साहित्यिक
विमर्श करती महत्वपूर्ण पत्रिकाएं
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गिरीश पंकज
हम
हिंदी वाले लाख रोना रोते रहें कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण
हिंदी क्षेत्र में पढ़ने की प्रवृत्ति कम हो रही है लेकिन सच तो यह है कि हिंदी
का वर्चस्व बढ़ा है। एक दौर था,
जब साहित्यिक पत्रिकाएं हाशिए पर चली गयी थीं। अनेक महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के
बंद होने के यह समझा जा रहा था कि पत्रिका आंदोलन विफल हो गया है। लेकिन ऐसा
कुछ नहीं था। अब देश के कोने-कोने से अनेक महत्वपूर्ण पत्रिकाएं निकल रही हैं।
विचारों की अनेक सरणियां यहां दृष्टव्य होती हैं। हर पत्रिका अपनी अस्मिता और
तेवर के साथ सामने आ रही हैं। कुछ विधागत हैं तो कुछ प्रवृत्ति विशेष। जैसे
व्यंग्यधर्मी पत्रिका -व्यंग्ययात्रा। गीत धर्मी- संकल्परथ। स्त्री विमर्श पर
केंद्रित अंतरंग संगिनी और तूलिका। मीडिया केंद्रित- आंचलिक पत्रकार,
विदुर, मीडिया विमर्श। अनुवाद केंद्रित
-सद्भावना दर्पण, अनुवाद आदि। कार्टून विधा पर कार्टून
वॉच आदि। दरअसल यह दौर विशेषीकरण का है। इसलिए ऐसी पत्रिकाओं के लिए व्यापक
स्पेस है। साहित्य की विविध प्रवृत्तियों पर भी दस्तावेज,
संबोधन, शब्द शिखर,
समय सुरभि, बया जैसी कुछ पत्रिकाएं भी
हैं। इन तमाम पत्रिकाओं को देखकर आश्वस्त हुआ जा सकता है कि साहित्य में
बौध्दिक विमर्श का मंच बन चुकी ये पत्रिकाएं अजेय सैनिक की तरह मोर्चे पर डटी
रहेंगी।
व्यंग्य
यात्रा
संपादक - डॉ.
प्रेम जनमेजय,
73- साक्षर अर्पाटमेंट, पश्चिम विहार,
नई दिल्ली, एक प्रति 25
रूपए, वार्षिक- 100
यह
व्यंग्य विधा पर केंद्रित एक अनिवार्य पत्रिका बनती जा रही है। पिछले तीन
वर्षों से नियमित रूप से प्रकाशित यह त्रैमासिक पत्रिका सार्थक व्यंग्य लेखन को
मंच देती है। साथ ही व्यंग्य साहित्य के आलोचनात्मक पक्ष को भी तवज्जो देती है।
हिन्दी साहित्य की आलोचना ने व्यंग्य को अछूत समझकर दरकिनार कर दिया है। इसलिए
यह बेहद जरूरी था कि व्यंग्यकार खुद अपना जमीन तैयार करते। इसीलिए प्रख्यात
व्यंग्यकार डॉ. प्रेम जनमेजय ने इसका बीड़ा उठाया और व्यंग्य यात्रा की शुरूआत
कर दी। आशा के विपरीत इस पत्रिका को व्यंग्य प्रेमियों की सद्भावना मिली। यही
कारण है कि केवल एक साल तक प्रकाशन का लक्ष्य लेकर चले प्रेमजी ने इसे नियमित
करने का मन बना लिया।
व्यंग्य
यात्रा का ताजा अंक अक्टूबर-दिसंबर
2006
हिन्दी के समकालीन परिदृश्य की पड़ताल पर केंद्रित है। व्यंग्य का फलक इतना
विशाल है कि इसे दो अंकों में समेटना पड़ा। पहले अंक में हिन्दी के नए-पुराने
व्यंग्यकार शामिल हैं। इसमें कुछ महत्वपूर्ण नाम छूट गए हैं जो दूसरे अंक में
समाहित किए जाएंगे। इस अंक में श्रीलाल शुक्ल, नरेन्द्र
कोहली, शंकर पुणतांबेकर, कृष्ण
चराटे, ज्ञान चतुर्वेदी, गोपाल
चतुर्वेदी, संतोष खरे, विनोद
