सरपट दौड़ा था
हिन्दी खोज इंजन
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अशोक चतुर्वेदी
कहते
हैं कि हिंदी की विकास यात्रा
700 ईस्वी से शुरू हुई। आज
जिस हिंदी को हम जानते हैं, उसका भी दो सौ साल से
ज्यादा का उजला इतिहास है। किताबी आंकड़े कुछ भी कहते हों,
विश्व में हिंदी जानने वालों की तादाद आधा अरब के करीब बैठती
है। सन 1936 के बाद से तो हिंदी विश्व की सबसे तेज बढ़ने
वाली भाषाओं में से एक है। कमाल की बात यह है कि हिंदी में पूंजी और तकनीक के
बित्ताभर निवेश के बावजूद ऐसा संभव हुआ है और हो रहा है। अंग्रेजी,
जिसके विकास और प्रसार के लिए अब तक अरबों डॉलर खर्च हुए और
जिसे विश्व भाषा कहकर अमूमन हर कॉमनवेल्थ देश के सिर-माथे बैठाया गया,
उसे वैज्ञानिक और तकनीकी
खोजों का लाभ भी भरपूर मिला।
संचार के लगभग
हरेक माध्यम पर अंग्रेजी का कब्जा पहले-पहल हुआ,
जमकर हुआ। 'जो मारे,
सो मीर' के अंदाज में हुई इस भाषाई फतह
के पीछे पलने वाले कारणों की तफ्तीश करना यहां हमारा मकसद नहीं है,
मगर हम कुछ कमियों के बावजूद हिंदी के लगातार फैलते-उफनते जाने
की वजह जरूर सामने लाना चाहते हैं। जी हां, यह है इस
भाषा की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और इसे बोलने वालों की भावना,
जिसका लोहा मनवाने के लिए किसी हिमायती की दरकार नहीं है।
हिंदी जानने-समझने वालों की व्यापारिक-व्यावसायिक महत्वाकांक्षाएं किसी से कमतर
नहीं। इस भाषा का राग और रस, संस्कृत के छंदों और उर्दू
की पुरअसर शायरी की विरासत से झरता है। इसके बोलने वालों में अदम्य जिजीविषा
समाई है, इसलिए आजादी
के पहले अंग्रेजों और उसके बाद अंग्रेजदाँ लोगों की बद्दुआओं के बाद भी इसका
जादू सिर चढ़कर बोलता रहा है।
शिक्षा जगत के
नवीनतम अध्ययन बता रहे हैं कि
'मानव मस्तिष्क की
सर्वश्रेष्ठ क्षमताएं, उसकी मातृभाषा में ही विकसित
होती हैं।' आप मानें न मानें,
मुहल्ले-मुहल्ले में स्कूलों और मॉडर्न महाविद्यालयों की पोल लोगों की नजर आने
लगी है। अब लोगों का ध्यान नए सिरे से अपने बच्चों को हिंदी सिखाने की तरफ जा
रहा है, क्योंकि अंग्रेजी मोह के चक्कर में हमारी पूरी
एक पीढ़ी न घर की और न घाट की रही है,
इसलिए ताजुब नहीं होना चाहिए कि आने
वाले दिनों में झख मारकर प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का सबसे लोकप्रिय और
प्रामाणिक माध्यम हिंदी तथा कुछ भारतीय भाषाएं हो जाएं!
