वेब-मीडिया का भविष्य
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शैलेष
भारतवासी
आज
से १० वर्ष पहले सम्भवतः किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि इंटरनेट पर हिन्दी भी
लिखी-पढ़ी जा सकेगी। हाँ,
भारत सरकार के
विज्ञापन और निविदाएँ स्कैनित रूप में अवश्य अपलोड की जाती रही थीं जिसमें
भाषायी बंधन नहीं था। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि उस समय के अंतरजाल की
दुनिया अंग्रेज़ी की गुलाम थी। यद्यपि अब भी अप्रत्यक्ष रूप से तकनीकी जगत् इस
भाषा का दास ही है।
हिन्दी
फ़ॉन्टों की खोज ने अंतरजाल पर देशी वेबसाइटों के दरवाजे खोल दिए। १००-२००
लोगों तक इक्की-दुक्की हिन्दी साइटें पहुँचती रहीं। तब तक शायद ये प्रवासियों
तक ही सीमित थीं। फ़ोन की तरह इंटरनेट भी मध्यमवर्गीय परिवारों की पहुँच से दूर
था। सूचना क्रांति हुयी। इंटरनेट के पाँव कस्बों तक पसरने लगे। या यूँ कहिए,
हिन्दी
के असली प्रयोक्ताओं तक इंटरनेट भी पहुँचने लगा। कुछ हद तक अंग्रेज़ी का अल्प
ज्ञान और कुछ हद तक निजभाषा प्रेम देवनागरी टंकण-टूलों के निर्माण के हेतु बने।
कालान्तर में
यूनिकोड नाम का महाशस्त्र आ गया। बीबीसी रेडियो अपना वेबसाइट लेकर आ चुका था
जोकि यूनिकोड की मदद से तैयार किया गया था। रेडियो के माध्यम से
www.bbchindi.com
का
प्रचार-प्रसार हुआ। देश-विदेश के हिन्दी प्रेमी यहाँ तक पहुँचने लगे । साथ-साथ
हिन्दी-ब्लॉगिंग (हिन्दी-चिट्ठाकारी) का भी विकास हो रहा था। यूरोपीय भाषायी
ब्लॉगरों की भाँति हिन्दी में भी स्वतंत्र पत्रकारों का जन्म होने लगा।
देवनागरी तथा अन्य भारतीय लिपियों के टाइपिंग टूलों में निरंतर विकास होता रहा।
देखते-देखते देश के प्रतिष्ठित समाचर पत्र भी इस क्षेत्र में कूद पड़े। दैनिक
जागरण www.jagran.com
हो गई। हर
समाचार पत्र,
साहित्यिक
एवम् गैरसाहित्यिक पत्रिकाएँ और टीवी समाचार चैनलों के अपने-अपने वेबसाइटें हो
गईं।
अब पाठकों को
यह समझ में आ गया होगा कि मीडिया का पूरे बाज़ार की नज़र हिन्दी वेब-पत्रकारिता
पर है। एक अध्ययन के मुताबिक यूरोप के लोग सही ख़बरों के लिए समाचार-चैनलों और
समाचार-पत्रों पर कम विश्वास करते हैं,
ब्लॉगरों पर अधिक भरोसा करते हैं। इंटरनेट ने स्वतंत्र पत्रकारिता को बल दिया
है। हालाँकि भारतवर्ष में अभी हिन्दी वेब-पत्रकारिता अपने शैशवकाल में है पर
शिशु जवान तो होगा ही! यदि उसको सही देखभाल और उचित पोषण मिला तो युवावस्था
जल्दी भी आ सकती है।
परन्तु क्या
है सही देखभाल और उचित पोषण?
कौन-कौन सी
घातक बीमारियाँ हमारे इस शिशु का अहित कर सकती हैं?
