Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 4, जून - अगस्त, 2007)

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आवरण कथा

 

 

इंटरनेट पर हिंदी पत्रकारिता

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ललित कुमार

 

 

आरम्भ और विकास

इंटरनेट आज हमारी जीवनचर्या का एक अभिन्न अंग बन चुका है। यदि बहुत से लोग इसे आधुनिक विश्व का आश्चार्य कहते हैं -तो कुछ गलत नही है। इंटरनैट के उद्भव से पहले सूचना प्रबन्धनप्रसार और विनिमय कभी भी इतना सरल और तीव्र नहीं था जितना कि आज है। इस तकनीक ने मानव समाज की रुपरेखा को भी काफ़ी हद तक प्रभावित किया है और इसमें संदेह नहीं कि आने वाले दिनो में इसका प्रयोग और महत्व केवल आगे की ही ओर बढेगा।

 

इंटरनैट को नेटवर्कों का नेटवर्क भी कहा जाता है। यह आपस में जुडे हुए कम्प्यूटरों का एक अति विशाल संग्रह है। इसी जुडाव के कारण इस संग्रह में सूचना बहुतायत और तीव्र गति से विनियमित की जा सकती है। कम्प्यूटर शुरुआत से ही अंग्रेज़ी भाषा में काम करते आये हैं और बहुत समय तक इंटरनैट पर केवल अंग्रेज़ी में ही जानकारी उपलब्ध थी। फिर धीरे-धीरे रोमन लिपि पर आधारित दूसरी भाषाओं जैसे कि फ़्रेंच, इटैलियन और स्पैनिश इत्यादि में भी काफ़ी सूचना इंटरनैट पर एकत्रित होने लगी। इस बदलाव का मूल कारण यह था कि समान लिपि होने के कारण अंग्रेज़ी कीबोर्ड की सहायता से ही इन दूसरी भाषाओं में भी लिखा जा सकता था। परन्तु कीबोर्ड, सॉफ़्टवेयर और मानकों के अभाव में गैर-रोमन लिपीय भाषाएँ इंटरनैट से दूर ही रहीं। जो लोग अंग्रेज़ी नहीं जानते थी पर अंग्रेज़ी वर्णमाला की समझ रखते थे -उन्होनें इंटरनैट पर रोमन अक्षरों का प्रयोग करते हुए अपनी भाषा में लिखना शुरु किया। हिन्दी में इस तरीके के प्रयोग को "रोमन हिन्दी" में लिखना कहा जाने लगा। लेकिन बिना अपनी लिपि के हर भाषा अधूरी ही लगती है। सो इंटरनेट पर गैर-रोमन भाषाओं में उपलब्ध सूचना में कोई ख़ास इज़ाफ़ा नहीं हुआ।  और इसी कारण उन देशों में जहाँ अंग्रेज़ी का ज्ञान रखने वाले लोग बहुत कम थे इंटरनैट का प्रयोग और फैलाव भी धीमा पड़ गया।

 

जल्दी ही लोगो का ध्यान इस समस्या पर गया और फिर यूनिकोड का विकास हुआ। यूनिकोड एक ऐसा मानक है जिसकी सहायता से किसी भी लिपि में कम्प्यूटर पर लिखा और पढा़ जा सकता था। धीरे-धीरे ऐसे सॉफ़्टवेयर भी उन्नत कर लिये गये जो यूनिकोड का प्रयोग कर गैर-रोमन लिपियों में कम्प्यूटर पर टंकण संभव बनाते थे। इंटरनैट का प्रसार तो तेज़ी से हो ही रहा था और रोज़ इसे नये प्रयोक्ता मिल रहे थे। इन सब घटनाओं ने गैर-अंग्रेज़ी भाषी लोगो को बहुत प्रोत्साहित किया और इंटरनेट पर अलग-अलग लिपियों में सूचना की बाढ सी आ गयी। हालांकि आज भी अंग्रेज़ी ही इंटरनैट की मुख्य भाषा है परन्तु अब दूसरी भाषाओ का विकास भी इंटरनेट पर तेज़ी से हो रहा है।

