Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 4, जून - अगस्त, 2007)

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आवरण कथा

 

वेब मीडिया यानी नई संभावनाएं

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देवव्रत सिंह

 

पिछले एक दशक में डिजीटल क्रांति ने दुनिया भर में एक ऐसे मीडिया को जन्म दे दिया है जो ना केवल सभी पुराने माध्यमों से भिन्न है बल्कि सही मायने में ग्लोबल भी है। कंप्यूटर आधारित इस माध्यम को साईबर मीडिया, वेब मीडिया, इंटरनेट मीडिया जैसे अनेक नामों से जाना जाता है, लेकिन अकादमिक हल्कों में अकादमिक लोगों ने इसे न्यू मीडिया की संज्ञा दी है। नया इसलिए क्योंकि इस माध्यम के रूप-स्वरूप ने अभी तक सभी पुराने संचार मॉडलों को चुनौती दी है और ये एक नये किस्म का संचार वातावरण तैयार कर रहा है। सारी दुनिया के देश इस माध्यम से आपस में जुड़ गये है। मार्शल मैक्लुहन का ग्लोबल विलेज (विश्व ग्राम) का सपना साकार होता लग रहा है।

 

नये माध्यम के विकास में जिन प्रमुख तकनीकों का विशेष योगदान रहा वे हैं - उपग्रह प्रसारण तकनीक, आप्टिकल फाइवर और डाटा प्रोसेसिंग का डिजीटलीकरण। उपग्रह तकनीक ने जहां पूरी पृथ्वी पर एक साथ प्रसारण करने को संभव बना दिया वहीं आप्टिकल फाइवर के बाद अभूतपूर्व पैमाने पर डाटा एक साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजना आसान हुआ। जबकि डिजीटल डाटा ने टैक्सट, साउंड और वीडियो तीनों प्रकार की सामग्री को बाईनेरी कोड में ढाल कर समरूप बना दिया और परिणामस्वरूप अनेक माध्यमों का अभिसरण (कंवजर्ेंस) होने लगा और मल्टीमीडिया ने आकार लिया। नया माध्यम कंप्यूटर के सहारे इंटरएक्टिव टेलीविजन, ब्राडबैंड सुविधायुक्त लैपटॉप, इंटरनेट की दुनिया समेटे मोबाइल फोन, आभासीय जगत की रचना करते इंटरएक्टिव वीडियो गेम्स की शक्ल में हमारे सामने आ रहा है।

 

वेब मीडिया का इतिहास

दुनिया का पहला कंप्यूटर सन् 1945 में पेनसिलिवेनिया में बनाया गया था। सत्तर के दशक तक कंप्यूटर काफी महंगा और विशाल आकार वाला होता था इस लिए बड़े सरकारी विभाग या कंपनियां ही इसे खरीद पाते थे। भारत में पहला कंप्यूटर सन् 1955 में भारतीय सांख्यिकी संस्थान ने खरीदा था। सन् 1981 में जीरोक्स कंपनी ने पहला माइक्रो कंप्यूटर बाजार में उतारा। धीरे-धीरे छोटे, हल्के और सस्ते कंप्यूटर बनने के बाद घरों में भी लोग कंप्यूटर खरीदने लगे। सन् 1991 में टिम बर्नर्स ली ने अनेक कंप्यूटर को जोड़कर वर्ल्ड वाइड वेब की शुरुआत की। लेकिन भारत में इंटरनेट सेवा 15 अगस्त 1995 में तब आरंभ हुई जब विदेश संचार निगम लिमिटेड ने अपनी टेलीफोन लाइन के जरिए दुनिया के अन्य कंप्यूटर से भारतीय कंप्यूटरों को जोड़ दिया। इसी साल देश की पहली साइट इंडिया वर्ल्ड डॉट कॉम आरंभ हुई। इसी साल रिडिफ डॉट कॉम और इंडिया टाइम्स डॉट कॉम भी आरंभ हुई। सन् 1998 में सरकार ने निजी कंपनियों को इंटरनेट सेवा क्षेत्र में आने की अनुमति दे दी। 23 सितंबर 1999 को दुनिया का पहला हिन्दी पोर्टल वेब दुनिया इंदौर से आरंभ हुआ।

