Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 4, जून - अगस्त, 2007)

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व्याख्यान

 

 

नए युग का प्रारंभ बन सकती है पत्रकारिता

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ओशो रजनीश

 

ह देश दो हजार वर्षों तक गुलामी में रहा है। इस कारण लोगों में आध्यात्मिक गुलामी पैदा हो गई है। यद्यपि राजनीतिक दृष्टि से हम स्वतंत्र हैं लेकिन मानसिक रूप से हम सभी अभी भी गुलाम हैं।

 

पत्रकारिता पश्चिम की पैदाइश है और वहां जो भी होता रहता है, उसकी हम नकल करते रहते हैं, वह हमारा अपना निर्माण नहीं है। पश्चिम आध्यात्मक में विश्वास नहीं करता। इस वजह से वह तीव्र संताप और तनाव में जी रहा है। वहां आत्महत्या की दर पूरब से चार गुना ज्यादा है। लोग भूख के कारण, भोजन के अभाव के कारण आत्महत्या करते हैं। तुम्हें उन पर करुणा करनी चाहिए, पश्चिम में लोग इसलिए आत्महत्या करते हैं क्योंकि उनके पास सब कुछ है और जीवन निरर्थक मालूम पडता है। उनके पास भरपूर धन है, वह सब है जो धन खरीद सकता है, लेकिन कुछ ऐसी भी बातें हैं जिन्हें धन नहीं खरीद सकता। वे मौन नहीं खरीद सकते, वे आनन्द नहीं खरीद सकते, वे प्ेम नहीं खरीद सकते, ध्यान नहीं खरीद सकते।

 

पत्रकारिता पश्चिम की देन है। तुम अभी भी उस चीज की नकल कर रहे हो, जो तुम्हारी संस्कृति में विकसित नहीं हुआ है, तुम्हारे वातावरण में नहीं पला है, जो इस मिट्टी का अंश नहीं है, यहां नहीं खिला है, तो तुम एक प्लास्टिक के फूल को हाथ में लिए हो। उसकी कोई जड़ें नहीं है।

 

पश्चिम में समाचार माध्यम को आध्यात्मिकता में कोई रस नहीं है क्योंकि पश्चिम में एक भी व्यक्ति का आध्यात्म में रस नहीं है। इस कारण वे दु:ख पा रहे है। कितने ही लोग मनोविश्लेषण करवा रहे हैं। कितने ही लोग मनोचिकित्सा के रुग्णालयों में हैं। कितने ही लोग पागल हो रहे हैं, आत्महत्या कर रहे हैं, खून कर रहे हैं। वे ये सब बातें इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें जीवन अर्थहीन लगता है, व्यर्थ लगता है।

 

तुम पूछ रही हो, हमारी पत्रकारिता के प्शिक्षण कोर्स में आध्यात्मिक विकास, आध्यात्मिक आयाम बिलकुल ही अपेक्षित रह जाता है। क्योंकि तुम पत्रकारिता को इस मिट्टी में विकसित नहीं कर रहे हो, उसमें इस मिट्टी की सुगन्ध नहीं है। तुम सिर्फ नकल कर रहे हो।

 

और तुम इस समाज को भयंकर नुकसान पहुँचा रहे हो। क्योंकि यहां आध्यात्म सबसे मूलभूत बात है। लेकिन तुम्हारी शिक्षा प्णाली के साथ भी वही हो रहा है। तुम्हारे विद्यालय हर कहीं पश्चिम की मानसिक दासता है। पश्चिम में जो भी हो रहा है उसकी नकल करनी है। वह तुम्हारी अचेतन आदत बन गई है। पत्रकारिता को अपना ढंग खुद खोजना होगा। अपनी निजता खुद विकसित करनी होगी। उसी तरह शिक्षा को भी अपनी वैक्तिकता विकसित करनी होगी।

 

