Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 6, दिसंबर.07.- फरवरी, 2008)

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आवरण कथा

 

 

1857- हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता


डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ

न् 1857 की जनक्रांति के डेढ़ सौ वर्ष बाद नए सिरे से यह बहस हो रही है कि 1857 का विद्रोह जनविद्रोह था या मात्र सिपाही-विद्रोह? इसके कारण धार्मिक थे या आर्थिक, सामाजिक भी। क्या इसे भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम कहा जा सकता है। सन् 57 को 'स्वाधीनता संग्राम' मानने का आग्रह सन् 1907 में सावरकर ने किया था। चूंकि सावरकर बाद में हिन्दुत्व के पैरोकार बने, इसलिए डॉ. रामविलास शर्मा जैसे कुछ विचारकों के अतिरिक्त अन्य प्रगतिशील इतिहासकारों और चिंतकों ने इस आग्रह को बहुत महत्वपूर्ण नहीं माना। तब मार्क्स और एंगेल्स के निबंधों का संकलन 'द फर्स्ट इंडियन वार आफ इंडिपेंडेंस 1857-1859'  प्रकाशित नहीं हुआ था। इस पुस्तक के प्रकाश में आने से प्रबुध्द पाठकों और लेखकों को पता चला कि कार्लमार्क्स ने बेंजमिन डिजरायली के उस भाषण का नोटिस लिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि 1957 का संघर्ष सिपाही विद्रोह नहीं था, बल्कि वह राष्ट्रीय विद्रोह (नेशनल रिवोल्ट) था। सुरेन्द्रनाथ सेन जैसे इतिहासकार विद्रोह के कारणों में धर्म की भूमिका पर जोर देते हैं जबकि मार्क्स, राजस्व बढ़ाने के लिए सरकार की लूटखसोट और उसे लेकर किसानों के अंसतोष को कारण मानते हैं। हालांकि हिन्दी साहित्य के कुछ लेखक और पत्रकार राजेन्द्र यादव, प्रियवंद, विभूतिनारायण राय आदि 1857 के जनाक्रोश को व्यापक और प्रासंगिक नहीं मानते हैं, फिर भी संप्रति एक आम सहमति ही बनती जा रही है कि 1857 हमारा  स्वाधीनता संग्राम था। 1857 को केंद्र में रखकर कई साहित्यिक पत्रिकाओं ने जो विशेषांक निकाले हैं वे भी इसी ज्वलंत सत्य की पुष्टि करते हैं।

वर्तमान साहित्य ने सर्वप्रथम नवंबर-दिसंबर 2006 के अंक को '1857 जनप्रतिरोध' के नाम से प्रस्तुत कर इस क्रांति के मुल्यांकन की दिशा में गंभीर प्रयास किया। 'अपनी बात' में संपादक डॉ. नमिता सिंह ने अपनी दृष्टि और सरोकार स्पष्ट कर दिए हैं : 1857 सिर्फ सिपाही विद्रोह नहीं था, सिर्फ धार्मिक भावनाओं के आहत होने के कारण पैदा हुए असंतोष का परिणाम नहीं था, सिर्फ रियासतें और राज्य छिन जाने के कारण अवध और झांसी जैसे प्रतिरोध के क्षेत्र निर्मित नहीं हुए थे, इस प्रथम मुक्तिसंग्राम के इतने रूप थे, इतने कारण थे कि पूरी मुकम्मल तस्वीर के लिए अभी भी बहुत कुछ खोजना और जानना शेष है। वर्तमान साहित्य के इस विशेषांक में प्रकाशित कई आलेख इस बहुत कुछ को खोजने और जानने का प्रयास करते हैं। बरेली विद्रोह, वहाबी आंदोलन, कुमायूं में विद्रोह, राजस्थान में स्वाधीनता संग्राम, मेवाड़ में क्रांति, हैदराबाद के सैनिक विद्रोह पर केंद्रित क्रमश: इकबाल हुसैन, कयामुद्दीन अहमद, अपूर्व जोशी, हरिवंश राय, आशिक बालौत, एन.आर. श्याम आदि के आलेख सिध्द करते हैं कि यह जनविद्रोह सीमित न होकर देश के बहुत बड़े भूखंड में सक्रिय था। इस विशेषांक में दो आलेख कलकतिया पलटन के बहाने 1857 का दलित भाष्य (विभूति नारायण राय) और 1857 और बहुजन दृष्टिकोण (कंवल भारती) अलग-अलग हैं। दोनों की निर्भ्रांत स्थापना है कि 57 का जनविद्रोह असफल हुआ तो अच्छा ही हुआ अन्यथा न यह देश लोकतंत्र बनता और न आधुनिक राष्ट्र बनता। इस विशेषांक के अन्य उल्लेखनीय लेखों में 1857 और कार्लमार्क्स (सूरज पालीवाल) मध्यभारत में 1857 का जनविद्रोह (भंवर भादानी) 1857 की मशाल है, भारतेन्द्रु के नाटक (सत्यदेव त्रिपाठी) उर्दू के नाम लिए जा सकते हैं। स्वतंत्रता इस क्रांति के प्रत्यक्षदर्शियों मुईनुद्दीन हसन, विष्णु भट्ट गोडसे, मिर्जा गालिब, जार्ज पेश शोर के विवरणों ने इस विशेषांक को समृध्द किया है। समझदार पाठक इस ध्वनित व्यंजनाओं को सरलता से समझ लेता है। संपूर्ण विशेषांक अपने उद्देश्यों में सफल है।