 

नब्बे का दशक भारतीय कंप्यूटर क्रांति का दशक माना जा सकता है। जब तेजी से ना केवल देश में कंप्यूटरों की बिक्री बढ़ी बल्कि बड़ी तादाद में कंप्यूटर का प्रशिक्षण देने वाले संस्थान भी शुरू हुए। हालांकि इसमें सरकार का उदार नीतियों का भी काफी योगदान रहा। नतीजा ये निकला कि भारत में प्रशिक्षित कंप्यूटर इंजीनियर बड़ी संख्या में अमेरिका के सिलिकोन वैली में जाने लगे। इसके साथ-साथ भारतीय तकनीकी संस्थान (आईआईटी) इंजीनियर अपनी उद्यमशीलता से कंप्यूटर जगत में अपना स्थान बनाने में लगे हुए थे। अर्जुन मल्होत्रा, शिव नाडार (एचसीएल), अजीम प्रेम जी (विप्रो) और नारायण मूर्ति (इन्फोसिस) के नाम इनमें प्रमुख रूप से गिने जा सकते हैं। सन् 2000 के बाद कंप्यूटर की कीमतों में जबरदस्त गिरावट आई और ऑफिसों से निकल कर अब कंप्यूटर मध्यमवर्गीय घरों में भी दिखने लगा। इसी के साथ-साथ देशभर में साइबर कैफों की बदौलत इंटरनेट सेवा ने भी व्यापक विस्तार लिया। इन कैफे में इंटरनेट सेवा की दर 50-60 रूपये प्रतिघंटा से घटकर 10-20 रूपये तक आ गयी।

 

नये माध्यम का नया संचार

वेब मीडिया ने संचार के क्षेत्र में भी पुराने माध्यमों से अलग पहचान बनायी है। इस माध्यम में सूचनाओं के उत्पादन, वितरण और संग्रहण तीनों हिस्सों में परिवर्तन आया है। इंटरनेट एक विशाल डाटा स्टोरेज के रूप में सारी दुनिया के लोगों को उपलब्ध है। आपको जिस भी सूचना की जितनी जरूरत है उसमें से निकाल लीजिए। संचार का मॉडल भी यहां बदलते हुए रूप में नजर आता है। संचार यहां बहुउद्देशीय और बहुआयामी है। लाखों लोग सूचनाओं के उपभोक्ता भी हैं तो वही लाखों लोग नेट पर सूचना छोड़ने वाले भी है। यानी यहां संदेश भेजने वाले और उसे ग्रहण करने वाले के बीच का फासला भी कम हो रहा है। कोई भी व्यक्ति एवं संस्था थोड़े खर्च में ही अपनी साईट आरंभ कर सकता है। इसलिए ये माध्यम सूचना उत्पादन में कुछ लोगों के वर्चस्व को चुनौती देता है। इस मायने में वेब मीडिया पुराने माध्यमों की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक है। कम्युनिटी और ब्लॉग साइट निरंतर यूजर्स को एक ऐसा स्पेस मुहैया करा रही हैं जिसमें आम लोग अपनी राय और विचार को दुनियाभर के सामने रख सकते हैं और ज्वलंत मुद्दों पर एक गर्मागर्म बहस चला सकते हैं।

 

