बाजार की जेब में संपादक
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अखिलेश अखिल
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“आप
किसी भी संपादक से मिलिए । पता चलेगा कि उन्हें पढ़ने का समय ही नहीं मिलता ।
आखिर वे करते क्या हैं ?
जब संपादक पढ़ेंगे नहीं तो विचार कहां से देंगे । आज संपादक की सबसे बड़ी
कमजोरी अज्ञानता है । पढ़ने की बजाए वे मालिकों के आदेश पर नेताओं, नौकरशाहों
के तलुए चांटते दिखते हैं ।”
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लोकतंत्र
में मीडिया की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र के चारों स्तंभ
में मीडिया ही वह सबसे चौकस पहरेदार है जो समाज की अच्छाइयों और बुराइयों को
जनता के सामने लाकर उसे निर्णय करने के लिए छोड़ देता है। हां इतना अवश्य है कि
मीडिया उन खबरों के प्रति ज्यादा उत्तेजक रहता है जो समाज और राष्ट्र के लिए
घातक होती है और ऐसी स्थिति में मीडिया लोगों के लिए उत्प्ररेक का काम तो करती
ही है। यही मिडिया का आदर्श है और यही उद्देश्य भी है।
वर्षों
पुरानी हमारा मीडिया कई मायने में विश्व के अन्य देशों के मुकाबले ज्यादा गंभीर
और सजग है। अगर हम दक्षिण एशिया क्षेत्र की बात करते हैं तो यह कहने में कोई
दिक्कत नहीं आएगी। दक्षिण एशिया के देशों में जो मीडिया हलचल है, उसमें भारतीय
मीडिया अभी भी अपनी परंपरा, संस्कृति से पीछे नहीं है और साथ ही यह आज भी आम
लोगों की चिंता करने से बाज नहीं आती। मामला चाहे प्रिंट मीडिया का हो या टीवी
मीडिया का, जनता की उपेक्षा करके वह आगे निकल सकने की जुर्रत नहीं कर सकता। फिर
भी मीडिया की सोच-समझ में बदलाव आए हैं जिसे वक्त के साथ स्वीकार करने की बात
कही जा रही है।
बाजारवाद
और मीडिया
बाजार का
एक नियम है कि वह मांग और आपूर्ति से संचालित होता है। मांग बढ़ने के साथ
आपूर्ति बढ़ती है। बाजार का एक दूसरा नियम सस्ती चीजों की बिक्री से भी है । जो
चीजें सस्ती होंगी, उसके ग्राहक ज्यादा होंगे। बाजार के ये दोनों नियम आधुनिक
मीडिया पर भी लागू हो रहे हैं। भारत में बाजारवाद या खुली अर्थव्यवस्था की
शुरूआत 1991 में हुई ती। अर्थव्यवस्था के सारे द्वार विश्वव्यापी अर्थव्यवस्था,
समाज, तकनीक, संस्कार, संस्कृति के लिए खोल दिए गए । ग्लोबल गांव की कल्पना
दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्था को नई लगी और लगभग सभी देश उसकी आगोश में आ फंसे।
चूंकि भारत एक विकासशील देश है और यहां मध्यम वर्ग की अच्छी तादाद है, ऐसी
स्थिति में पिछले 10-15 वर्षों में मीडिया का रंग-रूप और आचार-विचार भी बाजार
से प्रेरित होकर सामने आया है। वर्तमान में भारतीय मीडिया पूरी तरह से बाजार के
कब्जे में है। पहले समाज सेवा और देश सेवा करने वाले लोग ही मीडिया घराने के
रूप में जाने जाते थे । कोई दर्जन भर से कम ही ऐसे मीडिया घराने हैं जिन्हें
देश और समाज सेवा के उद्देश्य से अखबार निकालने वालों के रूप में चिह्नित किया
जा सकता है। बदलते परिवेश में और खासकर बाजारवादी युग शुरू होने का बाद भारत
में जितने अखबार, पत्र-पत्रिका, टीवी चैनल्स सामने आए हैं, उतने सौ साल के भीतर
भी नहीं आ पाए ए। यह बाजार का ही प्रभाव है कि आज व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर
विज्ञापन का जुगाड़ करके भी सैकड़ों पत्र-पत्रिकाएं निकल रही हैं । यह बात और
है कि इन पत्र-पत्रिकाओं का संबंध कहीं से भी समाज और देश से नहीं है । यह
बाजार का ही प्रभाव है कि हजारों की तादाद में नए पत्रकार गढ़ दिए गए हैं
जिन्हें समाज और देश की चिंता से ज्यादा अपनी जेबों को गर्म करने की चिंता लगी
रहती है । प्रायोजित लेख, खबर, विचार और प्रायोजित टीवी प्रोग्राम्स, न्यूज
सामने आने लगे हैं । दर्शक-पाठक जानता है कि इन खबरों की हकीकत क्या है, लेकिन
वे कुछ कर पा सकने की स्थिति में नहीं हैं । जिस भ्रष्टाचार को उजागर करने का
भीड़ा पत्रकारों, मीडिया कर्मियों के ऊपर है, वही वर्ग जब भ्रष्टाचार का शिकार
हो रहा है तो इसे आप क्या कहेंगे ?