इसके लिए हमें
शिशु की उत्पत्ति,
वर्तमान और
उसके भविष्य पर विचार करना होगा। अतः हमने इस परिचर्चा के माध्यम से हिन्दी
वेब-पत्रकारिता से जुड़े तमाम धुरंधरों से इस संदर्भ में चर्चा की है। हिन्दी
वेब-पत्रकारिता की सही दशा और दिशा जानने की कोशिश की है। हमने अंतरजाल पर
सक्रिय कुछ हिन्दी-प्रयोक्ताओं से निम्नांकित बिंदुओं पर उनकी स्वतंत्र
प्रतिक्रियाएँ माँगी थी-
हिंदी वेब-पत्रकारिता की भारत में
स्थिति, विश्व में
स्थिति, दिशा, तकनीक की
उपलब्धता, इंटरनेट की देश में
स्थिति, लोगों का रूझान, प्रिंट मीडिया के
मुकाबले उनकी लोकप्रियता, वेबमीडिया की
पहुँच(पहुँच
कहाँ कहाँ
तक
),
वेबपत्रकारिता का आम आदमी से
सम्बन्ध, हिन्दी साहित्य और वेब-पत्रकारिता
हमें ढेरों
ईपत्र मिले जिसमें कुछ को हम अक्षरशः प्रकाशित कर रहे हैं।
परिचर्चा
संयोजक-
शैलेश भारतवासी,
नई दिल्ली
---
मुश्किल है
वैकल्पिक मीडिया बन पाना
0प्रभाकर सिंह
मीडिया प्रबंधक,
सीएमएस मीडिया लैब
"कभी
अवसर निकाल कर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे गरीब प्रदेशों की यात्रा कीजिए। वहाँ
एक समाचार पत्र को बीस-बीस लोग पढ़ते हैं। लोग रु ३ का अखबार खरीदने के स्थान
पर डेढ़ रुपये की चाय सुड़क कर साथ-साथ पेपर भी पढ़ लेना चाहते हैं। इंटरनेट पर
कौन हिन्दी पढ़-लिख रहा है?
जो अप्रवासी हैं,
जो इंजीनियर हैं या जो सरकारी महकमों में उच्च पद पर कार्यरत हैं जिनकों
इंटरनेट की सुविधा मुफ़्त में मिली है। यूनिकोड को आये ४ वर्ष से भी अधिक समय
हो गया फिर भी महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के
विद्यार्थी भी हिन्दी-टंकण के लिए कृतिदेव फ़ॉन्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं।
उन्हें तो यह भी नहीं पता कि यूनिकोड किस चिड़िया का नाम है। मुझे नहीं लगता कि
हिन्दी वेब-पत्रकारिता आने वाले २० वर्षों में भी वैकल्पिक मीडिया का स्थान ले
पायेगी।"
---
हिंदी की बेहतर संभावनाएं
0समीर लाल 'समीर'
चर्चित
चिट्ठाकार,
टोरंटो, कनाड़ा
मैं
चूँकि
विगत
कई
वर्षों
से
भारत
से
बाहर
हूँ
तो
ऐसे
वक्त
में
मेरे
लिये
हिन्दी
में
मुद्रित
पत्रिकाओं
तक
लगातार
पहुँच
पाना
थोड़ा
मुश्किल
कार्य
होता
है। पहला
तो
उनकी
उपलब्धता
का
प्रश्न
होता
है
और
अगर
मिल
भी
जायें
तो
भारत
से
कहीं
ज्यादा
कीमत,
जो
कि
हमारी
भारतीय
मानसिकता
भारतीय
पत्रिकाओं
के
लिये
चुकाने
नहीं
देती.
