शेष है मुकाम
पाना
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संजय कुमार
इसमें
दो मत नहीं है कि सूचना और संचार क्रांति के दौर में आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक
मीडिया के बाद वेब पत्रकारिता का चलन तेजी से बढ़ा है। विदेशों के बाद भारतीय
परिप्रेक्ष्य में भी इसकी घुसपैठ हो रही है। हालांकि भारत में अभी भी वेब
पत्रकारिता की पहुंच अगली पंक्ति में खड़े लोगों तक ही सीमित है। जहां तक अंतिम
कतार में खड़ लोगों तक पहुंचने की बात है तो अभी यह कोसों दूर है।
'तहलका
डॉट कॉम' ने जब
स्टींग ऑपरेशन कर बंगारूप्पा से संबंधित खबर फ्लैश किया तब देशभर में वेब
पत्रकारिता को खास नजरिए से देखा जाने लगा।
सूचना तकनीक
के क्षेत्र में कंप्यूटर के आने और फिर डब्ल्यूडब्ल्यू डब्ल्यू यानी वर्ल्ड वेब
के इंटरनेट के माध्यम से सूचना तकनीक के क्षेत्र में जो क्रांति आई,
उसने दुनिया को सीमित कर दिया। एक अंगुली की मदद से पूरी
दुनिया को कुछ ही क्षण में जानने का मौका इससे हमें मिल जाता है। 1969
में एडवांडस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी ने संयुक्त राज्य
अमेरिका के चार विश्वविद्यालयों के कंप्यूटरों की नेटवर्किंग करके इंटरनेट की
शुरूआत की थी। यह आज जिस मुकाम पर है, उसकी कल्पना शायद
एजेंसी ने भी नहीं की होगी। वेब की दुनिया में इंटरनेट एक ऐसा माध्यम है,
जिसके जरिए किसी देश की भौगोलिक सीमाएं आड़े नहीं आती,
बल्कि अमेरिका में बैठे-बैठे कोई व्यक्ति किसी भी देश की
सामान्य सूचना और वहां से प्रकाशित अखबारों को वेबसाइट पर देख-पढ़ सकता है। इसने
सूचना और खबर के साथ-साथ जीवन को भी एक छत के नीचे ला खड़ा किया। अमेरिका हो या
भारत किसी देश की खबर, सूचना जीवन आदि के लिए कहीं
भटकने की जरूरत नहीं पड़ती है। सूचना प्रौद्योगिकी की दुनिया में इस तकनीक ने
विश्व के लोगों को जितना करीब ला दिया है, उतना करीब
शायद ही किसी अन्य तकनीक ने लाने का प्रयास किया हो?
इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वेबसाइट पर भारत में अगर कुछ डाला जाता है तो उसे
हजारों मील दूर बैठे किसी भी क्षेत्र में उसी क्षण देखा जा सकता है। ई-मेल का
पहले पहल प्रयोग 1972
में हुआ।
जहां तक वेब
पत्रकारिता की शुरूआत की बात है तो
1992 में वर्ल्ड वाइड वेब
जारी होने के बाद 1995 तक विश्व के यूजनेट पर करीब ढाई
हजार समाचार ग्रुप छा गए। 1995 में चेन्नई से प्रकाशित
दैनिक अंग्रेजी पत्र 'हिंदू' ने
नेट संस्करण शुरू किया। इसी के साथ देशी वेब पत्रकारिता ने जोर पकड़ा और
1996 में 'टाइम्स ऑफ इंडिया'
और 'द हिन्दुस्तान टाइम्स'
ने अपना इंटरनेट संस्करण शुरू किया। और आज इनकी संख्या में
दिनों दिन बढ़ोत्तरी हो रही है। समाचार पत्र हो या टीवी-खबरिया चैनल या फिर
रेडिया, सभी वेब
पत्रकारिता में कूद पड़े हैं। सभी अपने-अपने वेबसाइट पर समाचार दे रहे हैं। आज
भारत में देशी-अंग्रेजी ऑनलाइन वेब पत्रकारिता और हिंदी ऑनलाइन वेब पत्रकारिता
का अपना एक अलग संसार कायम हो चुका है। लगभग सभी राष्ट्रीय और स्थानीय प्रमुख
समाचार पत्रों का अपना वेबसाइट है और वे ई-पेपर निकाल रहे हैं।
आंकड़े के
अनुसार पूरे विश्व में लगभग छह हजार समाचार पत्र इंटरनेट पर अपना संस्करण दे
रहे हैं। वेब पत्रकारिता के दौर में अंग्रेजी समाचारों के मामले में
'वाशिंगटन
पोस्ट', 'न्यूयार्क टाइम्स' और
'फाइनेंसियल टाइम्स' के नेट
संस्करण काफी चर्चित हैं। ये सभी वेबसाइट 1996 के
शुरूआती दौर में इंटरनेट पर आए थे। हालांकि भारत में इसकी पहुंच अभी व्यापक
