Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 4, जून - अगस्त, 2007)

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मेरा समय

 

 

 

 

 

 

परिस्थितियां भरती हैं व्यक्तित्व में रंग

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रमेश नैयर

 

 पने एक आत्मीय परिचित हैं। जब कभी उनके कार्यालय में जाना होता है तो वहां टंगी एक तख्ती पर छपे कुछ सूत्र वाक्य ध्यान आकृष्ट करते हैं। एक सूत्र वाक्य है सबसे निष्कृट शब्द है 'मैं'। यह शब्द व्यक्ति के आत्मकेंद्रित होने का आभास कराता है। एक प्रकार का दर्प भी इससे झांकता है। इसलिए 'मैं' और मेरा समय जैसे शब्दों का उपयोग करने में संकोच होता है। वस्तुत: ऐसे व्यक्ति बहुत दुर्लभ होते हैं जो अपने समय को यत्कचिंत भी प्रभावित कर पाते हैं। सामान्यत: व्यक्ति समय का दास होता है। परिस्थितियां और विशिष्ट घटनाएं उसके व्यक्तित्व में कुछ रंग भरती हैं। कहीं-कहीं उसे तराशती भी हैं। ये उसकी प्रकृति और प्रवृत्ति का निर्धारण भी करती हैं। इनसे जुड़ी स्मृतियां और इनसे प्रसूत अनुभव व्यक्ति की पूंजी बन सकते हैं।

 

इन पंक्तियों के लेखक के जीवन की कुछ ऐसी घटनाएं हैं जिन पर उसका कोई बस नहीं था, परंतु उन्होंने उस पर निर्णायक छाप छोड़ी। उसके रुझान तय किए, एक जीवन-दृष्टि विकसित की। कालांतर में पत्रकारिता को आजीविका का माध्यम बनाने में भी यह जीवन-दृष्टि प्रेरक बनी।

 

पहली चिरस्मरणीय स्मृति है अगस्त, 1947 में पश्चिमी पंजाब के गुजरात जिले के कुंजाह की। दादा-दादी रोजमर्रा की तरह मंदिर गए हुए थे। पापा को आशंका थी कि देश का विभाजन होगा तो उपद्रव भी होंगे। दादा का तर्क था कि निजाम बदलते हैं पर अवाम नहीं बदलते, इसलिए पुश्तैनी जमीन-जायदाद, घर-बार छोड़कर नहीं जाया जाता। लेकिन पापा मेरे छोटे भाई और बीजी (मां) को लेकर पूर्वी पंजाब के फिरोजपुर चले गए थे। वहां भी दादा जी ने एक मकान बनवा कर रखा था, जिसमें रिश्ते की एक बुआ रहती थीं।

 

सुबह के सात-आठ बजे थे। मैं घर के सामने गली में खेल रहा था। लोगों के चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनाई दीं। आवाजें नजदीक आ रही थीं। अपरिचित लोगों का एक झुण्ड हमारे घर के भीतर घुस गया। मेरी उम्र साढ़े सात वर्ष की थी। देख सब कुछ रहा था, पर समझ कुछ नहीं पा रहा था। कुछ घबरा रहा था। ंजैनब दौड़ती हुई वहां पहुंच गयी। मुझे उठा कर सीने से लगा लिया। ऊपर से हरी चादर ओढ़ा दी। ंजैनब का घर पास ही था। कुछ मिनटों में ही वहां पहुंच गयी। ंजैनब मुझे नहलाने-धुलाने और खेलने-खिलाने का काम करती थी। अपने इलाके के पीर बुल्लेशाह की मुरीद थी। शायद इसीलिए मुझे प्यार से बुल्ला कहती थी। उसका बेटा सादिक तब कोई 13-14 साल का रहा होगा। मुझे अपने बेटे के सुपुर्द करके ंजैनब कालू खां के घर की तरफ दौड़ी। कालू खां दादा जी की जमीन-जायदाद का सारा काम देखा करते थे। कोई आधे घंटे बाद कालू खां मंदिर से दादा और दादी को साथ लेकर ंजैनब के घर पहुंचे।