 

इंटरनैट पर हिन्दी का वर्तमान

आज हिन्दी भाषा इंटरनेट पर मज़बूती से अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा चुकी है। जिन गैर-रोमन भाषाओं में इंटरनेट पर सर्वाधिक सामग्री उपलब्ध है -उनमें हिन्दी का स्थान काफ़ी ऊपर है। इंटरनेट पर हिन्दी का विकास तेज़ी से हो रहा है लेकिन अभी हिन्दी को बहुत लम्बा सफ़र तय करना बाकी है। सौ करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाले देश की राष्ट्रभाषा का जो स्थान इंटरनेट पर होना चाहिये वो अभी भी हिन्दी को नहीं मिल पाया है। परन्तु भविष्य निस्संदेह उज्जवल है।

 

इंटरनेट पर हिन्दी में कई प्रकार के जालस्थल उन्नत कर लिये गये हैं और नित नये हिन्दी जालस्थल अस्तित्व में आ रहे हैं। इनमें से बहुत से ऐसे जालस्थल हैं जो लोगों को पत्रकारिता करने और मत-प्रकटन में सहायता करते हैं। आईये ऐसे ही कुछ जालस्थलों के बारे में जानते हैं:

 

ब्लॉग्स और पत्रकारिता

ब्लॉग ऐसा जालस्थल होता है जो किसी व्यक्ति-विशेष द्वारा मनवांछित सूचना लोगों तक पहुंचाने के लिये बनाया जाता है। अपनी मूल परिकल्पना में ब्लॉग एक व्यक्तिगत डायरी की भांति होता है जिसे इंटरनैट पर कोई भी पढ सकता है। लेकिन आजकल ब्लॉग्स केवल निजी डायरी न रह कर पत्रकारिता तक का साधन बन चुके हैं। हिन्दी भाषी लोग अपने अपने ब्लॉग्स पर विभिन्न प्रकार की सूचनाएँ विश्व के साथ बाँटते हैं। व्यक्तिगत अभिरुचि के अनुसार संचालित होने के कारण विभिन्न ब्लॉग्स में विभिन्न प्रकार की सूचना मिल जाती है। ब्लॉग्स का प्रयोग बहुत से लोग सामाजिक, आर्थिक, राष्ट्रिय, अन्तर्राष्ट्रीय इत्यादि मुद्दों पर अपना मत प्रकट करने के लिये भी करते हैं। दिन प्रतिदिन इस मत का महत्व बढ रहा है और कुछ हद तक ब्लॉग्स को वैकल्पिक मीडिया के रूप में भी देखा जाने लगा है। ब्लॉग्स के ज़रिये आम आदमी आसानी से अपनी आवाज़ और अपना मत दूसरे लोगो तक पहुँचा सकता है।

 

इंटरनैट पर हिन्दी पत्रिकाएँ

हिन्दी भाषा की कई सुस्थापित पत्रिकाएँ अब इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं। इनमें से कई तो ऐसी हैं जिनका कोई प्रिंट संस्करण नहीं निकलता और ये केवल इंटरनैट के ज़रिये लोगो तक पहुँचती हैं। यहाँ विचार करने का विषय यह है कि अधिकांश ऐसी पत्रिकाएँ हिन्दी साहित्य से सम्बंधित है। दूसरे क्षेत्रो जैसे कि विज्ञान, राजनीति, इतिहास, खेल आदि से विशेषरूप से सम्बंधित हिन्दी पत्रिकाएँ इंटरनेट पर कम ही उपलब्ध हैं। हमें आशा और प्रयत्न करना चाहिये कि जल्द ही और नये विषयों पर भी हिन्दी पत्रिकाएँ इंटरनैट पर पहुँचे। जो पत्रिकाएँ अभी इंटरनैट पर उपलब्ध हैं -उनमें लोग अपना योगदान करते हैं और अपनी रचनाएँ, लेख इत्यादि प्रकाशित करवाते हैं। प्रिंट माध्यम के मुकाबिले इंटरनैट पर प्रकाशन आसान भी होता है और कम खर्चीला भी। इसलिये भी प्रकाशकों और रचनाकारों का रुझान इंटरनैट पर हिन्दी पत्रिकाओं की तरफ़ बढा है।