नहीं हो पाया है। एक आंकड़े के अनुसार भारतत में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या
50 लाख से भी ज्यादा हो चुकी है। तेजी से देश के
ग्रामीण क्षेत्रों में कंप्यूटर लगाने का कार्य किया जा रहा है। फिर भी,
अभी रेडियो और दूरदर्शन की तरह इंटरनेट की पहुंच भारतीय
ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं के बराबर है। देश की आम जनता तक इंटरनेट की सुविधा
पहुंचे इस दिशा में राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की चिंता पिछले दिनों
23 मार्च को नई दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय ई-भागीदारी
सम्मेलन में साफ दिखी। राष्ट्रपति ने कहा कि सामाजिक,
आर्थिक असंतुलन को दूर करने के लिए इंटरनेट से संबंधित सेवा 'ब्रॉडबैंड'
सेवा भी लोगों तक पहुंचे और इसके इस्तेमाल को बढ़ावा देना जरूरी
है। डॉ. कलाम ने ब्रॉडबैण्ड नि:शुल्क उपलब्ध कराने की चर्चा करते हुए कहा कि
सरकार सड़कों पर जो राशि खर्च करती है,
उससे अधिक वह सामान पर शुल्कों व
लोगों की समृध्दि से हासिल कर लेती है। इंटरनेट एक ऐसा माध्यम बन चुका है जो
दूरदराज में बैठा व्यक्ति दुनिया को एक जगह सिमटा लेता है। सूचना के इस
महासमुंद्र के पास हर लोगों को पास लाना होगा। राष्ट्रपति ने जो बात कही उसे
अमली जामा पहना कर इस क्रांति से लोगों को खासकर ग्रामीण जनता को जोड़ कर विकास
की धारा को और तेज किया जा सकता है।
यह सच है कि
शहरी क्षेत्र तो इंटरनेट का फायदा उठा रहा है। विदेशों की तरह भारत में वेब
पत्रकारिता विकास तो कर रहा है लेकिन कई समस्याओं की वजह से यह आम नहीं हो पा
रहा है। सबसे बड़ी वजह यह है कि इसके लिए एक अदद कंप्यूटर और इंटरेट की सुविधा
जरूरी है। इन पर अच्छी खासी लागत आती है। जैसा कि भारत की जनसंख्या का एक बड़ा
हिस्सा गांव में रहता है। शहरी बाजार की तुलना में ग्रामीण बाजार बहुत बड़ा है,
लेकिन गांवों के समुचित विकास आौ पिछड़ेपन की वजह से वहां का
आर्थिक संकट सबसे बड़ा कारण है। साथ ही भारत में बिजली की समस्या गंभीर है। इसकी
वजह से सायबर कैफे ठीक ढंग से कार्य नहीं कर पाते हैं और लोग इसका समुचित फायदा
नहीं उठा पाते। एक सरकारी आंकड़े के अनुसार वर्ष 2002
में एक पंजीकृत इंटरनेट कनेक्शन को
औसतन पांच लोग प्रयोग करते थे। हालांकि इसमें अब काफी बढ़ोतरी हुई है। सायबर
कैफे और व्यक्तिगत कंप्यूटर की मांग और संख्या तेजी से शहरी क्षेत्रों में बढ़ी
है। यही नहीं कस्बाई और छोटे शहरों में भी सायबर कैफे खुलने से इंटरनेट की
पहुंच बढ़ गई है। फिर भी विदेशों की तुलना में यहां कम है।
वेब
पत्रकारिता का सबसे ज्यादा फायदा विदेशों में रहने वाले लोग उठा रहे हैं।
अमेरिका में बैठा बिहार के भागलपुर जिला निवासी अब भागलपुर की खबरों के लिए
चिंतित नहीं रहता है। वह जिले से प्रकाशित स्थाीय समाचार पत्रों को नेट पर ही
पढ़ लेता है। उसे अपनी खबर के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ती। अमेरिका में
छपने वाले पत्रों में दिल्ली की खबरें तो मिल जाती हैं लेकिन छोटे शहरों की
खबरें पढ़ने को नहीं मिलती। इसकी वजह यह है कि आज सभी पत्रों के स्थानीय संस्करण
छपने लगे हैं। पटना हो या लखनऊ या फिर भोपाल,
वहां से छपने वाले राष्ट्रीय
पत्रों का कई जिलों से प्रकाश हो रहा है। ऐसे में खबरें जिले तक ही सिमट कर रह
गई है। एक जिले से दूसरे जिले में रहने वाला कोई भी व्यक्ति अपने जिले की खबर
नहीं पढ़ पाता ह। इन हालात में वेब पत्रकारिता ने एक अच्छा माध्यम दिया है।
अंग्रेजी
ऑनलाइन वेब पत्रकारिता की शुरूआत हिंदी से पहले हुई। दरअसल,