 

बाहर लूट-पाट और मार-काट शुरू हो गई थी। ंजैनब का घर छोटा था। फैसला किया गया कि कालू खां के घर पहुंचा जाए। उनका संयुक्त परिवार था। खाते-पीते लोग थे। घरों की छतों को पार करते हुए कालू खां के घर की तरफ रवाना हुए। दादी ने तो अपने-आपको चादर से ढंक लिया था, पर ऊंचे-पूरे और दोहरे बदन के शाहजी (मेरे दादा जी) की पहचान कैसे छिपाई जाए? पोशाक तो वैसे भी हिंदुओं और मुसलमानों की एक जैसी हुआ करती थी। कोई युक्ति न सूझी तो कालू खां ने अपने रिश्ते के आठ-दस भरोसेमंद जवानों को बुलाकर कहा कि शाहजी को अपने घेरे में लेकर वे उनके घर की तरफ रवाना हों। उनको निर्देश दिया गया कि राह गुजरते हुए वे बीच-बीच में अल्लाह हो अकबर का नारा लगाते चलें। कालू खां मुझे, दादी और ंजैनब को लेकर छतें फलांग रहे थे। बीच में एक संकरी सी गली पड़ती थी। उसे पार करने का बंदोबस्त पहले ही करके रखा गया था। किसी घर के दरवाजे के दो पल्लों को लंबाई में जोड़ कर गली को पार करने वाला  'पुल' बना दिया गया था। दिन का वक्त था। हम लोग इस पार से उस पार जा रहे थे कि नीचे से एक व्यक्ति चिल्लाया,  ''देखो, काफिरों को पनाह दे रहे हैं।'' मेरी नजर उस शख्स पर पड़ी। वह हमारे मदरसे का मास्टर था। वह शायद मुझको नहीं देख पाया था। वह ज्यादा बखेड़ा खड़ा कर पाता उसके पेशतर ही कालू खां के दस-बारह नौजवानों का झुण्ड अल्लाह हो अकबर का नारा बुलंद करता हुआ, वहां पहुंच गया था। उन्होंने दाढ़ी वाले उस मास्टर को ढकेल कर एक तरफ कर दिया। फिर मैंने देखा दो नौजवान उसे बहलाते हुए एक किनारे ले जा रहे हैं। मुझे ंजैनब ने चादर ओढ़ा कर सीने से लगा रखा था। ंजैनब घबरा गई थी। मैं उसकी तेज हो उठी धड़कनों को साफ महसूस कर रहा था।

 

कालू खां के घर सुरक्षित पहुंचने के बाद कुछ राहत महसूस हुई। बहुत जिंदादिल समझे जाने वाले  'शाह जी' का चेहरा बुझा हुआ था। जुबान नहीं खुल रही थी। कालू खां ने उनको दिलासा देते हुए, जो कुछ कहा उसका आशय था,  'हमारी कई पुश्तों ने आपके खानदान का नमक खाया है। आपके लिए हम अपनी जान की बाजी भी लगा देंगे।'

 

दादा जी को घर तक सुरक्षित ले आने वाले युवकों को कालू खां ने शाबाशी देते हुए हिदायत दी कि मदरसे के  'हिंदुस्तानी' मौलाना पर वे नजर रखें और उसे घर के आसपास न फटकने दें। पंजाब में उन दिनों दिल्ली से उस पार के इलाके, विशेषकर युनाइटेड प्राविंसेस को हिंदुस्तान और वहां के लोगों को हिंदुस्तानी कहा जाता था। कालू खां के लोग हमारे तबेले से एक गाय और बछड़ा खोलकर अपने घर ले आए थे। कुछ नये बर्तन लाकर दादी को दिए, ताकि वे उनमें हम तीनों का खाना बना लिया करें।

 