यह
बाजार का ही प्रभाव है कि पत्रकार शोषण के भी शिकार होने लगे हैं । कोई 20 साल
पहले बहुत कम देखने-सुनने को आता था कि काम करने के बाद पत्रकारों को
वेतन-भत्ते नहीं मिलते हों । लेकिन अब ऐसा हो रहा है । कथित पत्रकारों/मालिकों
की ऐसी जमात खड़ी हो गई है जो श्रमजीवी पत्रकारों को मेहनताना नहीं देते और जब
चाहें उन्हें हटा भी देते हैं । बाजारवादी शक्तियों ने उन श्रम कानूनों की
धज्जियां उड़ा दी हैं, जो कानून कभी पत्रकारों के हथियार होते थे ।
बाजार
ने मीडिया जगत को अपने अनुकूल बना लिया है । किस अखबार, चैनल और पत्रिका में
कौन से संपादक बहाल होंगे, कौन सा बीट किस व्यक्ति को दी जाएगी, यह सब बाजार की
शक्तियां तय करती है । मीडिया संस्थान के मालिक अगर कुछ बेहतर पत्रकार को जगह
भी देने की सोच रखता है तो बाजार उस पर अंकुश लिए खड़ा होता है । इसके अलावा
बाजार ने मीडिया संस्थान को भी बदला है । जब हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो
यह भूल जाते हैं कि आखिर मीडिया संस्थानों एवं उनके मालिक की स्थिति दिन-रात
क्यों सुधरती दिखती है ?
एक अखबार या पत्रिका निकालने वाला आदमी चंद वर्षों में ही इतना ऊंचा हो जाता है
कि आप उसकी ऊंचाई को माप नहीं सकते हैं। जब मीडिया संस्थान, मालिक और संपादक
ही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हों तो फिर किस मीडिया से सच्चाई की आस हो सकती है
। ऐसी स्थिति में बाजारवाद में सारी मीडिया उतरती दिखाई पड़ रही है ।
बाजार
और संपादक
वैश्वीकरण के
इस दौर में संपादक की सत्ता सबसे ज्यादा विचलित, दिग्भ्रमित और अपमानित हुई है
। संपादकों की ऊंचाई कम कर दी गई और उसकी महत्ता को बौना कर दिया गया है।
बाजारवाद के थपेड़ों में संपादक अब अखबार के मुखिया नहीं रहे । संपादकीय विभाग
की कार्य पद्धति संपादक द्वारा संचालित नहीं होती । संपादक की संपादकीय राष्ट्र
की चिंता से ओत-प्रोत नहीं होती और न ही संपादक के आदेश से खबरों का चुनाव संभव
हो पाता है । संपादक संस्थान के आदेश का पालक होता है । संपादकीय मालिक की
विचारधारा होती है । खबरों का चयन और प्रस्तुतिकरण मालिक और बाजार की सोच के
द्वारा तय होती है । कुल मिलाकर आज का संपादक महज एक रबर स्टैम्प की तरह होता
है जो एक बेवकूफ धनाढ्य मालिक के इशारे पर काम करता है और सिर्फ अपना हस्ताक्षर
करते चला जाता है ।
बाजारवादी
व्यवस्था से पहले संपादक की अपनी सत्ता थी और महत्ता भी । समाज में संपादक की
इज्जत थी और उनके फैसलों पर लोगों का यकीन भी । उनकी लेखनी भी आम लोगों, देश और
समाज के लिए क्या आज के संपादक विश्वास के साथ ये बातें स्वीकार कर सकते हैं कि
वे जो लिख रहे हैं उसमें आम जनता का दर्द छुपा है
?
