भाषाई बनाम अंग्रेजी पत्रकारिता
संयोजकःडॉ. कमल कुमार
इस अंक में हम
सूचना प्रौद्योगिकी की उन समस्याओं पर विचार कर रहे हैं जो मुख्यत: भाषाई और
अंग्रेजी प्रेस के तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में उभरी हैं और स्वयं उनके अपने
कारणों से जन्मी हैं। जाहिर है कि बातचीत में वे सारे सवाल उठे जो पत्रकारिता
के आधुनिक मानदंडों,
मूल्यों और स्थितियों में जन्में हैं। इस विमर्श में हिन्दुस्तान टाइम्स के
पूर्व संपादक और प्रेस इंस्टीटयूट आफ इंडिया के पूर्व निदेशक अजित भट्टाचार्य,
टाइम्स आफ इंडिया के पूर्व स्थानीय संपादक इंदर मल्होत्रा,
भाषा समाचार एजेंसी के पूर्व संपादक वेदप्रताप वैदिक,
जनसत्ता के संपादक ओम थानवी और वरिष्ठ पत्रकार एवं कार्टूनिस्ट
गोविंद दीक्षित भाग ले रहे हैं। विमर्श की समन्वयक हैं सुपरिचित कथाकार और लेखक
डॉ. कमल कुमार। - संपादक
कमल कुमार :
प्रेस की भूमिका आज हमारे जीवन में लगातार बढ़ती जा रही है। परंतु इसमें एक
अलगाव गंभीर तौर पर उभरा है और वह भाषाई प्रेस और अंग्रेजी प्रेस का अंतर। इस
विषय से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार करना जरूरी हो गया है,
जैसे भाषाई और अंग्रेजी प्रेस की सामग्री क्या है?
आजकल पत्रकारिता में आधुनिकीकरण के साथ-साथ बढ़ते बाजारवाद ने
उन्हें किस तरह प्रभावित किया है या संपादकों की घटती साख और उनका अप्रासंगिक
होते जाना जैसे सवाल हैं, इनके अलावा राष्ट्र की एकता
और स्वायत्तता के साथ जुड़े बहुत महत्वपूर्ण सवाल हैं,
जिनके बारे में भाषाई पत्रकारिता और अंग्रजी पत्रकारिता की क्या भूमिका रही है
और क्या होनी चाहिए। एमरजेन्सी का मुद्दा है, आतंकवाद
का मुद्दा है, जातिवाद,
साम्प्रदायिकता, मानवीय अधिकार,
राष्ट्रीय संस्कृति, विदेश नीति आदि अनेक मुद्दे हैं।
सबसे पहले हम भाषाई और अंग्रेजी पत्रकारिता पर बात करें। दीक्षित जी आपसे ही
शुरू करें।
गोविंद
दीक्षित :मैं हिन्दी या अंग्रेजी की रीडरशिप पर अलग-अलग बात न कर टोटल रीडरशिप
की बात करना चाहूंगा,
जिसकी स्थिति भारत में बहुत चिंताजनक है। विकसित देशों में
जहां 60-70-80 प्रतिशत लोग अखबार पढ़ रहे हैं,
वहां भारत में केवल 3 प्रतिशत बल्कि
उससे भी कम लोग अखबार पढ़ रहे हैं। अभी जो नवीनतम एन.आर.एस. (नेशनल रीडरशिप
सर्वे) हुआ उसके अनुसार हिन्दी रीडरशिप में 17 प्रतिशत
की वृध्दि हुई है, लेकिन अंग्रेजी में स्थिर स्थिति है।
इसमें कोई शह नहीं दिखती, बल्कि कुछ में तो गिरावट भी
देखने में आई है। पूरा अंग्रेजी प्रेस अपनी आक्रामक मार्केटिंग के बल पर टिका
हुआ है। उसके मुकाबले भाषाई पत्रकारिता के पास इतनी आर्थिक ताकत नहीं है। इसलिए
कई जगह उसे चालू राजनीति से समझौता करना पड़ता है, लेकिन
उसने पाठकों के बीच अपनी लोकप्रियता बनाई है। आज जो लोग यह कहते हैं कि हिन्दी
का प्रेस खासकर, क्षेत्रीय प्रेस कमजोर है,
वे निश्चित तौर पर उन अखबारों को पढ़ते नहीं क्योंकि वे अखबार