कालू खां के घर में दो हफ्तों से कुछ अधिक समय तक छिपकर रहने और उनके द्वारा की गई व्यवस्था से अमृतसर तक पहुंचने की दास्तान बहुत लम्बी है। कालू खां के छोटे भाई भिंडी खां विभाजन से कुछ हफ्ते  पहले अपने व्यवसाय के सिलसिले में अमृतसर और जालंधर गए थे और अब तक लौट कर नहीं आए थे। न ही उनकी कोई खोज खबर थी। उस तरफ से जो खबरें आ रही थीं, वे बड़ी दर्दनाक थीं। इधर भी उत्तेजना और उन्माद बढ़ रहा था। एक दोपहर कालू खां के घर के सामने टीन का पीपा बजाते हुए कुछ लोग मुनादी करते हुए कह रहे थे  'पिल्ले शाह का पता बताने वाले को एक हजार का ईनाम।' दादा का नाम लाला पाला मल्ल था लेकिन कस्बे के लोग उन्हें पिल्ले शाह कहा करते थे। बड़े जमींदार थे, इसलिए दोस्तों के साथ दुश्मन भी थे। कालू खां का खानदान शक्तिशाली और रसूख वाला था। कुछ नजदीकी रिश्तेदार पुलिस तथा फौज में भी थे। उन्हीं की मदद से एक रात हम तीनों को एक फौजी जीप में अमृतसर पहुंचाने का बंदोबस्त किया गया। उस रात बहुत देर तक कालू खां और दादा जी पास-पास बैठे रोते रहे। कुछ दूर बैठी ंजैनब और दादी भी सुबकती रहीं। बहुत रात गए एक फौजी जीप हमें लेकर रवाना हुई। ड्राइवर के अलावा फौज का एक जवान आगे और तीन पीछे थे। उनसे घिरे हुए हम तीन।

 

हम अमृतसर भी पहुंच गए, शरणार्थियों के रूप में, अभावों, संघर्षों और तरह-तरह की असुरक्षाओं के दंश कई दशकों तक झेलने के लिए। कुंजाह में फसाद भड़कने के दिन से अमृतसर के लिए  रवाना होने वाली रात तक की स्मृतियां पिछले छह दशकों से हमेशा मेरे मानस में झिलमिलाती रही हैं। उन्मादियों के झुण्ड के बीच ंजैनब का किसी फरिश्ते की तरह प्रकट होना। कालू खां द्वारा जोखिम उठाकर हमारी रक्षा करना। हमें सुरक्षित अमृतसर पहुंचाने का बंदोबस्त करना। इन स्मृतियों ने अटल विश्वास दिया कि मनुजता और व्यक्तिगत संबंधों को धार्मिक आस्था डगमगाती नहीं, पुष्ट करती है। लेकिन मदरसे के मौलवी का वह चेहरा उस फितने की याद दिलाता रहता है, जिसने मुल्क को तकसीम किया और आज भी दोनों तरफ रह-रह कर कहर बरपाता रहता है। बाद में आतंकवाद के जुनून में झुलसे पंजाब में बिताए छह वर्ष भी इसी विश्वास को शक्ति देते रहे। इस विश्वास ने मेरी जीवन दृष्टि का निर्धारण किया और मेरी पत्रकारिता को भी दिशा दी।

 

बयालीस वर्ष पूर्व जब मैंने पत्रकारिता में प्रवेश किया तो वह आजीविका का सुरक्षित जरिया नहीं माना जाता था। शिक्षक की 300 रुपए महीने की नौकरी छोड़कर रायपुर के युगधर्म दैनिक में 165 रुपए मासिक वेतन पर उपसंपादक बना था। घर की माली हालत कमजोर थी। मेरे फैसले को अधिकतर लोगों ने गलत ठहराया, परंतु माता-पिता ने कभी कोई आपत्ति नहीं की। तब समाज में, प्रशासन में और राजनीति में भी पत्रकार की प्रतिष्ठा थी। स्वतंत्रता आंदोलन में तपे हुए पत्रकारों के आदर्श जीवंत थे। आजादी के बाद के बीस-पच्चीस वर्षों में भी दिग्गज पत्रकारों का लेखन तथा व्यक्तित्व प्रभावित-प्रेरित करता था। पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें पढ़ना दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था।

 

