Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 4, जून - अगस्त, 2007)

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विशेष

 

 

डॉ. अम्बेडकर और उनकी पत्रकारिता

 

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मोहनदास नैमिशराय

 

 

त्रकारिता के बहुत-से दिग्गज यह तो जानते हैं कि 30 मई, 1826 को हिंदी का प्रथम समाचार पत्र 'उदंत्त मार्तंड' प्रकाशित हुआ था। वे गांधीजी के 'हरिजन' और गंगाधर तिलक के 'केसरी' समाचार पत्र के बारे में भी जानते हैं। वे बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन बहुत कम जानते हैं। क्या इसलिए तो नहीं कि हमारे जानने के भी कुछ सीमित सरोकार रहे हैं। जो जितना जानते हैं उससे आगे जानने को तैयार नहीं या यूं भी कहा जा सकता है कि हमारे परिवारजातिवर्ग और धर्मों के संस्कार हमें कुछ जानने के लिए प्रेरित करते हैं और कुछ न जानने के लिए रोकते हैं।

 

अम्बेडकर की शिक्षा-दीक्षा ऐसे ही भारतीय समाज के बीच हुई थी। उन्हें बचपन से ही पीड़ा मिली। व्यथा मिली और ढेर सारी प्रताड़ना विरासत में मिली। शायद उनके सरोकार इन्हीं सबसे बने। उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है, इसी बंद खिड़की तथा बंद दरवाजे वाली प्रयोगशाला ने सिखलाया। वैसे अम्बेडकर को सिखाया तो ज्योतिबा फुले ने भी और कबीर ने भी। उन्हें सिखाया जीवन के उस सच ने, जिसकी आग में पल-बढ़कर वे वयस्क हुए, पत्रकार बने, दार्शनिक बने और करोड़ों दलितों के मुक्ति नायक बने। शायद उन्होंने गुलामी की जंजीरों को बहुत पहले पहचान लिया था, जिन्हें अन्य दलित नेता नहीं पहचान पाए। यह भी हो सकता है कुछ ने अवश्य ही पहचान लिया हो, लेकिन उन जंजीरों को तोड़ न पाए हों या कोशिश की और सफल न हुए होंगे। पत्रकारिता हमें यही तो बतलाती है, यही सब सिखाती है।

 

डॉ. अम्बेडकर अपने समय से बहुत आगे थे। (1) उन्होंने इतिहास से बहुत कुछ सीखा था। उन्होंने वह सब पढ़ा था, जिसके अध्ययन करने का दलितों को निषेध था। कंवल भारती लिखते हैं कि सवर्ण साहित्यकारोंपत्रकारों की जानकारी सिर्फ इतनी ही हो सकती है, जितनी कि हिन्दूवादी और मार्क्सवादी इतिहासकारों ने उन्हें दी। इसलिए बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकरज्योतिबा फुले महादेव रानाडेअछूतानंद आदि की जानकारी एकांगीअधूरी और एकपक्षीय हो सकती है। (2)  डॉ. जाटव के विचारानुसार 1885 से करोड़ों अछूतों के राजनीतिक हितों की देखभाल करने के लिए राष्ट्रीय आंदोलन में कोई भी नहीं था। दलित समाज के लोग सामाजिकआर्थिक तथा नागरिक अधिकारों से वंचित थे। (3)आधुनिक काल की दृष्टि से भारत की स्थिति देखें तो दलित मुक्ति आंदोलन की लहर देशभर में चल रही थी। उदाहरण के रूप में महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले और उन्हीं के अनुयायी शिवराम जानबा काम्बते, जिन्होंने अम्बेडकर से पूर्व पुणे से (1 जुलाई 1908) 'सोमवंशीय पत्र' प्रकाशित किया था। (4) महाराष्ट्र से ही एसएन हरदास हुए, जिन्होंने 1924 में 'मण्डल महात्में' पुस्तक लिखी। यहां तक कि महिलाओं में दानी शांताबाई जुझारू महिला थी, जिन्होंने आंदोलनरत होकर लिखा भी। महाराष्ट्र से बाहर देखें तो संक्षेप में स्वयं दलित समाज से ऐसे समाज सेवीलेखकपत्रकार हुए, जिन्होंने बाबा साहेब के लिए जमीन तैयार की। उनमें भाग्य रेड्डी वर्मा, हैदराबाद से (1888), बिहार से जगलाल चौधरी (1895), भोला पासवान (1914), उत्तर प्रदेश से चौधरी नंदलाल (1862), स्वामी अछूतानंद (1879), मानकचंद जाटव वीर (1897), पंजाब से मंगूराम (1886), पं. बंगाल से हरीचंद ठाकोर (1811), मद्रास से पीएन राजभोज (1905)

