आभासी
दुनिया में मौजूद यथार्थ का प्रवाह
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जयदीप कर्णिक
बिहार
का रहने वाला एक
परिवार मेरा परिचित है।
बेहद संस्कारित और अनुशासन में रहने वाला। अनुशासन इतना कि
परिवार की स्थिति कैसी भी
हो, दसवीं के बाद पढ़ाई का
खर्च खुद ही चलाना है। यह न टूट
सकने वाला नियम है। चाहे ट्यूशन
करो या फिर कोई पार्ट टाइम नौकरी। इसी अनुशासन के
चलते उनके यहाँ केबल टीवी
नहीं है। अभी कुछ महीनों पहले उनके यहाँ दिलचस्प चर्चा
हुई। कुछ अतिरिक्त बजट
उनके पास था और सबका मानना था कि आज के युग में देश–दुनिया
से जुड़े रहना भी ज़रूरी है।
इस पूरी बहस में परिवार के सदस्यों को दो में से किसी एक
को चुनना था- केबल टीवी या
इंटरनेट। परिवार ने एकमत होकर इंटरनेट को चुना। घर में
नया कंप्यूटर आया और ब्रॉड
बैंड का कनेक्शन भी लग गया।
ये वाकया सिर्फ़ इसलिए कि
इंटरनेट ने आम आदमी को किस
तरीके से छुआ है। कतई ताज्जुब नहीं होता कि टाइम पत्रिका
ने 2006
का ‘पर्सन
ऑफ़ द ईयर’ पुरस्कार आम
इंटरनेट उपयोगकर्ता को दिया है। जिस तेज़ी
से इंटरनेट ने अपने पैर पसारे हैं
और आम जीवन को प्रभावित करना शुरू किया है,
उतनी
तेज़ गति तो टेलीविज़न की भी
नहीं रही। ये भी सिर्फ़ शुरुआत भर है। महँगे इंटरनेट
कनेक्शन और कंप्यूटर की
कीमतों की अड़चन दूर होने के बाद वास्तविक इंटरनेट क्रांति
देखने को मिलेगी। तब
इंटरनेट की यह दुनिया जिसे ‘वर्चुअल
वर्ल्ड’ के नाम से जाना
जाता रहा है,
उसकी पहचान और इस आभासी दुनिया का
सच, आईटी कंपनियों,
युवाओं और साइबर
कैफ़े तक सीमित न रहकर कहीं
अधिक व्यापक हो जाएगा।
हर नई ईजाद की तरह इंटरनेट
ने भी अपनी यात्रा की
शुरुआत कौतुहल के साथ की। सीमित उपयोग के लिए कुछ कंप्यूटरों
को आपस में जोड़ देने की
आवश्यकता से उपजे इस आविष्कार को लेकर किसी ने नहीं सोचा था
कि वो आगे चलकर इतना बड़ा
रूप ले लेगा। वर्ल्ड वाइड वेब के जनक टिम बर्नर ली ने भी
नहीं। धीरे-धीरे सीमित
आवश्यकतों के स्थान पर यह तकनीक बुनियादी आवश्यकताओं को भी
पूरा करने लगी और इंटरनेट
कौतुहल के स्थान पर आधुनिक युग की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता
में तब्दील हो गया।
यही आवश्यकता भारत भी पहुँची
और कंप्यूटर क्रांति का सूत्रपात
कर चुके भारत के लिए इसे अपनाना आसान हो गया।
लेकिन फिर भी बहुत लंबे समय तक ये
क्रांति कार्पोरेट जगत तक ही सीमित रही। डिजिटल
विभाजन के तमाम दावों-प्रतिदावों
के बीच आम आदमी इसके बारे में केवल सुनता या पढ़ता
रहा। एक कारण तो यह कि
इंटरनेट बहुत सारे लोगों के लिए पेशे की आवश्यकता से जुड़ा
था,
व्यक्तिगत आवश्यकता से नहीं।
इंटरनेट के ज़रिए टिकट मिलने
या पत्राचार की महत्वपूर्ण
सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद एक कमी थी,
जो खल रही थी। ...
