वेब-पत्रकारिता, ब्लॉग
और पत्रकार
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जयप्रकाश मानस
ब्लॉग(Blog)
इंटरनेट पर केवल निजी अभिव्यक्ति या स्वयं को अभिव्यक्त करने या भड़ास उतारने
मात्र का स्वतंत्र साधन नहीं रहा वह धीरे-धीरे सायबर जर्नलिज्म या ऑनलाइन
जर्नलिज्म या इंटरनेट जर्नलिज्म का शक्ल भी धारण करने लगा है । चाहे इसे एक ही
व्यक्ति या पत्रकार द्वारा संचालित किया जाय या फिर समूह में । जिस तरह विभिन्न
स्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाले संवाददाताओं की टीम के सहयोग से किसी अखबार
का प्रकाशन किया जाता है ठीक उसी तरह भी ब्लॉगों का संचालन संभव है । विश्व की
विभिन्न आईटी आधारित कंपनियों द्वारा मुफ्त उपलब्ध ब्लाग सुविधा एवं समानधर्मा
किन्तु न्यूनतम –
वांछित तकनीक में दक्ष पत्रकारों के द्वारा भी किसी ऑनलाइन अखबार का संचालन अब
संभव हो चुका है । यद्यपि ब्लॉग लेखन या ब्लॉगिंग की मूल प्रकृति निहायत
व्यक्तिवादी है जहाँ कोई भी अपने विचार, भाव, मन का उमड़न-घुमड़न लिख कर उसे
विश्वव्यापी बना सकता है, बकायदा उस पर वैश्विक प्रतिक्रिया भी प्राप्त कर सकता
है तथापि इस तकनीक का फायदा उठाकर वहाँ अखबार के नेट संस्करण की तरह सामूहिक
लेखन भी किया जा सकता है, वह भी प्रोफेशनल पत्रकारों की तरह । कहने का आशय है
कि ब्लॉगिंग पत्रकारिता जैसे सामूहिक बोध का ज़रिया भी बन सकता है ।
ऑनलाइन
पत्रकारिता के प्रकल्प के रूप में ब्लॉग तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता है -
सामूहिक अभिव्यक्ति का माध्यम अर्थात् समूह बोध यानी कि प्रजातांत्रिक
पत्रकारिता जहाँ लिखने वाले और बाँचने वाले के मध्य किसी तरह की कोई दलाली
नहीं। एक तरह से यह अभिव्यक्ति, सूचना, संचार और जानकारी का स्वतंत्र और
मर्यादित माध्यम सिद्ध हो सकता है जहाँ नियमित लिखने वाले सूचनादाता या
संवाददाता या पत्रकारों को न तो अखबार-प्रबंधन के निहित स्वार्थों और
पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ सकता है और न ही वहाँ अभिव्यक्त होने वाले
पत्रकारों को मिठलबरे संपादक की धारदार कैंची के सामना करने से उत्पन्न कुंठा
और मानसिक तनाव झेलने की विवशता। आत्मानुशासन और पूर्व लक्ष्यित उद्देश्यों और
शर्तों के सामूहिक अनुपालन से यह प्रबंधक की निरकुंशता मुक्त पत्रकारिता भी बन
सकता है । प्रकारांतर से यह बाजारवादी दबाबों का काट और मीडिया में संपादक नामक
(पत्रकार सहित) संस्था की वापसी की शुरूआत भी सिद्ध हो सकती है ।
जैसे-जैसे-जैसे देश में इंटरनेट, बिजली, तकनीकी ज्ञान और पाठकों का रूझान
स्वस्थ और निहायत तटस्थ पत्रकारिता की ओर उन्मुख होता चला जायेगा वैसे-वैसे
ब्लॉग आधारित पत्रकारिता भी विश्वसनीयता के नये प्रतिमान गढ़ सकती है । संक्षेप
में कहें तो यह अंतरजाल पर यानी वेब-पत्रकारिता का सहकारी उद्यम हो सकता है ।