शंकर शुक्ल समेत अनेक व्यंग्यकारों की रचनाएं प्रकाशित हैं। व्यंग्यकार प्रकाश
मनु, धनंजय वर्मा, अनूप
श्रीवास्तव आदि के महत्वपूर्ण विचार भी शामिल हैं। त्रिकोणीय एक स्थायी कालम
है। इसमें किसी एक उपन्यास पर तीन लेखकों की समीक्षाएं प्रकाशित होती हैं। इस
स्तंभ के तहत अब तक ज्ञान चतुर्वेदी, गिरीश पंकज,
विष्णु नागर की कृतियों पर चर्चा हो चुकी है। समीक्षा अंक में
यशवंत व्यास के उपन्यास कामरेड गोडसे पर कमलेश्वर,
ज्ञान एवं रामविलास जांगिड़ की समीक्षाएं हैं।
समीक्षा अंक
में प्रकाशित व्यंग्यों की विशेषता यह है कि लेखकों ने रचना के साथ यह भी
स्पष्ट किया है कि उन्हें अपनी यह रचना श्रेष्ठ क्यों लगती हैं। पत्रिका में
व्यंग्य संग्रहों की संक्षिप्त सूचनात्मक समीक्षाएं भी होती हैं। पत्रिका की एक
और विशेषता यह है कि उसने खुलकर अपील की कि लोग पत्रिका को आर्थिक सहयोग दें।
संपादक ने 'भिक्षाम
देहि' शीर्षक के साथ अपील की। इसका सुपरिणाम यह हुआ कि
पत्रिका की मदद के लिए अनेक हाथ आगे बढ़े। कुछ दृश्य में थे,
कुछ अदृश्य थे। संपादक ने सबकी सद्भावनाओं के लिए आभार मानते
हुए स्वीकार किया कि कारवां बनता गया। व्यंग्य पर गंभीरता के साथ काम करने वाली
'व्यंग्य यात्रा' यूं ही गतिमान
रहे।
बया
संपादक -
गौरीनाथ, 38
बृजपुरी एक्सटेंशन, परवाना रोड,
दिल्ली -
51,
एक प्रति 30 रूपए
बया का पहला
अंक मेरे सामने है। यह अर्ध्दवार्षिक पत्रिका है। इसे पढ़ने के बाद साहित्य का
सुधी पाठक यह प्रश्न करने पर बाध्य हो जाएगा कि यह अर्ध्दवार्षिक क्यों है। कम
से कम त्रैमासिक तो होना ही चाहिए।
224
पृष्ठों की इस पत्रिका को उलटने-पलटने के बाद समझदार पाठकों को पता चल जाता है
कि संपादक की अपनी पकड़ है। हिन्दी के अनेक महत्वपूर्ण लेखकों की रचनाएं
'बया' में नजर आ रही हैं। यह सूची काफी
बड़ी है। सबका उल्लेख संभव ही नहीं, लेकिन पत्रिका की
प्रवृत्ति को समझने के लिए यह बताना जरूरी है कि पत्रिका समकालीन साहित्य की
चुनौतियों से रूबरू है। साहित्य और समाज की चुनौतियां (कमलेश्वर),
लेखक की भूमिका (शिवमूर्ति), आज के समय
में आलोचना (वीरेन्द्र यादव) जैसे लेख जेनुइन चिंताओं को उठाते हैं।
मीडिया पर
रामशरण जोशी और पुण्यप्रसून वाजपेयी के लेख भी बाजारवाद के कारण उपजी
विसंगतियों पर गहन विमर्श करते हैं। पत्रिका में दलित एवं स्त्री विमर्श,
अर्थव्यवस्था, ग्रामीण भारत से जुड़े
लेख भी प्रकाशित हैं। सेहत और फैशन ने हमारे आधुनिक जीवन को प्रभावित कर रखा
है। इसलिए उसके फलितार्थों पर भी एक-एक पठनीय लेख प्रकाशित हैं। फिल्म की चर्चा
न हो तो रंग नहीं जमता। भले ही चर्चा की दिशा बौध्दिकता से लबरेज हो। मतलब यह
कि 'बया' में एक संपूर्ण
पत्रिका की पूरी फार्मूलेबाजी नजर आती है, लेकिन यह
फार्मूला चलाऊ नहीं है। इसमें गंभीर चेतना है। सत्रह श्रेष्ठ कहानियां और राजेश
जोशी, बरवर राव, अरूण कमल समेत
सत्ताईस महत्वपूर्ण कवियों की रचनाओं के कारण पत्रिका की ऊंचाई बढ़ी है।