ऐसे
में
जो
जरिया
सबसे
सुलभ
नजर
आता
है
वो
है
अंतर्जाल
पर
उपलब्ध
पत्रिकायें
और
साहित्य।
यूँ
भी
विश्व
के
इस
भाग
में
अंतर्जाल
की
स्थिती
और
पहुँच
भारत
से
बहुत
बेहतर
है।
एक
सीमित
संसाधन
वाला
व्यक्ति
भी
हाई
स्पीड
सेवाओं
को
आराम
से
प्राप्त
कर
लेता
है। अंतर्जाल
पर
उपलब्ध
साहित्य
और
पत्रिकाओं
को
आप
कहीं
से
भी
देख
सकते
हैं
और
यहाँ
तक
की
काम
के
बीच
बचे
खाली
समय
का
इस्तेमाल
भी
इस
तरह
से
बेहतर
हो
सकता
है
जबकि
मुद्रित
पत्रिकाओं
को
साथ
में
लेकर
चलना
हर
वक्त
संभव
नहीं
होता
है।
ब्लॉग
के
माध्यम
से
न
सिर्फ
आप
दूसरों
की
विचारधारा
से
परिचित
होते
हैं
वरन
उस
पर
आप
अपनी
प्रतिक्रिया
भी
व्यक्त
कर
सकते
हैं
और
अपने
ब्लाग
के
माध्यम
से
विश्व
के
कोने
कोने
तक
अपनी
विचारधारा
और
लेखनी
से
लोगों
को
परिचित
करा
सकते
हैं।
मेरा
मानना
है
कि
जितना
अधिक
पढ़ा
जाये,
उतनी
ही
बेहतर
लेखन
क्षमता
का
विकास
होता
जाता
है
और
अंतर्जाल
और
चिट्ठे
इसमें
भरपूर
योगदान
कर
रहे
हैं।
हर
विषय
पर
सामग्री,
प्रायः
मुफ्त
में,
उपलब्ध
है।
इसमें
कहानियों
से
लेकर
कविताओं
तक,
सामाजिक
से
लेकर
धार्मिक
और
राजनैतिक
विचार
धाराओं
पर
लोग
नित
लिख
रहे
हैं।साथ
ही
एक
और
बहुत
अच्छी
बात
जो
हो
रही
है
वो
है
कि
पुराने
साहित्य
को
अंतर्जाल
पर
लोग
ला
रहे
हैं।
डिजिटल
लाईब्रेरी
के
माध्यम
से
बहुत
सा
सहित्य
उपलब्ध
कराया
गया
है।
जिसमें
पंचवटी
से
लेकर
राग
दरबारी
तक,
फिराक
गोरखपुरी
से
लेकर
गुलजार
और
जावेद
अख्तर
तक
सब
कुछ
सरलता
के
साथ
उपलब्ध
है।.
शायद
आने
वाले
समय,
में
इतनी
कुछ
सामाग्री
हो
जायेगी
कि
अगर
कोई
व्यक्ति
सारा
कुछ
पढ़ना
चाहे
तो
यह
उसके
जीवनकाल
में
संभव
नहीं।
मुद्रित
पत्रिकाओं
और
साहित्य
का
दायरा
आज
अंतर्जाल
के
सामने
बहुत
सीमित
हो
गया
है।
उसका
एक
विशिष्ट
पाठक
वर्ग
है
किंतु
अंतर्जाल
की
कोई
भौगोलिक
सीमायें
नहीं
हैं
और
यह
विश्व
के
कोने
कोने
में
लगभग
छपते
ही
तुरंत
उपलब्ध
हो
जाता
है।
शायद
यही
इसकी
जीत
का
मार्ग
भी
प्रश्सत
कर
रहा
है।
हर
क्षण
कुछ
न
कुछ
जुड़
रहा
है
।
अनेकों
पत्रिकायें
हैं
जो
एक
स्तरीय
सामग्री
समायोजित
कर
पाठकों
तक
ला
रही
है।मुझे
अंतर्जाल
पर
हो
रहे
हिन्दी
भाषा
और
हिन्दी
साहित्य
के
विकास
से
बहुत
आशायें
हैं
और
मैं
इसका
एक
सुंदर
भविष्य
देख
रहा
हूँ।
---
पत्रकारिता की दयनीय स्थिति
0राजीव रंजन प्रसाद
हिंदी अंतर्जालीय कवि,
फरीदाबाद, हरियाणा
हिन्दी पत्रकारिता की वेब पर भी दयनीय स्थिति है। शैशव लम्बा हो गया है।
अखबारों की कॉपियाँ या सीमित सी यत्र तत्र बिखरी हुई समसामयिक चर्चाओ के अलावा
फिल्मी गपशप और ज्योतिषी बाबाजियों का मायाजाल ही हिन्दी के नाम पर अंतरजाल पर
उपलब्ध है। ब्लागरों को मैं साधुवाद देता हूँ जिनके कारण हिन्दी सामग्री के
अंतरजाल पर दर्शन होने लगे हैं।
क्या हिन्दी पत्रकारिता की स्थिति जब देश में ही दयनीय हो तो विदेशों में बेहतर
हो सकती है? हाँ कुछ हिन्दी प्रेमी प्रवासी भारतीयों की यदाकदा अनियतकालीन