परस्पर विश्वास से इसे समाचार या फीचर सर्विस की एंजेसी की तरह भी संचालित किया
जा सकता है ।
जैसा
कि हम जानते हैं ब्लॉग संचालन के लिए किसी डोमेन रजिस्टर कराने, वेब-स्पेस
खरीदने की कोई आवश्यकता नहीं होती, सामूहिक ब्लॉग लेखन यानी ब्लॉग आधारित
आनलाइन पत्रकारिता भी शून्य बजट से प्रारंभ की जा सकती है । बशर्ते की इस तरह
की ऑनलाइन पत्रकारिता के लिए कटिबद्ध सभी पत्रकार, संवाददाता या लेखक
यूनिकोड़ित फोंट केंद्रित टायपिंग कार्य जानते हों और ब्लॉगिंग की न्यूतम और
वांछित तकनीक से भली भाँति परिचित हों । इसके अलावा उन सभी के पास पर्याप्त गति
वाली इंटरनेट सुविधा भी हो तो सहकारी वेब-पत्र या पत्रिका संचालन में उन्हें
कोई अड़चन नहीं हो सकती भले ही उस समूह के सदस्य किसी अंचल के हो या किसी दूर
महाद्वीप से । यहाँ तक कि मुद्रित अखबार की तरह उसे आरएनआई (RNI)
से पंजीयन और नियमित रूप से शासकीय नियमों के पालन में सरकारी दफ्तरों के चक्कर
लगाने की भी कोई आवश्यकता नहीं होगी ।
व्यावसायिक
वेब पोर्टल बनाम ब्लॉग पत्रकारिता
कंटेट
और तकनीकी रूप से यूँ तो बड़े घरानों की पत्रकारिता केंद्रित वेब पोर्टल ब्लॉग
के सामने ठीक वैसे नज़र आते हैं जैसे चूहे के सामने हाथी । ऐसे वेब पोर्टलों
में नियमित रूप से काम करने वाली एक प्रोफेशनल्स टीम होती है जो दैनिक या
प्रतिघंटे वेब पोर्टलों को अपडेट करती रहती है । वहाँ ई-संस्करण संचालन की
सुविधा भी होती है । ऐसे साइट कलात्मक ढंग से अधिक सौंदर्यबोधी हुआ करती हैं ।
उनका अपना स्पष्ट आर्थिक तंत्र भी होता है । फिर भी सामग्री की नियमित उपलब्धता
की दृष्टि से यदि ऐसे सामूहिक ब्लाग को भी सहकारिता और समूह के सदस्यों के
द्वारा सुनिश्चित अनुशासन की परिधि से संचालित किया जाय तो कोई दो मत नहीं कि
वहाँ पाठकों का जमावड़ा न हो, लोग उस ब्लॉग पर न जायें या वह विश्वसनीय जाल
स्थल न बन सके । अब ब्लॉगों के रूप में भी काफी परिवर्तन और उनका विकास हो चुका
है । ऐसे ब्लॉगों पर टैक्स्ट के साथ ही फोटो, आडियो, वीडियो आदि भी सजाया जा
सकता है । आम वेब पोर्टलों और समाचार पत्रों से हटकर यदि कंटेट की मौलिकता,
रोचकता, उत्कृष्टता और विश्वसनीयता पर ध्यानस्थ हुआ जा सके तो संभव है कि कई
मायने में ऐसे सहकारी ब्लाग ज्यादा लोकप्रिय भी हो सकते हैं बनिस्पत किसी
सामान्य नेट अखबार के । ऐसे विश्वसनीय ब्लॉगों की बहुतायत का एक ऑनलाइन
पत्रकारिता के माध्यम से उस मिशन की पुनर्वापसी भी संभव हो सकती है जो
पत्रकारिता की मूल आत्मा है । वह दिन दूर नहीं जब भारत में भी बिलकुल पश्चिम
दुनिया की तरह यानी कि अंग्रेजी पत्रकारिता की तरह अभिव्यक्ति के चरम उदात्त
मूल्यों को स्थापित होते देखा जा सकेगा । तब आज की तरह पत्रकारिता का ध्येय
व्यवसायिकता नहीं बल्कि सेवा कर्म ही होगा तथा जहाँ हर नागरिक एक पत्रकार की
तरह अपनी आवाज़ सारी दुनिया में पहुँचा सकेगा । और यदि यह हुआ तो उसमें ऐसे