अपनी भाषा की कमी। जब तक इस पूरे
उपक्रम से भाषा की सौंधी महक नहीं जुड़ गई,
एक
बहुत बड़े वर्ग के लिए इस पूरी
क्रांति के कोई मायने नहीं थे। ऐसा सिर्फ़ भारत में ही
नहीं,
दुनिया के सभी देशों में हुआ,
बल्कि बाहर पहले हुआ,
अपने यहाँ बाद में। ..ख़ैर
अभी तो उनके और अपने
भाषा-प्रेम के बीच के अंतर और उससे जुड़ी लंबी बहस को यहाँ नहीं
छेड़ते।
तो भाषा के ईंधन ने इंटरनेट
के इंजन को तेज़ गति दी और
युनिकोड अब उसके लिए एक्सीलरेटर का काम कर रहा है। अब जब
महँगे कंप्यूटर और महँगे
इंटरनेट कनेक्शन के स्पीड-ब्रेकर दूर होंगे तो यह यात्रा
क्रांति का रूप ले लेगी।
तब सही मायने में भारत में इंटरनेट क्रांति का सूत्रपात
होगा ....और इस क्रांति की
अगुआई तकनीक नहीं करेगी,
बल्कि भाषा करेगी। भाषा ही वह
सेतु है,
जो सूचना क्रांति को आमजन से
जोड़ने का कार्य कर रही है और कर पाएगी।
जिन्होंने इंटरनेट पर भाषा के इस
महत्व को बहुत पहले पहचान लिया था,
वो अपने संकल्प
पर डटे रहे और आज आलम यह
है कि याहू और एमएसएन जैसे दिग्गज भी भारतीय भाषाओं का
परचम थामे मैदान में हैं।
बीबीसी की हिन्दी में रेडियो सेवा की तरह ही बीबीसी कि
हिन्दी साइट भी कमाल कर
रही है। ...याद कीजिए जब केबल टीवी के शुरुआती दौर में तमाम
चैनलों पर हिंग्लिश
कार्यक्रमों का ढेर लगा था.... फिर इन सभी विलायत से आयातित
कार्यक्रम निर्धारकों को
समझ में आया कि इससे काम नहीं चलेगा। भाषा का दामन तो
थामना ही पड़ेगा। विज्ञापन
की वैतरणी में भी वो तभी डुबकी लगा
पाएँगे....
अब इंटरनेट पर भी यही हो रहा
है। हो रहा है तो अच्छी
बात भी है। भाषा कि बगिया से अपनी जीविका के फ़ूल चुनने
वालों के लिए तो इस बहार
का कब से इंतजार था। प्रेस-कॉंफ़्रेंस में झोला टाँगकर पीछे
खड़े रहने वाले और कॉफ़ी
हाउस में कॉफ़ी पी-पीकर अँगरेजी के पत्रकारों को कोसने वाले
अपने भाषा के योद्धा
पत्रकारों को कोई पलक पाँवड़े बिछाकर बुलाए
तो इससे अच्छा और क्या
होगा?
जिस देवनागरी को विद्यालयों में
भी ढंग से नहीं सिखाया-पढ़ाया जा रहा,
जिनकी
यह मूल ज़िम्मेदारी है,
उस देवनागरी में चिट्ठाकारी
(ब्लॉग्स) के हर रोज़ परवान चढ़ते
जुनून को देखकर मन-मयूर झूम उठता
है। रोमन
लिपि के साम्राज्य से
भारतीय भाषाओं की इस
मुक्ति के जश्न को सार्थक करने के लिए आज भाषा-प्रेमी
पत्रकारों की भरपूर
आवश्यकता है। ये नदी कहीं फिर बीच रास्ते में ही न सूख जाए।
कॉन्वेंट से लेकर
कॉर्पोरेट जगत तक छाए अँगरेजी वर्चस्व के मानसिक दबाव को कम करने
का महत्वपूर्ण काम यह भाषा
क्रांति कर सकती है। आज भाषा को लेकर अच्छा काम करने
वालों की बड़ी संख्या में
आवश्यकता है, पर अच्छे लोग
नहीं मिल रहे हैं। अख़बार,
इंटरनेट और टीवी, सभी जगह
हिन्दी में अच्छी कॉपी लिखने वालों की कमी बनी रहती है।
अब तो कम से कम केवल
अँगरेजी के ही रोज़गारमूलक होने का भ्रम टूट जाना
चाहिए...
इंटरनेट पर भाषाई
पत्रकारिता,
अब अपने शैशव को पूरा कर नया रूप
लेने को तैयार है। तमाम भाषाई अखबार
अब इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। केवल
इंटरेनेट के लिए विशेष तौर पर खबरें तैयार करवाई और
लिखी जा रही हैं। बड़े टीवी
चैनलों और अखबारों से जुड़े पत्रकार भी अपनी-अपनी भाषा
में बढ़िया चिट्ठाकारी कर
रहे हैं। यहाँ उनकी अपनी संपादकीय नीति है और जगह या समय
के अभाव में उनकी बढ़िया
स्टोरी के लोगों तक न पहुँच पाने का अफ़सोस भी नहीं है।
भौगोलिक दूरियों को पाटते
हुए चंद लम्हों में सूचना को दुनिया के किसी भी कोने में
पहुँचा पाना,
और उससे भी आगे उस सूचना पर तुरंत
क्रिया-प्रतिक्रिया का दौर शुरू हो
पाना भी वेब पत्रकारिता का
महत्वपूर्ण पहलू है। ‘विश्व-ग्राम’
के स्वप्न को भी सही
मायनों में इंटरनेट ने ही
साकार किया है।
तकनीक ने अभिव्यक्ति के नए
माध्यम तैयार करके भाषा की
बड़ी सेवा की है। आभासी दुनिया में बहती भाषा की इस नदी
को अपनी रचनात्मकता से
लबालब और वेगवान बनाए रखना,
भाषा से जुड़े हर सृजनधर्मी कि
ज़िम्मेदारी है। इसे
बारहमासी बनाए रखना सभी का मिला-जुला दायित्व है.... आईए! एक
अर्घ्य आप भी दे दीजिए,
एक
डुबकी आप भी लगा लीजिए।
लेखक
वेब दुनिया डॉट कॉम, इंदौर के संपादक हैं।

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