Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 4, जून - अगस्त, 2007)

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बहस

 

 

 

 

 

 

 

भारत में चौथे खंभे का पता-ठिकाना

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प्रो. ओमप्रकाश सिंह

 

मैं,आपको एक दिन घटी घटना की कहानी बता रहा हूं। एक व्यक्ति एक दिन मेरे पास आया और एक जानकारी चाही। मैं तैयार होकर उसकी जानकारी का उत्तर खोजने लगा। बात बड़ी सामान्य थी। लेकिन उसकी बात में पत्रकारिता का रहस्य भरा था। अब आपकी इच्छा उस रहस्य को जानने की होगी। उत्तर मिलेगा। बस इसके लिए सिर्फ आप मेरे साथ चलते रहें। उस व्यक्ति ने अपने प्रश् में कुछ और नहीं बल्कि चौथे खम्भे का पता पूछा था। उसके अनुसार हर खम्भे की जानकारी लोकतंत्र में सभी को होनी ही चाहिए। वह इसे ढूंढने में लगा था। उसका मानना था कि लापता व्यक्ति या खम्भे में न तो संवाद हो सकता है और न ही सम्पर्क। उसकी बात से हंसी भी आ रही थी और चिंता भी। शायद आप भी इसी भाव में होंगे।

 

वह व्यक्ति मुझसे उत्तर पाने आया था अपनी समस्या का, लेकिन मैंने उससे ही प्रश् करना शुरू किया। आप सोचेंगे कि मैंने ठीक नहीं किया। लेकिन आप ही बताएं कि यदि आपसे कोई व्यक्ति किसी का पता-ठिकाना पूछता है तो क्या उससे आप कारण नहीं पूछते? क्या बिना कारण जाने आप पता-ठिकाना किसी का भी आप बताते फिरते हैं? आपका भी उत्तर यही होगा कि ऐसा कदापि नहीं। ऐसा आप क्यों करते हैं? इसका उत्तर यह रहा कि उस समय आप एक जिम्मेदार व्यक्ति बन जाते हैं। फिर मैं बिना कारण जाने कैसे किसी का पता-ठिकाना बताऊं। क्या मैं जिम्मेदार व्यक्ति नहीं हूं? आप यह भी न सोचें कि चौथे खम्भे उर्फ मीडिया का पता इतना आसान है! पता पूछने वाला व्यक्ति भी समाज में ही रहता है और यदि वह मीडिया उर्फ चौथे खम्भे का पता पूछ रहा है तो निश्चित ही कोई विशेष बात है ही। इसीलिए मैं और भी सजग हुआ। क्योंकि यदि वह पता जान रहा है तो क्यों पूछ रहा है? यदि नहीं जान रहा है तो उसकी इच्छा का कारण क्या है? मेरे सामने और भी प्रश् थे। समाज और मीडिया की राह अलग-अलग है। समाज में लोग अज्ञात की जानकारी खोजते हैं। लेकिन मीडिया में ज्ञात को ही लोग पहले तलाशते हैं। जैसे आपने किसी क्रिकेट मैच की दर्शक दीर्घा में बैठकर मैच का आनंद लिया। बाद में या अगले दिन समाचार पत्र में फिर उसी क्रिकेट मैच की खबर पहले खोजते हैं। यह सिर्फ आप ही नहीं सबके साथ ऐसा ही होता है। घटना स्थल पर मौजूद दर्शक अथवा सेमिनार का वक्ता अगले दिन अपनी देखी घटना और सेमिनार में सुने या बोले अपने भाषण को अखबार में सबसे पहले खोजता है। उसकी इस खोज में सम्पादक जी की प्रथम, द्वितीय या तृतीय लीड बनी खबर खो जाती है। ऐसी उलटी गंगा मीडिया में बहती है। इसी सुविधा के कारण मैंने प्रश् किया। मेरा उद्देश्य प्रश्कर्ता को परेशान करना कदापि नहीं था।

 

अब आपके मन में यह भी इच्छा होगी कि मैंने उससे क्या प्रश्न किया। मेरा सवाल सीधा था। मैंने उससे लोकतंत्र के चारों खम्भों की जानकारी चाही। मेरे प्रश् को सुनकर उसने ऐतिहासिक गठरी खोली। यदि तथ्य उसकी ही भाषा में बताऊं तो बात लम्बी होगी। और यह लेख भी कहानी में बदल जाएगा। मैं, लेखक से कहानीकार नहीं बनना चाहता। इसीलिए एक पत्रकार के रूप में सार-संक्षेप बताता हूं। आप मुझ पर विश्वास करें। कोई भी मुख्य बिन्दु नहीं छूटेगा। मुख्य बिन्दु को सलीके के साथ कम स्थान में परोसने में तो पत्रकार माहिर होता ही है। आखिर वित्तमंत्री बजट पर घंटों लम्बा भाषण देते हैं। पत्रकार उसे अखबार के एक कोने में समेट देता है। इसीलिए मैं उस व्यक्ति के व्याख्यान अथवा वक्तव्य की रिपोर्टिंग कर रहा हूं।

 