हिन्दी सामग्रियाँ अंतरजाल पर अवश्य दृष्टिगोचर हो जाती हैं। मुझे नहीं लगता कि
हिन्दी वेब पत्रकारिता नें वह स्थान हासिल कर लिया है कि
“विश्व
में स्थिति”
जैसे व्यापक विषय पर चर्चा हो सके।
हिन्दी टंकण बहुत से लेखकों की समस्या रही है। धीरे धीरे यह असुविधा कई तरह के
सहज
“टंकण
टूल”
के विकसित हो जाने के कारण दूर होती जा रही है। यही कारण है कि अंतरजाल पर
हिन्दी सामग्रियों की संख्या और स्तर दोनों ही बढते जा रहे हैं। हिन्दी
पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल है, यह मैं इस आधार पर कह रहा हूँ कि हम कर्म से
कितने बडे अंग्रेज हो जायें हमारे सोचने की भाषा हिन्दी ही है, इसलिये फैशन भले
ही हाँथों को अंग्रेजी अखबार पकडा देता हो किंतु पठन की प्यास तो अपनी भाषा ही
बुझा पाती है। पत्र और पत्रिकायें व्यापारिक मापदंड भी रखती हैं और उनकी परोस
वही सामग्री होती है जो बिक सके। इसी प्रवृत्ति नें पत्रिकारिता के मूल
सिद्धांतों से उन्हें शनै: शनैः दूर करना आरंभ कर दिया है...
नये दौर में समय एक पूंजी बन कर उभरा है और कम्प्यूटर एक आवश्यकता। आज अशिक्षित
वह है जिसे कम्पयूटर का ग्यान न हो। एसे में जिसे जो भी खाली समय मिला अंतरजाल
उस पल का साथी। हिन्दी सामग्री के बढने से यह माध्यम महत्वपूर्ण हो उठेगा। इसको
विस्तार देना आवश्यक है।
तकनीक के लिये रोने वाला देश अब भारत नहीं रहा। कम्पयूटर, लैपटाप, पामटॉप घर-घर
की मूल आवश्यकता हो गयी है। जुगाड संस्कृति ने हर तरह के साफ्टवेयर को घर-घर
पहुँचा दिया है। फोनिक अंगेजी में जब से हिन्दी लिखी जा रही है, यह एस.एम.एस और
चैटिंग की भी भाषा बनती जा रही है। तकनीक का रोना कहीं नहीं है, रोना उस पहल का
है जहाँ अंतरजाल भी हिन्दी पत्रिकारिता का स्तंभ बन कर निकले।
गली गली में यह सुविधा है, लगभग हर दूसरे नगरीय/शहरीय घर में यह पढाई की मेज पर
उपलब्ध है। अनेको गाँवों तक इसकी पहुँच है। दुरुपयोग है इस माध्यम का मैं यह
मानता हूँ, लेकिन जब भीतर गुलगुला ही मिले तो गुड की शिकायत गैर-वाजिब हो जाती
है।
लोगों का रुझान नापने का पैमाना अभी नहीं बनाया जा सकता। पाठक जो पढना चाहता है
वह उसे ढूंढता अवश्य है। वांछित सामग्री न मिले तो खाली दिमाग शैतान का घर। इस
लिये इंटरनेट को केवल इसीलिये गाली नहीं दी जा सकती कि इससे वह सामग्री आसानी
से पीढियों तक पहुँच रही है जो उनके मन को प्रदूषित कर दे। वहाँ तक उस सामग्री
का अभाव है जो वह पढना चाहता है, जो उसकी भाषा में है, जो उसके परिवेष का है।
लोगों का रुझान पैदा करना होगा, अंतरजाल तो माध्यम बनने के लिये प्रस्तुत ही
है।
बहुत समय से लिख रहा हूँ और समय समय पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित और
आकाशवाणी से प्रसारित भी होता रहा। फिर महसूस होने लगा कि अब कविता मरने लगी
है, साहित्य के प्रति रूझान समाप्त होने लगा है। एक दिन यूं ही ऑरकुट ज्वाईन
