समय,
समाज और पत्रकारिता
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प्रमोद वर्मा
हिन्दी
साहित्य के श्रेष्ठ आलोचक और कवि स्व. प्रमोद वर्मा छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत का
एक गौरवशाली हस्ताक्षर हैं।
5 जून 1929
को सक्ती (जांजगीर) में जन्में श्री वर्मा ने साहित्य समीक्षा
की कई महत्वपूर्ण पुस्तकों और अपने कविता संग्रहों से एक अलग पहचान बनाई।
उन्होंने एक नाटक भी लिखा। मार्क्सवादी कला-कृत्यों की पड़ताल करने वाली उनकी
किताब हलफनामा 1978 में वर्ष की सर्वश्रेष्ठ समीक्षा
कृति के तौर पर समादृत हुई। 1993
में उन्हें उनके रचनात्मक अवदान के
लिए मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने भवभूति अलंकरण से विभूषित किया। उनके
जयंती प्रसंग पर उनका यह आलेख उन्हें विनम्र श्रध्दाजंलि देते हुए प्रस्तुत
किया जा रहा है।
- संपादक
बिलासपुर-रायपुर सड़क मार्ग पर बिलासपुर से कोई पच्चीस किलोमीटर दूर सरल रेखा सी
बहती मनियारी नदी के तट पर एक छोटी सी बस्ती है - तालागांव। खेत खलिहानों और
आसपास बसे झोपड़ों को पार करते आप अचानक ठिठक जाते हैं। आंख मलने लगते हैं। कहीं
स्वप्न तो नहीं देख रहे। सामने आप के सचमुच एक स्वप्न लोक है। सपनों की ही तरह
भग्न और बेतरतीब। सच क्या है इनमें से वह जो था या यह जो है?
सच दोनों हैं
- वर्तमान से रंच मात्रा भी कम अतीत नहीं। फिलहाल का भला कौन नहीं होता?
लेकिन
प्राणियों में केवल मनुष्य ही तो उसे फलांगने की इच्छा सहित फिलहाल में होता
है। इसलिए खास देश-काल का होकर भी वह दिक्काल का होता है। इतिहास घटनाओं का
नहीं वरन् उन घटनाओं को संभव करते मनुष्य समूह का नाम है। उस से गुजरते हुए हम
अपने संघर्षरत पुरखों का,
एक तरह से अन्य देश-काल में अपना ही,
साक्षात् कर रहे होते हैं। बावड़ी के भीतर की सीढ़ियां आकाश की ओर ही तो खुलती
हैं। भीतर से बाहर और बाहर से भीतर कोई और नहीं हमीं हुआ करते हैं। मनुष्य।
बेपर का होकर भी जो उड़ सकता है,
तन के बंधन में होकर भी जो मन से
उन्मुक्त रहा चला जाता है। इसकी कल्पना की दूरबीन आगे भी देख सकती है और पीछे
भी जो अनुभव-समृध्द है इसलिए कृतसंकल्प भी। शायद पूर्वापर संबंध जोड़ पाने की
अपनी क्षमता के ही बल पर सृष्टि में कभी असहाय सा विचरता द्रिपद अजेय बनता गया।
खंडहरों में
प्रवेश कर हम जैसे स्वयं को ही अपने अतीत में हासिल करते हैं। ताला के भग्न
मंदिर का प्रवेश द्वार वानस्पतिक उपकरणों से सज्जित है। खगोल-भूगोल में विचरते
मानवेतर प्राणी रूद्रशिव के अंग-प्रत्यंग हैं। देवता के एक ही विग्रह में
पेड़-पौधों,
पशु-पक्षियों यहां तक कि
कीट-पतंगों को भी समाविष्ट करने वाली कला-चेतना हमारी संश्लिष्ट संस्कृति के
चरित्र के अनुरूप वैश्विक और समावेशी है। मनुष्य समय की पीठ पर सवार है और
