देश की आत्मा की मौत
अखिलेश अखिल
देश मर
रहा है क्योंकि देश की आत्मा,
गांवों की लगातार मौत होती जा रही है। कोई 60
साल की आजादी में हमने हजारों गांवों की आहुति दे दी है और कोई
हजारों गांव आने वाले 10 वर्षों में मौत के घाट उतरने
वाले हैं। कथित विकास के नाम पर गांवों की सभ्यता,
संस्कृति, समरसता, नैतिकता,
अपनापन और प्रेम भाव की जिस तरह से राजनीतिक और बाजारवादी
पाखंड के जरिए हत्या की जा रही है वह राष्ट्रीय एकता और संप्रभुता के लिए खतरे
की घंटी है।
गांव में
लोकतंत्र पहुंच गया है। पार्टियां,
राजनीतिक गिरोह पहुंच गए हैं,
पार्टियों और राजनीतिक गिरोह के समर्थक तैयार हो गए हैं। गांव झुंड के झुंड
मतदान करते हैं, पर उन्हें नहीं मालूम कि वे वोट क्यों
डाल रहे हैं, किस लिए डाल रहे हैं। अभी उत्तर प्रदेश
में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान दर्जनों गांव के लोगों से चुनाव और मतदान के
बारे में जो जानकारी मिली, वे चौंकाने वाली थी। ऐसा
नहीं है कि अब गांव के लोग भोले हैं, शहरी पाखंड अब उन
तक पहुंच गया है। उनकी राजनीतिक चेतना अब शहरी लोगों से ज्यादा मुखर है।
राजनीति ने उन्हें जो जातीय और साम्प्रदायिक चेतना प्रदान की है,
मतदान करने के जो हुनर पैतरे सिखाएं हैं जो वैमनस्य और रंजिशें
दी हैं, जो शत्रु भाव सौंपा है,
उसी से उसकी राजनीतिक चेतना तैयार हुई है। इस चेतना में न आर्थिक चिंतन शामिल
है, न राजनीतिक परिपक्वता और न सामाजिक समरसता। वोट ने
और वोट प्राप्त करने के हथकंडों ने गांव भेजो अधिकार भाव पैदा किया है,
उसमें चालाकी है,र् धूत्तता है और गाली
गलौज से लेकर हथियारबंद हिंसा है। देश में कोई 6 लाख
गांव हैं और हम 60 साल से आजाद हैं। आज स्वयं निर्णय कर
सकते हैं कि इस 60 सालों में गांवों की स्थिति कहां
बदली है? गांव के हालात कहां बदले हैं?
जिन गांवों में अभी तक पीने का पानी नहीं पहुंचा,
स्कूल नहीं पहुंचे, अस्पताल नहीं
पहुंचे, वहां बाजार पहुंच गए हैं। टूथपेस्ट,
क्रीम पाउडर से लेकर कोका-पेप्सी तक और हीरो-होंडा से लेकर
क्वालिस तक देसी के पाउच से लेकर महंगी विदेशी शराब तक कुछ भी ऐसा नहीं है जो
बाजार ने गांव तक नहीं पहुंचाया है। उन गांवों तक भी जिनकी सीमांत बस्तियों में
फैली झोपड़ियों से निकलकर नंग-धड़ंग, फूले पेट,
पतले पांव बच्चों के झुंड के झुंड गांव की हथेलियों से
भीतर-बाहर होते बाजार को विस्मित आंखों से देखते हैं। आर्थिक समृध्दि में
बंटवारे का जो कुरूप चेहरा गांव में बना है वह शहरी चेहरे से ज्यादा डरावना है।
60 साल की आजादी ने राजनीतिक, नेतृत्व,
प्रशासनिक प्रणालियों और सामाजिक संरचनाओं को जिस तरह से
भ्रष्टाचार, गुंडई और मर्यादाविहीनता के हवाले किया है
उसकी सबसे ज्यादा कीमत गांवों ने चुकायी है। पटवारी से लेकर पंचायत प्रमुख और
छूटभइया नेता से लेकर एम.एल.ए. तक, गांव के चौकीदार से
लेकर थानेदार तक कार्य व्यवहार की जो रीति-नीति तैयार हुई है,
उसमें न गांव की नैतिकता जिंदा रह पा रही है,
न ईमानदारी और न मासूमियत। लाठी पहले से भी ज्यादा मजबूत हो
गयी है जो सबल है उसने निर्बल को और अधिक कमजोर बना दिया है। जो बलात्कार कर