नया माध्यम अपनी मूल प्रकृति में ही इंटरएक्टिव है। यानी इस माध्यम को प्रयोग करने वाले लोग केवल मूक श्रोता होने के बजाय एक एक्टिव भूमिका में हैं। जिन्हें पल-पल अपनी पसंद राय देनी पड़ती है। इस माध्यम का लक्षांक समूह भी बहुत सधा हुआ नहीं है। सबसे रोचक बात ये भी है कि एक ही माध्यम में विभिन्न स्तरों पर संचार किये जा सकते हैं। जैसे ई-मेल और चैटिंग एक प्रकार का अंतरव्यैक्तिक संचार है। कम्युनिटी साईट और बुलेटिन बोर्ड समूह संचार की सुविधा उपलब्ध कराता है वहीं विभिन्न पोर्टल पर सूचना देकर जनसंचार किया जाता है। इसके अलावा सर्च इंजन की मदद से वेब मीडिया अपने उपभोक्ताओं को अथाह सूचना बैंक मुहैया कराता है जिसकी कल्पना तक अन्य माध्यमों में नहीं की जा सकती।

 

वेब मीडिया ने बदला जीवन का ढंग

इंटरनेट और कंप्यूटर आज भारतीय समाज से हर हिस्से में आसानी से दिखाई देने लगा। शहरी स्कूलों में कंप्यूटर अब प्राइमरी से ही पढ़ाया जाने लगा है। देश में अनेक बड़े विभाग कंप्यूटर के माध्यम से इस प्रकार जुड़ गये हैं कि उसका लाभ अब सीधा आम लोगों को मिलने लगा है। रेलवे टिकटों की बुकिंग अब कोई भी व्यक्ति कहीं से बैठकर करवा सकता है। कोर बैंकिंग की सुविधा के तहत सारे देश के बैंक जुड़ गये हैं जिससे बिना किसी झंझट के धनराशि एक स्थान से दूसरे स्थान पर कम समय में भेजी जा सकती है। यही नहीं एटीएम के कारण अब बैंक अपने ग्राहकों को चौबीस घंटे की सेवा देने लगे हैं। शेयर बाजार के कारोबार में इंटरनेट की मदद से अब आम मध्यमवर्गीय तबका भी निवेश करने लगा है। अपने शहर में बैठे हुए ही वो दिनभर शेयर बाजार पर नजर रखने लगा है। छोटे कस्बों तक में स्कूली बच्चे अब अपने परीक्षा परिणाम के लिए समाचार पत्र या फिर सरकारी गजट का इंतजार नहीं करते वे इंटरनेट की मदद से तुरंत अपनी अंकसूची का प्रिंट ले लेते हैं। इंटरनेट की मदद से छात्रों को दूरस्थ शिक्षा में भी काफी आसानी हुई है। शादी के लिए रिश्ते करवाने वाली साईट्स इस कदर लोकप्रिय हैं कि अब लोग केवल अखबार या वैवाहिक संस्थाओं की मदद के भरोसे नहीं रहते वे अपनी जानकारियां इंटरनेट पर छोड़ देते हैं। नौकरी या पयर्टन के लिए भी आम युवा अब इंटरनेट का काफी मदद लेने लगा है। इंटरनेट टेलीफोनी ने विदेश में बात करना काफी सस्ता बना दिया है। ई-मेल, चैटिंग और कम्युनिटी साइट्स तो युवाओं में पहले से ही काफी लोकप्रिय हैं।

 

आजकल इंटरनेट की सुविधा केवल ऑफिसों या साइबर कैफे तक सीमित है। सरकार की नयी ब्राडबैंड नीति ने इंटरनेट को एक घरेलू माध्यम बना दिया है। जिसका मतलब है कि पोर्नोग्राफी के रूप में ढेर सारी अनचाही सामग्री भी इंटरनेट के माध्यम से हमारे घरों में बच्चों की आसान पहुंच में आ जाएगी। बड़े शहरों में लोगों ने घरेलू इंटरनेट कनेक्शन लेना शुरू भी कर दिया है। क्योंकि ये काफी सस्ता है। अब केवल 500-800 रूपये में एक महीने के लिए मुफ्त इंटरनेट सुविधा उपलब्ध हो रही है। पश्चिम के अनुभव बताते हैं कि ब्राडबैंड क्रांति कम से कम शहरों में जीवन जीने के पुराने ढंग को पूरी तरह बदल देगी। ये अनेक संभावनाएं और आशंकाएं एक साथ लेकर आ रही है और इसका लाभ उठाने के लिए पूरी तरह एक नयी ब्राडबैंड पीढ़ी अपेक्षित है।