ब्लॉगों की भूमिका सर्वोपरि साबित होगी क्योंकि तब प्रसिद्ध वेब पत्र या पोर्टल
के या उसके संवाददाता का मुँह भी ताकना नहीं पडेगा और पलक झलकते ही किसी चित
–परिचित
ब्लॉग केंद्रित मीडियामैन के माध्यम से अपनी आवाज़ बुलंद किया जा सकेगा । इतना
ही नहीं, एकला चलो रे की शैली में स्वयं एक अकेला ब्लॉगर भी अपने ब्लॉग के
माध्यम से दुष्यंत की तरह गा उठेगा-
कौन कहता है
कि आसमान में सूराख नही हो सकता
तबियत से एक
पत्थर उछालो तो यारो ।
ब्लॉग, पत्रकार और पत्र-पत्रिकाएं
ब्लॉग
तकनीक के विकसित होने से भाषायी चिट्ठाकारिता के साथ-साथ पत्रकारिता की नई
दिशाएं खुलने लगी हैं । इधर भारतीय भाषाओं में काम करने की आवश्यक सुविधा से
ऑनलाइन पत्रकारिता में प्रिंट मीडिया के अनुभवी पत्रकार सहित नये-नये लोग या
गैर पत्रकार भी नज़र आने लगे हैं । वैसे भारत में और खास कर हिंदी में ब्लॉग
प्रौद्योगिकी केंद्रित ऑनलाइन पत्रकारिता का यह निहायत प्रारंभिक दौर है फिर भी
इंटरनेट पर मौजूद इस श्रृंखला को देखने से नया विश्वास भी मन पर उमगता है । इस
श्रृंखला में कुछ उन लोकप्रिय ब्लॉगों की चर्चा प्रासंगिक होगी, जिन्हें
विशुद्ध रूप से ऑनलाइन पत्रकारिता की श्रेणी में रखा जाना चाहिए
–
www.rachnakar.blogspot.com
रवि रतलामी
मूलतः इंजीनियर और इंटरनेट विशेषज्ञ हैं और ब्लॉग को भारतीय पृष्ठभूमि में
लोकप्रिय बनाने वालों में से एक और अतिसक्रिय ब्लॉगर हैं । रचनाकार नामक उनका
ब्लॉग वेब-पत्र की तरह ही विगत कई वर्षों से संचालित है तथा जिसे माइक्रोसॉफ्ट
जैसे विश्वस्तरीय कंपनी का विशिष्ट पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है । इस
जाल-स्थल पर प्रतिदिन कला, साहित्य, संस्कृति, इंटरनेट, नयी तकनीक, की जानकारी
दी जाती है । यद्यपि वे इसे अकेले संचालित करते हैं किन्तु यह उन सभी लोगों को
समर्थन देता है जो अंतरजाल पर लेखन में दक्ष नहीं हैं ।
www.kalpana.it/hindi/blog/
सुनील दीपक का
जो कह न सके
जैसे जाल-स्थल
को वेब-पत्रकारिता का खास उदाहरण माना जा सकता है । वैसे वे छायाचित्रकार (www.kalpana.it/photo/blog/)
नाम से एक फोटो ब्लॉग भी नियमित रचते हैं जो मूलतः विदेशी भूगोल पर अभिकेंद्रित
फोटो पत्रकारिता पर केंद्रित है ।
www.malwa.wordpress.com/
जैसा कि डोमेन
नेम से ही स्पष्ट है,
यहाँ मालवा
अंचल जैसे इदौर, धार, झाबुआ, खंड़वा खरगौन आदि क्षेत्रों के सभी प्रकार के
समाचार पढ़े जा सकते हैं । यह ब्लॉग पर निर्मित ऑनलाइन आंचलिक पत्रकारिता का एक
सशक्त मिसाल हो सकता है खासकर उन क्षेत्रों के पत्रकारों के लिए जो स्वतंत्र
रूप से पत्रकारिता करना चाहते हैं ।
www.wahmoney.blogspot.com
कमल शर्मा
मूलतः ऐसे पत्रकार हैं जो लंबे समय से पहले प्रिंट फिर वेबमीडिया से जुड़े रहे
हैं । मुंबई निवासी श्री कमल शर्मा फिलहाल इलेक्ट्रानिक टीवी एट्टीन इंडिया
