आओ, बाजार से घर वापस चलें
विजय बहादुर सिंह
तमाम
इलेक्ट्रॉनिक चैनल और अखबार जब हमारा हाथ पकड़ बाजार की तरफ चलने को कह रहे हों,
तब घर में रहना सचमुच कितना मुश्किल हो उठता है। तब तो और भी
जब अपने ही देश की ब्रह्माण्ड सुदरियां और अप्सराएं कह रही हों कि चलो बाजार
चलें। और तो और नायक और महानायक तक। बाजार होता भी है सचमुच बड़ा खूबसूरत। जैसे
कि कोई माया-राज्य हो। एक जादुई मुहल्ला हमारे अपने ही मुहल्ले के अगल-बगल,
आसपास। अब तो वह ऐसा सजा-धजा मिलता है कि दिन तो दिन,
रातें भी दिन जैसी लगती हैं, बल्कि दिन
से कई गुना अधिक खूबसूरत, कई गुना अधिक रंगीन। इस
वातावरण में भला किसका मन नहीं भटक जाएगा।
कभी कवि नीरज
ने एक गीत लिखा था किसी एक मेले में किसी भोली-भाली किशोरी के भटक जाने को
लेकर। हुआ कुछ यूं था कि मेले से लौटकर आई हुई वो किशोरी लगभग मटमैली हो चुकी
थी। घर की सारी पवित्र ताजगी लुटाकर वह मेले से लौटी थी और मां का गुस्सा उस
पर बरस रहा था सावन-भादो की तरह। तभी उस जवान होती किशोरी ने मां से यह कहा था-
'मेला
भी मेला कैसा, पग-पग पर जहां बिछा आकर्षण,
लाख दुकानें, लाख तमाशे,
लाख नट-नटी लाख प्रदर्शन।' आज तो इन
आकर्षणों की गिनती मुश्किल है। इतने बहुराष्ट्रीय निगम और उनके बाजार हमारी इस
शहरी आबादी के लिए आ धमके हैं कि हममें से किसी का भी मन घर में रहने का नहीं
बचा। बचा भी होगा तो सिर्फ उनका, जिनके या तो हाथ-पांव
या मन जवाब दे चुके हैं या फिर आर्थिक तंगियों के चलते जिनके पैंटों और कमीज
में जेबें नहीं लगीं। अन्यथा जिनकी जेबें भरी हुई हैं,
वे सब तो पल भर को भी घर में रहने को तैयार नहीं। और तैयार भी क्यों रहें?
घर में अब बचा भी क्या है? या तो
कुछेक नौकर-चाकर या एकाध पालतू कुत्ता। मां-बाप तो अपने-अपने काम पर जा चुके
हैं और दादा-दादी किसी वृध्दाश्रम में। विकास की तेज आंधी ने घर को भी घर कहां
रहने दिया है। वहां अब कोई गृहस्थी नहीं बची। हां,
निवास जरूर बचे हैं और दो-चार या छह कमरों में रात के वक्त जहां-तहां से
थक-हारकर लौटे हुए लोग, अपने-अपने बेहद निजी सपनों को
लेकर अपने-अपने बिस्तर पर। घर, घर न रहकर बस जैसे रात
को विश्राम गृह बचा हो। होली-दीवाली पर भी धीरे-धीरे घर की चिरपरिचित
जिम्मेदारियां खत्म होने के कगार पर है। बाजार ने घर के लिए कोई काम अब छोड़ा ही
नहीं। थोड़े दिनों में घर की अवधारणा भी शायद गैरजरूरी मान ली जाए,
क्योंकि घर जब कुछ करने लायक बचेगा ही नहीं,
तब उसकी जरूरत क्या है? हम धीरे-धीरे
उसी तरफ बढ़े चले जा रहे हैं। और यह 'तरफ'
बाजार है। बाजार हमें पहनना-ओढ़ना ही नहीं सिखा रहा,
खाने-पीने के नए-नए ढंग और रंग भी सिखा रहा है। इस भागती-दौड़ती
जिंदगी में वह जैसे कि फास्टफूड लेकर आया है। हमारी जीभें लार टपका रही हैं और