क्या उनकी लेखनी कोइ निर्णय कर पाने की स्थिति में है
?
जब से मीडिया संस्थान कारपोरेट घरानों में तब्दील हुए हैं, संपादक की लेखनी
कुंद कर दी गई है । मालिक कहता है कि सारे पत्रकार कोट-पैंट और टाई पहनेंगे ।
पत्रकारों से पहले संपादक ही अपनी स्वीकृति पहले देते हैं । मालिक कहता है कि
पत्रकारों के वेतन बढ़ें क्योंकि ऐसा करने से मालिक की जेब ढीली होगी । ऐसी
स्थिति में मालिक को अब संपादक नहीं, मैनेजर संपादक की जरूरत होगी । मालिक
संपादक का वेतन तय कर देता है और संपादक अपनी इच्छानुसार संपादकीय टीम को
व्यवस्थित कर लेता है । पिछले 15-20 वर्षों में एक भी वाकया ऐसा नहीं है कि
संपादकीय टीम की समस्याओं को लेकर संपादक उत्तेजित हुए हों और मालिक से बातें
की हों ।
यही
वजह है कि आज संपादकों की पहचान खो सी गई है । राष्ट्रीय अखबार निकालने का दावा
करने वाले सैकड़ों अखबारों के संपादकों की अगर सूची तैयार करें तो 10 संपादकों
की सूची बनाने में भी परेशानी आ जाती है । राजधानी दिल्ली से निकलने वाले
अंग्रेजी-हिन्दी के 10 संपादकों के नाम पूछने पर आम पत्रकार भी बगले झांकने
लगते हैं । और ऐसी स्थिति है तो उसके लिए संपादक ही दोषी है । देश के कोई
दर्जनों संपादकों को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं जो पत्रकारीय कार्यों में
कम दक्ष हैं लेकिन प्रबंधकीय कार्यों में ज्यादा रुचि रखते हैं । इस प्रबंधन का
तकाजा है कि उनके आंख के सामने पत्रकार दलाली करके दिखते हैं । जाहिर है कि उस
दलाली में उनका भी हिस्सा शामिल होता है । चुनाव के वक्त संपादकों और मालिकों
के भी बहस चलती है कि कैसे अखबार को लाभ पहुंचाया जाए। चैनल वाले यह तय करने
में समय लगाते हैं कि कितने का बाइट होगा । फिर संपादक को आप किस रुप में
प्रतिष्ठित करेंगे ?
पहले
संपादक किसी नेता के घर नहीं जाते थे लेकिन अब संपादक अपने कक्ष में कम नेताओं
के यहां ज्यादा दिखते हैं । संपादकों की कमजोरी वक्त का तकाजा है । बाजार से वे
सबसे ज्यादा प्रभावित हैं । बाजार ने उन्हें खोखला कर रखा है । ऐसी स्थिति में
आने वाली पत्रकारिता कैसा रुप लेगी, कहना मुश्किल है । लेकिन पत्रकारिता जैसे
पवित्र पेशे पर ध्यान अब इनका नहीं रहा । इनका ध्यान सिर्फ और सिर्फ अपनी जेब
गर्म करने और कुर्सी बचाने तक का रह गया है ।
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(अखिलेश
अखिल
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विविध पत्र-पत्रिकाओं में समयायिक विषयों पर
लेखन से विशिष्ट पहचान बनाई । इन दिनों दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन करते
हैं।
संपर्कः 295-ए, हनुमान गली, मंडावली,
दिल्ली- 110092)
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