लिमिटेड़ समूह की कमोडिटीज कंट्रोल डॉट कॉम के संपादक हैं और उसके अलावा वाह
मनी और
www.journalistkamal.blogspot.com
नामक ब्लॉग के
माध्यम से अपनी पत्रकारिता धर्म का निर्वहन विश्व में फैले हिंदी समूदाय के लिए
कर रहे हैं । इसमें से वाह मनी मुद्रा, बाजार, उद्योग और कार्पोरेट जगत् के
विश्लेषित समाचार के लिए लगातार अपनी पाठक संख्या बढ़ाता जा रहा है ।
www.sampadkmahoday.blogspot.com
वैसे तो यह
प्रत्यक्षतः पत्रकारिता पर केंद्रित नहीं है किन्तु यहाँ पत्रकारिता के
शीर्षस्थ पुरूषों जैसे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि पर लिखे गये शोध कृतियों को
हरिभूमि रायपुर के स्थानीय संपादक संजय द्विवेदी द्वारा संजोया जा रहा है । वे
बताते हैं कि भविष्य में उनके द्वारा विभिन्न अखबारों में समय-समय पर की गई खास
और महत्वपूर्ण शताधिक टिप्पणियों को भी सम्मिलित किया जा रहा है । इसे इस मायने
में पत्रकारों की नयी पीढ़ी और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण
जाल-स्थल कह सकते हैं ।
चंबल के दो ऑनलाइन अखबार
अंतरजाल पर इन दो ई-समाचार पत्रों को देख कर इतना तो कहा ही जा सकता है कि
कंप्यूटर और इंटरनेट की ब्लॉग प्रौद्योगिकी पत्रकारिता को अपने जीवन का लक्ष्य
मानने वालों को अपने प्रोफेशन में कम लागत और कम समय में सफल होना सिखा रही है
। ये दो ई-पत्र हैं –
चंबल की आवाज़ और राजपुत इंडिया। दोनों समाचार पत्र एमएसएन द्वारा संचालित माय
स्पेस में बनाये गये हैं । दोनों ही समाचार पत्र अपने अंचल के भ्रष्ट्राचारियों
की पोल खोल रहे हैं । सिर्फ इतना ही नहीं यहाँ विकास के साथ-साथ कला, साहित्य,
संस्कृति, व्यापार, राजनीति आदि सभी प्रकल्पों के समाचार प्रतिदिन प्रकाशित
होते हैं और बाकायदा ये समाचार इन क्षेत्रों ही नहीं बल्कि समूचे विश्व में पढे
जाते हैं । राजपुत इंडिया फरवरी 2005 से कारगर ढंग से संचालित है जबकि चंबल की
आवाज 2005 के जुलाई माह से संचालित हो रहा है । यदि आप चंबल की आवाज़ सुनना
चाहते हैं तो
http://chambal.spaces.live.com/
पर लॉग ऑन कर सकते हैं और राजपुत इंडिया के लिए
http://rajputaindia.spaces.live.com/
http://mohalla.blogspot.com/
यह एनडीटीव्ही
के पत्रकार अविनाश का हिंदी ब्लॉग है जिस पर कई विषयों के माहिर लोग नियमित रूप
से लिखते हैं ।
http://paryavaran-digest.blogspot.com/
यह
ब्लॉग की ही महिमा है जिसकी बदौलत 1987 से निरंतर प्रकाशित पर्यावरण पर पहली
राष्ट्रीय मासिक पत्रिका पर्यावरण डाइजेस्ट ऑनलाइन पढ़ी जा सकती है । जो रतलाम
के पर्यावरणविद् पत्रकार डॉ. खुशालसिंह पुरोहित के संपादन एवं रवि रतलामी के
तकनीकी सहयोग में प्रकाशित हो रही है ।
इसी तरह के
अन्य खास हिंदी ब्लॉगों में रवीश कुमार का कस्बा को शामिल किया जा सकता है
जिसका यूआरएल है -
http://naisadak.blogspot.com/
।