उद्भावना (अंक 75) का विशेषांक '1857 निरंतरता और परिवर्तन' शीर्षक से छपा है। लगभग 550 पृष्ठों का यह लेखकों के मंतव्यों से समृध्द है। इस विशेषांक के अतिथि संपादक डॉ. प्रदीप सक्सेना हैं। उनका कथन है कि हमारा 1857 को महिमा मंडित करने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन इसका अवमूल्यन भी हमें स्वीकार नहीं है। संपादकीय संकल्प के अनुरूप ही इसमें एक ओर जवाहर लाल नेहरू, आर.सी. मजूमदार, सुभाष गाताडे, सुंदर लाल आदि के विचार संकलित हैं, जो 57 को राष्ट्रीय विद्रोह या स्वाधीनता संग्राम मानने में हिचकिचाते हैं, दूसरी ओर सावरकर, कार्लमार्क्स, रामविलास शर्मा आदि निर्भ्रांत है कि यह विद्रोह भारत का स्वाधीनता संग्राम था। इस विशेषांक की विशेषता है कि इसमें प्राय: हर स्त्रोत से प्राप्त सूचनाओं और मंतव्यों को समाहित किया गया है। इतिहास लोकजीवन, साहित्य, ब्रिटिश दृष्टिकोण, फ्रांसीसी प्रेस, दलित दृष्टि आदि से छनकर जो कुछ सामने आता है, वह गर्व करने योग्य है। कवीन्द्र रवीन्द्र के इस मंतव्य से आम सहमति हो सकती है कि ये सिपाही वास्तव में बहादुर थे। उनका नामोल्लेख विश्व के महानतम वीरों में किया जाना चाहिए। उद्भावना के इस विशेषांक में विजेन्द्रनारायण सिंह और मधुरेश के आलेख हिन्दी साहित्य में सन् सत्तावन की उपस्थिति पर केंद्रित है। डॉ. विजेन्द्र नारायण सिंह ने सप्रमाण दर्शाया है कि भारतेन्दु युग के नवजागरण का सन् सत्तावन से गहरा रिश्ता है और उसका केंद्रीय स्वर है प्रतिरोध। इस बड़े आकार के विशेषांक में अनेक चित्र हैं जो उस संघर्ष के जीवंत प्रमाण हैं और आखिरी पृष्ठ पर उस गंगू हरिजन का चित्र है जो 1957 में फांसी पर चढ़ा दिया गया था। यह चित्र गवाह है कि दलित इस संग्राम से बराबर जुड़े रहे थे। इस तरह के सुनियोजित एवं समृध्द विशेषांक कम देखने में आते हैं।

साहित्य अमृत का 1857 केंद्रित अंक 'स्वाधीनता विशेषांक' नाम से छपा है। हालांकि इसमें फोकस देश की आजादी के साठ वर्ष पूरे होने पर संपूर्ण स्वाधीनता संघर्ष के मूल्यांकन पर है। लेकिन शुरुआत तो 57 से ही हुई थी। संपादकीय में श्री लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ने लिखा है कि सन 1957 की क्रांति को चाहे पं. नेहरू ने एक सामंती सैलाब ही माना हो और अंग्रेजों ने चाहे सैनिक गदर कहकर ही उसे खारिज कर दिया हो, वास्तव में यह क्रांति जनमत का राजनीतिक-सांस्कृतिक विद्रोह भी था। भारत का जनमानस उससे जुड़ा था। लोक साहित्य और लोक चेतना उस क्रांति के आवेग से अछूती नहीं थी। यह स्वाभाविक है कि इस विशेषांक में सन् 1957 में दिल्ली के लाल दिन (ख्वाजा हसन निजामी) पुरबिया सिपाही न उठता तो 1857 न हो पाता (देवेन्द्र स्वरूप), अखबारों में 1857 (श्रीधर पराड़कर), 1857 की सच्चाइयां (मनोज कुमार श्रीवास्तव), वीरांगना तात्या और बाठिया को शत-शत प्रणाम (प्रभात झा) सरीखे आलेख विद्यमान हैं। मदनलाल वर्मा क्रांत का एक महत्वपूर्ण आलेख प्रतिबंधित क्रांतिकारी साहित्य भी ध्यानाकर्षक है। इससे पता चलता है कि गदर (ऋषभचरण जैन), भारत सन् 57 के बाद (शंकर लाल तिवारी) भारत का प्रथम स्वातंत्र्य समर (सावरकर), रिवोल्ट आफ 1857 (लेखक अज्ञात) आदि अनेक प्रतिबंधित पुस्तकें सत्तावन की जनक्रांति से संबंध्द थी। साहित्य अमृत का यह अंक अपने तरीके से सन् 57 के वीर हुतात्माओं को श्रध्दांजलि देता है।

केंद्रीय हिन्दी संस्थान की पत्रिका मीडिया का विशेषांक 1857 एक पुनर्यात्रा शीर्षक से छपा है। लगभग 300 पृष्ठों का यह विशेषांक बहुत श्रम से संपादित और सुनियोजित है। सरकारी संस्थानों से प्रकाशित इस तरह के अंकों में जो हड़बड़ी और औपचारिकता होती है, उससे यह विशेषांक मुक्त है, इसके अतिथि संपादक रवीन्द्र त्रिपाठी ने अंक के प्रकाशन के पीछे की मानसिकता का परिचय देते हुए लिखा है - उपनिवेशवादी ताकतों ने जो मिथक बनाए थे उनकी रट आज भी कुछ लोग लगाए हैं। इसलिए यह आज भी जरूरी लगता है कि इन मिथकों को ध्वस्त किया जाए। सत्तावन की लड़ाई सिर्फ सामंतों की थी, अंग्रेज भारत में प्रगतिशील भूमिका निभा रहे थे, दलित इस संग्राम में भागीदार नहीं बने आदि मिथक इस विशेषांक में सप्रमाण ध्वस्त हुए हैं। इसमें रामशरण जोशी और फैसल अनुराग के आलेख बताते हैं कि आदिवासियों ने भी साम्राज्यवाद से जमकर लोहा लिया था। प्रभा दीक्षित ने मालिसन, डफ, जान के आदि अंग्रेज इतिहासकारों के साक्ष्य से ही इसे राष्ट्रीय विद्रोह सिध्द किया है। शंभुनाथ ने उन लेखकों, विचारकों की अच्छी खबर ली है जो यह मानते हैं कि क्रांति सफल होने पर देश या तो मुसलमानों के हाथ में चला जाता या ब्राह्मणों का कब्जा हो जाता। डॉ. इरफान हबीब के साक्षात्कार में इस बात पर जोर है कि बागियों के इश्तहारनामें में धर्म की अवधारणा बदली हुई है और यह लड़ाई साझी है। मंजूर एहतेशाम मानते हैं, इकानामिक पैरामीटर्स ने तमाम रजवाडाें को एक कामन परपज के लिए एकजुट किया था। मनोहर नायक निर्भ्रांत हैं कि अंग्रेजों ने कोई भी अच्छा काम नहीं किया। खुरशीद आलम और केशुभाई देवाई के आलेख क्रमश: वहाबी आंदोलन और गुजरात के संदर्भ में इस जनक्रांति को परखते हैं। वंदना मिश्र ने महिलाओं के शौर्य का बयान किया है। बद्री नारायण ने 57 का दलित पाठ प्रस्तुत किया है। डॉ. पुरूषोत्तम अग्रवाल ने सन् 1869 की एक कृति का उल्लेख किया है जो लक्ष्मीबाई की वीरता पर रचित रासो ग्रंथ है। लेखक हैं कल्याण सिंह। इससे पता चलता है कि 57 का जनसंघर्ष जनसाधारण तक पहुंचा था। और यह भी कि साहित्य भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं था। इस विशेषांक का एक महत्वपूर्ण आलेख 1857 में गद्दारों की वजह से भारतीय विद्रोह हारे (सफदर इमाम कादरी) हैं जिसमें गद्दारों के 32 पत्रों के हिन्दी अनुवाद दिए गए हैं। संपूर्ण विशेषांक विचारोत्तेजक और अपने उद्देश्यों में सफल हैं।

भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की पत्रिका आजकल (हिन्दी)  ने भी 57 के सेनानियों को सलीके से स्मरण किया है। इसके आवरण पृष्ठ पर छपा है - प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 150 साल। लगभग 25 आलेखों और टिप्पणियों में इस जनक्रांति के धर्मनिरपेक्ष और साम्राज्यवाद विरोधी चरित्र की पहचान हुई है। रामशरण जोशी का यह आकलन सही है कि अभाव अकाल और अन्याय से उत्पीड़ित भारतीय कृषि समाज के सामान्य सैनिकों ने इस संग्राम का नेतृत्व किया था। गुणाकर मुले ने विष्णु भट्ट गोड से की मराठी पुस्तक माझा प्रवास : सन् 1857 सालच्या बंडाची हकीकत (1906) को आधार बनाकर एक सुचिंतित आलेख लिखा है। मांझा प्रवास का उल्लेख प्राय: हर विशेषांक में है लेकिन श्री मुले ने शायद पहली बार बताया है कि 57 के इस बंद (विद्रोह) को गोडसे ने जहां-तहां क्रांति, राज्य क्रांति का संबोधन दिया है और अपने इस आलेख के लिए इतिहास पद का प्रयोग किया है। यह पुस्तक उन्होंने मोड़ी लिपि में लिखी थी और भी चिंतामणि विनायक वैद्य की प्रेरणा और संपादक में यह 1907 में छपी। अमृतलाल नागर ने 1947 ई. में इसका अनुवाद माझा प्रवास आंखों देखा गदर नाम से किया था।  रामसुजान अमर का आलेख, 1857 भारतीय राष्ट्र का असली मन, डैलरिंपल की कृति दि लास्ट मुगल पर आधारित है। अलका पांडे ने विदेशी बुध्दिजीवियों की नजर में भी इसे राष्ट्रीय विद्रोह माना है। मार्क्स और अर्नेस्ट जोंस के विचार प्रमाण के तौर पर दिए हैं। बनारसी सिंह ने अपनी टिप्पणी में अनेक ज्ञात-अज्ञात शहीदों का स्मरण किया है। आनंदप्रकाश कृत प्रथम स्वाधीनता संग्राम और साहित्य में मुख्यत: मिर्जा गालिब और सुभद्रा कुमारी चौहान की क्रमश: दस्तंबू तथा गालिब के कुछ पत्रों और झांसी की रानी को आधार बनाया है। गालिब इस जनक्रांति से प्रसन्न नहीं थे, लेकिन कई लेखकों ने अंग्रेजी हुकूमत को खुश करने के लिए लिखी गई उनकी दस्तंबू की अनावश्यक सहारना की है। यही स्थिति सर सैय्यद के असबाबे-बगावते हिन्द को लेकर है। इसमें वे अंग्रेजी सत्ता की खिदमत में बिछे जा रहे हैं और प्रगतिशील विचारों को वे बहुत स्वाभिमानी और साहसी लगते हैं।  इस विशेषांक में भी दलितों और स्त्रियों की भागीदारी पर आलेख हैं। विझदेवसरे ने स्त्रियों और बद्रीनारायण ने दलितों के जुझारूपन को रेखांकित किया है। नरेन्द्र गोयल की एक रचनात्मक टिप्पणी 1857 का स्वातंत्र्य समर लंदन में मनाई गई अर्ध्दशताब्दी से पता चलता है कि यह क्रांति हमेशा प्रेरित और प्रभावित करती रही है। बहादुर शाह जफर द्वारा 25 अगस्त 1857 को जारी एक इश्तिहार का अनुवाद हर्ष पांडे ने प्रस्तुत किया है। इसमें हिन्दुओं, मुसलमानों से जेहाद में भाग लेने की अपील की गई है। बहादुर शाह जफर के नाम का सिक्का (संजय गर्ग) नई जानकारी से संपन्न टिप्पणी है। समग्रत: आजकल का यह विशेषांक भी अपने उद्देश्य में पूर्णत: सफल है। प्रसंगवश शीर्षक संपादकीय में योगेन्द्रदत्त शर्मा ने लिखा है इस जन क्रांति ने भारतीयों के बीच अद्भुत एकता का नमूना पेश किया। विशेषांक की सामग्री इस मान्यता को प्रमाणित करती है।

अक्षरपर्व (स. सर्व मित्रा सुरजन) रायपुर (छत्तीसगढ़) से प्रकाशित होने वाला मासिक है। इसका जून 2007 का अंक (रचनावार्षिकी - 2007) 57 की जनक्रांति पर केंद्रित है। इसके कुछ आलेख 1857 जो चुप रहेगी जुबाने गालिब (डॉ. नरेश), 1857 की सांस्कृतिक व्यापकता (अनिल सिन्हा), 1857 की क्रांति में स्त्रियों कह्यी भूमिका (मधुरेश) 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय साहित्य (तुहिन देव) और 1857 प्रथम संग्राम में डाक विभाग (गोविंद सिंह असिवाल) विशेष रूप से पठनीय है। इन आलेखों का केंद्रीय स्वर यही है कि सन् 1857 में हर तबके और हर क्षेत्र के लोग जूझे थे। अनिल सिन्हा के लेख में उस समय असम में हुए प्रतिरोध का विस्तृत परिचय है।

ये सभी विशेषांक हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता की सजगता और जवाबदेही के व्यंजक हैं। व्यावसायिकता का मनोभाव सरकारी पत्रिकाओं के विशेषांकों में भी शायद ही मिले। इन विशेषांकों में जहां अपनी शौर्यपूर्ण विरासत की स्मृति को नए शोधों और नए विचारों के आलोक में बनाये रखने की सार्थक कोशिश है, वहीं इस जनक्रांति से जुड़े आरोपों और मिथकों के स्पष्टीकरण और पुनर्मूल्यांकन की सजगता भी दृष्टव्य है। कई आलेख इस संग्राम की मौजूद समय में प्रासंगिकता को लेकर उद्वेलित होते हैं और पाते हैं कि सत्ता की निरंकुशता, क्रूरता, अत्याचार के प्रतिवाद में इस संग्राम का जज्बा आज भी प्रेरक बन सकता है। तब तो एक ही विदेशी कंपनी थी और समाज सब धन विदेश चलिजात की विडंबना को भुगत चुका था। आज देश में अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां स्वच्छंद विचरण कर रही हैं। हमारे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में जुटी हैं, ऐसी स्थिति में एक और जनसंग्राम की जरूरत को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। पिछले दिनों एक समाचार में कहीं छपा था कि जो ईस्ट इंडिया कंपनी 1874 ई. में बंद कर दी गई थी, उसका ट्रेडमार्क सवा सौ साल बाद किसी एंथनी वाइल्ड ने फिर से पंजीकृत कराया। इस कंपनी को एक भारतीय उद्योगपति संजय मेहता ने करीब दो वर्ष पहले खरीद लिया और मुंबई में इसका पहला स्टोर खुल भी गया। लेकिन इस कंपनी के दुबारा आने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि लूट-खसोट का काम कोला कंपनियां आज बेहतर ढंग से कर रही हैं। कुछ ही दिनों में तमाम जल स्त्रोतों पर इनका एकाधिकार होने ही वाला है। तब जो जनाक्रोश जन्मेगा और क्रांति का रूप धारण करेगा, उसका एक प्रेरणास्त्रोत सन् सत्तावन का स्वतंत्रता संग्राम अवश्य होगा।

डी-131, रमेश विहार, अलीगढ़ - 202001

 

 

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

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