जाता है, जो हत्या कर देता है और जो अपने बाहुबल से
किसी औरत को सरे गांव नंगा घुमा देता है, उस तक पहुंचने
में कानून की सांस फूल जाती है। वहां भ्रष्टाचार उन्मुक्त है और अनाचार
निर्बाध। जी हां देश की आत्मा गांव, अब मर गए हैं। गांव
देश की विकास यात्रा में हाशिये पर आ गए हैं। आधुनिक अर्थ में विकास के लिए
पुराने गांव जो एक हद तक आत्मनिर्भर और स्वायत्त इकाई थे,
भाज्य और अग्राह्य हो गये। उनकी ग्रामीणता या गांवपन अब बोझ बन
गया। गांव का विघटन शुरू हुआ और उसके ताने-बाने उलझते चले गए। गांव के स्वभाव
को समझे बिना विकास का जो पैकेज पहुंचा और विकास का जो मापदंड बना,
उससे गांव विशृंखलित और विघटित हो गए। जमींदारी उन्मूलन,
चकबंदी, पंचायती राज,
सामुदायिक विकास योजना और गरीबों को ध्यान में रखकर चलायमान
योजनाएं ग्रामीण जीवन को जटिल बनाती चली गई। आज के ग्रामीण जीवन में अब कुंठा,
छद्म, बैर-भाव और ग्लानि घर करती जा
रही है। राजनीति के अपरिपक्व और अवांछित ढंग से प्रवेश के कारण गांव के लोग
मोहरे बनते चले गए। वोट बैंक के रूप में उनका उपयोग शुरू हुआ और साथ में शुरू
हुआ वर्गभेद और एक नया समीकरण, जिसमेें राजनीति का
प्रश्रय लेकर कुछ शासक और शोषक बनते गए और कुछ शासित और शोषित बनते गए। कोर्ट
कचहरी का चक्कर लगने लगा। घर-घर में बंटवारा शुरू हुआ,
मुकदमे चलने लगे और गांव-गांव में आपसी तकरार की दीवारें खड़ी होने लगी।
ग्रामीण
क्षेत्र भारत की विकास योजनाओं की प्रयोगशाला बने और व्यापक रूप से शासनतंत्र
की लालफीताशाही,
अक्षमता और भेद भाव के शिकार हुए। विकास के नाम पर चलते
कार्यक्रमों में बेईमानी से धन उगाही का भी सुभिता रहता है। इसके फलस्वरूप
शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन का
मामला हो या फिर बाढ़ या सूखा में जनता को सुविधा देने का काम हो,
नेताओं या अधिकारियों की चांदी रहती है। इन 'विकास
पशुओं' को चरने की परम छूट मिलती रहती है। सरकारी काम
चाहे छोटा हो या बड़ा अनपढ़ गांव के आदमी के लिए महाभारत से कम नहीं होता। इसलिए
हर कचहरी या दफ्तर में काम कराने वाले दलाल या बिचौलिए की अहम भूमिका होती है।
गंवार को सरकार से जो कुछ भी सहायता मिलती है, वह
उन्हीं दलालों की मदद से या यो कहें उनकी जूठन ही होती है। विकास की दृष्टि से
गांव तीन श्रेणियों में विभाजित हो गए हैं। विकसित गांव,
अर्ध्दविकसित गांव और पूरी तरह से अविकसित गांव। विकसित गांव
वे हैं जो शहरों के नजदीक हैं। शहरी सुविधाएं वहां जल्द पहुंच गयी हैं। शहरी
दलाली वहां पहुंच गयी है और जो गांव शहर से दूर हैं वहां कुछ सुविधाएं पहुंचाई
गई हैं और अधिकांश गांव ऐसे हैं जहां आज तक कोई सुविधाएं नहीं पहुंची। ये गांव
आजादी से पहले जैसे थे वैसे आज भी हैं, बल्कि उससे भी
बदतर। कंगाल की तरह गांव का दृश्य हो गया है। छत्तीसगढ़ के सैकड़ों गांव में चले
जाइए। बिहार, उत्तर प्रदेश,
राजस्थान, उड़ीसा या फिर बंगाल,
मध्यप्रदेश या दक्षिण के गांव का भ्रमण करें तो पता चलेगा कि देश की आत्मा की
स्थिति क्या है? इसी देश में दर्जनों वीआईपी गांव
मिलेंगे, जहां सारी शहरी सुविधाएं भी हैं। सड़कें,
बिजली, पानी,