सृजन-सम्मान के पहल पर छत्तीसगढ़ में शुरू पहली ब्लागजीन- सृजनगाथा का जिक्र भी
आत्मप्रशंसा की बात नहीं होगी जिसे कई स्थानीय कवि- लेखक मिलकर संचालित करते
हैं तथा जिसे
www.srijansamman.blogspot.com
पर लॉग ऑन
किया जा सकता है । यह मूलतः छत्तीसगढ़ के हिंदी रचनाकारों का साहित्यिक जाल
स्थल ही है । सृजन-सम्मान की पहल पर शुरू हुई ई-छत्तीसगढ़ भी इलेक्ट्रानिक
पत्रकार जेड. कुरैशी द्वारा संचालित पत्रकारिता केंद्रित ब्लॉग है ।
http://merekavimitra.blogspot.com
वैसे तो इस श्रेणी में कई चिट्ठों को रखा जा सकता है किन्तु हिंदी युग्म
और चिट्ठा चर्चा
को सहकारी
चिट्ठों
का नायाब नमूना माना जा सकता है । हिंदी युग्म की विषय वस्तु इंजीनियरिंग के
छात्र शैलेष भारतवासी की मस्तिष्क की उपज है जहाँ नितांत नये और सीधे आनलाइन या
इंटरनेट पर पधारे कवियों की कविताये प्रकाशित हो रही हैं । एक तरह से यह युवा
कविता का घर है जहाँ प्रति माह सृजन-सम्मान द्वारा प्रतियोगिता के आधार पर सफल
रचनाकारों को उपहार में कृतियाँ भी भेंट की जा रही है । इन पंक्तियों का लेखक
भी माह भर में पोस्टिंग की गई कविताओं पर अपनी टिप्पणी देता है । इसके अलावा ये
कवि आपस में एक दूसरे की कविताओं पर टिप्पणी भी करके भी एक दूसरे को कविता कर्म
का पाठ देते हैं । चिट्ठा चर्चा का पता है -
http://chitthacharcha.blogspot.com
। इसे फिलहाल 19 लेखक मिलकर संचालित कर रहे हैं ।
यूँ तो हिंदी ब्लॉगिंग सहित ब्लॉग आधारित विशुद्ध पत्रकारिता प्रारंभिक दौर से
गुजर रहा है । उसे हम डॉट कॉम और ओआरजी जैसे व्यवसायिक पोर्टलों के मुकाबले आज
खड़े नहीं कर सकते । क्योंकि उपलब्ध ब्लॉग में वह सारी सुविधाएं भी नहीं है जो
एक वेब पोर्टल में सामान्यतः होती हैं । वेब पोर्टल का सौदंर्यशास्त्र भी इन
ब्लॉगों को कुछ पल के लिए कमजोर साबित कर सकता है किन्तु जिन्हें समाचार, विचार
और सूचना मात्र पर विश्वास होगा वे इन ब्लॉगों पर प्रदत्त सुविधाओं से मूँह
नहीं मोड़ सकते । ब्लॉगरों की दुनिया का विश्लेषण करें और खास तौर पर समाचार
लेखन की भाषा पर विचार करें तो अभी वहाँ पत्रकारिता का कॉमन आचरण संहिता का
दबाब नज़र नहीं आता जो वेब पत्रकारिता के लिए भी अपरिहार्य होगी । भविष्य में
उच्छृंखल भाषा से इन ब्लॉग लेखक-पत्रकारों स्वयं को बचाना होगा । अच्छा होगा कि
वे स्वयं ही आत्मानुशासन का नया शास्त्र तैयार करें जो भविष्य में ब्लॉग आधारित
पत्रकारिता के साथ-साथ समकालीन अन्य ब्लॉग लेखकों को भी अनुशासित होने के लिए
प्रेरित और बाध्य कर सके । जहाँ तक समाचार और विचार चयन का प्रश्न है वहाँ भी
चौंथे स्तम्भ की मर्यादाओं का अनुपालन स्वतः स्फूर्त आवश्यक है ताकि
प्रजातांत्रिक मूल्यों और संस्कारों को कहीं से खरोंच न लगे । आज जबकि बड़ों
घरानों के समाचार पोर्टल दनदनाते हुए अंतरजाल पर नित-प्रतिदिन कोने कगरे से
समाचार परोस रहे हैं से टक्कर लेने में और उनके बरक्स अपनी पठनीयता और