प्रख्यात लेखक अमरकांत का उपन्यास 'विदा की रात'
भी प्रकाशित है। रचनाओं के बीच उत्कृष्ट रेखाचित्र पत्रिका को
दर्शनीय भी बनाते हैं। कुल मिलाकर बया की यह पहली उड़ान है लेकिन लगता है,
यह काफी लंबे समय तक उड़ान भरती रहेगी।

विदुर
संपादक- अन्नू
आनंद,
जामिया मिलिया हस्लामिया, जामिया नगर
नई दिल्ली - 110025 । एक प्रति - 40
रूपये
पिछले चार
दशकों से प्रकाशित पत्रिका
'विदुर'
पत्रकारिता एवं जनसंचार माध्यमों पर ही केंद्रित है। पत्रिका
का अंक (अक्टूबर-दिसंबर 06) हिन्दी अखबारों में अंगरेजी
के घुसपैठ को समर्पित है। निसंदेह यह एक बड़ी चिंता है कि कैसे हिन्दी की
पत्रकारिता में यह हीनताबोध घर कर गया कि अंगरेजी के बिना उसकी वाक्य संरचना
अधूरी रहेगी। अति आधुनिक होने के चक्कर में हिन्दी के तथाकथित राष्ट्रीय अखबार
तो पथभ्रष्ट हुए ही, प्रादेशिक अखबार भी पतित होते चले
गए। राष्ट्रभाषा हिन्दी की वैसे भी बुरी हालत रही है। उस पर हिन्दी पत्रकारिता
से भी अगर हिन्दी के शब्द बहिष्कृत होते जाएंगे तो सोचिए,
क्या होगा भविष्य।
नगरीय
परिशिष्टों में हिन्दी (माधव हाड़ा) में अंगरेजी के अनेक ऐसे शब्दों का जिक्र
करके यह बताया गया है कि जिसकी हिन्दी अखबारों में जरूरत नहीं होती। फिर भी
उन्हें घुसेड़ दिया जाता है। ऐसा लग रहा है कि हिन्दी के प्रचलित शब्दों को देश
निकाला दे दिया गया है। एक्टीविटी,
प्राइजेज, एक्वीपमेंट,
परोट, फेमस,
फ्लावर्स जैसे सैकड़ों वाक्य हिन्दी के अखबारों में पसरे मिल जाएंगे। खासकर
नगरीय पृष्ठों में। फूल कितना प्यारा शब्द है। लेकिन इसकी जगह फ्लावर का उपयोग
होता है। लेखक का यह कथन सटीक है कि भाषा का मुहावरा समाज के खाद पानी से जीवित
रहता है। यह उसी से फलता-फूलता भी है। लेकिन हिंग्रेजी की जड़ें हमारे समाज के
खाद-पानी में नहीं है। यह कृत्रिम प्लास्टिक मुहावरा है,
जिसकी चमक ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रहेगी। हिन्दी में
अंगरेजी की घुसपैठ के साथ-साथ हिन्दी समाचार पत्रों के आपसी घमासान और इंटरनेट
पर हिन्दी के बढ़ते वर्चस्व पर भी तथ्यपरक लेख प्रकाशित हैं। प्रिंट मीडिया के
महत्व पर संजय कुंदन का लेख पठनीय है। रेडियो की वापसी पर अरूण आनंद का लेख
रोचक बन पड़ा है। मीडिया में आडरसोर्सिंग पर दिनेश सी. शर्मा से अनेक नई
जानकारियां मिलती हैं। 'विदुर'
जैसी पत्रिकाएं समकालीन पत्रकारिता से जुड़े पत्रकारों के लिए सूचना का अनिवार्य
मंच हैं।

दस्तावेज
संपादक -
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,
बेतियाहाता,
गोरखपुर,
एक प्रति - 25 रूपये,
वार्षिक - 100 रूपये
दस्तावेज
हिन्दी साहित्य की एक गंभीर पत्रिका है। इसके संपादक श्री तिवारी कवि-आलोचक
हैं। पत्रिका की आलोचनात्मक दृष्टि को पाठकों ने पसंद किया है। बिना किसी
तामझाम के यह पत्रिका समकालीन हिन्दी साहित्य की प्रवृत्तियों का गहन विमर्श
