Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 4, जून - अगस्त, 2007)

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आवरण कथा

 

 

तकनीकी युग में हिन्दी पत्रकारिता

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अमिताभ त्रिपाठी  

 

पिछले डेढ़ दशक में जिस अप्रत्याशित रूप से तकनीक का विस्तार हुआ है, उसने देश के समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान सबको बदल कर रख दिया है। अब व्यक्ति की पहुंच वैश्विक हो गई है। कंप्यूटर पर एक क्लिक से आप घर बैठे दुनिया के किसी भी कोने का भ्रमण कर सकते हैं। मोबाइल पर आई तकनीक ने दृश्य-श्रव्य का मिश्रण एक छोटे से मोबाइल सेट में कर दिया है जिसमें व्यक्ति हर क्षण हर प्रकार की सूचनाओं से लैस रह सकता है। इस तकनीक के कारण लोगों की पहुंच वैश्विक हुई है परंतु वैश्विक मूल्य भी हमारे दरवाजे तक पहुंच गए हैं। तकनीक ने व्यक्ति को बाजारमूलक बना दिया है, जहां मुनाफा भगवान और मोक्ष दोनों ही है और बाजार में सबकी कीमत है फिर वह आस्था, लाभ, मर्यादा कुछ भी हो। इस बाजारवाद ने लोगों की सोच को भी प्रभावित किया है।

 

परन्तु यह परिवर्तन इतना तीव्र और गतिमान है कि इसके प्रभावों के विशेषण का मौका मिले कि इससे पूर्व कुछ नया परिवर्तन सामने आ जाता है परन्तु अब यह संक्रमणकाल कुछ हद तक स्थिर होता दिख रहा है। कम से कम इतना तो स्पष्ट है कि तकनीक के द्वारा लोगों की पहुंच वैश्विक रहेगी। ऐसे में वैश्विक संस्कृति के विकास की आड़ में पाश्चात्य संस्कृति को स्वीकार्य बनाने का प्रयास हो रहा है।

 

1450 से लेकर आज तक विश्व में जो भी परिवर्तन हमें दिखे हैं, वे पश्चिमोन्मुखी रहे हैं। ऐसे में तकनीक की इस आंधी में भी पश्चिम की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। इस तकनीकी विकास को हम नव उपनिवेशवाद कहें या बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पराराष्ट्रवादी पराक्रम, पर इतना तो स्पष्ट है कि हमें वर्तमान विश्व व्यवस्था के समक्ष या तो समर्पण करना होगा या फिर उसका प्रयोग कर अपनी चुनौती खड़ी करनी होगी।

 

यह विषय इस कारण अधिक प्रासंगिक है क्योंकि हिंदी पत्रकारिता का नई तकनीकी विश्व व्यवस्था से सीधा संबंध है। भारत में 19वीं और 20वीं शताब्दी में भी राष्ट्रीय पुनर्जागरण में हिंदी पत्रकारिता का सीधा योगदान था। उस समय साहित्य और पत्रकारिता परस्पर संपर्कित थे और प्रत्येक श्रेष्ठ साहित्यकार, पत्रकार भी था। हिंदी पत्रकारिता ने अंग्रेजों द्वारा अपने लाभ के लिए विकसित तकनीक प्रिंटिंग प्रेस की सहायता से 'स्व' का भाव देश में व्याप्त कर एक आंदोलन की भूमिका निर्वाह की। जिस समय स्वामी विवेकानंद वेदान्त के प्रवचन से भारतवासियों को उनमें व्याप्त ब्रह्म शक्ति से परिचित करा रहे थे, तो प्राय: उसी समय जयशंकर प्रसाद अपने प्राचीन पात्रों की सहायता से अपने नाटकों में 'हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुध्द शुध्द भारती' का उद्धोष कर रहे थे। इसी प्रकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल' बताकर स्वभाषा को माध्यम बनाकर जन में 'स्व' का भाव उत्पन्न किया और फिर इस धरा पर चलने वालों की लंबी श्रृंखला रही महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे लोगों ने भाषा को राष्ट्रीय पुनर्जागरण का हथियार बना लिया। परन्तु यह सब कुछ इस कारण संभव हो सका कि अंग्रेजों की शिक्षा नीति को भारत में क्लर्क उत्पन्न कराने की मंशा को ध्वस्त करते हुए देश की अनेक विभूतियों ने इसका प्रयोग विश्व के साथ स्वयं को जोड़ने में किया। तत्कालीन राष्ट्रवादी आंदोलनों के नायकों के जीवन चरित्र का हिंदी में अनुवाद हुआ और उनसे प्रेरणा लेकर भारत में भी कुछ करने की जिज्ञासा जगी। इस प्रकार तत्कालीन आधुनिकता को स्वीकार कर हिंदी पत्रकारिता में गति आई और इसमें अंतर्निहित क्षमता के साथ मिलकर इसने अंदर ही अंदर लोगों को आंदोलित किया। हिंदी पत्रकारिता के स्वभाषा के लगाव के कारण ही स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने वाला प्रत्येक प्रमुख व्यक्ति पत्रकारिता और लेखन को अपनी गतिविधि का अभिन्न अंग बनाकर चलता रहा।

 