 

समाचार पत्र

बहुत से हिन्दी समाचार पत्रों के जालस्थल संस्करण अब उपलब्ध हो चुके हैं। ना केवल ये जालस्थल प्रिंट माध्यम से तीव्रतर परिवर्धित होते हैं बल्कि इनके ज़रिये लोग अपना रचनात्मक योगदान भी अधिक आसानी से दे सकते हैं। हिन्दी समाचार पत्रों के इंटरनेट संस्करण भारत से बाहर बसे हिन्दी-भाषी लोगों के लिये भारत में हो रही गतिविधियों की सूचना पाने का एक प्रमुख साधन बन गये हैं।

 

सामुदायिक जालस्थल

अब धीरे-धीरे इंटरनैट पर सामुदायिक जालस्थल भी हिन्दी में विकसित होने लगे हैं। ये ऐसे जालस्थल होते हैं जहाँ बहुत से लोग इंटरनैट पर इकठ्ठे हो कर किसी विषय विशेष पर चर्चा करते हैं और अपने मत, सुझाव, शिकायतें, प्रश्न और उत्तर एक दूसरे के साथ बाँटते हैं। ये जालस्थल भी जनमत-निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे बहुत से जालस्थल याहू ग्रुप्स और ओरकुट जैसी साइट्स पर उपलब्ध हैं।

 

 हिन्दी मीडिया के लिये इंटरनेट का महत्व

जैसा कि ऊपर हमनें देखा कि इंटरनेट बहुत सी ऐसी सेवाएँ प्रदान करता है जिनके ज़रिये आम-आदमी भी अपनी रूचि और मत को न केवल प्रकट कर सकता है बल्कि उसे दूसरे असंख्य लोगो तक पहुँचा भी सकता है। आज अपनी आवाज़ बुलन्द करने के लिये लोग केवल प्रिंट माध्यम में प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों और पत्रिकाओं पर ही निर्भर नहीं हैं। वैसे भी प्रिंट माध्यम में स्थानाभाव के कारण हर किसी की बात को शामिल नहीं जा सकता। इसी कारण इंटरनेट की सेवाओं, इस पर उपलब्ध असीम स्थान और इसकी वैश्विक पहुंच को लोगो ने हाथों हाथ लिया है। रोज़ाना नये लोग इंटरनेट से जुड कर सूचना का आदान-प्रदान कर रहें हैं। ऐसे में हिन्दी प्रिंट तथा इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिये भी इंटरनैट का महत्व और भी बढ जाता है। इंटरनेट अब आम जनमत की झलक पाने का साधन भी बन गया है -सो यह प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडियाकर्मियों के लिये समाज की नब्ज़ टटोलने का एक अच्छा साधन साबित होने लगा है।

 

इंटरनेट के महत्व के बारे में जितना लिखा जाये उतना कम है। इस माध्यम ने सूचना-प्रसार में जैसी क्रांति पैदा की है  वैसा कोई दूसरा उदाहरण इतिहास में नहीं मिलता। लोगो के हिन्दी के प्रति लगाव और इंटरनेट पर इसके विकास के लिये कटिबद्ध होने को देखकर बहुत हर्ष होता है। यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि हिन्दी जल्द ही इंटरनेट पर वो ऊँचा स्थान प्राप्त कर लेगी जिसकी यह भाषा अधिकारी है।

लेखक विश्व हिंदी कविता कोश नामक साइट के संचालक हैं

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

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