दिल्ली तक पहुंच नहीं पाते हैं। वे बहुत महत्वपूर्ण अखबार हैं,
बहुत अच्छा कवरेज कर रहे हैं, बल्कि
मेरा मानना है कि पिछले दस साल में दिल्ली में जितनी भी बड़ी खबरें हमने देखी
हैं, वे कहीं न कहीं किसी हिन्दी अखबार में क्षेत्रीय
स्तर पर तीन या चार दिन पहले एक धमाका कर चुकी होती हैं। लेकिन चूंकि उनकी आवाज
सुनी नहीं गई या उनमें वह मोहक शक्ति नहीं थी इसलिए उनका नोटिस नहीं लिया गया।
हिन्दी जिस तेजी से बढ़ रही है और मुझे उम्मीद है कि आने वाले चार-पांच सालों
में पाठकीयता की वध्दि 25 प्रतिशत तक की जा सकती है।
इसके कुछ आश्चर्यजनक परिणाम आये हैं। अर्थात उनमें तुलनात्मक रूप से पढ़ने की
भूख बढ़ी है। राजस्थान और हरियाणा में एकदम नये पाठक वर्ग का विकास हुआ है और
धमाकेदार पाठकीयता, खासकर हरियाणा जैसे पिछड़े राज्य में,
देखने में आई। पाठकीयता को 25 प्रतिशत
तक ले जाने में भविष्य में कितनी भूमिका प्रबंधन की होगी,
कितनी संपादकों की होगी और कितनी जागरूक पाठकों की होगी यह तो
समय बताएगा। लेकिन 3 प्रतिशत वृध्दि की जल्दी से जल्दी
लोकतंत्र के लिए, खासकर आज जिस तरह की विस्फोटक
स्थितियां हैं, उसके लिहाज से बहुत आवश्यक है।
कमल कुमार :
अजित जी,
इस बारे में आपके क्या विचार हैं?
अजित
भट्टाचार्य : मैं अंग्रेजीभाषी हूं। हिन्दी के समाचार पत्रों को नहीं पढ़ता हूं।
इसलिए मैं इस मुद्दे पर सीधे अपनी राय नहीं दे सकता। वर्षों से ऐसा माना जा रहा
है कि अंग्रेजी मीडिया एक आदर्श है। लेकिन मैं सोचता हूं कि स्थिति बदल गई है।
अंग्रेजी मीडिया ऊंचाई छू चुका है और अब उसका विकास रूक गया है चाहे वह प्रसार
में हो या दूसरे क्षेत्रों में,
लेकिन हिन्दी मीडिया या गैर अंग्रेजी प्रेस का विकास हो रहा
है। वे उन जगहों पर पहुंच रहे हैं, जहां अंग्रेजी प्रेस
नहीं पहुंच पाये हैं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
भाषाई अखबार छोटे-छोटे शहरों के बारे में विस्तृत कवरेज करता है। उसमें
अंग्रेजी प्रेस न तो रूचि लेता है और न ही लेने में सक्षम है। पूर्ण रूप से तो
नहीं, लेकिन उनका पाठक वर्ग अलग है,
उनकी सामग्री, उनकी नीति अलग है।
विज्ञापन के प्रभाव से अंग्रेजी मीडिया केवल बड़े-बड़े शहरों तक ही सीमित है।
इनको ज्यादा विज्ञापन मिलते हैं और विज्ञापित चीजों पर विज्ञापनों का सीधा
प्रभाव पड़ता है। इसलिए उनका झुकाव, उनकी रूचि समाज के
उच्च वर्ग के प्रति ज्यादा होती है। यह एक बड़ा अंतर है अंग्रेजी और हिन्दी
मीडिया में। दूसरी तरफ जो पत्रकार हिन्दी समाचार पत्रों के लिए कवरेज करते हैं,
चीजों को कम जानते हैं, उनकी राष्ट्रीय
और अंतर्राष्ट्रीय पृष्ठभूमि कमजोर होती है, इसलिए उनके
कवरेज की एक सीमा होती है। लेकिन वे दूर-दराज के इलाकों में जाकर,
ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर जागरूकता फैला सकते हैं। वहीं से
समाज में बदलाव की सही तस्वीर भी सामने आती है।
कमल कुमार :
लेकिन तुलनात्मक रूप से पाठक वर्ग की स्थिति क्या है?
