इंटरनेट पर
हिन्दी
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दुर्गा प्रसाद अग्रवाल
अपनी किताब द
वर्ल्ड इज फ्लैट में थॉम एल. फ्रीडमैन ने दुनिया की शक्ल बदलने वाले तीन
नवाचारों की चर्चा की है।
1. पर्सनल कंप्यूटर,
जिसने हमें डिजिटल कंटेंट का सर्जक बनाया। 2.
इंटरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब जिसने हमें यह सुविधा दी कि हम
अपनी विषय वस्तु को पूरी दुनिया में नि:शुल्क कहीं भी ले जा सकते हैं और
3. नब्बे के दशक में हुई सॉफ्टवेयर क्रांति जिसने सारे
कंप्यूटरों को एकरूप किया। मैं, इसमें एक और नवाचार
जोड़ना चाहता हूं और वह है यूनीकोड। अब तक माना जाता था कि कंप्यूटर पर अंग्रेजी
का एकाधिकार है,
लेकिन यूनीकोड ने सारी तस्वीर बदल डाली है। भाषा की दीवारें जैसे टूट गई हैं।
बिना फॉन्ट इन्स्टाल किये किसी भी कंप्यूटर पर (बशर्ते वह बहुत पुराना और धीमा
न हो) कि सी भी भाषा की सामग्री देखी-पढ़ी या लिखी जा सकती है। निश्चय ही यह बात
हिन्दी के लिए एक वरदान है।
हिन्दी जगत ने
इसका लाभ भी भरपूर उठाया है
वैसे,
माइक्रोसाफ्ट ने काफी पहले से कंप्यूटर का हिन्दीकरण कर रखा
है। वर्ड, एक्सपी सब कुछ हिन्दी मे ंसुलभ है। सबसे बड़े
सर्च इंजन गूगल पर हिन्दी में खोज की जा सकती है ( गूगल पर हिन्दी राइटर्स
मांगने पर 1 लाख 20 हजार
प्रविष्टियां मिल जाती हैं), हिन्दी में ई मेल भेजी और
प्राप्त की जा सकती है और हिन्दी लिखने-पढ़ने में अनेक साफ्टवेयर्स की मदद ली जा
सकती है। फिर भी, कंप्यूटर और इंटरनेट अभी हमारी आदत
में शुमार नहीं हुए हैं। अगर हम इनका प्रयोग करते भी हैं तो अंग्रेजी की मार्फत,
जबकि हिन्दी के माध्यम से भी किया जा सकता है। वैसे,
यह करने में कुछ समस्याएं भी हैं। एक तो यही कि अभी तक हिन्दी
का कोई मानक की बोर्ड नहीं है, दूसरे हिन्दी में उतना
प्रामाणिक और विश्वसनीय वर्तनी जांचक नहीं सुलभ है जितना अंग्रेजी में है,
तीसरे फाण्ट्स की परस्पर परिवर्तनशीलता में कठिनाइयां हैं आदि,
लेकिन लेकिन यहीं यह कहना भी जरूरी है कि छोटी-छोटी जगहों के
उत्साही लोग इन कमियों की पूर्ति में जुटे हैं। यह भी इंटरनेट का ही चमत्कार है
कि रतलाम के रविशंकर श्रीवास्तव या मध्यप्रदेश के गंज वसौदा जैसे अनजान कस्ब के
जगदीप सिंह डांगी ऐसे बड़े काम कर रहे हैं। कोई हिन्दी की बोर्ड पर काम कर रहा
है तो कोई स्पेल चैक तैयार कर रहा है। कोई शब्दकोश तैयार करने में लगा है तो
कोई थिसारस बनाने में। कोई हिन्दी का अमर साहित्य नेट पर सुलभ कराने के लिए
प्रयत्नरत है तो कोई किसी विधा विशेष (जैसे कविता,
हाइकू, ललित निबंध, कहानी) की
अमर कृतियों को नेट पर ला रहा है। सुदूर इटली में बैठे एक सज्जन सुनील दीपक को
यह जुनून है कि कैसे अधिकाधिक हिन्दी रचनाकारों के लेखन की बानगी नेट पर लाई
जाए। वे कल्पना के माध्यम से यह काम कर रहे हैं। कई लेखकों ने खुद ही अपनी
साइट्स बना चला रखी है,
जैसे अशोक चक्रधर ने या गुलजार ने।
अलग-अलग बहुत
कुछ हो रहा है। जो जागरूक हैं वे इससे लाभान्वित हो रहे हैं और इस काम को आगे
बढ़ाने में सहयोग कर रहे हैं। लेकिन बावजूद इसके अभी हिन्दी जगत में कंप्यूटर को
लेकर इंटरनेट को लेकर और कुल मिलाकर तो तकनीक को लेकर ही,
एक असमंजस का, संशय का,
सन्देह का और एक हद तक अस्वीकार का भाव विद्यमान है। ऐसे लोगों
को लगता है कि तकनीक उनकी सृजनशीलता को नष्ट कर देगी। वे इससे दूरी बनाये रखने
में और यह कहने में कि मुझे न तो कंप्यूटर आता है और न ही मैं इसे सीखना चाहता