 

बकौल कंवल भारती मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ इलाकों में जागरण की ज्योति गुरु घासीदास ने जलाई। उन्होंने 'सतनामी संप्रदाय' स्थापित किया। (5) कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के पहले तथा उनके समकालीन ऐसे अनेक दलित समाज के लेखकपत्रकारचिंतकराजनीतिज्ञ तथा समाज सेवी हुए जिन्होंने दलितों के भीतर चेतना लाने के अथक प्रयास किए। बकौल कृष्णदत्त पालीवाल डॉ. अम्बेडकर के चिंतन का सर्वाधिक प्रखर रूप जातिवाद के खिलाफ एक सशक्त आंदोलन में दिखाई देता है। समतामूलक समाज की स्थापना के मार्ग की सबसे प्रबल बाधा जातिवाद है। जातिवाद ही हर क्षेत्र में भेदभाव को रोपता है और भेदभाव के कटु-तिक्त अनुभवों के भोक्ता इस चिंतन ने 'बहिष्कृत हितकारिणी सभा' का गठन किया। उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध्द और बीसवीं सदी का पूर्वार्ध्द  सभा और समाज का युग था। कोई हिंदू हितकारिणी सभा बनाता, कोई 'नागरी प्रचारिणी सभा' कोई 'आर्य समाज' और 'ब्रह्म समाज' (6) असल में इन 'सभा' और 'समाज' के भीतर आधुनिक भारत का लोकजागरण धड़कता था। तबके महापुरुष हाशिए के लोगों को अपनी वैचारिक, सांस्कृतिक शक्ति एकत्र करने की प्रेरणा देने के साथ ही यथास्थितिवाद से लड़ने हेतु उनके भीतर संकल्प भी तलाशते थे। अम्बेडकर को अच्छी तरह मालूम था कि सवर्ण समाज से कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी है। इसलिए भी उन्होंने कई मोर्चों की शुरूआत भी की।

 