अंग्रेजी और हिंदी के नामचीन संपादकों के अग्रलेख निष्ठा के साथ पढ़े जाते। उन पर आपस में चर्चा और बहस भी होती। सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति भी इन बहसों में शामिल होते। मध्यप्रदेश में भोपाल, जबलपुर और रायपुर समाचार पत्रों के प्रमुख प्रकाशन केंद्र थे। रायपुर के पत्रकारों ने समूचे मध्यप्रदेश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई थी। यह कहना अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं होगा कि रायपुर के पत्रकारों की साख अपेक्षाकृत अधिक थी। पत्रकारों में परस्पर स्पर्धा तो थी, परंतुर् ईष्या, द्वेष नगण्य था।

 

रायपुर से समाचार पत्रों के प्रकाशन का इतिहास तो एक शताब्दी से भी अधिक पुराना है। पेण्ड्रा से पं. माधवराव सप्रे द्वारा संपादित और रायपुर से पं. वामनराव लाखे द्वारा प्रकाशित छत्तीसगढ मित्र के विषय में सभी जानते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान प्रकाशित अग्रदूत और महाकोशल कालांतर में दैनिक समाचार पत्र बने। महाकोशल में उस समय देश के अनेक विख्यात पत्रकार संपादन के लिए आदरपूर्वक लाए गए। पं. श्यामाचरण शुक्ल जब तक राजनीति में पूरी तरह रम नहीं गए, तब तक महाकोशल में प्राय: नियमित रूप से संपादकीय दायित्व का निर्वाह करते थे। शुक्ल जी देश के विभिन्न प्रकाशन केंद्रों से अच्छे पत्रकारों को महाकोशल के संपादन के लिए लेकर आया करते थे। क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी विश्वनाथ वैशम्पायन, पं. विष्णुदत्त तरंगी मिश्र, पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी तथा कुमार साहू को श्यामाचरण जी ने ही महाकोशल में आने के लिए प्रेरित किया था। गुरुदेव कश्यप महाकोशल के अत्यंत प्रतिभाशाली संपादक रहे। गुरुदेव में यदि राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क एवं संबंध स्थापित करने की कला होती, तो उनकी गणना देश के प्रथम श्रेणी के कवियों में होती। परंतु अपने बेहद संकोची स्वभाव के कारण वह छत्तीसगढ़ तक सीमित रह गए। महाकोशल के प्रबंधन में श्री बसंत कुमार ने लम्बी पारी खेली।

 

उस दौर में राजनीतिज्ञों की पत्रकारिता में सक्रियता की बात करें तो महाकोशल के साथ ही अग्रदूत के संचालन में लगभग पांच दशकों तक सक्रिय रहे श्री केशव प्रसाद वर्मा मनसा, वाचा, कर्मणा गांधीवादी थे। खादी के वस्त्र तो पहनते ही थे, हमेशा गांधी टोपी भी लगाते थे। राज्य सभा के सदस्य रह चुके थे, परंतु विनम्र एवं सहज इतने कि यदि किसी सामान्य व्यक्ति ने भी प्रेस कांफ्रेंस के लिए आमंत्रित किया तो सहर्ष पहुंच जाते थे। मैं उम्र और अनुभव में उनसे बहुत छोटा था। परंतु प्रेस कांफ्रेंस हो, प्रेस टूर हो या किसी विषय पर बातचीत, वर्मा जी कहीं भी अपनी प्रभुता दिखाने का प्रयास नहीं करते। वह कहानीकार भी थे। उन दिनों अधिकतर पत्रकार साहित्य में भी रुचि रखते थे। मधुकर खेर कहानियां, एकांकी और व्यंग्य लिखते थे। स्वतंत्र पत्रकार के रूप में उन्होंने पूरे देश में अपनी पहचान बनाई थी। देश का शायद ही कोई महत्वपूर्ण राजनेता रहा होगा, जो श्री मधुकर खेर के नाम से परिचित न रहा हो। प्रदेश के मंत्री और मुख्यमंत्री तो उन्हें जानते ही थे अनेक राष्ट्रीय नेताओं से भी उनके संपर्क थे। अटल जी, डॉ. राममनोहर लोहिया, डॉ. शंकरदयाल शर्मा, पं. द्वारका प्रसाद मिश्र सहित अनेक प्रमुख राष्ट्रीय नेता खेर साहब को सम्मान देते। अपनी पत्रकारिता के माध्यम से और व्यक्तिगत संपर्कों के द्वारा वह अनेक जरूरतमंद व्यक्तियों को मदद दिलवाते, परंतु अपने लिए उन्होंने कभी किसी राजनेता से कोई मदद नहीं ली। यही कारण है आधी सदी से भी अधिक समय तक पत्रकारिता में सक्रिय रहने के बाद भी मधुकर खेर ने दो कमरों का एक छोटा सा जो घर कर्ज लेकर बनवाया था, उसकीं पूरी किस्तें अपने जीवन काल में चुका नहीं पाए। यह उस समय की पत्रकारिता का सच था।