मूल्य संस्कृति की पीठ पर। समुदाय का अंग बन कर द्रिपद मनुष्य हुआ। समुदाय ने
अपनी ऐतिहासिक सत्ता सामूहिक सहयोग और परिश्रम से उत्पादित करते हुए हासिल की।
उत्पादन बढ़ा तो लाभ हुआ। सामूहिक श्रम से उपार्जित धन का नियंत्रण अपने हाथ में
लेने की इच्छा रखने वाली ताकतें भी समाज से ही पैदा होती हैं। अलग-अलग समुदायों
को ऐसी ताकतें आपस में लड़ाती हैं। भारी पड़ने वाली ताकत अपने प्रतिद्वंद्वी को
गुलाम बना लेती है। भौतिक संपदा के अलावा हर समाज की आध्यात्मिक संपदा भी होती
है। इसे संस्कृति कहते हैं। इसका भी उत्पादन सदियों के सामूहिक सहयोग और
परिश्रम से होता है। संस्कृति जातीय अनुभवों और जीवन-मूल्यों का स्मृति-कोश है
ये मूल्य ही किसी समाज की वास्तविक पहचान होते हैं। उपनिवेशवाद की विजय-यात्रा
विजित राष्ट्र पर सांस्कृतिक प्रभुता के साथ समाप्त होती है।
उत्तर
मध्य-काल भारतीय इतिहास के चरम अध:पतन का समय है। ऐसे समय में यहां आयी विदेशी
सत्ता को पैर जमाने में खास दिक्कत नहीं हुई। लेकिन जैसे ही उसने भारत के मन के
भी उपनिवेशन की प्रक्रिया शुरू की,
बूढ़े भारत का सोया तेज जाग उठा। अपने डेढ़ सौ बरस के राज
में हर चंद कोशिशों के बावजूद अंग्रेज इस देश की अस्मिता को न मेट सके न बदल ही
सके। पराधीन रहकर भी जो मन से ऐसा अनुभव न करे उसे भला कौन बांधे रख सकता है।
भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के पांच ही साल बाद अंग्रेजों को
भारत छोड़ना पड़ा। और तब आता है विडंबना का ऐसा दौर
जिसकी मिसाल शायद ही कहीं मिले। आजाद होते ही हमने उन शस्त्रों को हिंद महासागर
में फेंक दिया जिनसे हमने आजादी की लड़ाई लड़ी थी। गांधी की हत्या वस्तुत: उन
मूल्यों की हत्या थी जिनके वे प्रतीक थे। स्वाधीनता-पूर्व और स्वाधीन भारत की
राजनीति का चारित्रिक अंतर ध्यान देने योग्य है। स्वाधीनता की लड़ाई के दौरान
जोर संस्कृति-नि:सृत मूल्यों पर था जबकि स्वाधीन भारत में उस के पर्याय कीमत पर
जिसे बाजार तय करता है। बड़े बाजार से जुड़ना उसके अधीन होना है। उपनिवेश बनकर भी
जो भारत मन से गुलाम नहीं हुआ था। उपनिवेशवाद के आरक्षित वन में बंधनरहित होकर
भी वस्तुत: अपनी स्वतंत्रता सीमित कर चुका है। स्वाधीन होने के बाद हमने समता
और न्याय पर आधारित समाज-रचना का संकल्प लिया था। तदनुसार विकास की योजनाएं बना
कर उन्हें अमल में लाने की आधी-अधूरी कोशिश भी हुई लेकिन उनका लाभ कमजोर वर्ग
के बजाय उपरले वर्ग को अधिक मिला। औपनिवेशिक प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से
जनकल्याणकारी योजनाओं पर अमल करने का नतीजा इसके
सिवा और हो भी क्या सकता है। सदियों से चली आ रही अन्यायी रूढ़िवादी व्यवस्था और
उसे मजबूत करने वाली सामाजिक संस्थाओं की जकड़बंदी आजादी हासिल करने के लगभग
पांच दशक बाद भी यथावत है। वोट बैंक के बने रहने के चक्कर में धर्म के मामले