अब तक अम्बेडकर विदेश से शिक्षा प्राप्त कर लौट चुके थे। उनके भीतर कुछ करने की लालसा थी। वे खुली आंखों से रुढ़ियोंपरंपराओं से युक्त हिंदू समाज भी देखझेल चुके थे और यूरोप के मुक्त समाज की प्रगतिशीलता को भी उन्होंने महसूस किया था। 22 फरवरी 1918 के 'टाइम्स ऑफ इंडिया' को देखें तो उसमें अम्बेडकर का एक पत्र छपा था। विषय था- स्वराज्य की मांग से पूर्व सामाजिक समानता सुनिश्चित की जाए। स्वराज्य उसी प्रकार एक महार का भी जन्मसिध्द अधिकार है जैसा एक ब्राह्मण का। उन्होंने हिन्दुओं के व्यवहार में ठोस परिवर्तन की आवश्यकता पर जोर दिया। साउथ ब्रो आयोग के माध्यम से बाबा साहेब प्रथम बार अंग्रेजों के समक्ष अस्पृश्यों के अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में आए। उनकी उपस्थिति से अस्पृश्यों ने भारत के लिए एक नए युग की सूत्रपात हुआ। (7) 31 जनवरी, 1920 को बाबा साहेब ने दलितों में जागृति लाने के उद्देश्य से एक मराठी पाक्षिक पत्र 'मूक नायक' प्रारंभ किया। इस पत्र को प्रारंभ करने में कोल्हापुर नरेश साहू महाराज ने आर्थिक सहायता भी दी। यह सुखद स्थिति थी, लेकिन दु:खद स्थिति यह भी रही कि 'मूक नायक' का विज्ञापन जब 'केसरी' में छपने हेतु भेजा गया तो अस्पृश्य पत्र के विज्ञापन होने के कारण 'केसरी' ने छापने से मना कर दिया। उन दिनों तिलक जीवित थे और 'केसरी' का दायित्व उन्हीं पर था। (8) 'मूक नायक' के पहले सम्पादकीय में अम्बेडकर ने लिखा- ''वर्तमान समाचार पत्र केवल कुछ विशिष्ट जातियों के हितों की रक्षा कर रहे हैं।'' उन्होंने इसी अंक में भारत को अस्पृश्यों व असमानता का घर बतलाते हुए लिखा था- ''भारत को स्वतंत्र होने से पूर्व आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक व धार्मिक आदि क्षेत्रों में समानता स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए। बिना उसके आजादी का अर्थ होगा सत्ता का स्थानांतरण।'' चूंकि 5 जुलाई, 1920 को डॉ. अम्बेडकर को पुन: शिक्षा प्राप्त करने विदेश जाना था, उन्होंने पीएन भटकर को पत्र चलाने की जिम्मेवारी देने का प्रस्ताव रखा। लेकिन पत्र की मैनेजिंग कमेटी ने डीडी घोलप के नाम को स्वीकृत किया। यह पत्र अप्रैल 1923 तक ही चल सका। (9)

 

डॉ. बेचैन लिखते हैं कि सिडेनहम कालिज, बंबई में प्राध्यापक होने के कारण डॉ. अम्बेडकर 'मूक नायक' के विधिवत संपादक नहीं थे। प्रवेशांक की जिम्मेदारी लगभग पांडुरंग नंदराम भटकर ने ही निभाई। वे महार जाति के स्नातकाधीन छात्र थे। यह पत्र मनोरंजन प्रेस, 3, संडहर्स्ट रोड, गिरगांव (महाराष्ट्र) में छपता था। 'मूक नायक' के द्वितीय संपादक ध्रुवनाथ घोलप थे। वे अछूत विषयक पत्रकारिता का अनुभव रखते थे। कहा जाता है कि अम्बेडकर और घोलप के बीच हिसाब-किताब संबंधी विवाद हुआ। 'मूक नायक' तो बंद हो गया, पर विवाद चलता रहा। (10) हालांकि 'मूक नायक' संबंधी अपनी भूमिका का अम्बेडकर ने खुलासा किया। (11) शुरू के 13 अंकों का सम्पादकीय और लेखन अम्बेडकर ने किया। 5 जुलाई 1920 को पांडुरंग नंदराम भटकर को संपादन सूत्र देकर वे पुन: इंग्लैण्ड चले गए। (12) चंदादाताओं से आशा थी कि वे पत्र को मदद करेंगे। आर्थिक सहयोग के अभाव में पत्र को लंबी उम्र न मिल सकी।

 

'मूक नायक' के संपादक मंडल में सर्वश्री सीताराम शिवतरकर, बालाराम अम्बेडकर, बालाराम खांडेकर, संभाजी गायकवाड़, संभाजी संतुजी, वाघमारे आदि का समावेश था। पत्र बंद होने पर अम्बेडकर को मानसिक संत्रास पहुंचा। जिस आशा से पत्र शुरू किया गया था कि, ''बिना लड़खड़ाए 'मूक नायक' स्वजनोध्दार करेगा। वह पत्र लड़खड़ाया ही नहीं, अप्रैल 1923 में पूरी तरह धराशायी हो गया। यह एक त्रासदी थी।'' (13)