करती रही है। यह खुशी की बात है कि दस्तावेज का समीक्षा अंक असमिया साहित्य पर
केंद्रित है। अनुवाद के जरिए हम भारत को जोड़ सकते हैं। दिलों के रिश्ते भाषा से
ही बनते और बिगड़ते हैं। यह अच्छा संकेत है कि अब साहित्यिक पत्रिकाएं अनुवाद को
महत्व देने लगी हैं। पहले अनुवाद को हेयकर्म समझा जाता था। लेकिन अब वह
अनुसर्जनात्मकता है।
दस्तावेज के
असमिया अंक के अतिथि संपादक उदयभानु पांडेय हैं। उनके सहयोगी डा. शांति थापा
हैं। दोनों के सहयोग से असम के विपुल साहित्य की बानगी देखने को मिलती है।
असमिया साहित्य का इतिहास बहुत पुराना है। अतिथि संपादक ने असमिया कविताओं और
कहानियों पर ज्यादा जोर दिया है। वरना पठनीयता का संकट खड़ा हो जाता। असमिया
रचनाओं का हिन्दी अनुवाद सचमुच बड़ा दुरूह कार्य है,
फिर भी यह किया गया। विशेषांक में प्रो. हीरेन गोहाई का
शंकरदेव पर केंद्रित लेख पठनीय है। असमिया कहानियों एवं कविताओं की आधुनिक
दृष्टि सुखद आश्चर्य से भर देती है। विशेषांक में एक असमिया नाटक भी है। आठ
कहानियों एवं चौदह कविताओं की बेहद अल्प सामग्री के कारण असमिया साहित्य के
बृहत्तर रूप से हम परिचित नहीं हो सकते, लेकिन इतना तो
समझ में आ ही जाता है कि दिशा क्या है। असमिया कहानी पर पराग भट्टाचार्य और
असमिया साहित्य की गीति संपदा पर अजयेन्द्रनाथ त्रिवेदी का लेख शोध परक है। कुल
मिलाकर दस्तावेज का असमिया विशेषांक एक दस्तावेज ही है जो भारतीय भाषाओं के
साहित्य को पढ़ने में दिलचस्पी लेने वालों के लिए उपयोगी सिध्द होगा।

शब्द शिखर
संपादक
- आनंद प्रकाश त्रिपाठी, यादव कालोनी,
सागर, मध्यप्रदेश,
एक प्रति 50 रूपये,
वार्षिक -200 रूपये
साहित्य,
संस्कृति एवं जनचेतना की पत्रिका शब्द शिखर साहित्यिक
पत्रिकाओं की भीड़ में अलग दिखती है। लेकिन यह भीड़ श्रेष्ठ पत्रिकाओं की है।
शब्द शिखर में भरती की रचनाएं नहीं है। यह पत्रिका भी विचार प्रधान है। यही
कारण है कि पत्रिका में कविता-कहानी के लिए ज्यादा स्पेस नहीं है। वैचारिक
लेखों की भरमार है। सुपरिचित लेखकों की उपस्थिति शब्द शिखर को समृध्द करती है।
साहित्य में गहरी बौध्दिकता के पक्षधरों के लिए शब्द शिखर में भरपूर सामग्री
है। कविताओं के नाम पर एक ही सोच में ढली कुछ कविताओं को देखकर ऊब होती है।
क्या अब कविता लिखना लोगों को ठगने का एक बौध्दिक शगल तो नहीं?
गनीमत है इस अंक में भगवत रावत की सात कविताएं हैं। विनय दुबे
की कविताएं भी बांधती हैं। देवेन्द्र शर्मा इंद्र के गीत छापकर शब्द शिखर ने
यह साबित कर दिया है कि वह अंधानुकरण की आदी नहीं है। नई कविताओं से ही अटी-पड़ी
पत्रिकाओं में गीत बहिष्कृत हैं लेकिन शब्द शिखर में गीत की प्रतिष्ठा देखकर
संतोष हुआ। छंद के बगैर कविता अधूरी है। ठीक है नई कविता का दौर है लेकिन छंद
को अछूत समझना कहां की बौध्दिकता है। 'हुजूर दरबार'
में प्रो. कांतिकुमार जैन अपने सुपरिचित तेवरों के साथ मौजूद
हैं। आलोचना का रंदा चलाते-चलाते वे कहीं-कहीं बड़बोले से लगते हैं। आत्मश्लाघा