में हजारों साल की सहिष्णुता और मेलजोल की विरासत नष्ट होती जा रही है।
पढ़े-लिखे वर्ग के लोगों को भी पिछले दिनों दूसरे सम्प्रदाय के उपासना गृह के
नष्ट किये जाने पर खुश होते और एक दूसरे को बधाई देते देखा- सुना गया है। समाज
विरोधी ताकतों के हौसले तो अब इतनी बुलंदी पर हैं कि शक होने लगता है कि वही
शासन चला रहे हैं। प्रतिगामी जनविरोधी ताकतों पर अंकुश लगाने की न तो शासन में
क्षमता दिखाई देती न पर्याप्त इच्छाशक्ति। राजनीति का अपराधीकरण हो गया है।
वर्तमान सरकार द्वारा खुले तौर से विकास की पश्चिमी धारणा को स्वीकार कर लेने
के बाद तो देश में उपभोक्ता समाज ही बन सका है। समतामूलक समाज नहीं। सामाजिक
न्याय की तोतारंटत भी इसीलिए आजकल कम सुनाई देती है विकासशील देशों द्वारा भी
वही रास्ता अपनाने की कीमत जाहिर है उन्हीं देशों के इत्यादि जन ही चुकायेंगे।
कुछ ही बरस
पहले तक तंत्र और उस पर काबिज ताकतों के जन विरोधी चेहरों को लेकर चिंता करते
अपने प्रश्नाकुल छात्रों को मैं दिलासा देता कि आदमी की जिंदगी मे ंतीस-चालीस
बरस बेशक बहुत होते हैं लेकिन देश की जिंदगी में तो यह बूंद भर समय ही है। वह
दिन जरूर आयेगा,
मैं उनसे कहता, जब न यह जनविरोधी तंत्र
रहेगा न उस पर काबिज दिख रही ये काली ताकतें ही। लेकिन जिस दौर में हम इन दिनों
गुजर रहे हैं और देशी मूल प्रकृति और व्यापक हितों के विरूध्द जैसे निर्णय
लगातार लिए जा रहे हैं, लोभ,
संदेह और नफरत के माहौल को सियासी ताकतें जिस तरह हवा देती चल रही हैं,
माफिया और सत्ता के दलाल जिस तरह दिनोंदिन मजबूत होते जा रहे
हैं उन्हें देखकर मेरे जैसा सुधारातीत आशावादी भी अब बुरी तरह सशंकित होने लगा
है। अभी उसी दिन बम्बई में हुए बम विस्फोटों की खबर देख रही हमारी ग्यारह साल
की बेटी झुंझला कर अपनी मां से कह उठी, बंद करो मां
बकवास कर रहे इस डिब्बे को। भौगोलिक कारणों से तो इस देश को अतिरेकों का
उपमहाद्वीप कहा ही जाता है लेकिन यह राजनैतिक कारणों से भी यही है। अवकाश के
घंटे में जानती हो हम पांच सहेलियां प्राय: क्या गाती हैं - नफरत की गंगा बहे,
देश में झगड़ा रहे। बात इसलिए बेहद चौंकाने वाली है क्योंकि भय,
हत्या, झूठ,
फरेब, अन्याय और दमन की राजनीति अपना कुप्रभाव समाज के
सबसे कोमल और पवित्र मन पर भी डालने लगी है। प्यार को नफरत,
एकता को झगड़ा और देश को न कुछ का नाम देते बच्चों को कौन सा
संसार दे रहे हैं हम। जब हम बच्चे थे तो 'जननी
जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी' उच्चारते विह्वल हो
उठते थे। देश का एक साफ विचार था हमारे अंदर। भूगोल और राजनीति से भी परे वह एक
सांस्कृतिक सच्चाई था। देश और समाज की भला कौन सी धारणा दूं मैं अपनी इस बड़ी हो
रही बच्ची को? राष्ट्रपति
को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए अनुसूचित जाति जनजाति के आयुक्त कहते हैं कि
