वेब-मीडिया का भविष्य
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शैलेष
भारतवासी
आज
से १० वर्ष पहले सम्भवतः किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि इंटरनेट पर हिन्दी भी
लिखी-पढ़ी जा सकेगी। हाँ,
भारत सरकार के
विज्ञापन और निविदाएँ स्कैनित रूप में अवश्य अपलोड की जाती रही थीं जिसमें
भाषायी बंधन नहीं था। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि उस समय के अंतरजाल की
दुनिया अंग्रेज़ी की गुलाम थी। यद्यपि अब भी अप्रत्यक्ष रूप से तकनीकी जगत् इस
भाषा का दास ही है।
हिन्दी
फ़ॉन्टों की खोज ने अंतरजाल पर देशी वेबसाइटों के दरवाजे खोल दिए। १००-२००
लोगों तक इक्की-दुक्की हिन्दी साइटें पहुँचती रहीं। तब तक शायद ये प्रवासियों
तक ही सीमित थीं। फ़ोन की तरह इंटरनेट भी मध्यमवर्गीय परिवारों की पहुँच से दूर
था। सूचना क्रांति हुयी। इंटरनेट के पाँव कस्बों तक पसरने लगे। या यूँ कहिए,
हिन्दी
के असली प्रयोक्ताओं तक इंटरनेट भी पहुँचने लगा। कुछ हद तक अंग्रेज़ी का अल्प
ज्ञान और कुछ हद तक निजभाषा प्रेम देवनागरी टंकण-टूलों के निर्माण के हेतु बने।
कालान्तर में
यूनिकोड नाम का महाशस्त्र आ गया। बीबीसी रेडियो अपना वेबसाइट लेकर आ चुका था
जोकि यूनिकोड की मदद से तैयार किया गया था। रेडियो के माध्यम से
www.bbchindi.com
का
प्रचार-प्रसार हुआ। देश-विदेश के हिन्दी प्रेमी यहाँ तक पहुँचने लगे । साथ-साथ
हिन्दी-ब्लॉगिंग (हिन्दी-चिट्ठाकारी) का भी विकास हो रहा था। यूरोपीय भाषायी
ब्लॉगरों की भाँति हिन्दी में भी स्वतंत्र पत्रकारों का जन्म होने लगा।
देवनागरी तथा अन्य भारतीय लिपियों के टाइपिंग टूलों में निरंतर विकास होता रहा।
देखते-देखते देश के प्रतिष्ठित समाचर पत्र भी इस क्षेत्र में कूद पड़े। दैनिक
जागरण www.jagran.com
हो गई। हर
समाचार पत्र,
साहित्यिक
एवम् गैरसाहित्यिक पत्रिकाएँ और टीवी समाचार चैनलों के अपने-अपने वेबसाइटें हो
गईं।
अब पाठकों को
यह समझ में आ गया होगा कि मीडिया का पूरे बाज़ार की नज़र हिन्दी वेब-पत्रकारिता
पर है। एक अध्ययन के मुताबिक यूरोप के लोग सही ख़बरों के लिए समाचार-चैनलों और
समाचार-पत्रों पर कम विश्वास करते हैं,
ब्लॉगरों पर अधिक भरोसा करते हैं। इंटरनेट ने स्वतंत्र पत्रकारिता को बल दिया
है। हालाँकि भारतवर्ष में अभी हिन्दी वेब-पत्रकारिता अपने शैशवकाल में है पर
शिशु जवान तो होगा ही! यदि उसको सही देखभाल और उचित पोषण मिला तो युवावस्था
जल्दी भी आ सकती है।
परन्तु क्या
है सही देखभाल और उचित पोषण?
कौन-कौन सी
घातक बीमारियाँ हमारे इस शिशु का अहित कर सकती हैं?
इसके लिए हमें
शिशु की उत्पत्ति,
वर्तमान और
उसके भविष्य पर विचार करना होगा। अतः हमने इस परिचर्चा के माध्यम से हिन्दी
वेब-पत्रकारिता से जुड़े तमाम धुरंधरों से इस संदर्भ में चर्चा की है। हिन्दी
वेब-पत्रकारिता की सही दशा और दिशा जानने की कोशिश की है। हमने अंतरजाल पर
सक्रिय कुछ हिन्दी-प्रयोक्ताओं से निम्नांकित बिंदुओं पर उनकी स्वतंत्र
प्रतिक्रियाएँ माँगी थी-
हिंदी वेब-पत्रकारिता की भारत में
स्थिति, विश्व में
स्थिति, दिशा, तकनीक की
उपलब्धता, इंटरनेट की देश में
स्थिति, लोगों का रूझान, प्रिंट मीडिया के
मुकाबले उनकी लोकप्रियता, वेबमीडिया की
पहुँच(पहुँच
कहाँ कहाँ
तक
),
वेबपत्रकारिता का आम आदमी से
सम्बन्ध, हिन्दी साहित्य और वेब-पत्रकारिता
हमें ढेरों
ईपत्र मिले जिसमें कुछ को हम अक्षरशः प्रकाशित कर रहे हैं।
परिचर्चा
संयोजक-
शैलेश भारतवासी,
नई दिल्ली
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मुश्किल है
वैकल्पिक मीडिया बन पाना
0प्रभाकर सिंह
मीडिया प्रबंधक,
सीएमएस मीडिया लैब
"कभी
अवसर निकाल कर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे गरीब प्रदेशों की यात्रा कीजिए। वहाँ
एक समाचार पत्र को बीस-बीस लोग पढ़ते हैं। लोग रु ३ का अखबार खरीदने के स्थान
पर डेढ़ रुपये की चाय सुड़क कर साथ-साथ पेपर भी पढ़ लेना चाहते हैं। इंटरनेट पर
कौन हिन्दी पढ़-लिख रहा है?