विश्वसनीयता बनाये रखने के लिए ब्लॉग पत्रकारों को जरूरी है कि वे समाचार संकलन
की सर्वसुलभ प्रविधियों से हटकर उन जगहों पर समाचार तलाशें जहाँ एक प्रोफेशनल
पत्रकार लगभग नहीं जाता या उसे वहाँ जाने बिना भी पगार मिल जाया करता है या उसे
वहाँ समाचार जैसा कुछ दिखाई नहीं देता । इस दृष्टि से ब्लॉग आधारित पत्रकारिता
उपेक्षित विषयों पर लेखन के लिए पतित पावनी गंगा सिद्ध हो सकती है । इसे हम
बाजारवादी और उपभोक्तावादी पत्रकारिता के विरूद्ध एक कारगर अस्त्र के रूप में
भी देखें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । जिस तरह से समकालीन भारतीय
परिस्थितियाँ गवाही दे रही हैं, उसे परीक्षित कर कहा जा सकता है कि भविष्य में
वंचित, शोषित, पीड़ित और उपेक्षित मनुष्यता की चीखों, पुकारों, आवाज़ों को
नज़रअंदाज करने वाली विद्रपताओं के विरूद्ध एक शसक्त विकल्प के रूप में भी इन
ब्लॉगों को कारगर बनाया जा सकता है । तब ये ब्लॉग-पत्र सबसे ताकतवर मीडिया के
रूप में जानी पहचानी जा सकेंगी । सिर्फ़ इतना ही नहीं इस माध्यम से भाषायी
पत्रकारिता की दिशा में भी काफी कुछ किया जा सकेगा ।
आंकड़ों से उभरते संकेत
एक टैक्नोरति नामक वेब साइट के एक विश्वसनीय आंकडे के अनुसार आज विश्व भर में
कम से कम
साढ़े सात करोड़ चिट्ठे हैं और जाहिर है कि ये केवल अंग्रेजी में नहीं है
प्रत्युत जापानी,
रूसी,
फ्रेंच स्पेनिश फारसी,
हिंदी(विभिन्न
लोकभाषाओं सहित),
मलयालम,
मराठी,
बंगाली, उडिया, आदि अनेक भाषाओं मे चिट्ठे लिखे जा रहे हैं । यहाँ उस आम
गलतफहमी
का भी जिक्र करना उचित होगा, जिसमें इंटरनेट की भाषा केवल अंग्रेजी को माना
जातात है । इसके ठीक विपरीत दुनियाभर से प्रकाशित चिट्ठों में से केवल
30%
सामग्री ही अंग्रेजी में है। सच तो यह है कि जो हिंदी चिट्ठाकारी देवनागरी लिपि
में लिखने पढ़ने की बुनियादी और शुरुआती अड़चनों से मंथर गति से पनप सकी थी अब
नित-प्रतिदिन अपनी संख्या में गुणोत्तर वृद्धि दर्शा रही है । जाहिर है इसके
साथ-साथ पत्रकारिता में अभिरूचि संपन्न लोग भी इसका वरण करते चले जायेंगे और तब
ब्लॉग आधारित वेब मीडिया जैसे महत्वपूर्ण जाल स्थलों की संख्या भी बढ़ती चली
जायेगी । मात्र चार वर्षीया हिन्दी चिट्ठाकारिता की दिशा को देखते हुए इतना तो
कहा ही जा सकता है और वह इसलिए भी कि पूत के पाँव पालने में ही दिखाई दे जाते
हैं ।
भारतीय
डिजीटल न्यूज मानिटरिंग कार्य में सक्रिय संस्था
ContentSutra
रिपोर्ट और इकॉनामिक्स टाइम्स के सर्वेक्षण पर गौर करें तो जुलाई 2006 में कुल
25 मिलियन भारतीय इंटरनेट उपभोक्ताओं में से 86 प्रतिशत नियमित रूप से ब्लॉग
देखते व चयन कर पढ़ते हैं । सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि 41 प्रतिशत ऑनलाइन
यूजर्स भाषायी सामग्री की फिराक में रहते हैं जिसमें से 17 प्रतिशत मात्र हिंदी