 

पत्रकारिता में तब पैसा नहीं था। सुख-सुविधाएं भी नगण्य थीं। वाहन के नाम पर सायकिल रहती या सायकिल रिक्शा पर आना-जाना होता। सातवें दशक के आरंभिक वर्षों तक हमारे परिचय क्षेत्र में केवल एक पत्रकार थे जिनके पास एक स्कूटर और एक कार भी थी। एक अन्य दैनिक के संघर्षशील स्वामी-संपादक के पास एक अदद पुरानी सी कार थी, जिसे शायद ही किसी ने सड़क पर चलते हुए देखा हो। मैं उसे प्रेस-स्वामी की अचल संपत्ति कहा करता था। कुछ वर्षों के बाद जब शासकीय अनुकंपा से मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्रियों के कृपापात्र पत्रकारों को लम्ब्रेटा स्कूटर का प्राथमिकता ने आधार पर अलाटमेंट होने लगा तो चंद चतुर पत्रकार स्कूटर धारी हो गए। ऐसे ही एक सहयोगी पत्रकार ने लम्ब्रेटा तो कोटे से प्राप्त कर लिया, परंतु उसे स्टार्ट करने के लिए किक मारने वाले व्यक्ति को वह तलाशते रहते। दूसरों के 'किक' से रफ्तार पकड़ने वाली प्रवृत्ति की आमद पत्रकारिता में होने लगी थी।

 

छठवें दशक की शुरूआत में रायपुर से एक के बाद एक तीन दैनिक समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू हुआ तो उसे छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में एक बड़ी हलचल के रूप में देखा गया। इंदौर के प्रतिष्ठित दैनिक नई दुनिया का रायपुर संस्करण श्री मायाराम सुरजन ने श्री अभय छजलानी के सक्रिय सहयोग से शुरू किया। श्री छजलानी रायपुर में आकर रहते। शुरूआती वर्षों में छजलानी जी स्वयं नई दुनिया के लिए रिपोर्टिंग करते। लगभग उसी समय नवभारत का रायपुर संस्करण प्रकाशित हुआ। एकाध वर्ष के बाद नागपुर के नरकेसरी प्रकाशन के युगधर्म ने रायपुर से प्रकाशन शुरू कर दिया। तब सारे दैनिक सिलेण्डर पर छपा करते थे। पूरा अखबार चार पृष्ठों का होता, जिसमें पूरा छत्तीसगढ रहता था। शुरू-शुरू में तो नवभारत और युगधर्म के भीतरी दो पृष्ठ नागपुर से छपकर रेलगाड़ी से रायपुर पहुंचते। प्रथम और अंतिम पृष्ठ रायपुर में तैयार होते। हाथ की कंपोजिंग होती थी, जिसका थोड़ा बहुत ज्ञान उपसंपादकसंपादक भी रखते। गुरुदेव कश्यप तो संकट की स्थिति में एकाध कॉलम मैटर खुद ही कंपोज कर लेते।

 