 

'मूक नायक' पददलित समाज का पहला पाक्षिक माना जाता है। डॉ. अम्बेडकर द्वारा मित्रोंकार्यकर्ताओं के साथ किए गए पत्र-व्यवहार में 'मूक नायक' संबंधी हकीकत सामने आई। 'मूक नायक' का उदय दलित पत्रकारिता को नई दिशा देने का संकेत था। प्रवेशांक में संत कवि तुकाराम की कविता (अभंग) छपी।

 

अभी मैं इच्छाएं धारण करके क्या करूं,

व्यर्थ तोमड़ी बनाकर क्या करूं?

संसार में खामोश लोगों की कोई नहीं सुनता।

अभी कोई लाज, हित सार्थक नहीं है।

 

'मूक नायक' के अग्रलेख (संपादकीय) अंक 5, 28 अगस्त 1920 भेड़िया (लांडग्याने) को पढ़कर हम सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता 'भेड़िया आएगा' और हरिशंकर परसाई का व्यंग्य 'भेड़े और भेड़िये' को पढ़ रहे जैसा अनुभव करते हैं। अंतर इतना है कि उक्त दोनों के संदर्भ राजनीति मूलक हैं जबकि पत्रकार अम्बेडकर का जोर समाजमूलक समस्या पर है। ''मैं ही भेड़-बकरियों का सच्चा नेता हूं। हिंदुस्तान के हमीं सच्चे हितैषी हैं। अपने मुंह से ऐसा कहकर गरीब जनता का रक्त शोषण एक जाति विशेष द्वारा करना और दीन-दुर्बलों को जो तंग करता है स्वयं चोर होकर चोरों की गिरफ्त से दौड़कर छुड़ाने के लिए आने वाले को चोर कहते हैं। क्या यह अच्छी बात है?'' (14)

 

3 अप्रैल 1927 को एक नए दृष्टिकोण के साथ डॉ. अम्बेडकर ने 'बहिष्कृत भारत' मराठी पाक्षिक की शुरूआत की थी। (15) इस पत्रिका के निकालने का मुख्य उद्देश्य था कि दलित वर्ग को पूरी जानकारी रहे कि देश में दलितों के साथ क्या हो रहा है। अम्बेडकर इसका प्रत्येक सम्पादकीय लिखते थे। पत्रिका के अंकों में विचारोत्तेजक प्रश्न पूछे जाते थे कि अगर मांस खाना दलितों को अछूत बनाता है तो मुसलमान और ईसाई को क्यों नहीं अछूत माना जाता। फिर बहुत से अछूत तो मांस छूते तक नहीं। (16)

 

डॉ. बेचैन के विचार में यह पत्र 1927 से 1929 तक निर्बाध रूप से चला। इसने सामाजिक, राजनैतिक, साहित्यिक, धार्मिक अनेक पहलुओं पर प्रकाश डाला। 'मूक नायक' की अपेक्षा 'बहिष्कृत भारत' में कुछ तकनीकी सुधार व वैचारिक मतांतर भी दिखाई देते हैं। डॉ. गंगाधर पानतावणे, सुखराम हिवरले आदि ने इस पाक्षिक पर शोध पूर्ण विचार किया है, लेकिन यह मराठी होने के कारण एक प्रांत विशेष के पाठकों तक ही सीमित रहा। (17) प्रो. एलिनार जालिएट (अमेरिकन विदुषी) ने अम्बेडकर के महान आंदोलन पर कार्य किया। पृष्ठ 10 (अंतिम) के नीचे प्रेस लाइन दी गई ''पत्र मुद्रक डॉ. मोरेश्वर चिंतामणि लेले, बीए की विक्रम प्रिंटिंग प्रेस से छपवाकर डॉ. भीमराव जी अम्बेडकर- बार एट ला की रहीम बिल्डिंग पांचवावाड़ी पटेल से प्रकाशित।'' (18)