 

नया माध्यम और बच्चे

किस प्रकार नया माध्यम अपने आगमन के साथ ही पुराने समाज में बेचैनी और खलबली पैदा करता है इसका अनुभव मुझे हाल ही में हुआ। एक प्रौढ़ मां ने बिफर कर अपने बेटे के बारे में शिकायती लहजे में मुझे बताया कि वो बार-बार स्कूल से भाग कर इंटरनेट देखने जाता है। अस्सी के दशक में बच्चे छुपकर टेलीविजन देखने के लिए डांट खाते थे तो नब्बे के दशक में स्कूल से भागकर व्यस्क फिल्में देखने के कारण बच्चे अभिभावकों के गुस्से का निशाना बनते थे। लेकिन अब नये जमाने में टेलीविजन और सिनेमा हॉलों के स्थान पर विलेन बना है इंटरनेट और वो भी बड़ी तादाद में कुकुरमुत्तो की तरह यहां-यहां खुले हुए साइबर कैफे के रूप में।

 

पूरी दुनिया में पोर्न सामग्री का सबसे घातक असर बच्चों पर देखा गया है। कच्ची उम्र में अश्लील सामग्री के संपर्क में आने से बच्चों के सहज विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इंटरनेट के घरेलूकरण से निश्चित तौर पर अभिभावकों के लिए निगरानी की परेशानियां बढ़ जाएंगी। साइटों पर ताला लगाने वाले साफ्टवेयर भी कुछ हद तक काम के साबित होंगे। लेकिन इससे भी जरूरी है सैक्स शिक्षा को स्कूली पाठयक्रमों में शामिल करना। क्योंकि अगर आप बाढ़ को रोक नहीं सकते तो बेहतर होगा उससे निबटने के लिए बच्चों को पहले से तैयार किया जाए। मीडिया साक्षरता भी इस संदर्भ में काफी उपयोगी साबित होगी। लेकिन मां-बाप द्वारा इंटरनेट प्रयोग के दौरान अपने बच्चों को निरंतर निगरानी का कोई विकल्प नहीं है। क्योंकि बच्चों में अच्छे संस्कार डालने में सबसे बड़ी भूमिका आखिर परिवार की ही होती है।

 

भारतीय समाज पर असर

नया माध्यम समाज में किस प्रकार के सकारात्मक और नकारात्मक बदलाव लायेगा इसका अंदाजा आगामी कुछ सालों में हो जायेगा, लेकिन इतना तो सुनिश्चित है कि इंटरनेट की घरेलू उपस्थिति भारतीय मां-बाप और अभिभावकों के सामने एक जबरदस्त चुनौती खड़ी करेगी। साइबर मीडिया नैतिकता, मर्यादा, सैक्स, विवाह, परिवार और मानवीय रिश्तों के बारे में परंपरागत भारतीय अवधारणाओं को बिलकुल नये तरीके से चुनौती देने वाला है। हालांकि व्यस्क फिल्मों और मैगजीनों का कारोबार देश में लंबे अरसे से खूब चल रहा है। लेकिन साइबर जगत का रूप धर कर पहली बार ये सब घर की चारदिवारी में सार्वजनिक रूप से प्रवेश कर रहा है। ये मसला इसलिए भी विचारणीय है क्योंकि भारतीय समाज अभी इस अभूतपूर्व सांस्कृतिक उथल-पुथल के लिए तैयार तो दूर की बात बल्कि अपने अतीत प्रेम की नींद सोया हुआ लगता है। दरअसल नया साइबर माध्यम सही मायने में ग्लोबल मीडिया है।

 