स्कूल, बाजार, सिनेमा आदि की
सुविधाएं हैं तो लाखों गांव ऐसे हैं जहां दरिद्रता मुंह बाए खड़ी है। बेगूसराय
(बिहार) का बिहट गांव बिहार का मास्को कहलाता है। यह पूरा गांव कम्युनिस्ट है।
उत्तर प्रदेश का सैफई और बिहार का फुलवरिया गांव भी इसी देश में हैं जहां विकास
की सारी सुविधाएं पहुंच गई हैं। बाकी के गांव मरणासन्न स्थिति में हैं।
मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में ऐसे-ऐसे गांव हैं जिसे सरकारी लोग जानते तक
नहीं। लांजी प्र्रखंड में सैंकड़ों ऐसे गांव हैं जहां पहुंचना कठिन है। यहां
बसती है आदिम जनजाति बैगा। कहते हैं कि इन जनजातियों के विकास के लिए अब तक
सरकार 99 अरब रूपये खर्च कर चुकी है,
लेकिन इन जनजातियों को देखें तो आंखों में आंसू भर आते हैं।
इधर गंदी
राजनीति ने गांव के संस्कारों को खत्म कर दिया है। आपसी प्रेम को तबाह कर दिया
है। देश का ऐसा कोई गांव नहीं है जहां हिन्दू,
मुसलमान साथ न रहते हों। पहले यह था कि हिन्दू-मुसलमान भले ही
एक-दूसरे के यहां भोजन तो नहीं करते थे, लेकिन उनमें
समरसता थी। वे एक-दूसरे को प्यार करते थे और एक-दूसरे की बहू-बेटी को अपना
मानते थे। लेकिन अब सब कुछ बदल गया है, लेकिन समय बदलने
के साथ सामाजिक ताना-बाना बदला है। अब हिन्दू-मुसलमान एक-दूसरे के यहां भोजन
करते हैं, मगर दिलों में दरार है। पहले बाह्य स्तर पर
भेदभाव था किंतु आतंरिक स्तर पर भावनात्मक एकता सुदृढ़ थीं,
जबकि आज स्थिति यह है कि बाह्य स्तर पर जीवन शैली एक जैसी है
मगर आतंरिक स्तर पर एक दूसरे के प्रति वह जुड़ाव नहीं है जो पहले था।
पिछले
20
वर्षों में गांव में जो सबसे ज्यादा बदलाव आए हैं वह है युवाओं का पलायन। आज
किसी भी गांव में चले जाइए, युवाओं को ढूंढते रह
जाएंगे। शिक्षित युवा हो या अनपढ़ गांव के परकोटे से बाहर जाते नजर आ जाएंगे।
शिक्षित युवा पढ़ाई और रोजगार के नाम पर गांव की दहलीज लांघते मिलेंगे,
तो मजदूर तबके के लोग पेट की खातिर,
ग्रामीण रंजिश से आहत होकर गांव से भागते मिलेंगे। सरकार की तमाम विकास योजनाएं
गांव में चलती दिखती हैं चाहे वह कागज के पन्नों तक ही सीमित क्यों न हो,
लेकिन वहां उनके लिए न रोजगार है और न ही सामाजिक समरसता। भले
ही शहरी जीवन में ग्रामीणों का जीवन और भी मलिन क्यों न हो जाए,
गांव की झंझावातों से वे अपने को बेहतर समझते हैं। यह तो देश
के नुमाइंदों को ही तय करना है कि अब वे गांवों को कैसे बचाएंगे।
ग्रामीण
संस्कृति,
ग्रामीण उल्लास, ग्रामीण तीज-त्यौहार,
ग्रामीण खेलकूद और ग्रामीण आबोहवा अब पूरी तरह दूषित हो चले
हैं। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी,
शोषण, जातपात,
मुकदमे, वैमनस्यता और गुंडई का बोलबाला ही गांवों की
असली पहचान बन गई है और अगर यही सच है तो आने वाले दिनों में पूरा का पूरा गांव
अपराधियों, चोरों, गुंडों,
लठैतों, देशद्रोहियों और नक्सलियों से
भर जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। गांव के लोगों का सत्ता,
सरकार और राष्ट्र के प्रति अविश्वास भर गया है और ऐसा ही होता
रहा तो देश को कौन बचाएगा कहना मुश्किल है।
295-ए,
हनुमान गली, मंडावली,
दिल्ली-92