समाचारों के संकलन की सुविधाएं भी सीमित थीं। रेडियो से समाचार लिए जाते। बाद में पी.टी.आई. के टेलिप्रिंटर आए तो अंग्रेजी से उनका हिंदी में अनुवाद होता। बड़े हैरतअंगेज और कभी-कभी हास्यास्पद अनुवाद भी होते। पचासों उदाहरण याद हैं-नमूने के लिए एक के शीर्षक का अनुवाद पेश है: अंग्रेजी में था 'हंड्रेड्स ऑफ स्लीपर्स वाश्ड अवे बाय द फ्लैश फ्लड।' खबर रेल पटरियों के स्लीपर बह जाने को लेकर थी। ज्ञानी उपसंपादक ने हिंदी में उसका अनुवाद किया, 'चमकदार बाढ़ में हजारों सोये हुए लोग बह गये।' परंतु इस प्रकार की अनुवाद संबंधी भूलों के बावजूद पत्रकार भाषा के संस्कार विकसित करने को महत्व देते।  हिंदी भाषा के प्रयोग में सजगता बरती जाती। साथ ही अंग्रेजी का ज्ञान विकसित करने पर भी ध्यान दिया जाता। पत्रकार पत्रिकाओं के अलावा पुस्तकें भी खरीदते और उन्हें पढ़ते। यह प्रवृत्ति पत्रकारों के साथ ही राजनीतिज्ञों में भी थी।

 

पत्रकारों और राजनेताओं के संबंधों में स्निग्धता थी। खुलापन भी था। आज जैसी अखाड़ेबाजी और हदबंदी नहीं थी। सब आपस में मिलते-जुलते, घंटों साथ बैठते। रायपुर के शारदा चौक में दिन-रात खुला रहने वाला एक होटल होता था, 'रैन बसेरा।' रातपाली से मुक्त होकर नवभारत, देशबंधु, युगधर्म और महाकोशल के पत्रकार वहां पहुंच जाते। होटल के स्वामी सरदार मालिक सिंह बहुत हंसमुख और फराख दिल इंसान थे। उनके यहां ठहरने की सुविधा भी उपलब्ध थी। समाजवादी नेता लाडली मोहन निगम वहीं ठहरा करते। रात गए देर तक पत्रकारों की मंडली एक होटल में वह भी शरीक हो जाते। प्रखर समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया जब कभी रायपुर में आते तो जयस्तंभ स्थित एक होटल में ठहरा करते। लाडली जी उनको भी पत्रकार मंडली में लिवा लाते। कामरेड सुधीर मुखर्जी की भी कभी-कभार उस बैठक में शिरकत हो जाती। अब वह बात नहीं रह गई है।  प्रेस मालिकों की निजी स्पर्धा ने पत्रकारों को भी बांट दिया है। प्रेस कांप्लैक्स में दो बड़े समाचार पत्र आमने-सामने हैं, परंतु दोनों के पत्रकार बीच की विभाजक सड़क को पार करके एक-दूसरे के पास नहीं जाते। दोनों तरफ की इस झिझक पर मुझे उर्दू का यह शेर याद आता है :

 

हदें कुछ इस तरह से खींच रखी हैं हरम के पासबानों ने।

वो मुझ तक आ नहीं सकते, मैं उन तक जा नहीं सकता॥

 

ये कटुता भरी दूरियां पहले राजनीति में आईं और फिर पत्रकारिता में भी पसर गईं। पत्रकारों के वेतन बढ़े। सुविधाओं में इजाफा हुआ। उनके दबदबे में भी वृद्धि हुई, पर समाज में उनका सम्मान कम होता गया है। मूल्यों के प्रति जो आग्रह हुआ करता था, वह लगभग तिरोहित हो गया है। इस परिवर्तन को विस्तार से नहीं कहना चाहता, क्योंकि यह समय मेरे जैसे कलमनवीसों का शायद नहीं रह गया है। बात छत्तीसगढ क़ी ही नहीं, पूरे देश की है। चले गए वे दिन जब फ्रैंक मॉरेस की इंडियन एक्सप्रेस में इमरजैंसी पूर्व के चंद वर्षों में विशेष टिप्पणियां प्रथम पृष्ठ पर प्राय: हर रोज छपा करती थीं। 'मिथ एण्ड रयल्टी' शीर्षक से फ्रैंक मॉरेस की उन टिप्पणियों की कतरने सहेजकर रखी जाती थीं।