पेट है कि रो रहा है। एक तरफ फास्टफूड के सुपर बाजार हैं,
तो दूसरी तरफ बड़े-बड़े खूबसूरत और महंगे अस्पताल। फास्टफूड की
बिक्री जितनी बढ़ रही है, डॉक्टर निहाल होते जा रहे हैं।
हृदय रोग और उच्च रक्तचाप अपने उफान पर है और बाजार इसके लिए नई-नई दवाएं और
उपचार लेकर हाजिर है। पहले कभी एक गाना सुनने में आता था- 'तुम्हीं
ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना' इस कहने में एक
निवेदन था। अब तो आधुनिक बाजारों का यह दावा होगा- 'हमीं
ने दर्द दिया है हम ही दवा देंगे।'
कहते हैं कि
अगला विश्व-युध्द शायद पानी के लिए होगा। धरती तो तबाह ही की जा रही है। आसमान
भी कोई कम घायल नहीं है। उसकी कई परतों में छेद हो चुके हैं। सभ्यता ने
पर्यावरण को क्षत-विक्षत और लहूलुहान कर डाला है। वनस्पतियां सकते में आ गई
हैं। चीजों के स्वाद और उनकी गंध तक अब पहले जैसी नहीं रही। तब बाजार नया स्वाद
और नई गंध लेकर हमारे ठीक बगल खड़ा है और नींद से उठा-उठाकर समझा-बुझा रहा है कि
उठो और बाजार चलो। चीजें कितनी इफरात हैं और तुम सो रहे हो। अरे पैसा नहीं है
तो हमसे कहो न?
हम तुम्हारे लिए लोन की व्यवस्था भी कर देंगे। तुम्हें कहां
कुछ करना पड़ेगा। कर्ज लो और घी पियो। याद पड़ता है ऐसा एक पुराना दर्शन इस देश
की धरती पर जन्मा था चार्वाकों का। वे कहा करते थे कि कर्ज लो और घी पियो। अगला
जन्म होगा कि नहीं, कौन कह सकता है। इसलिए अगर तुम कर्ज
में डूबे-डूबे मर ही गए या फिर विदर्भ के किसानों की तरह आत्महत्या का का वरण
कर लिया तो कौन कंपनी या निगम तुमसे मांगने आएगा।
सचमुच बाजार
ने हमारी सारी मुश्किलें हल कर दी हैं। हमारे सोचने-समझने के लिए उसने कुछ भी
नहीं छोड़ा है। यहां तक कि फैसले की घड़ियां भी। वही हमारे लिए सोचने का काम करता
है,
वही हमें रास्ते सुझाता है, वही हमारे
विवेक की चौकीदारी करने लगा है। हम उसकी कठपुतलियां और वह हमारा सूत्रधार है।
हम नाचने को बेताब और वह हमें नचाने को उद्यत बैठा है। अब कोई बचकर बताए तो
जानें। बचना अब किसी भी स्थिति में संभव नहीं बचा इस जादुई बाजार से। गांधी
बुध्दू थे जो उन्होंने इस 'सभ्यता'
को नहीं समझा और इसे शैतानी (राक्षसी) कह डाला। सोचता हूं क्या
अभी भी घर लौटने की कोई गुंजाइशें बची हैं? क्या पिछले
पांच-सात हजार सालों वाला यह देश इस शैतानी बाजार के हाथों मारा जाएगा?
क्या हमारे दाल-रोटी, दूध-भात तमाम तरह
के व्यंजन, मसाले, चाट और
मिठाइयां अब हमारे काम के नहीं रहे? अंकुरित और भुने
चने, जौ-ह्यगेहूं के सत्तू,
अजवाइन, जीरे से गूंथकर तली पूड़ियां,
केक और बिस्कुट से घटिया हैं? और
हानिकारक भी? लेकिन सोचने की फुर्सत कहां है?
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निराला नगर, दुष्यंत मार्ग,
भोपाल-462003
(मध्यप्रदेश)