स्वतंत्रता पश्चात हनुमान प्रसाद पोद्दार ने गीता प्रेस के माध्यम से जन संस्कार का दुष्कर कार्य अपने हाथों में लिया और प्रिंटिंग प्रेस की तकनीक के सहारे ही घर-घर में अत्यंत सस्ते दामों में धर्मग्रंथ और दर्शन हिंदू घरों में उपलब्ध करा दिया। आज हिंदी पत्रकारिता पुन: एक  मुहाने पर खड़ी है, जहां इसे अंतर्मुख या बहिर्मुख के विकल्पों में से एक का चयन करना है। संभव है कि हम अपने पूर्ववर्ती प्रेरणा पुरुषों से प्रेरणा प्राप्त कर कोई बीच का रास्ता निकाल सकें जहां तकनीक के सहारे हिंदी पत्रकारिता को विश्व में एक स्थान दिला सकें।

 

आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और वेब पत्रकारिता ने भाषा की शुध्दता पर गंभीर प्रश् खड़ा कर दिया है। फारसी, उर्दू और अंग्रेजी के अनेक शब्द हिंदी में घुसपैठ करते जा रहे हैं। कुछ समाचार पत्र और टीवी चैनल एक विचित्र प्रकार की हिंग्लिश भाषा का सृजन करने में लगे हैं। ऐसी परिस्थिति में हिंदी पत्रकारिता के समक्ष एक चुनौती है। इस भाषा के मिश्रण के साथ हिंदी पत्रकारिता को बाजारवाद से भी कड़ी चुनौती मिलने वाली है, जहां मुनाफे की होड़ में जनसंस्कार और जनशिक्षण का पत्रकारिता का दायित्व पीछे छूट सकता है। सबसे बड़ा प्रश् यही है कि इन चुनौतियों का सामना करने की रणनीति क्या हो, तो इस बात का उत्तर आज की समस्या में ही है। यदि हम तकनीक और बाजारवाद को शरीर मानें तो मुनाफा प्राप्त कर बाजार हड़पना इसकी आत्मा है। हमें बाजारवाद के शरीर में अपनी आत्मा का प्रवेश कराना है। अर्थात तकनीक और बाजार प्राप्त करने के हुनर से हिंदी पत्रकारिता को शिखर तक ले जाना है।

 

हमारे समक्ष इस संबंध में एक उदाहरण भी है। वर्तमान पत्रकारिता के जन से कटने का परिणाम हमें चिट्ठाकारिता या ब्लागिंग के उदय में देखने को मिला। चिट्ठाकारिता के उदय ने पत्रकारिता में आए शून्य को भर दिया और चिट्ठाकारिता तेजी से एक स्वतंत्र विधा बनकर उभर रही है। चिट्ठाकारिता की इस नई विधा ने सबसे तेज तकनीक वेब का प्रयोग कर वेब पत्रकारिता के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं।

 

चिट्ठाकारिता को पत्रकारिता से जोड़कर उसे अपनी तासीर और मिट्टी की महक देने के लिए 'लोकमंच' ने अभिनव प्रयोग किया ताकि पत्रकारिता चिट्ठाकारिता के मर्म को समझ सके और पत्रकारिता के माध्यम को चिट्ठाकार भी अपना सकें। 'लोकमंच' अपने प्रयासों में कितना सफल होगा यह तो समय बताएगा परंतु अभी तक की सफलता ने इस प्रयोग की सार्थकता को प्रमाणित किया है।

 

आज पत्रकारिता के समक्ष सबसे बड़ा संकट उसके मूल्यों को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास है। इस प्रयास में पत्रकारिता को केवल समाचार देने वाली या घटनाओं को बताने वाली एजेंसी मान लिया गया है जहां समाचार बाजार में बेचने वाली वस्तु रह गई है और पाठक एक उपभोक्ता। इस परिभाषा में पत्रकारिता के मूल स्वरूप के लुप्त हो जाने का खतरा है। क्योंकि विक्रेता वही बेचेगा जो उपभोक्ता खरीदेगा और उपभोक्ता अपनी क्रय शक्ति के आधार पर ही खरीदेगा। ऐसे में तो पत्रकारिता को वही सुनाना और दिखाना पड़ेगा जो अधिक क्रय शक्ति वाला उपभोक्ता चाहेगा। इस नए संबंध में नैतिकता, संस्कार और जनशिक्षण के लिए कोई स्थान नहीं है और अशील, कुसंस्कारित और आम जन से कटा अभिजात्य वर्ग के आकर्षण की चीजों को परोसना कहीं भी पत्रकारिता के मूल्यों के विरुध्द नहीं माना जाएगा।

 

पत्रकारिता की इस परिभाषा को रोकने के निमित्त 'लोकमंच' ने एक वैचारिक आंदोलन की राह पकड़ी है, जहां व्यावसायिक चमक-दमक में गुम रचनाकारों को मंच दिया जाएगा ताकि वे नई तकनीक के माध्यम से अपने विचार विश्व स्तर पर पहुंचा सकें। 'लोकमंच' का प्रयास है कि प्रत्येक चिट्ठाकार और रचनाकार स्वांत: सुखाय के साथ अपने सामाजिक दायित्व की पूर्ति के लिए भी लिखे।

 

हिंदी पत्रकारिता का भविष्य उज्जवल है और रचनाकारों और चिट्ठाकारों को तकनीक में आए व्यापक परिवर्तनों का प्रयोग कर बाजारवाद के दबावों का समुचित उत्तर देते हुए एक साथ आना चाहिए, जहां परस्पर विरोधी विचारधारा होते हुए भी हिंदी के विस्तार के लिए समान उत्कंठा हो।

लेखक लोकमंच डॉट कॉम के संपादक हैं।

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

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