जो अप्रवासी हैं,
जो इंजीनियर हैं या जो सरकारी महकमों में उच्च पद पर कार्यरत हैं जिनकों
इंटरनेट की सुविधा मुफ़्त में मिली है। यूनिकोड को आये ४ वर्ष से भी अधिक समय
हो गया फिर भी महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के
विद्यार्थी भी हिन्दी-टंकण के लिए कृतिदेव फ़ॉन्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं।
उन्हें तो यह भी नहीं पता कि यूनिकोड किस चिड़िया का नाम है। मुझे नहीं लगता कि
हिन्दी वेब-पत्रकारिता आने वाले २० वर्षों में भी वैकल्पिक मीडिया का स्थान ले
पायेगी।"
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हिंदी की बेहतर संभावनाएं
0समीर लाल 'समीर'
चर्चित
चिट्ठाकार,
टोरंटो, कनाड़ा
मैं
चूँकि
विगत
कई
वर्षों
से
भारत
से
बाहर
हूँ
तो
ऐसे
वक्त
में
मेरे
लिये
हिन्दी
में
मुद्रित
पत्रिकाओं
तक
लगातार
पहुँच
पाना
थोड़ा
मुश्किल
कार्य
होता
है। पहला
तो
उनकी
उपलब्धता
का
प्रश्न
होता
है
और
अगर
मिल
भी
जायें
तो
भारत
से
कहीं
ज्यादा
कीमत,
जो
कि
हमारी
भारतीय
मानसिकता
भारतीय
पत्रिकाओं
के
लिये
चुकाने
नहीं
देती.
ऐसे
में
जो
जरिया
सबसे
सुलभ
नजर
आता
है
वो
है
अंतर्जाल
पर
उपलब्ध
पत्रिकायें
और
साहित्य।
यूँ
भी
विश्व
के
इस
भाग
में
अंतर्जाल
की
स्थिती
और
पहुँच
भारत
से
बहुत
बेहतर
है।
एक
सीमित
संसाधन
वाला
व्यक्ति
भी
हाई
स्पीड
सेवाओं
को
आराम
से
प्राप्त
कर
लेता
है। अंतर्जाल
पर
उपलब्ध
साहित्य
और
पत्रिकाओं
को
आप
कहीं
से
भी
देख
सकते
हैं
और
यहाँ
तक
की
काम
के
बीच
बचे
खाली
समय
का
इस्तेमाल
भी
इस
तरह
से
बेहतर
हो
सकता
है
जबकि
मुद्रित
पत्रिकाओं
को
साथ
में
लेकर
चलना
हर
वक्त
संभव
नहीं
होता
है।
ब्लॉग
के
माध्यम
से
न
सिर्फ
आप
दूसरों
की
विचारधारा
से
परिचित
होते
हैं
वरन
उस
पर
आप
अपनी
प्रतिक्रिया
भी
व्यक्त
कर
सकते
हैं
और
अपने
ब्लाग
के
माध्यम
से
विश्व
के
कोने
कोने
तक
अपनी
विचारधारा
और
लेखनी
से
लोगों
को
परिचित
करा
सकते
हैं।
मेरा
मानना
है
कि
जितना
अधिक
पढ़ा
जाये,
उतनी
ही
बेहतर
लेखन
क्षमता
का
विकास
होता
जाता
है
और
अंतर्जाल
और
चिट्ठे
इसमें
भरपूर
योगदान
कर
रहे
हैं।
हर
विषय
पर
सामग्री,
प्रायः
मुफ्त
में,
उपलब्ध
है।
इसमें
कहानियों
से
लेकर
कविताओं
तक,
सामाजिक
से
लेकर
धार्मिक
और
राजनैतिक
विचार
धाराओं
पर
लोग
नित
लिख
रहे
हैं।साथ
ही
एक
और
बहुत
अच्छी
बात
जो
हो
रही
है
वो
है
कि
पुराने
साहित्य
को
अंतर्जाल
पर
लोग
ला
रहे
हैं।
डिजिटल
लाईब्रेरी
के
माध्यम
से
बहुत
सा
सहित्य
उपलब्ध
कराया
गया
है।
जिसमें
पंचवटी
से
लेकर
राग
दरबारी
तक,
फिराक
गोरखपुरी
से
लेकर
गुलजार
और
जावेद
अख्तर
तक
सब
कुछ
सरलता
के
साथ
उपलब्ध
है।.
शायद
आने
वाले
समय,
में
इतनी
कुछ
सामाग्री
हो
जायेगी
कि
अगर
कोई
व्यक्ति
सारा
कुछ
पढ़ना
चाहे
तो
यह
उसके
जीवनकाल
में
संभव
नहीं।
मुद्रित
पत्रिकाओं
और
साहित्य
का
दायरा
आज
अंतर्जाल
के
सामने
बहुत
सीमित
हो
गया
है।
उसका
एक
विशिष्ट
पाठक
वर्ग
है
किंतु
अंतर्जाल
की
कोई
भौगोलिक
सीमायें
नहीं
हैं
और
यह
विश्व
के
कोने
कोने
में
लगभग
छपते
ही
तुरंत
उपलब्ध
हो
जाता
है।
शायद
यही
इसकी
जीत
का
मार्ग
भी
प्रश्सत