 

वह भी एक दौर था जब दुर्गादास का बेबाक विश्लेषण राजनीति की भीतरी परतों को उधेड़ा करता था, डीएफ कराका का साप्ताहिक 'करंट' सत्ताधीशों को झटके दिया करता था। ब्लिट्ज को सम्मान के साथ तो नहीं देखा जाता था, परंतु करंजिया साहब का साहस अनुकरणीय था। राजाजी का 'स्वराज्य' सत्ता पर बौद्धिक प्रहार करता था। वह दिनमान तो अब भूले-बिसरे वक्त का इतिहास बन गया है जिसने हिंदी पत्रकारिता को परिपक्व समग्रता प्रदान की थी। अब कहां से खोज कर लाइएगा रघुवीर सहाय को जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता को नये आयाम दिए, पत्रकारों को सुघड़ भाषा, विचार और सुलझी हुई दृष्टि दी। लौटकर तो वह धर्मयुग भी नहीं आ सकता, जिसने साहित्य, पत्रकारिता और स्वस्थ मनोरंजन के सम्मोहन से लाखों परिवारों को जोड़ा था। लेकिन यह बिखराव केवल पत्रकारिता का ही तो नहीं, सारे माध्यमों का है। समझ में नहीं आता, इस बहुमुखी स्खलन के समक्ष समर्पण कर दिया जाए, या निर्माण और विकास की मनुष्य की आदिम इच्छा पर भरोसा करते हुए वक्त की नयी करवट का इंतजार किया जाए?

 

रमेश नैयर

 जन्म- 10 फरवरी, 1940, कुंजाह (अब पाकिस्तान में)।शिक्षा- एमए (अंग्रेजी, भाषा विज्ञान)।पत्रकारिता-लेखन-1964 से अब तक जारी कार्यक्षेत्र-युगधर्म,रायपुर, एमपी क्रानिकल-रायपुर में उप संपादक रहे। दैनिक लोक स्वर -बिलासपुर के संस्थापक संपादक, दैनिक ट्रिब्यून-चंडीगढ़ के सहायक संपादक, नवभास्कर, रायपुर में संपादक, संडे आब्जर्वर (हिन्दी) के कार्यकारी संपादक, दैनिक भास्कर-रायपुर के संपादक, द हितवाद-रायपुर में स्थानीय संपादक, दैनिक भास्कर व दैनिक हरिभूमि के सलाहकार संपादक तथा जनसत्ता-रायपुर के संपादक। प्रमुख कृतियां-कथा यात्रा, उत्तर कथा, साधो जग बौराना (संपादन), ए बुक ऑफ चारा रिकार्ड (व्यंग्य संग्रह), एक दिल हजार अफसाने, वीएस नायपॉल के उपन्यास मैजिक सीड्स का हिन्दी में माटी मेरे देश की शीर्षक से अनुवाद।सम्मान- 1. झाबरमल शर्मा स्मृति शिखर सम्मान(सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़) 2. वसुंधरा सम्मान(दुर्ग)3. सामाजिक पत्रकारिता सम्मान(शिमला)। परिवार-पिताश्री-स्व. प्रकाशनाथ नैयर माता-स्वर्गीया कृष्णावंती धर्मपत्नी-श्रीमती इंद्रमोहनी नैयर पुत्र- संजय और संदीप विशेष- तीन वर्षों तक इंडियन फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटयूट, पुणे की गवर्निंग काउंसिलिंग के सदस्य रहे, अक्टूबर, 1985 में लाहौर में पत्रकारिता संगोष्ठी में हिस्सेदारी, पाकिस्तान, नीदरलैंड, ब्रिटेन तथा यूरोप के कई देशों का प्रवास। संप्रति- संचालक : छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी संपर्क- 152-, समता कालोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)

 

 

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादè