Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 4, जून - अगस्त, 2007)

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विमर्श

 

 

 

मीडिया का अतिरेक

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विश्वनाथ सचदेव

 

रामकृष्ण गौड़ को जानते हैं आप? नहीं याद आ रहा इस नाम के बारे में कुछ? अच्छा, जाह्नवी कपूर का नाम सुना है आपने? नहीं, यह सवाल मुझे नहीं पूछना चाहिए था। भला कौन नहीं जानता आज जाह्नवी  कपूर को। हमारे टीवी चैनलों की कृपा से जाह्नवी ही नहीं, उसके सारे कुनबे को पूरा देश जानने लगा है। जाह्नवी की खासियत यह है कि अमिताभ बच्चन के बेटे और विश्वसुंदरी की शादी के दिन उसने आत्महत्या की कथित कोशिश की थी और फिर सारी दुनिया को बताया था कि अभिषेक बच्चन ने ऐश्वर्या की मांग में सिंदूर भरने से पहले उसकी मांग में सिंदूर भरा था। इससे महत्वपूर्ण खबर हमारे टीवी चैनलों के लिए क्या हो सकती थी? सारे के सारे ससुराल वालों और मायके तक भी पहुंच गए थे टी.वी., कैमरे। रातोरात जाह्नवी वीआईपी बन गई। बनी नहीं, बना दी गई।

 

यही किस्सा रामकृष्ण गौड़ का भी था। प्रियंका गांधी की जब शादी हुई तो इस व्यक्ति ने कुछ वैसा ही किया था, जैसा अभिषेक-ऐश की शादी में जाह्नवी ने किया। वह प्रियंका के घर बारात लेकर पहुंच गया था। न्यायालय में उसने याचिका दायर की थी कि प्रियंका को शादी से रोका जाए। उसने यह भी दावा किया था कि वह अभिनेत्री श्रीदेवी और जयाप्रदा का भी पति रह चुका है। हालांकि अदालत ने उन्हें यह सब प्रपंच करने के लिए दंडित भी किया था, लेकिन बदनाम होंगे तो क्या नाम नहीं होगा, की तर्ज पर वह अपना 'नाम' तो कर गया। यह बात दूसरी है कि आज उसके बारे में किसी को कुछ याद नहीं है, लेकिन यह किसे याद नहीं होगा कि तब टीवी चैनलों ने रामकृष्ण गौड़ को सिर पर उठा लिया था। वैसे ही, जैसे अब अपना नाम जाह्नवी बताने वाली इस महिला को सिर पर उठाया गया है। टीआरपी के भूखे हमारे चैनल यह नहीं स्वीकारेंगे, लेकिन यह एक हकीकत है कि गौड़ और जाह्नवी के ये प्रकरण कुल मिलाकर मीडिया की बीमार मानसिकता का ही परिचय देते हैं।

 

हमारी आदत बन चुकी है अपनी हर करतूत के समर्थन में विदेशों, विशेषकर यूरोप-अमेरिका से समर्थन जुटाना। उस कथित विकसित समाज में जो कुछ हो रहा है, उसे हम अनुकरणीय मान लेते हैं। पश्चिमी मीडिया की नकल करना, वहां की फूहड़ता को अपनी शैली का हिस्सा बनाना, स्वयं को वहां के मूल्यों के अनुरूप ढालने की कोशिश में स्वयं को बाकियों से अलग समझने-समझाने की कोशिश करना, यह सब दुर्भाग्य से हमारे मीडिया की पहचान बनती जा रही है। कुछ अर्सा पहले तक ऐसा नहीं था। हमारे मीडिया की एक दायित्वपूर्ण व्यवहार करने वाली जिम्मेदार पहचान थी। दूरदर्शन के जमाने तक तो मीडिया समाज का दर्पण तो नहीं, मशाल बनने की भी कोशिश किया करता था। सरकारी नियंत्रण वाले दूरदर्शन की बहुत सी कमजोरियां और कमियां भी थीं, पर तब हमारा मीडिया फूहड़ नहीं था। जब नए-नए निजी चैनल आए, तब भी दायित्वपूर्ण पत्रकारिता के कई उदाहरण हमने देखे। बहुत कुछ होता था हमारे चैनल में जिस पर हम गर्व कर सकते थे। अब भी है। लेकिन अब बहुत कुछ ऐसा भी है, जो किसी भी सभ्य और समझदार समाज में चिंता का विषय होना चाहिए। जाह्नवी प्रकरण और अभिषेक-ऐश्वर्या की शादी का प्रकरण भी ऐसी ही चिंता का विषय है। ब्रेकिंग न्यूज की होड़ वाले इस जमाने में हमने न्यूज के अर्थ और महत्ता को ही नहीं भुला दिया, खबरें गढ़ने-बनाने की एक ऐसी समझ को भी विकसित किया है, जिसके बारे में विवेकशील समाज में चिंतन होना ही चाहिए।