आध्यात्मिकता जीवन का सारभूत अर्थ है। आत्मा के बिना आदमी सिर्फ एक शव है और आध्यात्मिकता के बिना कुछ भी शिक्षा, पत्रकारिता सिर्फ शव है। उससे दुर्गन्ध आती है। तुम्हारी राजनीति पश्चिम की नकल है इसलिए चालीस साल की आजादी के बाद कुछ भी बदला हुआ नहीं लगता। वही नौकरशाही-वह तो और भी बदतर हो गई है। क्योंकि नकल असल से बेहतर नहीं हो सकती है।

 

तुम्हारी शिक्षा सिर्फ एक नकल है। मैं विश्वविद्यालय में शिक्षक रहा हूँ। मुझे विश्वविद्यालय से निरंतर लड़ना पड़ा है। वे विश्वविद्यालय के कोर्स में योग या ध्यान को सम्मिलित करने को तैयार नहीं थे, लेकिन इस बात पर गर्व करते हैं कि यह गौतम बुध्द की, महावीर की, बौध्द धर्म और पंतजली की, कबीर और नानक की भूमि है। वे बड़ा सीना तानकर बोलते रहते हैं, लेकिन उन्हें दिखाई नहीं देता कि वे क्या कर रहे हैं। उनकी पत्रकारिता में, उनकी शिक्षा में, उनकी राजनीति में कबीर, नानक, पतंजलि या बुध्द का कोई चिन्ह नहीं है। वे लोग पश्चिमी चिन्तकों से प्भावित हैं।

 

राजनीतिक दृष्टि से तुम स्वतंत्र हो लेकिन मानसिक रूप से बिलकुल स्वतंत्र नहीं हो। पत्रकारिता को स्वयं को पश्चिम से मुक्त करना है और फिर अपने को एक प्रामाणिक मौलिक आकार देना है। तुम आश्चर्यचकित होओगे कि यदि तुमने पत्रकारिता को आध्यात्मिक आयाम दिया तो आज नहीं कल, पश्चिम तुम्हारा अनुसरण करेगा। क्योंकि वहाँ तीव्र भूख है, गहन प्यास है। दूसरों की नकल करने की बजाय तुम मौलिक क्यों नहीं हो सकते और दूसरों को तुम्हारी नकल क्यों नहीं करने देते? ऐसा हुआ तो पहली बार इस देश में स्वतंत्रता के कुछ फूल खिलेंगे।

 

और आध्यात्मिकता किसी प्कार की धर्मान्धता नहीं है। आध्यात्मिकता का यह अर्थ नहीं है कि तुम्हें धर्म का प्चार करना है या जैन धर्म का प्रचार करना है या इस्लाम का प्रचार करना है। आध्यात्मिकता का अर्थ इतना ही है कि तुम्हें सब धर्मों के मूलभूत तत्वों का प्सार करना है, जो कि समान हैं।

 

क्या प्रेम हिन्दू या मुसलमान हो सकता है? क्या शांत चित्त हिन्दू या बौध्द हो सकता है? क्या करुणापूर्ण व्यक्ति को ईसाई या यहूदी होना जरूरी है?

 

प्रामाणिक आध्यात्मिकता के कोई विशेषण नहीं होंगे। यह सभी धर्मों के सिर्फ सार तत्वों की शिक्षा होगी। पत्रकारिता को अपनी सूची में उसको प्थम स्थान देना चाहिए, वह पहले नम्बर पर होना चाहिए। राजनीति आखिरी नम्बर पर। लेकिन दुर्भाग्य से राजनीति का प्रथम क्रमांक है और आध्यात्म का अन्तिम भी नहीं है।

 

तुम लगातार गुलामी में कैसे रहते हो, यह मेरी समझ के बाहर है। क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम पश्चिम से मुक्त हो जाएं-हमारी अपनी शिक्षा हो, हमारी अपनी पत्रकारिता हो, हमारी अपनी सुगन्ध हो और हमारा अपना अर्थ हो।

 