दूसरी तरफ
आप्रवासी और गृहविरही भारतीय भाषा-भाषियों के सामने खड़े पहचान के संकट से
निपटने में हिंदी संपर्क एक रामबाण नुस्खा साबित हुई है। भाषा और पहरावा एक
पताका की तरह उनके साथ होते हैं,
जो अपनी मां और मिट्टी से खुद को ममता के मजबूत तार को बांधे
रहते हैं। नतीजतन हिंदी फैलती गई है। व्यापार, वाणिज्य,
ज्योतिष के क्षेत्र में आज देश की सबसे प्रचलित भाषा हिंदी है।
यहां तक कि कैरियर के विकास के लिए पिछले एक दशक में हिंदी का चलन धीरे-धीरे
बढ़ा है। पिछले एक दशक से आईएएस और एलाइड सेवाओं में लगभग एक चौथाई लोग हिंदी
माध्यम में परीक्षा देकर प्रवेश पाने लगे हैं, इसलिए नए
नौकरशाहों में एक बहुत बड़ा तबका है,
जिसकी परवरिश हिंदी संस्कार की
परवान चढ़ी है।
ऐसे परिवेश
में इंटरनेट के जरिए पनप रहे विश्वव्यापी संजाल (डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू) पर
नजरसानी मुनासिब है। ऐसा हो नहीं सकता कि एक बढ़ती हुई भाषा और उसे बोलता हुआ
महत्वाकांक्षी तबका तकनीकी बदलाव से देर तक मुंह मोड़े रहे। संसदीय लोकतंत्र,
जिसे गालिबन संवाद और सौमनस्य पर टिकी शासन व्यवस्था माना जाता
है, खुलेपन के दौर में ऐसे संजाल को पनपाने और उससे लाभ
उठाने में आखिर क्यूंकर पीछे रहेगी? जगजाहिर है कि
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और बेशक सबसे बहुरंगी विशाल बाजार व्यवस्था में
जैसे-जैसे मशीने सुलभ व सस्ती होती जाएंगी, वैसे-वैसे
उनको अपने ढंग से इस्तेमाल करने वाले भी आगे आएंगे। बस यहीं आकर लगता है कि
भारतीय भाषाओं, खासकर हिंदी का चलन कंप्यूटर और इंटरनेट
पर इससे भी आगे बढ़ेगा। माहौल को देखकर उद्यमियों और निवेशकों ने अपनी कमर कस ली
है। इंटरनेट पर हिंदी महज मिशन या सेवाभाव का मामला नहीं है,
यह शुध्द व्यवसाय है और वह भी लाभ का। यहां पूंजी फंसाकर उतना
लंबा इंतजार भी नहीं करना है, जितना 'याहू'
या इस किस्म के अंग्रेजी पोर्टलों को करना पड़ा। इंदौर में श्री
विनय छजलानी ने हालात को तौलकर सितंबर 1999 में पूर्व
प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के हाथों हिंदी के पहले पोर्टल 'वेबदुनिया'
का लोकार्पण दिल्ली में
कराया था।
शुरूआती दौर
में इंटरनेट पर अपने उपयोगकर्ताओं के लिए इसके पास थी चार या पांच भाषाओं में
संवाद की सुविधा और परोसने को उम्दा सांस्कृतिक-साहित्यिक सुगंध सहित व्यापक
समाचार सामग्री। श्री प्रकाश हिन्दुस्तानी ने संपादकीय कमान संभाली और अमित
गोयल,
आशीष गीते जैसे उत्साही लोग
तकनीकी मोर्चे पर जमे। पोर्टल के रूप में पूरा आकार लेने के लिए अब इसे एक सर्च
इंजन की जरूरत थी। इसी बीच नवंबर में संयोगवश यह लेखक भी इस अभियान से जुड़ा।
श्री विवेक जैन और श्रीमती बबीता अग्रवाल ने इस कार्य में तकनीकी सहयोग दिया।
सर्च इंजन के
लिए पहली दरकार थी एक वर्गीकरण की। पुस्तकालय विज्ञान की भारी-भरकम पध्दतियों
की भूलभुलैया में ऐसी गली निकालना टेढ़ी खीर थी,
जिससे गुजरकर भावी उपयोगकर्ता इंटरनेट पर अपनी मनपसंद जानकारी
को खोज सके। हिंदी की पहली थिसारस के लेखक अरविंद कुमार ने कुछ उपयोगी सुझाव इस
दिशा में जरूर दिए, मगर उन्हें अंजाम देना बाकी था। जब
इससे निपटे तो सहज सवाल उठा कि हिंदी के सर्च इंजन को नेट पर फैले अंग्रेजी
पृष्ठों की जानकारी भी अपने पाठकों को क्यों नहीं देनी चाहिए?