 

जाह्नवी कांड यदि हमारे मीडिया के अतिरेक का उदाहरण है, तो प्रतीक्षा और जलसा के सामने लगी मीडियाकर्मियों की भीड़ यह बताती है कि समाचार ही हमारी समझ और वरीयताओं के प्रति माही सोच शर्म की सीमाएं लांघ चुकी है। पूरे तीन दिन तक हमने छोटे पर्दे पर एक ऐसा तमाशा देखा, जो कुल मिलाकर हमारी सोच के बौनेपन को ही उजागर करता है। अमिताभ बच्चन के बेटे की शादी में समाज की रूचि होना स्वाभाविक है। अभिषेक और ऐश्वर्या दोनों सेलिब्रिटी हैं। वे क्या कहते हैं, क्या करते हैं, कैसे दिखते हैं आदि में आम लोगों का और खास लोगों का भी रूचि लेना गलत नहीं है। पर मीडिया ने समाज की इस सहज जिज्ञासा को जिस तरह से भुनाने की कोशिश की है, वह गलत भी है और एक अस्वरूप प्रवृत्ति की परिचायक भी। यह शादी खबर थी, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन इतनी बड़ी या महत्वपूर्ण नहीं कि पूरे तीन दिन समाचार-चैनलों के सारे कैमरे इसी पर लगे रहते, और क्या दिखाया इन कैमरों ने? 'प्रतीक्षा' और 'जलसा' के दरवाजों का खुलना और बंद होना। सफाई-कर्मचारी भी यदि अंदर जा या बाहर आ रहा है तो वह कैमरामैन की जिज्ञासा का विषय बन गया था। इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है कि भीतर  शादी की रस्में हो रहीं थीं और हमारे टी.वी. चैनल ऐश्वर्या-अभिषेक द्वारा अभिनीत फिल्मों के शादी वाले दृश्य दिखाकर दर्शकों को मूर्ख बना रहे थे? कड़वी लगती है यह बात, लेकिन सही है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जब यह साफ लगा है कि या तो हमारा मीडिया दर्शकों को मूर्ख समझता है या फिर मूर्ख बनाता है।

 

टी.वी. की यह प्रवृत्ति, खबर भुनाने वाली प्रवृत्ति, समाचार पत्रों में भी झलकने लगी है, पर सौभाग्य से अभी स्थिति इतनी बिगड़ी नहीं है। सावधानी बरतने और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की जरूरत यहां भी है, लेकिन दृश्य माध्यमों को तो इमरजेंसी ब्रेक लगाने की आवश्यकता पड़ गई है। टी.वी. पर क्या दिखाया जाए, क्या नहीं, इस पर विवाद हो सकता है, लेकिन यह निर्विवाद है कि जो कुछ दिखाया जाए, उसके संभावित परिणामों के बारे में भी सोचा जाए। संभव है, हम कल जाह्नवी  को भी उसी तरह भूल जाएं, जैसे हमने रामकृष्ण गौड़ को भुला दिया है। ऐसे नाम और ऐसे लोग भुलाने लायक ही होते हैं, लेकिन ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर खबरें बेचने की जिस दिशा में हमारा मीडिया बढ़ रहा है, जिस तरह खबरों की समझ का अवमूल्यन हो रहा है और जिस तरह खबरों के नाम पर सामान्य दर्शक के विवेक का उपहास किया जा रहा है, उसे भूलना उचित नहीं होगा। इसे याद रखना भी जरूरी है और उतना ही जरूरी है इस सोच को रेखांकित करना कि मीडिया यदि अपना दायित्व भूल जाता है या उसे गलत समझता है तो समाज के विवेकशील वर्ग का दायित्व बन जाता है कि वह इसके विरूध्द आवाज उठाए। पत्रकारों और पत्रकारिता से यह आशा की जाती है कि वह समाज को उन दिशाओं से परिचित कराएंगे, जहां विकास की संभावनाएं हैं। किसी जाह्नवी के पागलपन या किसी फिल्म स्टार की शादी को भुनाना किसी भी दृष्टि से इस आशा को पूरा नहीं करता। घटिया पत्रकारिता के यह दृश्य हम बार-बार देख रहे हैं। मीडिया वाले इस घटियापन को कब समझेंगे?

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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