 

बहिष्कृत भारत में 33 अग्रलेख और 150 स्फुट लेख उपलब्ध हैं। महार सत्याग्रह के बाबत, हिन्दू सरकार ने अछूत विषय पर तीन संपादकीय है। 'महार और उनका वतन' विषय पर क्रमश: चार किश्तों में संपादकीय लिखे हैं। (19) शोध का विषय यह भी है कि पत्रकार अम्बेडकर पर केन्द्रित दलित पत्रकारिता सूचनात्मकता से अधिक विचारवस्तु पर आधारित है। दलितों में स्वाभिमान, आत्मसम्मान का सतत संघर्ष उनके  सम्पादकीय की धमनियों में प्रवाहित है। उन्हीं के शब्दों में - जुल्म अत्याचारों से बचाव के लिए आज समाचार पत्रों की सर्वाधिक आवश्यकता है। यह संपूर्ण बहिष्कृत जनता को कबूल करना चाहिए। (20) पत्र में संत-कवियों को बार-बार चर्चा करना, उनकी रचनाओं के उध्दरण देना अम्बेडकर का संत-वांग्मय के प्रति प्रेम व सकारात्मकता का परिचय है। अम्बेडकर लिखते हैं, ''विज्ञापन द्रव्य-लोभ बढ़ाने का कारण है। द्रव्य लोभ के कारण अनीति को उत्तेजना देना, भ्रम फैलाने, पाठकों की अनिष्टकारक वासना उद्दीप्त करने, कामोत्तेजक औषधि सेवन, विलायती दारू के अनेक विज्ञापन प्रकाशित किए जाते हैं। इस तरह कितने की समाचार-पत्र अज्ञ लोगों को मूर्ख बनाने के कारखाने हैं।'' (21)

 

हिंदू धर्म के जगदगुरु डॉ. कुर्तकोटि के मठ से 'स्वधर्म' नामक पत्र प्रकाशित होता था। जिसमें 'श्रीमाटे ने अछूतों के लिए जीवन अर्पित कर दिया', ऐसा मत छपा था। अम्बेडकर ने कहा कि ''हमें अस्पृश्यता निवारण के लिए कार्य करने वालों का चयन करना है। सच्चे आदमी को अपने पास तक लाना है। झूठे को उसके घर तक पहुंचाना है।'' (22) बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर अन्य पत्र-पत्रिकाओं में भी उन दिनों लेख आदि लिखते थे। एक पारसी सान ने अक्टूबर 1929 के दैनिक पत्र 'बाम्बे क्रानिकल' में पुरोहितवाद के विरुध्द एक लेख लिखा। बाबा साहेब ने इसके समर्थन में अपना लेख लिखा जिसका शीर्षक था ''पुरोहितवाद के विरुध्द एक संस्था की आवश्यकता है।'' (23)

 

इसके बाद बाबा साहेब के प्रयासों से 'समाज समता संघ' की स्थापना की गई। इसी के तहत 'समता' पत्र भी प्रकाशित किया गया। अम्बेडकर पत्रकारिता की कड़ी में 24 नवंबर, 1930 को 'जनता' पत्र निकला। पत्र के प्रधान संपादक देवराव विष्णु नाईक थे। यह पत्र 4 फरवरी 1956 तक चला। इसकी कुल आयु 26 वर्ष रही। (24) समता पत्र ही 'जनता' पत्र के रूप में नामांतरित हुआ। इसके संपादक मंडल में गंगाधर नीलकंठ, सहस्त्रबुध्दे, भंडारे, कांबले आदि थे। इनके हाथ में कलम तो दृष्टि में सामाजिक समता स्थापित करने का लक्ष्य था।   सहस्त्रबुध्दे ने तो महाड़ में मनुस्मृति दहन कार्यक्रम का आगे बढ़कर नेतृत्व किया था। इन ब्राहण्य रहित ब्रह्मण पत्रकारों (25) ने अम्बेडकर के नेतृत्व में आस्था, विश्वास के साथ पहले समता फिर जनता को चलाने की जिम्मेदारी ली थी।