दुनिया के विभिन्न समाजों की सांस्कृतिक भिन्नता आपसी मेलजोल के इस प्लेटफार्म पर अनेक दिक्कत पैदा कर रही है। एक देश के लोग जिस कंटेंट को नैतिक और सांस्कृतिक रूप से सही मानते हैं वही दुनिया के दूसरे हिस्से के लोगों को नागवार गुजरता है। ससे ज्यादा समस्या तो परंपरागत एशियाई देश झेल रहे हैं। जैसे पोर्न साइट्स के अलावा ढेर सारी दूसरी साइटों पर हिंसात्मक भड़काऊ मसाला आसानी से प्रचारित किया जा रहा है। इंटरनेट की दुनिया पर सैंसरशिप लगाना संभव नहीं। हाल ही में सारी पोर्न साइटों को पाकिस्तान के मुख्य सर्वर से रोक दिया गया जिसका लोगों ने काफी विरोध भी किया। लेकिन सवाल  उठता है कि क्या यही एकमात्र तरीका है बॉडबैड मीडिया को नियंत्रित करने का?

 

नियंत्रण की उलझनें

ई-बिजनेस और ई-गवनर्ेंस को प्रोत्साहित करने के लिए 17 अक्टूबर 2000 को देश में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम लागू किया गया। कुल 94 धाराओं और 13 अध्यायों में फैले इस अधिनियम के बाद पहली बार इलेक्ट्रानिक रूप में किये गये संचार एवं कारोबार को कानूनी मान्यता मिल गयी। इससे पहले देश की न्याय व्यवस्था केबल लिखे, टाइप किये या छपे हुए दस्तावेजों को सबूत के रूप में स्वीकारती थी। लेकिन इस कानून के बाद डिजीटल सिग्नेचर वाले इलेक्ट्रानिक दस्तावेजों को भी न्यायालय ने मान्यता दे दी। कोई भी कंपनी निर्धारित नियमों के अनुसार सरकार से डिजीटल हस्ताक्षर लेने के लिए आवेदन कर सकती है। इस कानून में कंप्यूटर जगत में होने वाले अपराध को भी रोकने के प्रावधान किये गए। इसके अनुसार किसी कंप्यूटर में उसके मालिक की अनुमति के बिना किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ (कंप्यूटर चलाना, डाटा संपादित करना, नष्ट करना, चुराना, सिस्टम फाइलों के साथ छेड़छाड़ करना, वायरस डाल देना इत्यादि) को अपराध की श्रेणी में रखा गया है।

 

कानून में किसी भी प्रकार की अश्लील सूचना या तस्वीर कंप्यूटर या नेट पर छोड़ना या देखना भी अपराध बना दिया। अधिनियम के अंतर्गत साइबर कैफे में अश्लील साइट देखना या दिखाना भी गैर कानूनी बना दिया गया। लेकिन इंटरनेट माध्यम पर नियंत्रण रख पाना इसलिए काफी कठिन है क्योंकि ये ग्लोबल माध्यम है और भारतीय कानून केवल भारतीय कंपनियों एवं नागरिकों पर ही लागू हो सकते हैं। एक सवाल ये भी है कि जब इंटरनेट घरों में पहुंच रहा है तो कानून किस प्रकार अपने नागरिकों की निगरानी कर सकेगा। क्योंकि हर किसी के बेडरूम की निगरानी करना सरकार के लिए ना तो संभव है और ना ही उससे ये अपेक्षा रखी जाती। आखिर नागरिकों की निजता के अधिकार का सरकार को सम्मान करना होगा। निजता के अधिकार का हनन करने का सरकार को केवल तभी हक है जब राष्ट्रीय हित दांव पर हों।

 