अजित
भट्टाचार्य : इस मुद्दे पर भी मैं दूसरों से सुनी बात ही कह सकता हूं। हिन्दी
पत्रकारिता का निश्चित रूप से प्रसार बढ़ा है। एक विशाल पाठक वर्ग खड़ा हो रहा
है। यह पाठक वर्ग उन क्षेत्रों में बढ़ रहा है जहां अंग्रेजी प्रेस नहीं है।
अंग्रेजी मीडिया एक मुकाम पर पहुंच गया है। उसे नीति-निर्माता पढ़ते हैं,
सरकारी अफसर पढ़ते हैं, जिन्हें किसी
तरह की भूमिका निभानी है। लेकिन मैं नहीं सोचता कि वे नीति-निर्माताओं को
प्रभावित करते हैं या समाज को प्रभावित करते हैं। इस दृष्टि से गैर-अंग्रेजी
प्रेस बहुत महत्वपूर्ण है। वे जो कहते हैं उसका असर पड़ता है।
कमल कुमार :
कहा यह जाता है कि अंग्रेजी के अखबार का पाठक वर्ग संपन्न लोगों का है और
हिन्दी की या भाषाई पत्रकारिता गरीबों की है।
इंदर
मल्होत्रा : लेकिन सबसे अफसोस की बात यह है कि सरकार की तरफ से कहा जा रहा है
कि साक्षरता
56-57 प्रतिशत हो गई, उसके बावजूद
श्रीलंका, मलेशिया तथा अफ्रीका के देशों को आप देखें तो
वहां प्रति हजार समाचार पत्रों की संख्या कहीं ज्यादा है। जापान,
स्केण्डेनेविया और ब्रिटेन की बात छोड़ दीजिए। यह शर्मनाक बात
है कि आज भी अखबार जितने पढ़े जाने चाहिए, उतने पढ़े नहीं
जा रहे हैं। हां, भारत में दूसरा एक सिलसिला यह है कि
शाम को गांवों की चौपाल में बैठकर या घर में बैठकर एक अखबार कई लोग पढ़ते हैं या
सुनाते हैं। 1947 या 1950 से
लेकर 1970 के दशक के मध्य तक अंग्रेजी अखबार की सामूहिक
प्रसार संख्या हिन्दी के समाचार पत्रों की सामूहिक प्रसार संख्या से ज्यादा थी।
1978 में हमारे बीच राष्ट्रीय प्रसार वाला अखबार नहीं
रहा। हां, महानगरों में स्थिति अच्छी रहने के बावजूद
अन्य जगहों की स्थिति दूसरे या तीसरे दर्जे की रही। हिन्दुस्तान टाइम्स,
टाइम्स आफ इंडिया, हिन्दू,
स्टेट्समैन जैसे अखबार हैं, अब स्थिति
बदल रही है। अब अंग्रेजी के बड़े अखबार अन्य बड़े शहरों से भी प्रकाशित हो रहे
हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स कलकत्ता एवं दिल्ली से प्रकाशित हो रहा है। इकोनोमिक
टाइम्स सभी जगह जा रहा है। एक विकास यह है। साथ ही दूसरा यह है कि हिन्दी को आप
चाहे कुछ भी कह लें, लेकिन सरकार की भाषा,
वाणिज्य और भाषा, तकनीक की भाषा,
वैधानिक संस्थानों की भाषा,
अंतर्राष्ट्रीय संचार की भाषा और अब भूमण्डलीकरण की भाषा के रूप में अंग्रेजी
भाषा के समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं का महत्व बना रहेगा। हां,
दोनों ही स्थितियों में गुणवत्ता का फर्क रहेगा। आज एक बड़ा
अंग्रेजी अखबार प्रधानमंत्री या विपक्ष के नेता की बजाए चावड़ी बाजार के आदमी तक
पहुंचना चाहता है। जिस आदमी को स्कूटर खरीदना है या बेचना है,
जिस आदमी को बेटी को ब्याहना है, उसके