किया अंतरजाल पर। वहाँ कुछ मित्र बनें, एक नें मुझे युनिकोड में हिन्दी टाईपिंग
सिखा दी। अनायास ही मैने अपनी एक कविता ऑरकुट पर एक साहित्यिक कम्युनिटि पर डाल
दी। उसके बाद जैसे मुझसे संपर्क करने वाले मित्रो, और कविता पढने की चाह रखने
वाले साथियों की एक श्रिंखला सी बन गयी। इस कडी मे हिन्दुस्तान के हर कोने से
कविता के रसग्य थे साथ ही प्रवासी भारतीय भी। इसी कडी में उन्ही अंतरजाल से
जुडे मित्रों ने ब्लागिंग से मेरा परिचय कराया..संक्षेप में यह कि इस माध्यम की
व्यापकता है। पाठक ढूंढ रहा है अपनी पसंद की सामग्री। पेपर क्षेत्रीय या
राष्ट्रीय हो सकता है लेकिन यदि सही इस्तेमाल हो तो पेपर का इस माध्यम से कडा
मुकाबला निश्चित है।
वेबमीडिया को अभी अपनी पहुँच पैदा करनी होगी। सामग्री तो आये, यह माध्यम अपनी
पूर्णता से अपनी भाषा में इस्तेमाल तो होनें लगे, पहुंच व्यापक हो जायेगी।
आम आदमी को यहाँ परिभाषित करना आवश्यक है। यदि देश का मध्यम वर्ग भी आम-आदमी
कहलाता है तो उस तक यह माध्यम पहुंच चुका है। वेब पत्रकारिता को अभी इस माध्यम
पर पैठ बनाने की आवश्यकता है।
हिन्दी साहित्य में यह माध्यम प्राण फूंक सकता है। समयाभाव है इस भागती दौडती
दुनिया में। किसे फुर्सत है बाजार जा कर हंस या पहल खरीदे। मुझे ही लीजिये, जब
से अभिव्यक्ति, अनुभूति या सृजनगाथा जैसी साईटों का पता चला है कवितायें, गज़लें
कहानियाँ सबसे फिर रिश्ता कायम हो चला है। समाचार पत्रों और बहुत सी तथाकथित
पत्रिकाओं से बहुत अच्छी सामग्रियाँ मुझे मिलीं अंतरजाल पर। वेब-पत्रिकारिता का
भविष्य उज्ज्वल है, फिलहाल वर्तमान से मैं संतुष्ट नहीं।
---
बहुत पीछे है हिंदी
0सृजन-शिल्पी
वरिष्ठ पत्रकार, नई दिल्ली
हिन्दी
दुनिया की तीसरी सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषा है। विश्व में लगभग
80
करोड़ लोग हिन्दी समझते हैं,
50
करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं और लगभग
35
करोड़
लोग हिन्दी लिख सकते हैं। लेकिन
इंटरनेट पर हिन्दी
काफी पिछड़ी अवस्था में है।
‘ग्लोबल
रीच’
द्वारा सितम्बर, 2004
में जारी भाषा पर आधारित
विश्व की ऑनलाइन आबादी के आँकड़ों में शामिल
34
भाषाओं की सूची में हिन्दी को स्थान
भी नहीं दिया गया था। वर्ष
2005
में भी
ऑनलाइन जगत की 10
सबसे
लोकप्रिय भाषाओं
में हिन्दी को स्थान नहीं मिल सका। तेजी से विकसित हो रही
गैर-अंग्रेजी ऑनलाइन भाषाओं में चीनी,
जापानी,
स्पेनिश,
जर्मन,
कोरियन,
फ्रेंच,
इटालियन,
डच और पुर्तगाली प्रमुख हैं,
जबकि हिन्दी अन्य गैर-अंग्रेजी ऑनलाइन भाषाओं
में शामिल है। ऑनलाइन जगत में हिन्दी के पिछड़ने का प्रमुख कारण यह है कि
इंटरनेट
से जुड़े भारतीय अपने ऑनलाइन कामकाज में अंग्रेजी का प्रयोग करते रहे हैं।
हालाँकि
भारत में इंटरनेट से जुड़े लोगों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है और
‘इंटरनेट
विश्व सांख्यिकी’
के ताजा आँकड़े बताते हैं कि भारत में जून,
