राजनीति के पद और पदार्थ
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अष्टभुजा शुक्ल
तिल
का ताड़ बना देने को तर-बतर मीडिया की भाषा और प्रस्तुति परवान पर चढ़ी हुई है।
चुनाव को 'महासंग्राम',
'महाभारत' और 'निशाना
साधने' जैसे कारकों में तब्दील कर दिया गया है गोया यह
जनता के अपने लोकतांत्रिकरण का, समर्थन या विरोध के
विवेक का संवैधानिक अवसर न होकर साम्राज्य की लड़ाई का हिंसा,
रक्तपात और युध्दोन्माद हो।
पढ़े-लिखे
लोगों की भाषा गढ़ी और पकी हुई होती है। लेकिन परिपक्वता में जो यांत्रिकी समा
जाती है वह उसे सहज या सुलभ नहीं रहने देती। इसके विपरीत जनता अपनी भाषा खुद
ईजाद करती है। अपने मुहावरे स्वयं विकसित करती है। उसके मुहावरों में उसके अपने
अनुभव,
अभिरूचि, शैली,
तर्क और इंद्रियबोध घुले-मिले होते हैं। इसीलिए वह ठेठ और बेधड़क होने के साथ
किताबी नहीं रह जाती। किताब के भी पहले आने वाला प्रत्यय हिसाब है। पहले सयाने
और बुजुर्ग लोग बिल्कुल ठेठ अंदाज में सवाल पूछते थे और जवाब चाहते थे। अब यही
36 और 63 वाला आंकड़ा ही लीजिए।
निश्चित रूप से यह हिन्दी की अपनी देवनागरी से विकसित मुहावरा है। अंकों का यह
खेल रोमन संख्याओं के जरिए संभव ही नहीं हो सकता। सम्मुख या विमुख होने का अर्थ
63 और 36 जिस बिम्ब के साथ
प्रस्तुत करते हैं, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। गनीमत है
कि मराठी अभी तक इस लिपि को संजोए है। लेकिन यह भी पढ़े-लिखे लोगों का मुहावरा
है। जनता इस मुहावरे को बिल्कुल अपने ही ढंग से सोचती है और व्यक्त करती रही है
- पूरे कौतुक, जमीनी सच्चाई और अनौपचारिकता के साथ।
जैसा कि मैंने पहले ही अर्ज किया, बुजुर्गों का सवाल इस
मुद्दे पर कुछ टेढ़ा होता था। वे पूछते - कै नवम् मुंह चुम्मी चुम्मा ?
तो जवाब होता - सात नवम् मुंह चुम्मी चुम्मा। और कै नवम् गँड़
धुक्की धुक्का? तो उत्तर आता- चार नवम् ....।
आज जब देश की
सदन को सबसे ज्यादा जनसेवक उपलब्ध कराने वाले यूपी में विधानसभा के चुनाव शुरू
हो चुके हैं तो जनता का सवाल पूछने का वह सलीका मुझे बेहतर याद आ रहा है। चुनाव
की पूर्व संख्या तक चार नवम् जारी है जो चुनावोपरान्त गठबंधन के लिए सात नवम्
में बदल जाएगा। गठबंधन का धर्म निभाने के लिए कोई भीतर से समर्थन देगा तो कोई
बाहर से। यानि कि किसी दल से दिल मिलेगा तो किसी से हाथ। इस कूटभाषा को समझने
के लिए जनता फिर किसी नए मुहावरे की तलाश शुरू कर देगी। लेकिन तिल का ताड़ बना
देने को तर-बतर मीडिया की भाषा और प्रस्तुति परवान पर चढ़ी हुई है। चुनाव को
'महासंग्राम',
'महाभारत' और 'निशाना
साधने' जैसे कारकों में तब्दील कर दिया गया है गोया यह
जनता के अपने लोकतांत्रिकरण का, समर्थन या विरोध के
विवेक का संवैधानिक अवसर न होकर साम्राज्य की लड़ाई का हिंसा,
रक्तपात और युध्दोन्माद हो। यह अतिरंजना सिर्फ गाल बजाने तक
सिमट चुकी है क्योंकि कल तक साथ-साथ सत्तासुख भोगने वाले आज एक-दूसरे पर
'निशाना' साध रहे हैं। न सत्ताधीशों के
पास कुछ उपलब्धियां हैं, न विरोधियों के पास कोई जनहित
के मुद्दे। भाषा सिर्फ भाषा तक सीमित हो चुकी है।
भाषाविदों का
मानना है कि भाषा पैतृक संपत्ति नहीं होती। उसे अर्जित करना पड़ता है। लेकिन
भारतीय राजनीति पैतृक संपत्ति बनती ही जा रही है। राजनीति अब धंधा और रोजगार बन
चुकी है। फिर से राजघराने कायम हो रहे हैं। नई खेप के साथ नए-नए युवराज सामने आ
रहे हैं। भारत में वंशवादी उत्तराधिकार के लक्षण इतने निर्लज्ज ढंग से प्रकट
होने लगे हैं कि जनतंत्र प्रहसन हो चुका है। इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने में भी
मीडिया जोर शोर से जुटा हुआ है और वह जनमत निर्माण करने की जगह राजमत स्थापित
करने का धर्म निभा रहा है। इसीलिए जंगलराज से धर्मराज तक फैली भारतीय राजनीति
अब सीधी भर्ती करने वाला विभाग हो चुकी है जहां किसी तरह की परीक्षा नहीं देनी
पड़ती। न कोई संघर्ष,
न कोई अनुभव, न सामान्य जनता के
सुख-दुख से कोई लेना देना। बस, बची है तो गलाकाट
प्रतियोगिता और सुंदर सा पद जनसेवा। जनसेवा के ऐसे मंसूबों को देखते हुए कुछ
साल पहले यूपी में ही घटित एक घटना याद आ रही है। विकासखंड स्तर पर एक तृतीय
संवर्ग का पद हुआ करता था - ग्रामसेवक। उन कर्मचारियों में अपने इस पदनाम को
लेकर गहरा असंतोष था। इसमें जुड़ा 'सेवक'
शब्द उन्हें अपमानजनक प्रतीत होता था। भला,
सेवा करने जैसा निष्कृष्ट काम और कौन सा होगा?