लिए करो। अंतिम बात जो मैं कहना चाहता हूं वह यह कि सामग्री के बारे में
संपूर्ण सामान्यीकरण करना बहुत मुश्किल है। आजकल कुछ हिन्दी अखबारों की सामग्री
का संपादन बहुत अच्छा हो रहा है, लेकिन ऐसी बात नहीं है
कि समाचार पत्रों में बहुत बड़ा परिवर्तन है। अंग्रेजी में आर्थिक और राजनीतिक
साप्ताहिकों की बहुत ज्यादा प्रतिष्ठा है। पाकिस्तान में भी इकबाल बरनी के
मेनस्ट्रीम, आउटलुक बहुत अच्छे हैं। उनकी प्रसार संख्या
कम है, विज्ञापन कम है, लेकिन
सभी वर्ग के पाठकों के बीच बहुत अधिक प्रतिष्ठा है। अंतिम बात सामग्री के बारे
में। व्यापक विषयों पर आप बिल्कुल ठीक रहते हैं, परंतु
लोगों की स्थानीय समस्याओं को लेकर गड़बड़ा जाते हैं।
कमल कुमार :
हमारी सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन की संरचना और समाचार पत्र द्वारा की जाने वाली
क्रांति में भी विरोधाभास दिखता है। जैसे गुजरात के मामले में हुआ,
मीडिया कुछ और कह रहा था लेकिन लोगों के जो विचार थे वे अलग
थे। तो पाठकों की भी अपनी एक यह भी संकल्पना होती है।
इंदर
मल्होत्रा : नहीं-नहीं,
उसमें भी एक समस्या है। आज की स्थिति को समझने के लिए जरा पीछे
जाएं तो 1981 में आरक्षण के विरुध्द जो दंगे हुए थे
उसमें भी एडिटर्स गिल्ड के प्रतिनिधि मंडल ने कहा था कि गुजराती अखबार ने बहुत
खराब पक्ष रखा है।
कमल कुमार :
मैं यह कह रही थी कि लोक राय कई बार हमारे निजी संजाल में प्रतिबिम्बित होती
है। इसकी कोई लिखा-पढ़ी नहीं होती। लेकिन यह हमारे लोक विचार को बहुत अधिक
प्रभावित करता है,
जबकि सरकारी नीतियों का निर्धारण लिखित मीडिया करता है। ऐसी
स्थिति में पाठक वर्ग के बारे में वैदिक जी, आप क्या
कहेंगे?
वेद प्रताप
वैदिक : पाठक वर्ग के बारे में जो दो-तीन बड़ी प्रवृत्तियां हैं उनकी ओर मैं
आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। जैसा कि इंदर जी ने अभी कहा,
अब से करीब चालीस-पचास साल पहले हिन्दी के अखबारों की संख्या
ज्यादा थी, अंग्रेजी के अखबारों की कम,
लेकिन प्रसार संख्या में वे कम थे। प्रसार कम था,
अखबार ज्यादा थे। लेकिन अब हालत यह है कि सारे देश से निकलने
वाले अंग्रेजी के अखबारों की कुल मिलाकर 78 लाख
प्रतियां छपती हैं, जबकि हिन्दी इलाकों से निकलने वाले
और थोड़े बहुत कलकत्ता, हैदराबाद और गुजरात जैसी जगहों
से निकलने वाले हिन्दी अखबार कुल मिलाकर ढाई करोड़ से ज्यादा निकल रहे हैं। यानी
अनुपात न केवल उलट गया है बल्कि हिन्दी के अखबार का प्रसार तीन गुना बढ़ गया है।
लोकतंत्र में संख्या का बड़ा महत्व है। तो पाठक वर्ग के हिसाब से,
संख्या बल के हिसाब से हिन्दी की पत्रकारिता देश की सबसे सशक्त
पत्रकारिता है। अब यह प्रश्न हो सका है कि पाठक कौन है?