भी नजर आती है। बावजूद इन सबके उनका बेबाक लेखन बहुत कुछ नई सूचनाएं देता रहता
है। संपादकीय में और अधिक वैचारक गहराई अपेक्षित है। बहरहाल,
इस नई पत्रिका में बहुत संभावनाएं हैं।

संबोधन
संपादक
- कमर मेवाड़ी, चांदपोल,
कांकरोली - 313324, जिला-राजसमंद,
राजस्थान, एक प्रति-15
रूपये
'संबोधन'
एक पुरानी पत्रिका है। नियमित भी है। चार दशकों से प्रकाशित इस
पत्रिका का नया अंक कथाकार स्वयं प्रकाश पर केंद्रित है। स्वयंप्रकाश सुपरिचित
कहानीकार हैं। कमर मेवाड़ी ने दोस्ती निभाई है। ऐसा कम होता है कि दोस्त पर कोई
अंक ही निकाल दिया जाए। वैसे दोस्त में दम भी तो होना चाहिए। कमर जी के सैकड़ों
मित्र हैं लेकिन उन्होंने स्वयंप्रकाश पर अंक निकाला। इसकी वजह है स्वयंप्रकाश
जी का सार्थक लेखन। संपादकीय में कमर जी, सूरज प्रकाश
से अपने अंतरंग रिश्ते के कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। अंत में उन्होंने अपनी
सीमा भी याद रखी। फिर भी सौ पृष्ठों में गागर में सागर भर दिया गया है संबोधन
ने।
कमला प्रसाद,
रमेश उपाध्याय, हेतु भारद्वाज,
कैलाश बनवासी के स्वयंप्रकाश पर केंद्रित अंतरंग लेख आकर्षित
करते हैं। उर्मिला शिरीष ने स्वयंप्रकाश से सार्थक बातचीत की है। इसे पढ़कर पाठक,
लेखक की सृजन यात्रा के विभिन्न पड़ावों से परिचित हो जाते हैं।
स्वंयप्रकाश की यह आत्मस्वीकारोक्ति, हिन्दी कहानी की
जड़ता पर तमाचा है कि हमें भूलना नहीं चाहिए कि सत्तर साल में हम सब मिलकर भी
प्रेमचंद को सरपास नहीं कर पाए हैं।

बयान
संपादक : मोहनदास नैमिशराय, बी.जी.
5 ए 30 बी,
पश्चिम विहार, नई दिल्ली -
110063, एक प्रति - 20 रूपये
मोहनदास
नैमिशराय दलित विमर्श का एक बौध्दिक चेहरा हैं। मोहनदास दलितों के लिए निरंतर
लिख रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वे कहीं पर भी आक्रामक नहीं होते। वे
उदारता के साथ विमर्श करते हैं। उनके विचारों में नफरत नहीं,
प्रेम है। दलित अस्मिता के लिए संघर्षरत होने के बावजूद वे
असंतुलित नहीं होते और मनुष्यता की बुनियादी शर्त प्रेमभाव से आबध्द होकर लेखन
करते हैं। उनकी पत्रिका 'बयान'
के अंक मेरे सामने हैं। 'बयान'
को उन्होंने दलित अस्मिता पर ही केंद्रित नहीं किया है। वे इसे आम आदमी के जीवन
की पत्रिका बनाना चाहते हैं। बयान की रचनाएं जोड़ने की बातें करती हैं।
धर्म है तो
उसे धारण किया जाए। ऐसी बात भी जरूरी है। दलित-शोषित समाज के विभिन्न घटकों पर
भी बयान में लेख छपते हैं। अन्य सामाजिक मुद्दों पर भी विमर्श होता है। कुछ
बातों से आम पाठक असहमत हो सकता है,
लेकिन बयान की ज्यादातर सामग्री हमें विचार के लिए बाध्य करती
हैं। कविताओं का चयन भी संपादक सावधानी से करता है। रचनाओं से मनुष्यता को
प्राथमिकता दी जाती है।
'बयान'
का दलित अस्मिता अंक (मार्च-अप्रैल, 07)
महत्वपूर्ण दस्तावेज सा बन गया है। दलित अस्मिता के पुरोधा डॉ.