 

समाज समता संघ में बाल गंगाधर तिलक की रुचि नहीं थी जबकि उन्हीं के बेटे बलवंत तिलक बैठकों में आते-जाते थे। अपने पिता के कारण दुखी होकर स्वयं बेटे को आत्महत्या करनी पड़ी थी। बलवंत तिलक ने आत्महत्या से कुछ समय पूर्व (28 मई 1928) अम्बेडकर को पत्र भी लिखा था। तिलक के इस पुत्र ने 'समाज समता संघ' की शाखाएं जगह-जगह स्थ्ािापित करने में अपनी भूमिका निभाई थी। उनके योगदान और दलितों में उनकी समर्पित पैठ का परिचय डॉ. अम्बेडकर द्वारा 'श्रीधर बलवंत तिलक की मृत्यु' पर लिखे गए 'मृत्यु लेख' (26) से मिलता है।

 

14 अक्टूबर ,1956 को डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में सामूहिक धर्म परिवर्तन किया गया। इसी दिन 'जनता' पत्र का नाम बदलकर 'प्रबुध्द भारत' कर दिया गया। इसका तार्किक आधार धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया में दलितों को प्रबुध्द हो गए माना गया। प्रवेशांक के अनुसार इसके मुख शीर्ष पर 'अखिल भारतीय दलित फैडरेशन का मुखपत्र' छपा था। 'जनता' और 'प्रबुध्द भारत' दोनों ही भारत भूषण प्रेस, दादर बंबई से प्रकाशित हुए।

 

उस समय की पत्रकारिता हमें बताती है कि मराठी के अधिकांश सवर्ण पत्रकार कभी भी बाबा साहेब के समर्थन में नहीं आए। 'केसरी' का उदाहरण हम पहले दे चुके हैं। अन्य पत्र 'भाला', 'कुलाबा समाचार', 'सुदर्शन' हमेशा अम्बेडकर की आलोचना में लगे रहे। (27) पर ब्राह्मणों में भी अपवाद थे सहस्त्रबुध्दे। डॉ. ग.नी. सहस्त्रबुध्दे चित पावन ब्राह्मण थे। उनकी नियुक्ति का निर्णय स्वयं डॉ. अम्बेडकर ने लिया था। (28)

 

यह उल्लेखनीय है कि दायित्वपूर्ण कार्यों को सही रूप में संपादन करने वाले पत्रकार समूह में इन कथित उच्चवर्णीय ब्राह्मण-कायस्थ साथियों की बड़ी अहम भूमिका रही। अम्बेडकर सहस्त्रबुध्दे को एक पत्र में लिखते हैं- ''मेरी भावनाओं व अछूतों के सुख-दुखों व उनकी आकांक्षाओं के साथ तुम सब इतने समरस हो गए हो कि तुम मेरी तरह जन्म जाति से अछूत नहीं हो मात्र इतना ही तुम्हारा दोष है।'' (29)

 

'जनता' का प्रकाशनकाल डॉ. अम्बेडकर के जीवन की सर्वाधिक जिम्मेदारियों, व्यवस्तताओं और संघर्ष का काल रहा है। जनता के आरंभिक दिनों से ही राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में उथल-पुथल थी। स्वतंत्रता प्राप्ति का आंदोलन निर्णायक मुकाम पर पहुंच रहा था। भावी स्वराज में दलितों की उचित भागीदारी का प्रश् डॉ. अम्बेडकर के जहन में बराबर कौंध रहा था। उनका बार-बार विदेश गमन, अध्ययन और भारतीय राजनीति के घटनाक्रम पर गंभीर चिंतन उसी समय का है। फिर भी वे जनता के लिए निरंतर लिखते थे। यह तथ्य भाउराव को लंदन से लिखे एक पत्र (23-9-1931) में परिलक्षित होता है- ''यहां मैं जनता के लिए नियमित लिखते हुए प्रसन्न हूं और मैं निश्चिंत हूं कि आप के लिए 'जनता' के विस्तार में सहायता करने के लिए दोहराना नहीं पड़ेगा।''(30)