सवाल के पक्ष और विपक्ष में अनेक तर्क थे,
पर श्री अभय छजलानी के मार्गदर्शन में आखिरकार इसका समाधान भी
निकला। तय पाया गया कि 'हिंदी का सर्च इंजन'
इतना स्वयंपूर्ण होना चाहिए कि कम से कम अपने परिणामों के लिए
तो अंग्रेजी का मोहताज न बने। हां, यदि हम आगे जाकर
अन्य भारतीय भाषाओं के जोड़ (लिंक्स) दे सकें तो इससे अच्छे संकेत जाएंगे और ऐसा
करने से प्रबंधन को दीर्घकालीन लाभ मिलेगा। अब रास्ता साफ था,
मगर 23 फरवरी 2000
का लक्ष्य सामने था। लगभग 12 सौ
श्रेणियों-उपश्रेणियों में हजारों नेटपृष्ठों में फैली-बिखरी सामग्री के लिए
कुंजी शब्दों और वाक्यांशों को तैयार करने की चुनौती कुछ कम भारी नहीं थी। मगर
'वेबदुनिया'
की उत्साही टीम ने इसे भी आखिर पूरा
कर ही डाला और तयशुदा मुंबई के ताज होटल में इसका विधिवत शुभारंभ हो गया। थोड़े
ही समय में लाखों बार इंटरनेट पर इसे लोगों ने आजमाया।
शुरूआती दौर
पर भी
'वेबदुनिया खोज', 'वेबदुनिया'
और 'नईदुनिया'
के वेबपृष्ठों में दी गई ढेरों सामग्री तक पहुंच बनाती थी लेकिन जल्द ही इसका
विस्तार हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में नेट पर उपलब्ध सामग्री को खोजने के
लिए कर दिया गया। खेल, संस्कृति,
साहित्य, मनोरंजन,
पर्यटन, व्यंजन,
व्यापार-वाणिज्य और स्वास्थ्य की श्रेणियों को उनकी सैकड़ों
उपश्रेणियों में बांटकर,
नेटपृष्ठों की सामग्री को वर्गीकृत
किया गया। उपभोक्ता चाहे तो कुंजी शब्द के सहारे सभी श्रेणियों में या श्रेणी
विशेष में या लेखक के नाम से वांछित सामग्री को खोज सकते हैं।
इसका उपयोग
बेहद आसान और मनोरंजक रहा। हिंदी में जिस तरह,
जिस शब्द या वाक्य या उसके हिस्से को आप बोलते हैं,
बस उसे रोमन लिपि में अपने कंप्यूटर के कुंजीपटल (की-बोर्ड) पर
लिख भर दीजिए। जिस वक्त आप रोमन में टाइप करते हैं,
उसके साथ ही साथ आपके कंप्यूटर परदे (स्क्रीन) पर देवनागरी में उसका लिप्यांतर
(ट्रांसलिटरेशन)होता चलता है। जरूरत के मुताबिक आप अक्षरों को अदल-बदलकर,
वर्तनी जांचकर दुरुस्त कर सकते हैं। बस इसके फौरन बाद मूस
(माउस) का इस्तेमाल करते हुए जानकारी को प्रकट होने का आदेश दें। कोई भी
महत्वपूर्ण विषयवार जानकारी या उस विषय पर अन्य सूचना स्रोत जो नेट पर हैं
उपभोक्ता तक पलक झपकते पहुंच जाते थे। यदि आप कोई वाक्यांश,
शब्द समूह खोजना चाहते हैं तो बिना कोई जगह छोड़े (विदाउट
स्पेस) उसे टंकित करें। साथ ही, 'और'
के * (सितारा) तथा 'याअथवा'
के लिए ! (विस्मयादि बोधक
चिन्ह) का उपयोग किया जा सकता था। चाहें तो किसी खोज श्रेणी की आखिरी पायादन
पर आई उपश्रेणी को क्लिक करके उसमें दर्ज लिंक्सजोड़ों की पूरी सूची हासिल कर
सकते थे। यह सुविधा भी मौजूद थी कि श्रेणी खोज के दौरान एक से दूसरी उपश्रेणी
पर अगली खोज के लिए पहुंच जाते थे।
हिंदी के खोजी पाठकों की संदर्भ यात्रा के लिए तैयार सर्च इंजन पूरी तरह भारतीय
तकनीक और कौशल का फल था। इसमें अगर कोई चीज विदेशी थी तो वह थी निवेशक वाल्डेन
इंटरनेशनल और आप्रवासी प्रकाश भालेराव,
जिन्होंने परियोजना पर अपने विश्वास की मुहर लगाते हुए इसमें
शुरूआती दिन ही 2.3
मिलियन डॉलर से ज्यादा पूंजी लगाने की घोषणा की थी। इस तरह कई करोड़ रुपए की
पूंजी से यह पोर्टल समृध्द होने लगा। प्रयाग-कुंभ जैसे अखिल भारतीय पर्वों के
आयोजन के दौरान ही नहीं अन्य अनेक अवसरों पर इस पोर्टल ने हिंदी पत्रकारिता का
परचम लहराया। इस पोर्टल के उपांग के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल
बिहारी वाजपेयी ने संविधान डॉट कॉम को लोकार्पित किया। पहली बार संविधान खोजे
