जरूरी है
बौध्दिक बहस
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बसंत कुमार तिवारी
पत्रकारिता को
लेकर चलने वाली बहसों में उसकी शक्तियां,
चुनौतियां और भविष्य पर काफी
चर्चा होती है। खास तौर पर भाषायी पत्रकारिता में। यह मानकर चला जाता है कि
भाषाई पत्रकारिता का सीधा टकराव अंग्रेजी की पत्रकारिता से है जबकि ऐसा शायद ही
है। वहीं भाषाई पत्रकारिता केवल हिन्दी भाषी समाचार पत्रों तक सीमित नहीं है।
हिन्दी के साथ ही अनेक दक्षिण भारतीय भाषाओं की भी पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित
होती हैं। उनकी प्रसार संख्या और प्रभाव का प्रतिशत हिंदी से कहीं ज्यादा है।
यह सही है कि
गुलामी के दिनों में अंग्रेजी समाचार पत्र पहले निकले पर वे आम भारतीय के बीच
लोकप्रिय नहीं बने। उनकी भूमिका प्रारंभ में सत्ता के संदेश आम आदमी तक
पहुंचाने तक सीमित रही। वे आम आदमी का संदेश सत्ता तक शायद ही पहुंचा सके।
स्वाधीनता
संग्राम में भाषाई पत्रकारिता ने अहम भूमिका अदा की जब उसने हिन्दी सहित अन्य
भाषाओं में स्वाधीनता संग्राम का न केवल संदेश घर-घर पहुंचाया बल्कि लोगों को
घरों से बाहर निकालकर एक आंदोलन का स्वरूप धारण कराया। यह सही नहीं है कि
पत्रकारिता ने स्वाधीनता संग्राम की कोई नीति तय की थी। दरअसल नीति तो तिलक और
गांधी ने तय की थी। भाषाई पत्रकारिता ने उसे लोकप्रिय बनाकर आजादी की एक शक्ति
बनाई। आजादी के बाद आपातकाल में तो समाचार पत्रों ने लगभग समर्पण कर दिया था।
जेपी ने विरोध और लड़ने की नीति तय की और पत्रों ने उसी दिशा में काम किया। वीपी
सिंह ने राजीव गांधी के विरुध्द विद्रोह किया और अखबार जब उनके साथ हुए तब
वातावरण बन सका। राजनीति ही नीति निर्धारित करती आई है। आज भी यह भ्रम नहीं
होना चाहिए कि भाषाई या अंग्रेजी पत्रकारिता की नीति निर्धारण में कोई अहम
भूमिका होती है। पर आम आदमी की भावना को यदि सत्ता तक पहुंचा पाती है तो शायद
अपनी भूमिका अदा करती है। आजादी के बाद दो दशक तक तो पत्रकारिता की शक्ति से
सत्ता,
समाज और राजनीति भय खाती थी। अब शायद ही। अब यह उम्मीद नहीं की
जाती कि भाषाई पत्रकारिता वैसी कोई भूमिका अदा कर पा रही है जैसा उसने
स्वाधीनता संग्राम के समय की थी। इधर 80 के बाद तो
भाषाई पत्रकारिता का स्वरूप ही बदल गया और अब वह आम आदमी की आवाज कम,
सत्ता और राजनीति की बुलंद आवाज बनकर रह गई है। शायद उसी का
वर्चस्व और एकाधिकार बढ़ता जा रहा है। मिशन से व्यवसाय बने समाचार उद्योग का
पुन: मिशन बनना लगभग असंभव लगता है क्योंकि व्यवसायी और धनार्जन को मूल लक्ष्य
पर चलाना कठिन ही लगता है। समाचार पत्रों और पत्रकारिता के पहले निहित स्वार्थ
नहीं थे पर अब वैसा नहीं है। स्वार्थों की इस लड़ाई में संपादक नाम की संस्था
विलुप्त हो गई है। अब जब देश में संस्थाएं और 'ट्रस्टीशिप'
खत्म हो गई है तो संपादक की
वापसी कैसे होगी। लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ माना गया है जबकि उसे
मुख्य स्तंभ होना चाहिए। स्थिति यह है कि जब तीन टांग से लोकतंत्र चल निकला हो
तो चौथा क्या करे। कभी-कभी तिलंगे को गिरने से बचाने में वह अवश्य मदद कर रहा
है। यह शक्ति बनी रहे तो स्थिति आशाजनक रहेगी।
जहां तक
चुनौतियों का प्रश्न है तो भाषाई पत्रकारिता के सामने अंग्रेजी पत्रकारिता कोई
