चुनौती या
मात्र टेक्नोलॉजी अवदान?
-------------------------------------
कृष्णचंद्र मौलि
भारत में शिक्षा प्रसार की जो रफ्तार है,
आर्थिक उन्नति की जो दशा है और यथास्थितिवाद के पोषक और समर्थक
कहलाए जाने में गौरव महसूस करने वाला शिक्षित समाज का जो एक प्रभावी वर्ग है,
उन्हें दृष्टिगत रखकर बड़ी आसानी से यह माना जा सकता है कि भारत
में वेब पत्रकारिता परम्परागत मुद्रण पत्रकारिता के लिए कम से कम अगले आधे शतक
तक तो चुनौती खड़ी नहीं कर सकती। इसके लिए कोई शोध या सर्वेक्षण की जरूरत नहीं
है। वेब पत्रकारिता के समर्थक और वेब पत्रकारिता को मीडिया के क्षेत्र में
क्रांति के रूप में देखने वालों को यह बात भले ही निराशावादी या परंपरावादी
लगती हो परन्तु सच तो यही है। इस प्रसंग में एक प्रख्यात अमरीकी लेखक डेविड
रेनार्ड के इस अनुमान कि अमरीका और यूरोप जैसे शिक्षित और सम्पन्न देशों में भी
वेब पत्रकारिता को मुद्रण पत्रकारिता (समाचार पत्र-पत्रिकाएं) की चुनौती के रूप
में स्थापित करने में कम से कम अभी 25 वर्ष और लग सकते
हैं - को मानें तो भारत ही क्यों समूचे एशिया में वेब पत्रकारिता को वह स्थान
प्राप्त करने में पचास वर्ष से भी अधिक समय लगना कोई अतिशयोक्ति नहीं हो सकती।
डेविड रेनार्ड के ही अनुसार दस प्रतिशत प्रिंट जर्नलिजम (मुद्रण पत्रकारिता)
फिर भी समाज के उस वर्ग के बीच में प्रभावी तरीके से न केवल जीवित ही रहेगा
बल्कि फलता-फूलता भी रहेगा। रेनार्ड का मानना है कि समूचे विश्व में मुद्रण
पत्रकारिता को एक वैभवशाली अतीत, एक गौरवमयी परंपरा,
एक अनिवार्य जीवंत सूचना
माध्यम और एक संदर्भ अभिलेख के रूप में परिपोषण करने वालों की संख्या सदैव
रहेगी तथा निरंतर बढ़ती भी रहेगी।
इस परिप्रेक्ष्य में यहां कुछ अध्ययन और सर्वेक्षणों के निष्कर्ष भी काफी
दिलचस्प हैं। भारत में ऑन लाइन समाचार पत्र वाचन आदतों पर पुणे विश्वविद्यालय
के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के एक
प्रोजेक्ट के अंतर्गत किए गए लघु शोघ एवं सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष निकला कि
अंग्रेजी वेब समाचार पत्रों के वाचन करने वाले प्रत्येक तीन व्यक्तियों में से
दो व्यक्ति भारत में ही निवास करते हैं। यह निष्कर्ष इस भ्रम को झुठलाता है कि
अंग्रेजी समाचार पत्रों में वे एडिशन्स का वाचन केवल विदेशों में रहने वाले
भारतीय ही ज्यादा करते हैं। अभी आठ वर्ष पूर्व यह स्थिति भिन्न थी। एक और
दिलचस्प बात इस शोध से उभरकर आई है। वेब समाचार पत्र को पढ़ने वाले न संपादकीय
पढ़ते हैं,
न लेख न विकास समाचार और ना ही खेल और मनोरंजन। वे तो व्यापार,
राजनीति और विज्ञापन संबंधी वेब पृष्ठों को पढ़ते हैं। उन्हें
किसी विषय पर संदर्भ खोजना हो तो वे प्रिंट का ही सहारा लेते हैं। केवल तीन
प्रतिशत युवा वर्ग ही अत्याधिक वाचित माने जाने वाले मेट्रिमोनियल कालम को
देखता है। एक डिजिटल पब्लिशिंग तकनालाजी कंपनी का मानना है कि जैसे जनसंपर्क
कर्म सोशल मार्केटिंग का रूप लेता जा रहा है वैसे ही वेब पब्लिशिंग व्यापारिक न
होकर सामाजिक पब्लिशिंग का रूप ले लेगा। यह परिवर्तन पारंपरिक पब्लिशरों के लिए
भी लाभदायक रहेगा क्योंकि यह एक अवसर प्रदान करता है कि विषय वस्तु और लक्ष्य
समूह के बीच नीडी (Neady)
और केटरर (Caterer)
का सामंजस्य स्थापित होगा जो वेब पब्लिशिंग को अधिक लोकप्रिय बनाएगा। स्वाभाविक
ही है कि ऐसे वेब साइट को सामग्री और विज्ञापन प्रचुर मात्रा में मिलने लगेंगे
और प्रेक्षक संख्या में निरंतर वृध्दि होगी।
वेब समाचार पत्र में क्रांतिकारी अन्वेषण निरंतर जारी है। पिछले वर्ष ही सानी
ने ई-बुक (वेब पुस्तक) को मार्केट में लांच किया। जापान की फुजिन्सू कंपनी ने
वर्ष
2008 तक रंगीन ई-पेपर लांच
करने की योजना बनाई है। यह ई-पेपर तोड़ा-मरोड़ा तो नहीं जा सकता परन्तु पाकेट