की सामग्री चाहते हैं । यह रूझान ब्लॉग्स के माध्यम से इंटरनेट पर स्वतंत्र
पत्रकारिता की स्वस्थ संभावनाओं की ओर भी इशारा करता है ।
ब्लॉग आधारित पत्रकारिता और उसका अर्थशास्त्र
यह सर्वमान्य
तथ्य है कि जो कुछ मुफ़्त में दुनिया को देगा तो वह उसकी क़ीमत कहीं न कहीं से
वसुलेगा ही । आज जितनी भी प्रतिष्ठित ब्लाग प्रोवाडर्स कंपनियाँ है उनकी की
कमाई का जरिया भी बाजार से प्राप्त विज्ञापन है। ब्लॉग क्रियेटर्स के माध्यम से
ऐसी कंपनियों की मुख्य साइटें करोड़ों की संख्या में नित देखी पढ़ी जाती हैं
जिससे उनका अर्थशास्त्र को पुख्ता होता है । यह ठीक है कि ब्लॉग आधारित
वेब-पत्रकारिता से संबंद्ध पत्रकारों के लिए पूर्णकालिक रोजी-रोटी की व्यवस्था
होने के रूझान अभी परिलक्षित नहीं हुए हैं और न ही उसे पूर्णतः व्यवसाय के रूप
में अपनाया जा सकता है । यह दीगर बात है कि इस प्रविधि में खर्च न के बराबर है
तथापि बड़े पोर्टलों और प्रिंट मीडिया की तरह यहाँ भी स्थानीय विज्ञापन सजाकर
जेब खर्च निकालने में कोई खास कठिनाई नहीं होगी । वैसे इसके लिए मझोले
व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को इस ओर मोड़ने की चुनौती भी है जो इन दिनों वेब
मीडिया में अपने उत्पाद के विज्ञापन में अपना फायदा नहीं देखने की मानसिकता में
हैं, पर यह चुनौती इतनी खतरनाक नहीं है कि मुँह मोड़कर पत्रकार हाथ डाल दे । इस
दिशा में गूगल ऐडसेंस (www.google.com/adsense/)का
सहारा भी लिया जा सकता है जो विज्ञापन देकर कुछ राशि दे सकती है
लेकिन यह काफी कुछ
निर्भर करेगा गूगल ऐडसेंस की
सेवा की
शर्तों
पर,
इसके अलावा हिन्दी मे लिखे पन्नों पर ज्यादातर
पीऍसए (जन
सेवा विज्ञापन) ही आते है,
जिसमें क्लिक के बावजूद कुछ
भी नही मिलता। क्योंकि गूगल ऐडसेंस जालपृष्ठ के विषय-वस्तु और मुख्य-शब्द
(कीवर्ड्स)
पर निर्भर करता है,
और हिन्दी में लिखे विषय-वस्तु के समकक्ष विज्ञापन
मिलना लगभग असम्भव ही है। फिर भी भविष्य में कुछ आशा तो की ही जा सकती है।
ऐसे ब्लॉगों के माध्यम से लाभ अर्जित करने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि
ऐसे जाल-स्थल को किसी समाचार या फीचर्स सेवा की तरह संचालित किया जाय और
छोटे-मझोले समाचार पत्र प्रतिष्ठानों एवं वेबसाइटों की सदस्यता से उन्हें
वांछित समाचार और विचारात्मक आलेख उपलब्ध कराकर नियमित रूप से कुछ निश्चित राशि
प्राप्त की जाय । क्योंकि लाख प्रतिष्ठित समाचार एंजेसी होने के बावजूद भी
स्थानीय महत्व के मुद्दे अक्सर छूट ही जाते हैं और प्रतिदिन प्रकाशित होने वाले
ऐसे समाचार पत्रों को नियमित रूप से समाचार और आलेखों की आवश्यकता होती है ।
आये दिन जिस तरह से आंचलिक अखबारों का प्रकाशन दर बढ़ रहा है और पूर्व संचालित
अखबारों में पेजों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है उसे देखकर कहा जा
सकता है कि आंचलिक स्तर पर भी ऐसे सामूहिक ब्लाग व