आंबेडकर को समर्पित यह विशेषांक अनेक ज्वलंत सवालों को उठाता है। इन लेखों को
पढते हुए पाठक भी समाज की अनेक विसंगतियों से आहत होता चलता है। अधिकांश लेखों
का स्वर यही है कि समाज खुशहाल हो। विषमताएं मिटें। अराजकता खत्म हो। विशेषांक
में दलित कहानी, दलित कविता,
दलित राजनीति, दलित कला आदि विषयों पर गंभीर लेख
प्रकाशित किए गए हैं। विषमता की विष बेल अब कटनी ही चाहिए। 'बयान'
जैसी पत्रिकाएं नवजागरण का काम कर सकती हैं। पत्रिका में अनेक
दलित कवियों की धारदार कविताएं भी हैं। हिन्दी की तथाकथित राष्ट्रीय पत्रिकाओं
से गायब रहने वाली कविताएं बयान में छपकर इस सत्य को ही उद्धाटन कर रही हैं कि
कैसे साहित्यिक पत्रिकाएं भी भेदभाव बरतती हैं। बयान के बहाने श्रेष्ठ
कवि-कहानीकार सामने आ रहे हैं। कहीं-कहीं कुछ रचनाओं में ठेठ नारेबाजी है। कुछ
में अनियंत्रित आक्रोश भी है। ऐसी रचनाएं न छपें तो बेहतर। सामाजिक परिवर्तन
नफरत की बुनियाद पर नहीं हो सकता। इसके लिए जरूरी है कि हम सब सद्भावना का
वातावरण बनाते हुए जागरण का काम करें। बयान से उम्मीद बढ़ जाती है क्योंकि इसके
संपादक खुद एक उदारवादी सोच वाले लेखक-चिंतक हैं। 'बयान'
जैसी पत्रिकाओं से हिन्दी के लेखक भी जुडें क्योंकि यह पत्रिका
केवल दलितों की नहीं है।

संकल्प रथ
संपादक:
रामअधीर, 1081 शिवाजी नगर,
भोपाल (मध्यप्रदेश), एक प्रति- 25
रूपये
गीत-विमर्श की
एक मात्र संवाहिका
'संकल्प
रथ' का नया अंक मार्च-07
छायावाद के प्रवर्तक कवि पं. मुकुटधर पांडेय पर केंद्रित है। रामअधीर जी ने
छत्तीसगढ़ के अनेक कवियों पर विशेषांक प्रकाशित किए हैं। उनका हरेक अंक
संग्रहणीय होता है। मुकुटधर पांडेय पर केंद्रित यह विशेषांक भी पठनीय है। हमेशा
की तरह सर्वाधिक पठनीय संपादकीय में रामअधीर ने इस विशेषांक की पृष्ठभूमि पर
प्रकाश डाला है। छत्तीसगढ़ से श्री अधीर को गहरा लगाव है। इसलिए वे बार-बार
छत्तीसगढ़ को याद करते हैं। वे उन लोगों को भी याद करते हैं जिन्होंने उन्हें
सहयोग दिया। जैसे मुकुटधर पांडेय अंक के लिए उन्होंने रायगढ़ के रविशंकर मिश्र
को आत्ममीयता के साथ याद किया है।
विशेषांक में मुकुटधर जी का छायावाद पर लेख मंत्रमुग्ध कर देता है। कैसे
छायावाद विकसित हुआ,
इस अंक पर पांडेय जी ने संक्षेप में महत्वपूर्ण जानकारी दी है।
पांडेय जी ने 1920 में कविता की उस वक्त की
प्रवृत्तियों को देखते हुए उसे छायावाद कहा था। उनके लेख श्री शारदा नामक
पत्रिका में लेख माला के रूप में प्रकाशित हुए थे। डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन'
के लेख से पता चलता है कि साहित्यिक बिरादरी में पांडेय जी की
कितनी प्रतिष्ठा थी। डॉ. सुरेश गौतम, डॉ. गंगा प्रसाद
बरसैंया, विद्याभूषण मिश्र, डॉ.
विमल पाठक, स्व. हरि ठाकुर,
प्रो. ईश्वर शरण पांडेय, डॉ. बलदेव,
डॉ. बिहारीलाल साहू, डॉ. विजय पाठक आदि
के लेख भी पं. मुकुटधर पांडेय के गीतधर्मी सहज व्यक्तित्व को उद्धाटित करते
चलते हैं।
विशेषांक में
पांडेय जी की कुछ मशहूर कविताएं भी प्रकाशित की गई हैं। बेहद सरल,
सान और उतने ही बड़े साहित्यकार पं. मुकुटधर पर विशेषांक
निकालकर 'संकल्प रथ'
ने हिन्दी की महत्वपूर्ण सेवा की है। आज हिन्दी की कुछ लोकप्रिय पत्रिकाएं
मुकुटधर पाण्डेय जैसे युग प्रवर्तक साहित्यकार को याद तक नहीं करतीं। ऐसे समय में अगर
गीतकार रामअधीर एक विशेषांक निकालते हैं तो यह उल्लेखनीय घटना है। प्रकृति के
अद्भुत चितेरे मुकुटधर जी पर केंद्रित यह अंक पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित
होना चाहिए।
लेखक सद्भावना दर्पण के संपादक हैं

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