पाठक कैसा है? अजित बाबू, जैसा
अभी आपने कहा प्रांतीय और स्थानीय अखबार हैं तो वह भी वैसे ही चल रहा है।
क्षेत्रीय या प्रांतीय अखबार उन अखबारों के मुकाबले ताकतवर हैं जिन्हें हम
राष्ट्रीय अखबार कहते हैं। स्ट्रिंगर्स के काम करने का तरीका भी सब जगह लगभग एक
जैसा है। कुछ अपवाद होते हैं जो अद्भुत काम करके दिखाते हैं। अकेले हिन्दी,
बांग्ला या मराठी हों, ऐसा नहीं है,
क्योंकि न्यूज एजेंसी में मैं दस साल रहा हूं। मुझे मालूम है
कि अंग्रेजी न्यूज एजेंसी के जो स्ट्रिंगर्स हैं वे किस तरह काम करते हैं और
कितनी निगरानी उन पर रखनी पड़ती है। मेरा निवेदन यह है कि ये जो मैं कह रहा हूं
कि हिन्दी की पत्रकारिता सबसे ताकतवर है। देश में तो उसका आधार सिर्फ यही नहीं
है कि उसका पाठक वर्ग सबसे बड़ा है, बल्कि यह है कि पाठक
वर्ग बड़ा ताकतवर है। ताकतवर इस मायने में कि उसकी तुलना हम महानगरों के पाठक
वर्ग से न करें। दिल्ली, मुंबई,
मद्रास, कलकत्ता के पाठक वर्ग से न करें। जहां-जहां
हिन्दी अखबार और भाषाई अखबार जाते हैं। देश में वहां देश के सबसे संपन्न किसान,
उस इलाके के सबसे संपन्न उद्योगपति, उस
इलाके के सबसे बढ़िया विद्वान, प्राचार्य,
प्रोफेसर, डॉक्टर,
वकील अर्थात जितने भद्र लोक हैं, वह सब
हिन्दी और भारतीय भाषाओं का अखबार पढ़ता है और बड़ी श्रध्दा,
निष्ठा और ध्यान से।
अजित
भट्टाचार्य : इसका प्रमाण क्या है?
वेदप्रताप
वैदिक : आप संपादक के नाम पत्र स्तंभ देखें। हिन्दी के अखबारों में संपादक के
नाम पत्र स्तंभ बहुत शक्तिशाली हैं। एक लेख आप लिखिए,
दो-दो महीने बहस चलती रहती है। पांच-पांच सौ चिट्ठियां,
एक-एक हजार चिट्ठियां आती रहती हैं। यानी हिन्दू के अलावा कुछ
हद तक पायनियर का जो लेटर टू द एडिटर कालम है इसके अलावा किसी अंग्रेजी अखबार
में इतनी बहस नहीं देखता हूं। हिन्दी पाठक कई सवाल उठाते हैं। इससे यह पता चलता
है कि हिन्दी का जो पाठक वर्ग है, वह निरक्षर नहीं है,
वह नितांत गरीब नहीं है, वह पिछड़ा हुआ
नहीं है, वह बहुत प्रबुध्द है,
बहुत जागरूक है और बहुत बेलाग है। इसलिए अगर लोकतंत्र के चश्मे से देखें तो
हिन्दी की पत्रकारिता अंग्रेजी की पत्रकारिता के मुकाबले बहुत ताकतवर है। इंदर
जी ने कहा कि नीति-निर्माता अंग्रेजी के अखबार पढ़ते हैं,
लेकिन जो नीति-निर्माता लोग प्रांतों में बैठे हुए हैं,
भोपाल में या जयपुर में हैं, वे दिल्ली
के अंग्रेजी अखबार को देखते हैं इसमें कोई शक नहीं है,
लेकिन समाज को व्यापक तौर पर प्रभावित करने वाले प्रांतीय भाषाओं के अखबार हैं
और जो नीति-निर्माता प्रांतों की राजधानियों में बैठे हैं वे हिन्दी अखबार की
उपेक्षा नहीं कर सकते। दूसरी बात यह है कि वह युवा वर्ग में सबसे अधिक लोकप्रिय
है। नई पीढ़ी जो मैट्रिक पास कर कालेज के स्तर पर आती है वह हिन्दी के अखबार
पढ़ती है।
इंदर मलहोत्रा
: मैं एक बात कहूं,
आप सिर्फ हिन्दी की बात क्यूं कहे चले जा रहे हैं?