2006
तक 5
करोड़ 60
लाख इंटरनेट प्रयोक्ता हो चुके हैं और भारत अब अमरीका,
चीन और जापान
के बाद इंटरनेट से जुड़ी आबादी के मामले में चौथा स्थान हासिल कर चुका है।
ब्रॉडबैंड
इंटरनेट कनेक्शनों की संख्या भारत में
15
लाख हो चुकी है। भारत में अब हर दो कंप्यूटर प्रयोक्ताओं में से एक इंटरनेट से
जुड़ चुका है। इंटरनेट का प्रयोग बढ़ने के साथ-साथ ऑनलाइन हिन्दी की स्थिति भी
बेहतर हो रही है। इंटरनेट पर हिन्दी के जालस्थलों और चिट्ठों की संख्या तेजी से
बढ़
रही है और
‘जक्स्ट
कंसल्ट’
द्वारा जुलाई, 2006
में जारी
ऑनलाइन इंडिया के आँकड़ों से पता चलता है कि ऑनलाइन भारतीयों में से
60%
अंग्रेजी पाठकों की तुलना में
42%
पाठक गैर-अंग्रेजी भारतीय भाषाओं में और
17%
पाठक हिन्दी में पढ़ना पसंद करते हैं। हालाँकि
पाठकों का यह रुझान ज्यादातर जागरण,
बी.बी.सी. हिन्दी और वेबदुनिया जैसे लोकप्रिय
हिन्दी वेबसाइटों की तरफ ही है,
जिन्हें रोजाना लाखों हिट्स मिलते हैं।
हिन्दी चिट्ठाकारी की
स्थिति
चिट्ठाकारी (ब्लॉगिंग)
भारत में तेजी से लोकप्रिय हो रही है और
85%
भारतीय नेटिजन नियमित रूप से ब्लॉग पढ़ते हैं।
किंतु हिन्दी चिट्ठों का संसार अभी उतना व्यापक नहीं हो पाया है।
‘चिट्ठा
विश्व’
के मुताबिक भारतीय चिट्ठों में अब तक केवल
7%
ही हिन्दी में हैं। हिन्दी चिट्ठों की संख्या
फिलहाल लगभग 400
है जिनमें से
नारद
के माध्यम से 326
चिट्ठों की ख़बर मिलती रहती है। लोकप्रिय माने जाने वाले हिन्दी
चिट्ठों पर प्रकाशित किसी नई प्रविष्टि को औसतन सौ हिट्स मिलते हैं और उनको
मिलने
वाली प्रतिक्रियाओं की संख्या शायद ही कभी
30
से ऊपर जा पाती है। हिन्दी चिट्ठों के
ज्यादातर पाठक अभी तक वे चिट्ठाकार हैं जो नारद और चिट्ठा विश्व जैसे हिन्दी
चिट्ठा
संकलकों के माध्यम से अन्य चिट्ठाकारों के विचारों से रूबरू होते रहते हैं।
सर्च
इंजन अथवा अन्य माध्यमों से स्वतंत्र रूप से हिन्दी चिट्ठों तक पहुँचने वाले
नये
पाठकों की संख्या बहुत कम ही है। फिर भी,
अच्छी बात यह है कि शुरुआती दौर में ही
हिन्दी चिट्ठों का दायरा विश्व पटल के काफी बड़े हिस्से में फैल चुका है।
हिन्दी के
चिट्ठाकार मुख्य रूप से भारत के अलावा संयुक्त राज्य अमरीका,
कनाडा,
जर्मनी,
इटली,
फ्रांस,
स्वीटरजरलैंड,
आस्ट्रेलिया,
ब्रिटेन,
रूस,
सिंगापुर,
कुवैत,
संयुक्त राज्य
अमीरात और फिलीपींस आदि देशों में सक्रिय हैं। भारत के ज्यादातर राज्यों में
हिन्दी
चिट्ठाकारों की मौजूदगी देखी जा सकती है जिसमें हिन्दी भाषी राज्यों के अलावा
दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्यों में उनकी सक्रियता विशेष रूप से उल्लेखनीय
है। विश्व
में हिन्दी भाषियों की विशाल संख्या और इंटरनेट पर हिन्दी के निरंतर बढ़ रहे
प्रयोग को देखते हुए हिन्दी चिट्ठाकारिता का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल दिखता है,