चुनौती नहीं है। चुनौती तो दोनों के ही सामने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया है जिसकी गति,
सम्प्रेषण क्षमता और तकनीक
बेहतर है। वह प्रिंट मीडिया की तुलना में तेजी से आम लोगों तक पहुंचता है। पढ़कर
प्रभावित होने की तुलना में देखकर व दिखाकर वह जल्दी प्रभावित करता है। इसीलिए
संप्रेषण भी जल्दी करता है। कमी यह है कि वह एक समाचार और घटना को लगातार
दिखाकर पाठक और दर्शक को थका देता है। प्रिंट मीडिया के लिए यह अच्छा है
क्योंकि पाठक फिर उसकी ओर नए और विवेचनात्मकता की तलाश में लौटता है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पाठकदर्शक संख्या कहीं ज्यादा है क्योंकि वह एक साथ एक
ही क्षण सब जगह पहुंच जाता है। प्रिंट मीडिया को पहुंचने में देर लगती है। वैसे
इंटरनेट पर प्रिंट मीडिया पहुंचता है पर यह सुविधा आम आदमी के पास नहीं है।
आज की तुलना
में पहले दुनिया बहुत बड़ी और पहुंच के बाहर थी। अब उतनी बड़ी नहीं है औंर पहुंच
के पास है। पहले व्यक्ति और समाज को अस्तित्व का संकट कम था। चुनौतियां कम थी।
अब दोनों का संकट है और इसलिए जब आपको स्थानीय,
प्रांतीय या देशीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं,
विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा करनी है तब कहीं ज्यादा चुनौतियां
हैं। हिंदी या भाषाई पत्रकारिता अंग्रेजी को निरस्त कर उसकी तमाम बुराइयां करे,
तब भी यह स्वीकार करना होगा कि नई पीढ़ी के सामने उसके बिना कोई
विकल्प नहीं है। भाषाई पत्रकारिता सीमित क्षेत्र में लोगों की मदद कर सकती है
पर विश्व स्तर पर शायद ही। अत: हिंदी और भाषाई पत्रकारिता को अंग्रेजी के
विरुध्द ऐसी कोई जंग छेड़ने की बजाय अपने लक्ष्य अलग से तय करने होंगे। हिंदी को
अभी भी पूरे देश की भाषा बनने में समय है। प्रिंट मीडिया अभी भी इलेक्ट्रॉनिक
मीडिया से कहीं ज्यादा विश्वसनीय है। यह उसकी सबसे बड़ी शक्ति है और यही उसका
लक्ष्य भी है, ताकि
वह अविश्वसनीय न बन सके।
जहां तक
भविष्य का प्रश्न है तो विज्ञान की,
तकनीक की और निरंतर बढ़ती शिक्षा के कारण भाषाई पत्रकारिता का
भविष्य उावल है। भविष्य उसकी अपनी कार्यप्रणाली,
गुणवत्ता और चुनौतियों का मुकाबला
करने की शक्ति पर निर्भर है। जैसे-जैसे प्रचार-प्रसार की तकनीक का विस्तार होगा
वैसे-वैसे भाषाई पत्रों की संभावना बनेगी। भाषाई पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती
उसके स्थानीयता के स्वरूप लेने की है। कठिनाई यह है कि बहुसंस्करणों के कारण अब
सभी भाषाई पत्र क्षेत्रीय और स्थानीय होते जा रहे हैं। उनका राष्ट्रीय और
प्रांतीय प्रतिनिधित्व का स्वरूप खत्म होने से उनकी प्रभाव क्षमता कम हो रही
है। अत्यधिक स्थानीय होकर वे सीमित हो रहे हैं जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए।
अब तो सबका
भविष्य योग्यता और गुणवत्ता पर है। प्रतिस्पर्धा और तकनीकी विकास का लाभ यह है
कि अब
'खोटा सिक्का'
नहीं चलता। धोखे से भी नहीं।
पत्रकारिता यदि अपनी गुणवत्ता नैतिक और मूल्य धारक मारक क्षमता बरकरार रखेगी तो
भविष्य निश्चित ही उावल है। पत्रकारिता को लेकर बौध्दिक बहसें जारी रहना चाहिए।
लोकतंत्र में बहसों की रचनात्मक शक्ति है।
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