दूसरे क्षेत्रों में भी प्रमुख भाषाई पत्र इतने ही सशक्त हैं।
आंध्र प्रदेश में हिन्दू है, और भी स्थानीय अखबार हैं,
लेकिन इनाडू की बात है, उस पर कोई सवाल
ही पैदा नहीं होता। उसका जवाब नहीं है। जो भी मुख्यमंत्री वहां होगा,
वह इनाडू से घबराता है।
वेदप्रताप
वैदिक : आज से तीस साल पहले नई दुनिया के एक सर्वेक्षण में पाया गया था कि नई
दुनिया की एक कापी
22 लोग
पढ़ते हैं। यह एक बड़ा वैज्ञानिक सर्वे चंचल सरकार ने उस जमाने में करवाया था। अब
संपन्नता आ गई है इसलिए हर आदमी अखबार खरीद लेता है। इसलिए 20-25
करोड़ लोगों का एक समाज जो कई प्रांतों में फैला हुआ है व अपने
पाठक वर्ग को अखिल भारतीय रूप देता है और ताकतवर रूप देता है। यह बात अंग्रेजी
पत्रकारिता नहीं कर पाती। उसका जो पाठक वर्ग है, उसका
चरित्र अभिजात्य वर्ग का है उसके पाठकों की संख्या बहुत कम है। हिन्दी के
मुकाबले 10 प्रतिशत भी नहीं और समस्त भारतीय भाषाओं को
जोड़ लें तो यह प्रतिशत और भी कम हो जाता है। अंग्रेजी के मुकाबले जो भारतीय
भाषाओं की पत्रकारिता है उसका ताल्लुक जन-जन से है। इस मायने में भारतीय भाषा
की पत्रकारिता बहुत ही प्रबल है और बहुत स्वस्थ है। दूसरी बात मैं यह कहना
चाहता हूं कि इस समय सारी दुनिया में जो भारतीय फैले हैं करीब दो करोड़ लोग,
आप क्या समझते हैं वे सिर्फ अंग्रेजी अखबार देखते हैं?
सर्वेक्षण के आंकड़ों से सिध्द हुआ है सारे लोग अपनी अपनी भाषा
के अखबारों को भी विदेशों में इंटरनेट पर जरूर पढ़ते हैं। आप रजिस्ट्रार की
रिपोर्ट देखें तो मालूम पड़ेगा कि हिन्दी अखबारों का प्रसार 60
प्रतिशत तक बढ़ गया है।
कमल कुमार :
थानवी जी,
कई अखबारों के कई संस्करण निकल रहे हैं। उनका पाठक वर्ग भी
होगा। वे हर क्षेत्र से जाकर जुड़ जाते हैं। आप इस तरह के पाठक वर्ग को लेकर
क्या कहना चाहेंगे?
