकि उनकी असहमति भी गरिमामयी थी और उनके इंकार किसी दुराग्रह से प्ररित या प्रभावित नहीं थे। उनके उद्देश्य निष्कपट और निर्णय बेदाग थे। पर आज हम दाग भी अच्छे हैं वाले समय में हंस और खेल रहे हैं। अतः लिथड़े रहने की शोभा से जगमगा रहे हैं। और असहमति के कूपन से सहमति के कारोबार में शामिल हो चुके हैं।

 

साहित्य से जोड़कर कहा जा रहा है कि असफल लेखक ही आलोचक और संपादक होते हैं बल्कि लेखक की श्रेणी में शामिल होने के लिए भी लोग संपादन को हासिल की लकड़ी की तरह पकड़ते हैं। पर  ऐसे अनुभव अब असत्य सिद्ध हो चुके हैं क्योंकि देखने में यही मिलता है कि अच्छे लेखक ही प्रतिष्ठित संपादक भी निकले हैं। यह और बात है कि कुछ उदाहरणों में संपादकों ने गिरोहबंदियां भी की हैं और वे सरगना बनकर एक प्रकार की सत्ताधीशी भी करते देखे गए हैं, लेकिन उनका भी हश्र वही हुआ जो हर क्षेत्र के सरगना का होता है या होना चाहिए । कुछ संपादकों ने अपनी सत्ता की कमान से कई कई निशाने साधे हैं। ऐसे शिकार में मारामारी से लेकर चिड़ीमारी तक के किस्से हैं। यह अलग बात है कि जिनके लिए ये चोरियां घटियाहियां की गई वे खुद ही चोर-चोर चिल्लाने लगे और उलटकर उन्हीं सत्ताओं पर पिच्च कर दिया । अभी हाल ही में नया ज्ञानोदय के फरवरी में एक खास विमर्श वाले लेखक का पत्र छपा है जिससे यह रहस्योउद्घाटन भी होता है कि पत्रिकाओं में लेखक भर्ती और निष्कासित भी कराये जाते हैं, उन्हें सटवाया और हटवाया भी जाता है। लेकिन पत्रिकाओं से ही किसी लेखक का मोहभंग हो जाएगा तो आखिर जुड़ेगा ही किससे ? न धोबी को आन घाट, नगदहा को आन परोहन।

 

जो भी हो पत्रिकाओं की महत्ता तो निर्विवाद है। उनकी अपनी सोच, अपनी मान्यताएं और उद्देश्य अलग-अलग हो सकते हैं। क्योंकि पत्रिकाएं ही किसी लेखक के लिए आरंभिक मंच है। अतः साहित्य के राज्य में संपादक की सत्ता भी अनिवार्य है। यह दीगर सवाल है कि यह राज्य कभी-कभी साम्राज्य की महत्वाकांक्षी से दबोच लेने की चेष्टा करता है। ऐसे माहौल में साहित्य से जुड़ी जो पत्रिकाएं जनतांत्रिक विश्वासों की पूंजी से निकल रही हैं उनमें पहल, आलोचना, उन्नयन, पुरूष, नया ज्ञानोदय, कथादेश, परिवेश, संदर्भ, वसुधा, तद्भव, आशय, कृति ओर आदि उल्लेखनीय हैं। इन संपादकों की भी एक सत्ता है इसलिए इन पत्रिकाओं की साहित्यिक-सांस्कृतिक महत्ता भी। ये हमारे समय के अधुनातम विमर्शों की भी पैरोकार हैं और अपनी प्रगतिकामी परंपरा की संवाहक भी।  हमारे जनजांत्रिक मूल्यों का एक सराहनीय पक्ष यह भी लक्षित किए जाने लायक है कि आज भिन्न-भिन्न अनुशासनों की पहल करने वाली पृथक-पृथक पत्रिकाएं हैं।नटरंगके बाद नाटकों पर केंद्रित रंग - प्रसंग प्रयाग शुक्ल के संपादन में निकलने वाली बेजोड़ पत्रिका है तो कहानियों, और कविताओं पर भी केंद्रित रहने वाली कई अलग पत्रिकाएं हैं । साहित्य की इस बहुविध दुनिया में कई मोर्चो पर जीवंत रूप से सक्रिय रहने वाले सारिका के संपादक स्व, कमलेश्वर जी की याद स्वाभाविक है । और कहां किसी को पता था कि नया ज्ञानोदय फरवरी 07में प्रकाशित मील के पत्थर स्तम्भ के अंतर्गत वे अपनी श्रद्धाजंलि ले रहे हैं । हमारी दो-तीन मुलाकातें ही इसकी प्रमाण हैं कि वे लेखक के साथ बहुत ही सहज इसीलिए बड़े मनुष्य भी थे । आशा है कि इस लेख के जर्रे-जर्रे से असहमत होने के बावजूद आप हमारे आखिरी वाक्य से अवश्य सहमत होंगे ।

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अष्टभुजा शुक्ल हिंदी के प्रख्यात कवि और ललित निबंधकार । कई पुस्तकें प्रकाशित । संप्रति संस्कृत महाविद्यालय, चित्राखोर में प्राध्यापक हैं । संपर्कः संस्कृत महाविद्यालय, चित्राखोर, बरहुआ, बस्ती 272123 (उत्तरप्रदेश)

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रवंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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