हूं, गर्व महसूस करते हैं। लेकिन इनके बरक्स एक बहुत
बड़ा समुदाय है जिसने कंप्यूटर से दोस्ती की है, इंटरनेट
पर सवार होकर लंबी उड़ानें भरी हैं और इसके रोमांच का अनुभव कर प्रसन्न हुआ है,
ऐसे ही लोगों के कारण आज
कंप्यूटर पर हिन्दी प्रभावशाली तरह से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।
आज इंटरनेट पर
हिन्दी की कम से कम
20 स्तरीय साहित्यिक
पत्रिकाएं नियमित रूप से चल रही हैं। इनमें प्रमुख हैं हिन्दी नेस्ट,
सृजनगाथा, अभिव्यक्ति,
शब्दाजंलि, साहित्य कुंज,
छाया, गर्भनाल,
भारत दर्शन, वेब दुनिया,
ताप्तीलोक, कृत्या, रचनाकार,
कलायन और जयपुर से निकल रही इंद्रधनुष इंडिया। इन सभी में
महत्वपूर्ण, पठनीय, स्तरीय
सामग्री आकर्षक रूप से प्रस्तुत की जाती है और दुनिया भर के लोग,
खासतौर पर वहां के, जहां हिन्दी पत्र
पत्रिकाएं नहीं पहुंच पाती है, इन्हें पढ़ते हैं। इनके
अलावा ऐसी अनेक पत्रिकाएं जो मुद्रित होती हैं, वे भी
संपूर्ण रूप से नेट पर सुलभ होने लगी हैं। इनमें मुख्य हैं हंस,
वागर्थ, तद्भव,
नया ज्ञानोदय, अन्यथा,
ताप्तीलोक और हमारे अपने यहां की मधुमती, अनेक समाचार
पत्र तो नेट पर सुलभ हैं ही, जैसे अमर उजाला,
आज, नवभारत टाइम्स,
नई दुनिया, वॉयस आफ अमेरीका,
डॉयचे वेले जैसे रेडियो स्टेशन्स की भी अपनी-अपनी-अपनी साइट्स
हैं। इनमें से बीबीसी हिन्दी वाले तो अपनी साइट पर हिन्दी की एक साहित्यिक
पत्रिका भी चलाते हैं और उसमें बहुत महत्वपूर्ण सामग्री मिलती है। इधर ब्लाग्स
का नया चलन शुरू हुआ है जिसे हिन्दी वालों ने चिट्ठा नाम दिया है। आज हिन्दी
में कम से कम 300 चिट्ठाकार सक्रिय हैं जो अपनी रचनाएं
और प्रतिक्रियाएं नियमित रूप से और पूरे उत्साह से नेट पर डालते हैं। इतना सब
होते हुए भी, अगर हम अंग्रेजी से ही तुलना करें तो
पाएंगे कि अभी हम बहुत पीछे हैं। नेट पर जहां अंग्रेजी के 20
अरब से अधिक पेज सुलभ है, हिन्दी के पन्ने करीब
1 करोड़ ही हैं।
हिन्दी में
पुस्तक प्रकाशन की दशा बहुत अच्छी नहीं है। लेखक की पीड़ा यह है कि किताब छपती
नहीं,
छपती है तो बिकती नहीं, और बिक भी जाती
है तो पाठक तक नहीं पहुंचती, पुस्तकालय आंदोलन लगभग
अनुपस्थित है। किताबों की दुकानें दुर्लभ हैं। पत्रिकाओं की स्थिति भी बहुत
अच्छी नहीं है। लोकप्रिय और मुख्यधारा की पत्रिकाओं ने तो साहित्य को बेकार की
चीज मानकर लगभग देश निकाला दे ही रखा है, लघु पत्रिकाएं
भी साहित्य को वैसा मंच दे पाने में समर्थ नहीं हैं जैसे की आज जरूरत है। उनकी
अपनी सीमाएं हैं और उनसे हम सब वाकिफ हैं, ऐसे में,
यह तकनीक मुझे एक वरदान लगती है। आप कहीं भी हों,
न्यूयार्क में, नई दिल्ली में या नायला
में, इंटरनेट पर आप लिख सकते हैं,
पढ़ सकते हैं। यह मामूली बात नहीं है। जब भी आप कोई संदर्भ
चाहें, आपको मिल सकता है, वह
रचना या किताब जिसे पढ़ने को आप व्याकुल हों, लेकिन जो
आपके अपने संग्रह में न हों, आपके गांव या शहर की
लाइब्रेरी में भी आपको न मिले, इंटरनेट पर आपको तुरंत
मिल सकती है और यह खजाना दिन-ब-दिन समृध्द होता जा रहा है। मुझे तो सबसे अधिक
जरूरी यह लगता है कि हिन्दी पढ़ने लिखने वाला समुदाय कंप्यूटर व इंटरनेट से दूरी
घटाये, उसे दोस्ती करे और उससे फायदा उठाये। यह हम सब
जानते हैं कि कंप्यूटर किताब को विस्थापित नहीं कर सकता,
शायद करना भी नहीं चाहता। उसे किताब के पूरक के रूप में
इस्तेमाल करने में क्या हर्ज है?
लेखक
शिक्षाविद् और इंदधनुष इंडिया के संपादक हैं ।

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