ओम थानवी :
वैदिक जी ने जो कहा उससे मैं पूरी तरह सहमत नहीं हूं। हिन्दी को लेकर
अंतर्विरोधी आचरण है। हम सब अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में दाखिला करवाते
हैं,
इसके लिए सिफारिश कराने से भी नहीं चूकते। मोटे तौर पर हमारा
रवैय्या हिन्दी और अंग्रेजी के बीच कमशकश का है। मैं कहूं कि औपनिवेशिक
प्रवृत्ति में अंग्रेजी से मैं घृणा करता हूं तो गलत नहीं होगा,
इस मायने में कि अंग्रेजी से जो गुलामी का तेवर जुड़ा हुआ है वह
मुझे उस तरफ ले जाने को प्रेरित करता है। पर उन चीजों को अलग रखते हुए जब
पत्रकारिता या साहित्य की बात आये तो अंग्रेजी को मैं उस घृणा की नजर से नहीं
देखता हूं। वहां एक स्तर पर हमारे सरोकार, हमारे लक्ष्य,
एक से हो जाते हैं।
कमल कुमार :
जब हम भाषाई पत्रकारिता और हिन्दी पत्रकारिता की बात करते हैं तो उनमें कोई
तुलना तो हो सकती है। यहां छोटा-बड़ा करने की बात नहीं है।
ओम थानवी :
वैदिक जी ने कहा कि प्रादेशिक पत्रकारिता का प्रसार बहुत बढ़ रहा है। यह भी कहा
कि भाषाई पत्रकारिता ताकतवर है,
इस रूप में कि वह ताकतवर लोगों तक पहुंच रही है। यह सारी
मानसिकता अंग्रेजी की है। जिस तरह हम देखते आये हैं कि अंग्रेजी अखबार किस ढंग
से ताकतवर हैं या किस ढंग से चीजें ताकतवर होती हैं,
उसी नजरिये से हिन्दी में भी हम चीजों को देखते हैं। यानी प्रसार ज्यादा है तो
अखबार ताकतवर है। हमसे जब लोग पूछते हैं कि आपका प्रसार कितना है तो हम कहते
हैं थोड़े लोग पढते हैं पर अच्छे लोग पढ़ते हैं। और इसका मुझे संतोष है। पर मैं
थोड़ी निर्ममता के साथ यह बात कहना चाहता हूं कि मुझको बहुत निराशा भी होती है।
मैं सारी भाषाओं की पत्रकारिता की बात नहीं करता हूं। ईमानदारी से कहूं तो मैं
उन भाषाओं को जानता ही नहीं हूं। मैं हिन्दी की आलोचना भी नहीं कर रहा हूं।
बल्कि मैं अपनी आलोचना कर रहा हूं क्योंकि मैं उसी समाज या पत्रकारिता का
हिस्सा हूं। आपने अभी एक अखबार का नाम बताया कि उसका कितना प्रसार है। यानी
किसी विवेकपूर्ण व्यक्ति से आप यह पूछें कि आपके बैंक में कितना पैसा है या आप
किस ढंग के कपड़े पहनते हैं, क्योंकि हम आपके व्यक्तित्व
का अंदाजा उससे लगाएंगे। मैं समझता हूं कि ये सारा का सारा सोचने का नजरिया गलत
है। ये अखबार ज्यों-ज्यों ऊपर बढ़ रहे हैं मैं मानता हूं कि त्यों-त्यों छोटे भी
होते चले जा रहे है। इस मायने में कि उनके सरोकार उस रूप में व्यापक हो ही नहीं
रहे जिस रूप में प्रसार के हिसाब से उनको व्यापक होना चाहिए। अगर हरियाणा से एक
संस्करण निकल गया है और राजस्थान से संस्करण निकल गया है तो कहा जा रहा है कि
यह तो राष्ट्रीय अखबार है। कल वह इस तरह अंतर्राष्ट्रीय होने का दावा भी कर
सकता है। लेकिन कायदे से तो वह गली-मुहल्ले के अखबार की तरह है। पाठक को नहीं