हिंदी फॉन्ट की समस्या की वजह से हिंदी ऑनलाइन वेब पत्रकारिता
देरी से आई। हालांकि आज भी फॉन्ट की समस्या बरकरार है,
क्योंकि हिंदी ऑलाइन वेब पत्रों का अपना अलग-अलग पैकेट फॉन्ट है। सभी अलग-अलग
फॉन्टों में खुलते हैं, जिससे पाठकों को बहुत परेशानी
होती है। हालांकि अब लगभग सभी ई-अखबार अपने-अपने संस्करण के साथ डाउनलोड करने
के लिए फॉन्ट भी देने लगे हैं। 90 के दशक में प्रमुख
हिंदी दैनिकों नेन नेट संस्करण निकाल कर वेब पत्रकारिता में घुसपैठ की। मसलन,
1997 में 'दैनिक जागरण'
ने 'जागरणडॉटकॉम', 1998
में 'अमर उजाला'
ने 'अमरउजालाडॉटकॉम' 'दैनिक
भास्कर' ने 'भास्करडॉटकॉम',
1999 में 'वेबदुनियाडॉटकॉम',
2000 में 'प्रभात खबर'
ने 'प्रभातखबरडॉटकॉम'।
भारतीय समाचार पत्रों ने जो विकास वेब पत्रकारिता के क्षेत्र में किया,
वह साहित्यिक पत्रकारिता ने नहीं किया है। हालांकि कुछ चर्चित
साहित्यिक पत्रिकाओं का नेट संस्करण आने लगा है। इनमें चर्चित 'हंस'
पत्रिका 'हंसमंथलीडॉटकॉम'
और 'वर्तमान साहित्य'
का 'खबरएक्सप्रेसडॉटकॉम'
नेट पर है। जबकि अलग से वेब पर साहित्य को समर्पित साइटों में
'अभिव्यक्तिहिंदीडॉटओआरजी', 'अनुभूतिहिंदीओआरजी',
'हिंदीनेस्टडॉटकॉम', 'लिटरेटवर्ल्डडॉटकॉम'
आदि शामिल हैं। 'हंस'
और 'वर्तमान साहित्य'
अपने अंक को जहां नेट पर डालते हैं,
वहीं साहित्यिक साइटें,
साहित्य के विविध आयामों पर सामग्री
देते हैं।
आज अमूमन सभी राष्ट्रीय और स्थानीय समाचार पत्र वेब
पत्रकारिता में कूद चुके हैं और नेट पर अपने पत्रों का संस्करण निकाल रहे हैं।
हालांकि भारत ने वेब क्षेत्र में
पत्रकारिता अलग से काफी कम हो रही है सिर्फ गिने-चुने ही वेबसाइट इस क्षेत्र
में अलग से हैं। वहीं दैनिक पत्र अपने समाचार पत्रों के संस्करण को केवल नेट पर
छोड़ देते हैं। देखा जाए तो भारत में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जिस तरह
से स्वतंत्र नेटवर्क फैलाया है उस तरह से वेब पत्रकारिता का नेटवर्क नहीं है।
अगर अखबारों के संस्करण को थोड़ी देर के लिए छोड़ दिया जाए तो भारत में देशी वेब
पत्रकारिता नहीं के बराबर मिलेगा। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जो अपना नेट
संस्करण निकालते हैं वे अलग से इसकी व्यवस्था तक नहीं करते हैं। उनके पास वेब
पत्रों के लिए अलग से विभाग कार्य नहीं करता। इसकी सबसे बड़ी वजह शायद यह है कि
इससे अतिरिक्त आय नहीं के बराबर होती है। हालांकि कुछ साइटों ने अपने ई-अखबार
के लिए अलग से संवाददाता भी रखे हैं। वेब पत्रकारिता के लिए अलग से टीम नहीं
रहने से मौलिकता का भी अभाव रहताहै। खबरों में अपडेट का अभाव साफ दिखता है।
वैसे एक-आध साइटें हैं जो खबर अपडेट करने की दिशा
में सक्रिय हैं। वेब पत्रकारिता को व्यापक बनाने के लिए अलग से रिपोर्टर रख कर
ऑनलाइन रिपोर्ट फाइल करवाने की आवश्यकता है। साथ ही प्रिंट और इलेक्ट्रिॉनिक
मीडिया की तरह इसे अलग रखकर इसके विकास के प्रति जवाबदेह होना होगा। केवल
अखबारों के संस्करण नेट पर छोड़ने से काम नहीं चलेगा। वेब पत्रकारिता को स्थापित
करने के लिए इसकी अपनी दुनिया होनी चाहिए ताकि यह अपनी मौलिकता के साथ पहचानी
जाए।
खैर जो भी हो,
आने वाले दिनों में वेब
पत्रकारिता निश्चित तौर पर वह मुकाम पाएगा जो प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने
पाया है। तेजी से बड़े शहरों से होता हुआ छोटे शहरों और अब कस्बा-ग्रामीण
क्षेत्रों में पैर पसार रहा है।
लेखक आकाशवाणी,
पटना में सहायक समाचार
संपादक हैं
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