हालाँकि हिन्दी चिट्ठे अब तक ऑनलाइन हिन्दी पाठकों के बहुत बड़े वर्ग तक नहीं
पहुँच
पाए हैं। लेकिन हिन्दी चिट्ठाकारिता का सबल पक्ष है कलम के धनी और तकनीकी रूप
से
कुशल प्रतिभाशाली चिट्ठाकारों का इससे जुड़ा होना। लेकिन इससे भी अधिक
महत्वपूर्ण
है स्वदेश भारत और स्वभाषा हिन्दी के प्रति सबका अनन्य प्रेम,
जो उन्हें एकसूत्र
में बाँधता है और इंटरनेट पर हिन्दी को गौरवपूर्ण स्थान दिलाने के लिए निरंतर
सचेष्ट रहने हेतु प्रेरित भी करता है। हिन्दी चिट्ठाकारों द्वारा शुरू किए गए
अक्षरग्राम,
नारद,
सर्वज्ञ,
निरंतर,
परिचर्चा,
शून्य,
ब्लॉगनाद,
बुनो कहानी और
अनुगूँज जैसे उल्लेखनीय सहकारी प्रयासों
से हिन्दी चिट्टाकारिता के भविष्य के प्रति
आशा बलवती होती है। भारत और दुनिया के विभिन्न शहरों में हिन्दी चिट्ठाकारों के
अक्सर होते रहने वाले सम्मेलन उनकी सजगता और सक्रियता को बढ़ाते हैं। हिन्दी
वेब-पत्रकारिता के शुरूआती संकेत अच्छे हैं।
---
भविष्य
उज्जवल है
0मोहिन्दर कुमार
हिंदी चिट्ठाकार
नई दिल्ली
जहां तक आम जनता तक पहुंचने का सवाल है। भारत में हिन्दी बेव पत्रकारिता अपने
शैशव काल में है। कुछ विकसित देशों को छोड़ कर विश्व में बेव-पत्रकारिता की
स्थिति ज्यादा संतोषजनक नही है। विकसित तकनीक की उपलब्धता के कारण बड़ी तेजी से
बेव-पत्रकारिता को नये-नये आयाम मिल रहे हैं। पहले केवल टेकस्ट ही उपलबध हो
पाता था परन्तु अब चित्र,
विडियो व आडियो आदि भी बडी आसानी से विश्व के किसी भी कोने में भेजे जा सकते
हैं।
देश में उपभोगता इन्टरनेट का उपयोग विभिन्न उदेश्यों के लिये करते हैं.. जिसकी
स्थिति इस प्रकार से है-
खरीदने/बेचने कि लिये- ४%,
ई-मेल- ४५%,
चैट -१०%,जानकारी व शिक्षा-३३%, मनोरंजन-७% और भी नये-नये आयाम इसमें धीरे-धीरे
जुड रहे हैं और ये अनुपात बहुत जल्दी ही बदलने वाले हैं।
इन्टरनेट पर आने वालों का रुझान इस प्रकार से है- दैनिक उपभोगता १८% सप्ताह
में चार दिन-१८%,
सप्ताह में दो दिन-२२%, सप्ताह में एक दिन- १५%- माह में दो तीन दिन-१३%।
लोगों का रूझान दिन-प्रतिदिन इस और बढ रहा है... फिल्म,
रेडियो एंव दूरदर्शन के समान इन्टरनेट भी लोगों के दिल में घर करता जा रहा है।
आज के परिवेश में पेपर बेव पर हावी है जहां तक पत्रकारिता का प्रश्न है तो इस
का कारण है...इसका मंहगा होना,
घर-घर तक पहुंच का न होना,
भाषा व देश की भौगोलिक स्थिति व जनता में जागरूकता का अभाव।
समय-समय की बात है...भविष्य में बेब पत्रकारिता लोगों से इसी तरह से जुड़
जायेगी जैसे आजकल समाचार पत्र व अन्य पत्र पत्रिकायें जुड़ी हुयी
हैं।हिन्दी-साहित्य और बेव-पत्रकारिता ही क्यूं बाकी भाषाओं में भी बेव
पत्रकारिता का भविष्य उज्जवल है..क्योंकि सभी भाषाओं के साहित्यकार व भाषाविद्
इस ओर प्रयत्नशील हैं।
परिचर्चा संयोजक चर्चित चिट्ठाकार और
अंतरजाल पर कविता केंद्रित ब्लॉग हिंद-युग्म के संचालक हैं ।

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