पता कि दुनिया में क्या हो रहा है। उसे वे आपके शहर का एक अखबार बनाकर रख देते
हैं। ऊपर का लेबल राष्ट्रीय अखबार का है और उसकी खोल में हमारे पास एक
गली-मुहल्ले किस्म का अखबार है। मुझे लगता है कि यह चिंता की बात है,
क्योंकि इससे आपके व्यापक सरोकार साबित नहीं होते।
होना यह चाहिए
कि हम देखें कि किस तरह की हिन्दी पत्रकारिता थी और किस तरह की हो चली है। जब
प्रसार इतना था ही नहीं,
वह पत्रकारिता तब भी आज से ज्यादा अच्छी थी अंग्रेजी के
मुकाबले। भारी प्रसार वाले प्रादेशिक अखबारों ने न केवल गली-मोहल्लों का
संकीर्ण अखबार निकालना शुरू किया बल्कि उनका भाषा संस्कार नहीं रहा। उसमें काम
करने वाले लोगों की ट्रेनिंग के लिए किसी तरह की कोई कोशिश नहीं की गई। बहुत
थोड़े पैसे देकर कुछ लोगों को लिया और मोटे तौर पर यहां तक चेष्टा की कि बगैर
संपादक के भी अखबार निकाला जाए। दूसरी बात यह है कि रंग बिरंगी,
इतनी नंगी तस्वीरें हिन्दी के अखबारों में कभी नहीं छपीं,
जितनी पिछले पांच-दस साल में छपी होंगी। कई प्रादेशिक अखबार
अपने आपको जैसे टीवी बनाने पर तुले हुए हैं। उनका सारा विजुअल,
उनका मेकअप, उनके सरोकार,
फैशन आदि और भी तमाम तरह का हल्कापन जिसकी उम्मीद प्रिंट
मीडिया से हम कभी नहीं कर सकते, उस किस्म की चीजें
प्रादेशिक अखबारों में आ रही हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि कहीं पर भी कोई
दृष्टि नजर नजर नहीं आती, जैसे विवेक नहीं है। बड़े-बड़े
प्रसार के अखबार संपादकीय पृष्ठ पर अंग्रेजी के अनुवाद छापते हैं। आप कहते हैं
कि हम बहुत आगे निकल आये हैं। क्या संपादकीय पृष्ठ पर हिन्दी समाज के अंदर उनका
विवेक, उनकी अपनी बुध्दि नहीं होनी चाहिए?
वेदप्रताप
वैदिक : इस मामले में आपसे खूब सहमति है बल्कि मेरे मन में उन अखबारों के लिए
बहुत ही आलोचनात्मक भाव है।
ओम थानवी : आप
देखें प्रसार संख्या को कैसे बढ़ाया जा रहा है। इसमें केवल उपहार देकर ही नहीं,
सभी तरह के उपायों का सहारा लिया जाता है। इसका मतलब यह नहीं
कि अखबार पढ़ा भी गया है और वह सचमुच काफी सफल रहा है।
वेदप्रताप
वैदिक : ऐसा लगता है कि ओम जी का सारा वजन इस बात पर है कि यदि अखबार का प्रसार
बढ़ेगा तो उसकी गुणवत्ता कम होगी। लेकिन हमेशा तो यह जरूरी नहीं है। जो सबसे
अधिक प्रसार वाले प्रांतीय अखबार हैं उन पर कुछ हद तक वह बात,
जो ओम जी कह रहे हैं, लागू होती है।
लेकिन हम यह न भूलें कि हिन्दी के कुछ प्रांतीय अखबार भी ऐसे हैं जिनका स्तर
तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों से आज भी ऊंचा है, पाठक वर्ग
की दृष्टि से भी और जब मौका आता है, तब वे बड़े से बड़े
सिध्दांत पर लड़ने के लिए कटिबध्द भी हो जाते हैं।
कमल कुमार :
आज कहीं ऐसा तो नहीं कि संपादक की संस्थ