सो उन्होंने न्यायालय में याचिका ठोंक दी। न्यायालय भी उनकी
पीड़ा से सहमत हुआ और अब 'ग्राम सेवक'
का पदनाम 'ग्राम विकास अधिकारी'
है। कहां अधिकारी की ठसक और कहां सेवक की निरीहता?
एक छोटा सा कर्मचारी भी गांवों के अधिकारी की घौंस के साथ रहना
चाहता है तो तथाकथित जनसेवक यदि सम्राटों जैसा रूतबा हासिल करने के लिए जनतंत्र
की चिन्दी-चिन्दी करने के लिए बेताब हैं तो आश्चर्य कैसा?
बेचारे गांधी जी ने 'हरिजन'
सेवा का संकल्प लिया था तो इसी भारतीय जनता ने 'हरिजन'
पद को लेकर ही उन्हें कटघरे में खड़ा कर दिया और उनके नाम के
साथ 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी'
जैसा मुहावरा दे मारा। पर मुहावरे भी वक्त के साथ बदलते ही
रहते हैं। भला हो, पुरूषोत्तम अग्रवाल जैसे चिंतक का
जिन्होंने इसे अब बदलकर 'मजबूती का नाम महात्मा गांधी'
कर दिया है और 'सेवा'
जैसे प्रत्यय को निंदनीय होने से बचा लिया है। आखिर,
तुलसीदास ने कुछ सोच समझकर ही लिखा होगा - सब ते सेवक धरम कठोरा।
यह एक कठोर सच
है कि सेवा दुष्कर कर्म है। स्वयंसेवकों के जितने भी शाखा सूत्र बढ़ते जाएं
लेकिन पर जन सेवा के गुणसूत्र मिटते जा रहे हैं। परपीड़ा के अहसास नदारत हैं
क्योंकि हमने संवेदनहीनता का चुनाव कर लिया है। अब राजनीति जनसेवा के लिए नहीं,
दबदबा बनाए रखने के लिए की जा रही है। दुखद यह है कि लोकतंत्र
का चौथा स्तंभ भी 'जनता की सेवा'
जैसे कारक को 'जनता पर शासन'
जैसे प्रत्यय में बदल देने का अपराध करता दिखाई दे रहा है।
लेकिन दूसरी ओर यह सुखद भी है कि उसी मीडिया ने घूस लेकर सदन में सवाल करने
वाले बेचू जनसेवकों को बेनकाब भी कर दिखाया। उम्मीदें हमेशा आदमी को थामे रहती
हैं। यह भी छोटा सच नहीं।
पता नहीं अन्य
राज्यों में कैसी व्यवस्था है,
लेकिन यूपी में परिवहन विभाग की बसों में कुछ सीटें
जनप्रतिनिधियों (विधायकों, सांसदों और पत्रकारों) के
लिए लिखित तौर पर आरक्षित होती हैं। इस नए किस्म के आरक्षण पर जब से मैंने
यात्रा करनी शुरू की तभी से निगाह डाल रहा हूं। इसे संयोग कहिए या विडम्बना कि
आज तक उन सीटों पर कोई पद का दावेदार नहीं दिखाई दिया - अंखड़ियां झांई पड़ीं पंथ
निहारि- निहारि। संयोग इसलिए नहीं कह सकता कि वह कभी कदाचित घटित होता है। तो
ऐसी विडंबनाओं के हवाले हो चुके इस लोक(प)तंत्र में रायपुर (छत्तीसगढ़) के पूर्व
सांसद श्री केयूर भूषण की बूढ़ी साइकिल की सवारी मन में आदर का भाव उत्पन्न करती
है। आखिर, जनसेवकों में महाराजाओं की तरह दिखने और रहने
की कामनाएं क्यों जन्म ले चुकी हैं? यह जानते हुए भी कि
जिंदगी का यथार्थ आदमी को कम से कम अपनी सच्चाई का आईना तो दिखा ही देता है और
आम आदमी की तरह रहने के लिए बाध्य भी करता है और पदार्थ के संदर्भ ऐसे ही होते
हैं -
हम सब अपने
अपने भंगी
अपने हाथों
अपना गोबर धोते धुर सत्संगी
कौन अछूत,
सवर्ण कौन है, पट में सबकी नंगी
कोई काला कोई
गोरा यह दुनिया बहुरंगी
रज की सुधा,
वीर्य के अमृत से निर्मित यह काया
गर्भाशय या
परखनली में भू्रण एक-सा पाया
शब्द-शब्द को
मन से गाया,
ताल ताल पर थिरका
नवरस के कवि।
आदिकाल से अपना रस तो सिरका
सब का मुंह
कुश से चीरा है,
सबकी क्षुधा समुद्र
सबकी सोच
गगनचुंबी है कर्म क्षुद्र से क्षुद्र
दूध सभी का
उज्जर होगा,
रक्त सभी का लाल
अष्टभुजा के
मुंह मत लगना,
अष्टभुजा चंडाल
लेखक
प्रख्यात कवि एवं ललित निबंधकार हैं।

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