समय आ गया है। पत्रकारिता एक नये युग का आरम्भ बन सकती है। राजनीति को जितने पीछे ढकेलो- तुम्हारे अखबार के बिल्कुल अंतिम पृष्ठ पर। राजनीति हमारी आत्मा नहीं है। वह सबसे गंदा खेल है, जिसका तुम लोगों में प्रसार कर रहे हो। राजनीतिक को इस बात का स्पष्ट अहसास दिलाना अत्यन्त आवश्यक है कि उसके पास कोई प्रज्ञा नहीं है कि उसे देश की नियति का नियंता नहीं बनना है और वह सिर्फ जनता का सेवक है। उसकी भूमिका सिर्फ कामकाज की है।

 

पोस्टमास्टर जनरल कौन हो? इसके लिए तुम बहुत शोरगुल नहीं मचाते। उसकी भूमिका सिर्फ कामकाज के लिए है। रेलवे विभाग का प्मुख कौन हो, इसके लिए बहुत माथापच्ची नहीं करते। उसकी क्या जरूरत है? वह अपना काम कर रहा है, उसे उसका वेतन मिल रहा है, बात खत्म हुई। तुम राजनीतिज्ञों की ओर इतना ध्यान क्यों देते हो? तुम्हारी पचास प्रतिशत से भी अधिक ऊर्जा उन पर व्यय होती है, जिनकी राजनीतिक आयु केवल चार साल की है। कल वे विस्मृत हो जाएंगे।

 

वे ठीक तुम्हारे अखबारों जैसा है। कल का अखबार उतना ही कचरा होता है, जितना तुम्हारा कल की राजनीति।

 

लेकिन इन क्षणाजीवी बातों को इतना महत्व क्यों देना? आध्यात्म का अर्थ है ऐसी बातों को महत्व देना, जिनका चिरस्थायी मूल्य है, जो जीवन को सदा मार्गदर्शन और प्रकाश दे सकते हैं, जो सनातन है, शाश्वत है। शाश्वत मूल्य आध्यात्मिकता का अंग है, क्षणिक मूल्य राजनीति का अंग है। राजनीति और आध्यात्म दो विपरीत ध्रुव हैं।

 

राजनीति देश के कोने-कोने में धर्म को दबाने की कोशिश कर रही है। राजनीतिज्ञों को एकमात्र खतरा है धर्मों से, क्योंकि धर्म के कारण ही लोगों में अधिक प्रज्ञा जाग सकती है।

 

उदाहरण के लिए मैं किसी भी समस्या को इतनी बड़ी नहीं मानता कि देश उससे संघर्ष करता रहे और उसे सुलझा न पाए। दस साल के भीतर उस देश की सब समस्याएं सुलझाई जा सकती है। लेकिन राजनीतिज्ञ समस्याओं को सुलझाना नहीं चाहते है, वे उन्हें पैदा करना चाहते है। वस्तुत: उनकी जिन्दगी ही इन समस्याओं पर निर्भर करती है।

 

एडोल्फ हिटलर ने अपनी आत्मकथा में एक बड़ा अर्थपूर्ण वक्तव्य दिया है। अगर राजनीतिज्ञ को महान राजनीतिज्ञ बनना है, जनता का महान नेता बनना है तो वह इस बात की फिक्र करे कि राज्य में शांति कभी न हो। उसे हमेशा कुछ न कुछ उपद्रव पैदा करना चाहिए, वह लोगों में भय पैदा करे, उन्हें असुरक्षित चिंतित और उद्विग्न बनाये रखे। वह लोगों को हमेशा इस स्थिति में रखे कि उन्हें उसकी जरूरत हो। वह पड़ोसी राष्ट्रों से सदा दुश्मनी पैदा करे-वास्तविक या काल्पनिक। लेकिन सीमा के पार सदा से दुश्मन हो। और जैसे ही तुम्हे गता है कि नेतृत्व कमजोर हो रहा है, युध्द पैदा करो क्योंकि युध्द काल में ही महान नेता पैदा होते हैं।

 

वह ठीक कह रहा है। इसका निष्कर्ष क्या निकलता है? निष्कर्ष यह निकलता है कि राजनीतिज्ञ को समस्याएं सुलझाने में कोई रस नहीं है, वह उन्हें यथासंभव जटिल बनाने में लगा रहता है। इसलिए उसका होना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है। तुम्हें सदा उसकी जरूरत होती है। वह तुम्हें सदा दुश्मनों से डराता रहता है-चीन-पाकिस्तान। वे अणु-बम इकट्ठे कर रहे हैं, आणविक शस्त्रास्त्र इकट्ठे कर रहे हैं तो तुम्हें अपने नेताओं की जरूरत होती है फिर वे दो कौड़ी के क्यों न हों। युध्दकाल में जो सत्ता में होता है उसका पूरा समर्थन करना चाहिए क्योंकि वह संकट की स्थिति है। चालाक राजनीतिज्ञ हर देश को हमेशा संकट में बनाए रखता है।

 

पत्रकारिता में बड़ी से बड़ी क्रांति जो होगी वह है अगर वह इस देश में एक अलग किस्म की पत्रकारिता पैदा कर सके, जो राजनीति के द्वारा नियंत्रित न हो, लेकिन देश के प्रज्ञावान लोगों द्वारा प्रेरित हो। तुम इसे बिल्कुल सुनिश्चित रूप से जान लो कि किसी भी देश के प्रज्ञावान लोग चुनाव नहीं लड़ेंगे। वे जनता से वोट नहीं मांगेंगे तो प्रज्ञावान लोग, उनके स्वभाव के कारण ही, सत्ता से बाहर रहेंगे।

 

पत्रकारिता का यह एक मूलभूत कार्य रहेगा कि जनता के सामने प्रज्ञावान लोगों को और उनकी प्रज्ञा को प्कट करें।

 

राजनीति पर अधिक ध्यान मत दो। वह खतरनाक है। उनकी जितनी हो सके, उतनी उपेक्षा करो। उन पर तभी ध्यान देना चाहिए जब वे प्रामाणिक रूप से कुछ शुभ कार्य करें।

 

स्वस्थ पत्रकारिता से मेरा मतलब है ऐसी पत्रकारिता जो मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व का पोषण करे-उसका शरीर, उसका मन, उसकी आत्मा, ऐसी पत्रकारिता जो बेहतर मनुष्यता को निर्मित करने में संलग् है। सिर्फ घटनाओं के वृतान्त नहीं इकट्ठे करती। पत्रकारिता सिर्फ एक समाचार माध्यम न हो, वह एक अच्छा साहित्य भी होना चाहिए, तभी वह स्वस्थ है। आज भी उसे पढ़ा जा सके । वह इतना क्षणजीवी न रहे। लेकिन तुम सिर्फ एक समाचार माध्यम ही रहे, तो फिर स्वभावत: वह दिन बीत गया कि समाचार पुराना हो जायेगा। तुम्हें ऐसी चीज निर्मित करना चाहिए जो कभी पुरानी नहीं होती, सदा नई रहती है।

 

महान साहित्य का यही अर्थ है। दोस्तोवस्की के उपन्यास या लियो टालस्टाय, एन्टन चैखव, तुर्गनेव या रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास, ये तब तक अर्थपूर्ण रहेंगे, जब तक मनुष्यता रहेगी और सदा ताजा बने रहेंगे। तुम्हारी पत्रकारिता में कुछ वैसी गुणवत्ता होनी चाहिए। वह गुणवत्ता लाई जा सकती है। तुम समाचार को स्थान दे सकते हो, लेकिन वह गौण होना चाहिए। क्योंकि वे समाचार-वृत्तान्त आखिर है क्या? उनसे क्या होने वाला है? कोई चोरी करता है उसका समाचार छापने में क्या सार है? उसे व्यर्थ ही क्यों खबर बनाना? तुम अपने पन्ने बिल्कुल ही गैर जरूरी बातों से भर रहे हो।

 

आवश्यक बात को जगह दो। तुम्हारे पास कवि हैं, चित्रकार हैं, लेखक हैं, आध्यात्मिक महामानव हैं, तुम उन सबको ला सकते हो। राजनीति तीसरे पृष्ष्ठ पर हो या चौथे पृष्ठ पर या शायद किसी भी पृष्ठ पर नहीं। तुमने इन राजनीतिज्ञों को इतना बडा बना दिया है, उनके बारे में इतनी अतिश्योक्ति कर दी है कि उसकी वजह से पूरे देश को परेशानी उठानी पड़ती है। पूरी दुनिया इन लोगों से परेशान है। उसकी जिम्मेदारी तुम्हें अपने सिर पर उठानी पड़ेगी। इन लोगों के गुब्बारे में जो हवा भरी है उसे निकालना होगा, उनका सही स्थान उन्हें दिखाना होगा। कोई व्यक्ति देश का राष्ट्रपति होगा, वह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। सवाल यह है कि वह एक अच्छा राष्ट्रपति है या नहीं, उसकी गुणवत्ता का सवाल है।

 

जब अब्राहम लिंकन राष्ट्रपति हुए, तब ऐसी घटना घटी। सीनेट के पहले दिन.... वहां का अभिजात्य वर्ग बहुत नाराज था, उनके अहंकार को ठेस लगी थी क्योंकि वह रईस खानदान से नहीं था। वह चमार का बेटा था। उनमें से एक रईसजादे से नहीं रह गया। वह खडा होकर बोला, ''श्रीमान लिंकन, इससे पहले कि आप अपना भाषण शुरू करें-वह उद्धाटन का भाषण था-मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि आप एक चमार के बेटे हैं।''

 

पूरा सीनेट तालियाँ बजाने लगा और हंसने लगा। वे अब्राहिम लिंकन का अपमान करना चाहते थे। लेकिन तुम उसके जैसे आदमी का अपमान नहीं कर सकते। वह शांति से खड़ा हुआ और जब सब शोरगुल खत्म हुआ तब उसने कहा, ''मैं आपके प्रति अनुग्रहीत हूं कि आपने मुझे मेरे महान पिताजी की याद दिलाई। मैं अपनी कमियां, अपनी कमजोरियां जानता हूं। वे जितने बड़े चमार थे, उतना बड़ा राष्ट्रपति मैं कभी नहीं हो पाऊंगा। मैं उनकी तुलना में कुछ भी नहीं हूं। मेरे पिताजी एक महान कलाकार थे। मैं यथासम्भव पूरी कोशिश करूंगा, लेकिन मैं जानता हूंमैं उनसे श्रेष्ठतर नहीं हो पाऊंगा।''

 

पूरा सीनेट सन्नाटे में आ गया। लेकिन उन्होंने एक बात जान ली कि इस आदमी को तुम अपमानित नहीं कर सकते।

 

जिस आदमी ने यह सवाल पूछा था उससे उसने कहा, ''आपको उनकी याद कैसे आई? क्योंकि मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरे पिताजी आपके घर भी जाया करते थे। क्या आपने मेरे पिताजी के द्वारा बनाए हुए जूते पहन रखे हैं? क्या वे काट रहे हैं? मैं भी कुछ जानता हूँमैं उन्हें ठीक कर सकता हूँ। मैं बहुत बड़ा कलाकार नहीं हूं, लेकिन मेरे पिताजी के साथ काम करते-करते मैं थोड़ा-बहुत सीख गया हूं। तो आप लोगों में से किसी के भी जूते में कोई तकलीफ हो तो आप कभी भी मेरे पास आ सकते हैं।'' राष्ट्रपति केवल राष्ट्रपति होने से बड़ा नहीं हो जाता, उनकी गुणवत्ता क्या है... गुणवत्ता के सम्बन्ध में बात करो, व्यक्ति के सम्बन्ध में नहीं। प्रधानमंत्री सिर्फ प्रधानमंत्री होने से कुछ नहीं होता, उसके गुणों की चर्चा करो-उसने देश के लिए क्या किया है, वह क्या कर रहा है, उसे यह करने के लिए प्ेरित करो। दिन बीतते जाते हैं ... इन सालों को गुजरते हुए मैं दैख रहा हूं।  मेरा पूरा परिवार आजादी की लडाई में संलग् था। सब लोग कारावास में थे। हम बच्चों ने बहुत कष्ट उठाए। बचपन में मैं अपने पिताजी से पूछता था, ''क्या आपको भरोसा है कि  जिस आजादी के लिए आप लड़ रहे हैं, वह कभी आएगी? हो सकता है कि अंग्रेज यह देश छोड़ दें लेकिन उनकी जगह जो आएंगे क्या वे उनसे बेहतर होंगे? मैं समझ सकता हूँ कि आप गुलामी के खिलाफ लड रहे हैं, लेकिन मैं नहीं सोचता कि आपको यह बात साफ है कि आप आजादी के लिए लड़ रहे हैं। आपके पास कोई विधायक कार्यक्रम नहीं है।''

 

भारत का पूरा स्वतन्त्रता आन्दोलन बिना विधायक कार्यक्रम के  हो रहा था। इसका परिणाम यह है कि चालीस साल बीत गए और देश नीचे से नीचे गिर रहा है।

 

तीस साल पहले, जब मैंने बोलना शुरू किया, इस देश की आबादी 40 करोड़ थी। मैं संतति निरोध के पक्ष में बोल रहा था। मुझे पत्थर मारे गए, मेरी सभा को अस्त-व्यस्त कर दिया गया। अगली दफा जब मैं उस शहर गया तो मुझे रेलगाड़ी से नीचे उतरने नहीं दिया गया। दो सौ कट्टर हिन्दू प्लेटफार्म पर खडे थे, वे मुझे नीचे उतरने नहीं दे रहे थे। देश की आबादी नब्बे करोड़ हो गई है। इस सदी के अंत तक वह एक अरब पार कर चुकी होगी। इतिहास में पहली बार भारत-चीन से आगे होगा। अब तक चीन सबसे मूढ़ देश था, अब भारत उससे आगे होगा। चीन अपनी आबादी को रोकने में सफल हो गया है। लेकिन तुम्हारे राजनीतिज्ञों में हिम्मत नहीं है, वे लोगों से सच कहने से डरते हैं क्योंकि उन्हें अपने वोटों से मतलब है। पत्रकारों को किसी से डरने की जरूरत नहीं है। तुम तो किसी के वोटों पर निर्भर नहीं हो। तुम्हें लोगों के सामने सत्य को प्रकट करना चाहिए- तुम बच्चे पैदा कर रहे हो लेकिन वस्तुत: तुम मौत को जन्म दे रहे हो। इस सदी के अंत तक आधा देश- इसका मतलब 50 करोड़ लोग भूख से मर जाएंगे, दो में से एक आदमी। तुम लाशों से घिर जाओगे। तुम्हारे राजनीतिज्ञ इस सम्बन्ध में क्या कर रहे हैं? अगर मैं संतति निरोध के साधनों के पक्ष में बोलता हूँ तो शंकराचार्य मेरी निन्दा करते हैं राजनीतिज्ञ मेरे प्रवासों को नष्ट करने की कोशिश करते हैं क्योंकि यह बात लोगों के धार्मिक अन्धविश्वासों के खिलाफ जाती है।

 

किसी राजनीतिक के पास, मेरे पास आकर मुझसे मिलने का साहस भी नहीं है। इंदिरा ने पूछा था...  छह दफा उसने मुलाकात के लिए समय लिया था और सिर्फ एक दिन पहले वह उसे रद्द कर देती। अंतत: मैंने अपनी सचिव को उसके पास भेजा, ''यह क्या पागलपन है? आपको आना हो तो आ जाइए और हीं आना हो तो आपको कोई निमंत्रण नहीं दे रहा है। आप ही पूछ रही थी।'' तब मेरी सचिव से कहा, ''मेरे सहयोगी मुझे रोकते हैं। वे कहते हैं, मैं वहां गई तो इससे मेरे राजनीतिक भविष्य को खतरा पैदा होगा।'' क्योंकि मेरे पास कोई वोट नहीं है। सब शंकराचार्य, इमाम और बिशप अपने वोट वापिस ले लेंगे, यदि वे देखते हैं कि एक राजनीतिक मेरे पास आ रहा है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि उनमें से कोई भी तर्क नहीं कर सकता। मैं उनको चुनौती देता रहा हूं कि मैं किसी के भी साथ किसी भी विषय पर सार्वजनिक विवाद के लिए तैयार हूं। ये कायर... इनमें से कोई भी खड़ा नहीं होता।

 

जो लोग उन कारणों के लिए लड़ रहे हैं जो लोकप्रिय नहीं हैं, उन्हें जनता के सामने लाना पत्रकारों का कर्तव्य है। क्योंकि ये अप्रिय कारण अतीत है, इसकी सड़ी-गली धरोहर है। राजनीतिज्ञों के पास वह साहस नहीं हो सकता लेकिन पत्रकार के पास हो सकता है और होना चाहिए। मैं यह कह रहा हूं कि सिर्फ नकारात्मक समाचार पर निर्भर मत रहो। विधायक को उसकी पूरी सुन्दरता में प्रकट करो और नकारात्मकता को पृष्ठ भूमि में रखो। उस पर तुम्हारा ध्यान केन्दि्त न हो। मैं यह नहीं चाहता कि तुम सिर्फ विधायक होओ, मैं चाहता हूँ कि तुम यथार्थवादी होओ। माना कि नकारात्मकता जीवन का हिस्सा है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि तुम्हें अपनी श्मशान भूमि बीच बाजार में बनानी चाहिए। तुम अपनी श्मशान भूमि शहर के बाहर बनाते हो, जहां तुम सिर्फ एक बार जाते हो और फिर वापस नहीं लौटते। तुम उसे बीच बाजार में क्यों नहीं बनाते ताकि आने-जाने वाला राहगीर रोज उसे देख सके कि लोग जलाए जा रहे हैं।

 

वह जीवन का हिस्सा है, इसलिए कभी-कभार तुम अंतिम संस्कार की चर्चा कर सकते हो। लेकिन उस पर ध्यान केन्द्रित मत करो। मृत्यु सुनिश्चित है लेकिन जीवन अधिक महत्वपूर्ण है। जीवन की चर्चा करो, जीवन को उत्सव बनाओ। लोगों को मृत्यु से अत्यधिक भयभीत मत करो। नकारात्मकता की मानसिकता को कुंठा मत बनाओ, यह मेरे कहने का मतलब है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि माध्यम सिर्फ विधायक समाचार पर जिंदा रह सकता है। वह गलत होगा, वह अधूरा होगा। नकारात्मक को प्रकट करना ही है, लेकिन उस पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए। उसकी निंदा की जानी चाहिए। विधायक को सहारा देना चाहिए और नकारात्मक की निंदा की जानी चाहिए।

 

उस भांति तुम सिर्फ विधायक पर रोशनी नहीं डालोगे, तुम दोनों को प्रकट करोगे। लेकिन नकारात्मक पहलू कुरूप होता है। तुम जानते हो कि जीवन में हम नकारात्मक को रास्ते से हटा देते हैं और विधायक को सामने ले आते हैं। यही स्वस्थ पत्रकारिता का रूख होना चाहिए, विधायकता लक्ष्य होना चाहिए, नकारात्मकता उस मंजिल तक पहुंचाने वाली सीढ़ी होनी चाहिए। लेकिन उस पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि उससे लोगों के मन में यह ख्याल पैदा हो जाता है कि जीवन सिर्फ इतना ही है। यह आत्मा का बड़ा खतरनाक कैंसर है। मैं सत्य को वैसा ही प्रकट करता हूं, जैसा दí