इस देश में तिहरी अर्थव्यवस्था लागू है क्योंकि इसके भीतर दो और देश है इंडिया
के अलावा भारत और हिन्दुस्तनवा। कौन से
मुंह से उपदेश दे कोई पिता अपने बच्चे को कि अपने देश को प्यार करो क्योंकि तब
वह फट से पूछ बैठेगा,
किस देश को पिता और पिता को
कोई जवाब नहीं सूझेगा।
समय के ऐसे
दौर में पत्रकार की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। पत्रकारों में मैं
लेखक को भी शामिल मानता हूं - सिर्फ इसलिए नहीं कि पत्रकारिता त्वरित लेखन है
बल्कि इसलिए खासतौर से हमारे लिए यहां पत्रकार-लेखकों और लेखक-पत्रकारों की
सुदीर्घ और समृध्द परंपरा रही है जो आज तक चली आ रही है। सबसे जरूरी काम आज
मुझे नवजागरण और स्वतंत्रता संग्राम के दौर की स्पिरिट का पुनर्वास लगता है
क्योंकि मन के हारे हार है मन के जीते जीत। सिर्फ साठ-सत्तर साल पहले तक जो
जाति आत्मगौरव और देशाभिमान से रहित नर को नर-पशु और मृतकतुल्य कहती थी और
जिसके स्वाधीनता-संघर्ष से एशिया-अफ्रीका के तमाम मुल्कों ने अपनी आजादी की
लड़ाई लड़ने की प्रेरणा पायी थी उसी को अपने स्वाभिमान को ताक पर रख
अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद के चरण चांपते देखना बेहद लााजनक अनुभव है। तालागांव के
रूद्रशिव की प्रतिमा जिस चेतना से उपजी है उसके पीछे सदियों का सोच और विवेक
है। हर दर्पण अपने ही इतिहास और संस्कृति को प्रतिबिंबित करता है। अपने दर्पण
को तज देने से हमारे पुरखे कहां प्रतिबिम्बित होंगे?
और वही नहीं रहे तो हम भला कितने रह जायेंगे?
औपनिवेशिक ताकतों की मानसिक गुलामी
से छुटकारा पाना मेरे विचार से जाति के तौर पर सम्मानजनक ढंग से हमारे बने रहने
की अहम शर्त है।
तहस-नहस के इस
दौर में हमारे देश की पत्रकारिता पर बड़ी जिम्मेदारी है। यह देखकर तसल्ली होती
है कि बहुतेरे दबावों के बीच भी उसमें वैदिकी हिंसा को भी हिंसा ही कहने का
साहस है,
डरावनी से डरावनी सच्चाइयों से मुठभेड़ करने की कूवत है।
अयोध्या की टूटी मस्जिद का सच, कश्मीर में मंदिरों के
सही सलामत होने का सच, दलितों के उत्पीड़न का सच,
सियासी साजिशों और आर्थिक घोटालों का सच,
लोगों तक पहुंचाने का जोखिम उसने उठाया है। बेशक काली-पीली
पत्रकारिता का भी हमारे यहां बड़ा जखीरा है। सत्ता के ढिंढोरचियों की भी एक बड़ी
जमात है। लेकिन जातीय जीवन के परिप्रेक्ष्य में आम आदमी और उसकी नियति के अहम
फैसलों से जुड़े सवाल बेहिचक उठाती पत्रकारिता ही तिलक,
गांधी और गणेशंकर विद्यार्थी की
परंपरा है। जिस में सत्ता के विरूध्द अपनी इंटीमिटी कायम रखने की क्षमता हो वही
हमारी पत्रकारिता और लेखन की मुख्यधारा हो सकती है।(प्रकाशन
संस्थान नई दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक कदाचित से साभार)
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