डिजीटल डिवाईड का डर

वेब मीडिया के विस्तार के साथ-साथ आशंका ये भी जताई जा रही है कि क्या नया माध्यम दुनिया में एक नयी खाई को तो नहीं जन्म दे रहा है। सिध्दांतकार इस फासले को डिजीटल डिवाइड का नाम दे रहे हैं यानी एक ऐसा विभाजन जिसके एक तरफ होंगे सूचना और तकनीकी से समृध्द लोग जो समाज पर नियंत्रण रखेंगे और दूसरी तरफ होंगे समाज के सूचना विपन्न लोग जो शासित होंगे। दरअसल नये युग में संपन्नता का आधार सूचना और तकनीक बन जायेगा। ऐसे में जोर इस बात पर दिया जाने लगा है कि कंप्यूटर क्रांति का फायदा केवल शहरी मध्यमवर्ग तक ही सिमट कर ना रह जाये उसका प्रसार ग्रामीण अंचलों में भी होना चाहिए। मध्यप्रदेश के धार जिले में चलाई गई ज्ञानदूत परियोजना इस दिशा में एक प्रयोग था। दक्षिण भारत में भी गांवों में सूचना क्रांति को पहुंचाने के अनेक गंभीर प्रयास किये गए हैं। इसके तहत जिन सूचनाओं के लिए किसानों को शहर आना पड़ता था उन्हें इंटरनेट के जरिए उनके गांव में ही उपलब्ध करा दिया गया जैसे जमीन का रिकार्ड, खाद-बीज और फसल के दाम एवं अन्य प्रकार के आवेदन पत्र।

 

इसके अलावा कंप्यूटर का उपयोग विकास में कैसे अधिकाधिक किया जाये इसको लेकर भी चिंता की जा रही है। कंप्यूटर क्रांति का लाभ आम लोगों तक सही मायने में पहुंच पाये इसके लिए जरूरी है कि कंप्यूटर की कीमतों में आम जन की पहुंच तक गिरावट आये। कुछ भारतीय कंपनियां कंप्यूटर के दाम दस हजार तक कम करने पर भी विचार कर रही हैं, जिसे शुभ संकेत कहा जा सकता है। टेलीकॉम क्रांति का उदाहरण लें तो उसके बारे में भी पहले इसी प्रकार की आशंकाएं जताई जा रही थी। लेकिन एक ही दशक में टेलीफोन रखना इस कदर सस्ता हो गया कि वो अब आम आदमी की पहुंच में आ गया है। कुछ इसी प्रकार की उम्मीद कंप्यूटर के मामले में भी की जा सकती है। ये इसलिए भी सुनिश्चित कहा जा सकता है क्योंकि बाजार किसी भी माध्यम को अधिकाधिक विस्तार अपने मुनाफा बढ़ाना के लिए देगा। और उसके लिए वो उसकी कीमतों में कमी लायेगा।

 

भविष्य की डगर

एक और महत्वपूर्ण सवाल ये भी उठता है कि क्या हम इंटरनेट जैसे नयी तकनीक का सही उपयोग करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। प्रत्येक नयी तकनीक अपने इस्तेमाल करने वालों से एक न्यूनतम स्तर की तैयारी की मांग करती है। यानी उपभोक्ता इतना परिपक्व हो कि अपनी जरूरत की सूचनाएं उचित मात्रा में इंटरनेट  रूपी विशाल भंडार से निकाल ले। तकनीकी विकास ने सूचना का विस्फोट कर दिया है। इसलिए यूजर से ही आत्म सैंसरशिप की उम्मीद की जाती है। सरकार को भी ये सुनिश्चित करना होगा कि कंप्यूटर तकनीक को इस हद तक उपलब्ध करा दिया जाये कि आम लोग इसका उपयोग अपने विकास में कर सकें। इसका एक सरल उपाय स्कूलों में आरंभ से ही बच्चों को कंप्यूटर से अवगत करा देना है। अब कंप्यूटर साक्षरता अभियान चलाना होगा। साथ ही भारतीय भाषाओं में अधिकाधिक कंप्यूटर सॉफ्टवेयर विकसित किये जायें और इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं में जानकारी उपलब्ध करायी जाये।

 

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में व्याख्याता हैं।

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

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