दुधारी तलवार
पर दो-दो हाथ
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बबीता अग्रवाल
हम
अपनी जिन खूबियों की वजह से विश्व में जाने-पहचाने और माने जाते हैं उनमें सबसे
बड़ी है हमारी ग्रहणशील संस्कृति। एक हद तक अपनाने और अपना बनाने की तमीज।
संस्कृतियों के इस झुरमुट में जहां नई तकनीक और उपादानों को आजमाने-अपनाने की
ललक है,
वहीं प्रचलित तकनीकी कौशल में नए आयाम जोड़ने की चाहत भी। अब
इंटरनेट को ही लें, अपने प्रचलन के कुछ ही दशकों में
विश्व के तीन-चौथाई से ज्यादा इसके उपभोक्ता एशिया क्षेत्र में तैयार हो गए
हैं। वैसे तो अपनी विलक्षण क्षमताओं और पहुंच के कारण इंटरनेट का सर्वग्राही
संचार माध्यम की तरह फैला है, मगर एशिया के लोगों ने
उसे हाथों-हाथ लिया। पांच करोड़ उपभोक्ताओं का आंकड़ा छूने में रेडियो को
38 साल ऐड़ियां रगड़नी पड़ीं, टीवी ने
13 साल लिए , केबल 10
सालों में इस मुकाम तक पहुंचा मगर इंटरनेट ने तो उससे आधे समय में ही यह कमाल
कर दिखाया।
गुणात्मक और
संख्यात्मक दोनों ही लिहाज से सॉफ्टवेयर और इंटरनेट संबंधी जानकारों की सबसे
विशाल फौज भारत से संबंधित है। वर्ष
1999-2000 में जहां देश में
इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग का आकार 8 बिलियन
डॉलर का था वहीं चालू वित्तीय वर्ष में 32 बिलियन डॉलर
से ऊपर पहुंचने की उम्मीद है। शुरूआती उतार-चढ़ावों के बावजूद इस क्षेत्र में
अपनी वृध्दि दर बनाए रखी है। अकेले सॉफ्टवेयर और नेट सेवा से जुड़े लाखों कुशल
कर्मियों के बल पर और ई-गवर्नेंस, संचार,
परिवहन, शिक्षा,
शोध, व्यापार आदि में सूचना
प्रौद्योगिकी के बढ़ते उपयोग के कारण इसकी पैठ तेजी से बढ़ रही है। सन
2008 तक सवा दो करोड़ से
ज्यादा लोग सूचना प्रौद्योगिकी से प्रशिक्षित बन जाएं तो आश्चर्य नहीं होना
चाहिए।
व्यापार-व्यवसाय में इंटरनेट का दखल तेजी से बढ़ा है और बिलियनों डॉलर की कमाई
इंटरनेट के जरिए सिर्फ विज्ञापनों से हुई है। मीडिया तो पूरी तरह इंटरनेट की
गिरफ्त में आ ही चुका है। आज भारतीय भाषाओं का शायद ही कोई उल्लेखनीय अखबार हो
जो अपनी विषयवस्तु (कंटेंट) के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल न करता हो। समाचार-
विचार-चित्र और सूचनाओं के स्रोत और संवाहक के रूप में वेब मीडिया,
धीरे-धीरे एक ऐसा स्थान बनाता जा रहा है जो छपे हुए की सीमाओं
की वजह से समाचार-पत्रों के बस का नहीं है। टेलीविजन का एकतरफापन (लो
इंटरेक्टिविटी के संदर्भ में) और पहुंच सीमाओं के कारण उसकी कमी को पूरा करने
वाले माध्यम के रूप में वेब मीडिया बहुत तेजी से आगे आया है। ब्रॉडबैण्ड और
इंटरनेट मोबाइल ने तो कमाल ही कर दिखाया है। कल तक दुनिया को मुट्ठी में करने
की ख्वाहिश जताने वाले आज इंटरनेट के बल पर 'कर दुनिया
चुटकी में' कहने लगे
हैं।
इस तस्वीर के
और भी उजले पक्ष गिनाए जा सकते हैं मगर जब नकारात्मक मुद्दों पर ध्यान जाता है
तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। साइबर अपराध,
जो महज एक दशक पहले इक्का-दुक्का लोकरूचि समाचारों का वायस बन
जाया करते थे, निहायत तेजी से बढ़ रहे हैं। नेट पर अशील,
अविश्वसनीय, अवांछित सामग्री की बाढ़ आई
हुई है। बच्चे, युवा और यहां तक कि बूढ़े इंटरनेट की
रूमानी दुनिया में खोते जा रहे हैं। क्या खूब विरोधाभास है कि जिस संचार माध्यम
से उम्मीद की जा रही थी कि वह सारे विश्व को एक बिरादरी बना देगा,
वही आज इंसान को 'गुम'
कर देने का मंतर बनता जा रहा है। बस आप हैं और आपका पीसी। इसने
रच दी है फरेब की एक ऐसी दुनिया जहां आप किसी भी अनजान ई-मेल से खौफ खाने लगे
हैं। गैर-जिम्मेदारी का आलम और बेनामी का फायदा उठाकर लोगों को ठगते,
लूटते, धमकाते साइबर-गुडों का
साम्राज्य! इंटरनेट के शुरूआती दिनों का लतीफा आज भी लोग भूले नहीं है जिसमें
सर्फिंग करते दो कुत्ते आंख मारकर एक दूजे से कहते हैं 'चलने
दो! इंटरनेट पर कौन जानता है कि तुम कुत्ते हो!'
कहने को
भारतीय भाषाओं की ढेरों साइटें (वे ठिकाने) बनी हैं मगर लोकप्रिय कंटेंट के नाम
पर क्या परोसा जा रहा है?
गतिशील, आधुनिक और लोकप्रिय भाषा के
नाम पर 'भाषा' का भूसा बनाया जा
रहा है। हिंदी का तो नेट पर इतना ज्यादा वर्ण संकरीकरण कर दिया गया है कि उसे
पहचानना मुश्किल हो रहा है। अभी कुछ समय पहले तक हिंदी को संस्कृत की पुत्री
कहने वाले, सोचने को मजबूर हो गए हैं 'हिंदी
इंग्लिश की डॉटर' तो नहीं हो जाएगी?
यही हाल संस्कृति का है। उदारवाद के नाम पर सब प्रकार की छूट।
चाहे संगीत हो, गीत हो, साहित्य
हो, सबमें रीमिक्स का दौर उफान पर है। लोग असल और नकल
का भेद भूलते जा रहे हैं। वर्चुअल यानी प्रपंच , जो है
भी और नहीं भी है। इस वर्चुअलिटी की डरावनी छाया बाजार से उतरकर अब 'घरों'
को लील लेना चाहती है। संबंधों के बनने-बिगड़ने की शैली
विन्डोज पर पेज खुलने बंद होने जैसी बनती जा रही है। एक सूत्रीय संदेश निकालो
काम और करो तमाम! हकीकत, ठहराव,
लगाव, सादगी जैसी चीजें विदा हो रही हैं- बाजार का
'नेट' (जाला)
सभी को गिरफ्त में लेने पर उतारू है।
बहरहाल नेट की
दुधारी तलवार पर हिन्दुस्तान की पकड़ मजबूत होती जा रही है। तलाश है नेट को लेकर
वाजिब प्रतिमान गढ़ने की। सरकारें,
मीडिया,
सामाजिक जीवन के सूत्रधार सभी मिलकर
कुछ करें अन्यथा तो जिन्न अब बोतल से बाहर आ ही चुका है।
लेखिका
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय,
भोपाल में प्राध्यापक हैं।

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