नोटबुक साइज के इस पेपर पर आवश्यक जानकारी डाउन लोड कर साथ में रखी जा सकती है
और निरंतर अपडेट भी की जाती रह सकती है। विज्ञापन जगत में शायद ई-पेपर की अधिक
उपयोगिता होगी साथ ही वेब पत्रकारिता को अधिक भागीदारी लक्षित भी बनाना पड़ेगा।
यदि कोई साइट वेब रीडर द्वारा नहीं क्लिक किया (देखा) जा रही है तो मान लिया
जाना चाहिए कि वेब साइट पर परोसी जा रही सामग्री,
विज्ञापन आदि बिलकुल ही रोचक, आकर्षक और उपयोगी नहीं
है। वेब में एकांगी यातायात नहीं चल सकता। संयोगवश सफल संचार का भी यही
सिध्दांत है। वेब पत्रकारिता में निहित इन सब विशेषताओं के बावजूद यह प्रश्
अनुत्तरित रह जाता है कि क्या वेब पत्रकारिता पारंपरिक पत्रकारिता के लिए
चुनौती बन सकती है? यही सवाल आकाशवाणी और रेडियो न्यूज
चैनलों की लोकप्रियता के दौर में और दूरदर्शन तथा टीवी चैनलों के विस्तार के
दौर में भी बार-बार उठता रहा है,
उत्तर सबके सामने है। समाचार पत्रों
में अपेक्षानुसार कमी आने की बजाय कई गुना वृध्दि हुई है। आज भी किसी प्रसंग
में प्रमाणित स्रोत या संदर्भ का उल्लेख करना हो तो समाचार पत्र का ही उल्लेख
किया जाता है। किसी चैनल का नहीं। विश्वसनीय अभिलेख की हैसियत आज भी समाचार
पत्रों का ही है क्योंकि ऑडियो-वीडियो फिल्मस की तरह मुद्रित समाचार या मुद्रित
जानकारी का डक्टरिंग नहीं हो सकता। डाक्टर्ड ऑडियो-वीडिओ फिल्म सामग्री आम बात
है।
इसी बीच चिकित्सा क्षेत्र में कार्य कर रहे एक एनजीओ ने आडियन्स सर्वेक्षण कर
निम् सनसनीखेज निष्कर्ष निकाला है आडियन्स वेब पत्रिका को मुद्रित समाचार पत्र
जैसे निरंतर पढ़ने में आंखों और मस्तिष्कक पर स्ट्रेस पड़ता है। लगातार
इलेक्ट्रॉनिक से आंखों को नुकसान पहुंच सकता है। जितनी बार वेब पर संदर्भ देखना
है उतनी बार साइट क्लिक तो करना ही पड़ेगा जबकि मुद्रित समाचार पत्र आंखों के
सामने बार-बार देखने के लिए सरलता से उपलब्ध रहता है। वेब साइट पर एक खास
मुद्रा में लगातार समाचार,
लेख आदि सामग्री देखते रहने से मस्तिष्क और गरदन से जुड़ी तकलीफ
जैसे स्पान्डी लाइटिस, माइग्रेन आदि भी हो सकती है।
मनुष्य का स्वभाव है कि हर नए आविष्कार पर वह फूला नहीं समाता है और खुद से तथा
समाज से प्रश् करने लगता है कि नए आविष्कार से क्या परंपरा नष्ट हो जाएगी। ऐसा
होता नहीं है। परंपरा और आधुनिकता का हमेशा चोली-दामन का साथ रहेगा। जीवन के
किसी भी मामले को उदाहरण के तौर पर ले लें, यही शाश्वत
तथ्य है। ऐसे में वेब पत्रकारिता की आधुनिक तकनालाजी इस तथ्य से अलग कैसे हो
सकती है। हर नए आविष्कार का एक दौर भी होता है। और एक अंतिम चरण (Situration
Stage) भी
होता है। यही बात वेब पत्रकारिता पर भी लागू होती है। यह संभव है कि वेब
पत्रकारिता के दौर में परंपरागत पत्रकारों-एडीटर,
रिपोर्टर, विशेष संवाददाता,
अग्रलेखक आदि तो महत्व को
नहीं घटेगा परन्तु उनके इर्द-गिर्द का आभा मंडल क्षीण हो जाएगा और उन्हें
विशिष्ट व्यक्तियों के रूप में देखने वालों की संख्या में कमी आएगी।
अंतत: हमें यह मान लेने में कोई विवाद नहीं है कि परंपरागत पत्रकारिता का अपना
स्थान और महत्व है ऐसा ही वेब पत्रकारिता का भी अपना स्थान और महत्व है। दोनों
के कार्यक्षेत्र और लक्ष्य समूह अलग हैं। यदि मुद्रण पत्रकारिता शास्त्रीय
संगीत है तो वेब पत्रकारिता आधुनिक संगीत है। इन दोनों की न तुलना की जा सकती
है और न प्रतिस्पर्धा। अत: वेब पत्रकारिता परंपरागत पत्रकारिता के लिए कोई
चुनौती नहीं हो सकती है। अलबत्ता वह एक तकनालाजी अवदान अवश्य है जो परंपरागत
पत्रकारिता को संभवत: लोकप्रियता के मंच पर तकनालाजी की सहायता से एक खास
लक्ष्य समूह तक पहुंचाने की महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
संपर्कः माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि, भोपाल मध्यप्रदेश

lll