 

प्रो. अरुण कापसे के अनुसार अम्बेडकर के प्रमुख लेख देशान्तर, धर्मान्तर, नामान्तर आदि 'जनता' पत्र के अलावा मुख्यत: 'ज्ञान प्रकाश' में भी प्रकाशित हुए। उनके 'जातिभेद उन्मूलन' भाषण के बारे में मधु लिमये ने लिखा था-''इसमें इतनी आग है कि इसकी तुलना काल मार्क्स, एंजेल्स द्वारा लिखित 'कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो' से की जा सकती है। हम भारतीयों के लिए तो यह कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो से भी अधिक प्रासंगिक है।''

 

गांधीजी ने जब 'हरिजन' पत्र शुरू किया तो अम्बेडकर से संदेश मांगा था। लेकिन उन्होंने संदेश न देते हुए लिखा था। गांधी जी ने उनके बयान को पत्र सहित 'हरिजन' के प्रवेशांक में 'डॉ. अम्बेडकर और जाति' शीर्षक देकर प्रकाशित किया था। जो इस तरह है- मैं कोई संदेश नहीं दे सकता। कारण मेरे लिए समझना अनुचित है साहस की बात होगी कि हिंदुओं की आंखों में मेरा महत्व इतना है कि वे मेरे किसी संदेश का आदर करेंगे। मैं केवल मनुष्य से मनुष्य के नाते कुछ बोल सकता हूं। (31)

 

डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन लिखते हैं कि ''साहित्य पत्रकारिता का वास्तविक वाहक आज वही है, जो सामाजिक गुलामी के अवशेषों को समाप्त करने के लिए लिख रहा है। यहां मैं महसूस करता हूं 'हरिजन' और 'जनता' महज अखबार नहीं थे वे दो अलग चिंतन धाराओं के प्रतिनिधि थे। इन दोनों का साहित्य पर भी गहरा प्रभाव आया। बहुत सारा गैर दलित 'हरिजन साहित्य' 'हरिजन' प्रभाव से प्रस्तुत हुआ है तो दलित साहित्य को 'जनता' पत्र ने काफी ऊर्जा दी। अपनी अवधारणा भेद के मुताबिक 'हरिजन' वर्ण व्यवस्था के पुरातन मूल्यों के प्रति और 'जनता' 'मूक नायक' 'बहिष्कृत भारत' में तैयार की गई पृष्ठभूमि में विकसित हो अपनी लोकतांत्रिक अवधारणा का आभास देने वाला जागरुक पत्र है।'' (32) यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि दलित साहित्यकारोंपत्रकारोंतथा शिक्षाविदों पर अम्बेडकर की पत्रकारिता का गहरा असर पड़ा है। विशेष रूप से महाराष्ट्र के दलितबौध्द परिवारों में तो अम्बेडकर के द्वारा शुरू किए गए अखबारों की फाइलें मिल जाएंगी। प्रसिध्द लेखक दया पवार ने अपनी आत्मकथा 'अछूत' में लिखा है, ''बंबई में बाबा साहेब द्वारा संपादित 'जनता' मराठी साप्ताहिक छात्रावास में आता था। उसके संपादकीय मानसिक शक्ति प्रदान करने पढ़ते हुए हमें चारों ओर सामाजिक शोषण का अहसास बड़ी तीव्रता से होता था।''

 

बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के महत्वपूर्ण पत्र होने पर भी ऐसा देखा पढ़ा गया कि हिंदी के गैर दलित किसी भी शोध ग्रंथ में डॉ. अम्बेडकर की पत्रकारिता का जिक्र तक नहीं है। पत्रकारि