जा सकने वाले (संदर्भ-ग्राही) रूप में इंटरनेट पर पेश किया गया।
दुर्भाग्य से
शेयर मार्केट में डॉट कॉम का बुलबुला फूटने के साथ ही सन
2002
में वेबदुनिया, खासकर खोज इंजन के बुरे दिन शुरू हो गए।
द्वितीय चक्र के निवेश के अभाव में धीरे-धीरे इसकी टीम बिखरती गई। हमारे यहां
विश्वविद्यालय और सरकार शोध-कार्यों के लिए अनुदान,
शास्त्री और विशेषज्ञ टाइप के लोगों को देते हैं। इंटरनेट और वह भी हिंदी में,
किसी को भी इस पूंजी और समय खर्च करना नहीं रुचा। लिहाजा,
वेबदुनिया का खोज इंजन जिस उत्साह से शुरू हुआ,
उसी लाचारगी के साथ खड़ा-का-खड़ा रह गया। लेखक ने स्वयं वर्धा
स्थित हिंदी विश्वविद्यालय और भोपाल स्थित पत्रकारिता विश्वविद्यालय के
पदाधिकारियों को खोज इंजन पर कार्य जारी रखने के लिए प्रस्ताव भेजे लेकिन मदद
करना तो दूर किसी ने शुरूआती बातचीत के लिए भी बुलाना ठीक नहीं समझा। इस बीच
हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता को भांपकर कुछ अंतरराष्ट्रीय नेट खिलाड़ियों ने हिंदी
खोज इंजन शुरू करने के प्रयास किए हैं लेकिन वे ठीक तकनीक न अपनाने की वजह से
उतने भी सफल नहीं हो सके, जहां तक वेबदुनिया का हिंदी
का खोज इंजन पहुंच था। स्वयं इंटरनेट के विकास में अमरीकी विश्वविद्यालय ने ढेर
से संसाधन खपाए इैं। जहां तक अंग्रेजी भाषा का सवाल है उसने तकनीकी विकास से
अपने कदम सदा मिलाए रखे हैं। अंग्रेजी का इतना प्रसार ही इसलिए हुआ है क्योंकि
उसके विकास में अरबों डॉलर का निवेश हुआ है और इस कार्य में सैकड़ों भाषाविदों
और हजारों तकनीकविदों का परिश्रम लगा है। सुनने में बुरी लगे लेकिन यह कड़वी
सच्चाई है कि भारतीय भाषा-भाषी, खासतौर से हिंदी वाले
पिछलग्गूपन के शिकार रहे हैं। अपने उपयोग के बाद जो भी साहब फेंक दें उसी को
पहन-ओढ़कर हम फैशन बघारने लगते हैं। यही हाल तकनीकी विकास के क्षेत्र में हो रहा
है। अपवाद छोड़ दें तो हम अपने दम पर ज्यादा कुछ नया और अनुकरणीय कर ही नहीं
पाते। स्वदेशी के नाम पर मात्र पुर्जे जोड़ने (एसेम्बलिंग) और शोध के नाम पर
संदर्भ बदलने जैसे खेल करके आखिर हम कब तक अपने-आप को बहलाते रहेंगे?
वेबदुनिया खोज
की प्रमुख विशेषताएं थीं-
1. अकेला सक्रिय खोज
इंजन जिसके पास सैकड़ों हिंदी वेबसाइटों (160)
का विशेषज्ञों द्वारा वर्गीकृत
संदर्भ था।
2. विभिन्न वेबसाइटों
से लगभग 1300 से अधिक श्रेणियों में वर्गीकृत
35000 जोड़ (लिंक्स) थे।
3.
एक लाख से ज्यादा पृष्ठों का
वर्गीकृत संग्रह था।
4.
विषय श्रेणियों के साथ-साथ कुंजी
शब्दों (की वर्ड्स) के जरिए अथवा लेखक के नाम से खोजने की सुविधा थी।
5. खेल,
संस्कृति, साहित्य,
मनोरंजन, पर्यटन,
व्यंजन, व्यापार,
स्वास्थ्य जैसी अनेक श्रेणियां,
उपश्रेणियों में बांटी गई थी।
6.
हिंदी की कुंजी पटल या विशेष फॉन्ट
डाउनलोड करने की जरूरत नहीं थी।
7.
समसामयिक मुद्दों (हॉट की वर्ड्स)
पर विशेष रूप से संजोई गई जानकारी पेश की जाती थी।
8.
विषय विशेषज्ञों द्वारा हरेक वेबपेज
का दो लाइनों में सारांश दिया जाता था।
9.
साइट विशेषज्ञ के संग्रह भी उपलब्ध
थे जिनसे उनकी सामग्री को तेजी से खोजा जा सकता था।
10.
खोज इंजन के तमिल और मलयालम संस्करण
भी बनाए गए जो समान वर्गीकरण और तकनीक पर आधारित थे।
11.
चूंकि डाटाबेस को लगातार अद्यतन
किया जाता था इसलिए निष्फल जोड़ (लिंक्स) बहुत कम मिलते थे और प्राय: चाही गई
जानकारी उपभोक्ता को मिल जाया करती थी।
लेखक
वेब दुनिया डॉट कॉम के प्रथम संपादक व इन दिनों मुख्यमंत्री, छ.ग. के संसदीय
सलाहकार हैं।

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