उसके अनुसार हिंदी में प्रचलित लोकतंत्र के चौथे खम्भे का मूल अंग्रेजी से आया। अंग्रेजी में इस खम्भे के लिए पिलर नहीं बल्कि 'इस्टेट' शब्द का प्रयोग होता है। इस्टेट का अर्थ होता है- जमीन, आधार, जागीर आदि। इसे जब लोकतंत्र के साथ जोड़ा गया तो इसका अर्थ प्रतीकात्मक हो गया। समाजशास्त्रीय दृष्टि से इसका अर्थ बदला। ब्रिटिश मॉडल के लोकतंत्र में यह चला। ब्रिटेन में प्रारंभ में राजा (क्राउन), संसद, चर्च और सामंत जैसे चार आधार लोकतंत्र के थे। धीरे-धीरे यह दृष्टि और अर्थ बदला। संसद की जगह सरकार और राजा इसी सरकार में समा गया। न्यायपालिका अलग खड़ी हुई। अमेरिकी क्रांति ने सामंतों को हटाकर प्रेस को खड़ा किया। इन सभी परिवर्तनों में चर्च टस से मस नहीं हुई। इस प्रकार ब्रिटिश लोकतंत्र के चार आधार या खम्भे  माने गए। इनमें सरकार, न्यायपालिका, चर्च और प्रेस सम्मिलित हुई। चूंकि लोकतंत्र के आधारों के बदलाव के बीच चर्च ज्यों की त्यों बनी रही। शायद इसी चर्च में स्थायी भाव को खम्भे के रूप में मानकर लोकतंत्र के आधार की जगह खम्भा शब्द हिन्दी में चल पड़ा।

 

ब्रितानी लोकतंत्र के चार खम्भों की ऐतिहासिक गाथा के बाद उसने जो विचार भारत के संबंध में दिया, वह भी चौंकाने वाला ही था। उसके अनुसार भारत में लोकतंत्र की विकास यात्रा अंग्रेजी हुकूमत में शुरू हुई। मॉडल भी वही रहा। इसीलिए चौपाया लोकतंत्र यहां भी आया। लेकिन भारतीय लोकतंत्र में ब्रिटिश लोकतंत्र के खम्भे बदल गए। आखिर यदि हम भारतीय अंग्रेजों से अलग नहीं थे तो अंग्रेजों को यहां से क्यों भगाते। भले ही आज अंग्रेज और अंग्रेजी अच्छी लग रही हो। ब्रितानी लोकतंत्र की गाड़ी सरकार हांकती है। न्यायपालिका न्याय व्यवस्था देखती है। चर्च सामाजिक संगठन का आधार है। सूचना व्यवहार मीडिया से ही चलता है। लेकिन भारत में सरकार, न्यायपालिका और प्रेस जैसे खम्भे ज्यों के त्यों हैं। इनमें से एक खम्भा सिर्फ अलग है।

 

एक अलग खम्भे की बात सुनकर मेरी जिज्ञासा भी बढ़ी। और उस एक भिन्न खम्भे के विषय में प्रश् दाग ही दिया। उस व्यक्ति ने इसका भी उत्तर दिया ही। उसके अनुसार भारत में ब्रितानी चर्च की जगह जाति जैसा सामाजिक संगठन है। गैंग रूपी दलीय भारत में जाति को पकड़कर नेता चुनाव की वैतरणी पार करते हैं। यदि इस जाति को हटा दें तो गैंग रूपी दलों को वोट देने कौन जाएगा? इसलिए भारतीय लोकतंत्र का पहला खम्भा सरकार, दूसरा खम्भा न्यायपालिका, तीसरा खम्भा जाति और चौथा खम्भा प्रेस है। यही चार मिलकर भारतीय लोकतंत्र की गाड़ी हांक रहे हैं। इन चारों में सरकार तो राजधानियों में और न्यायपालिका न्यायालयों में, जाति समाज में मिल जाती है। लेकिन प्रश् है कि चौथा खम्भा कहां मिलेगा, समाचार पत्र में, पत्रिका में, रेडियो में अथवा टीवी आदि में? इसे बहुत खोजा पर मिला नहीं। यह चौथा खम्भा है कहां? इसका पता क्या है? ...इस चर्चा और प्रश् में लेख बड़ा हो गया। अब आप बोर न हों इसलिए इस चर्चा को यहीं विराम देते हैं। इसे समाप्त नहीं कर रहे हैं। चौथे खम्भे का पता-ठिकाना खोजकर हम आप तक पहुंचाएंगे। इसे खोजने में कुछ समय अवश्य लगेगा। तब तक आप और प्रश्कर्ता दोनों को ही प्रतीक्षा करनी होगी। इसी प्रतीक्षा के बीच छपेगा 'मीडिया विमर्श' का अगला अंक उसी में होगा 'चौथे खम्भे का पता-ठिकाना'। चलिए तब तक आप करें प्रतीक्षा और हम लगे खोज में।

 

लेखक काशी विद्यापीठ के महामना मालवीय पत्रकारिता संस्थान, वाराणासी में पत्रकारिता के प्रोफ़ेसर हैं।

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