छत्तीसगढ़-पत्रकारिता की संस्कार भूमि
संजय द्विवेदी
देश
के दूसरे हिस्सों से छत्तीसगढ़ को देखना एक अलग अनुभव है। बस्तर,
भिलाई का स्टील प्लांट, डोंगरगढ़ की मां
बम्लेश्वरी, गरीबी, पलायन और
अंतहीन शोषण के किस्से यह हमारी पहचान के कुछ दृश्य हैं जो दूर से भी दिखते
हैं। किन्तु छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ को देखना एक अलग ही अनुभव है। संवेदनशील कवि,
लेखक,पत्रकार इन चीजों को देखते भी हैं
और दर्ज भी करते हैं। छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता का आकलन करें तो वह तमाम
चुनौतियों के बीच अपने सरोकारों तथा प्रतिबध्दता का प्रतीक है। सन 1900
में पं. माधवराव सप्रे ने जिस पेंड्रा (जिला-बिलासपुर) नामक
स्थान से अपने पत्र 'छत्तीसगढ़ मित्र'
की शुरूआत की, वह आज भी विकास की दौड़
से एकदम दूर जड़-एकांत में खड़ा दिखता है। आदिवासी समाज की उपस्थिति से भरी-पूरी
पेंड्रा जैसी तमाम जगहों पर शायद बड़े अखबार अपनी प्रतियां भी न भेजना चाहें,
क्योंकि ऐसी जगहें सूचनाओं एवं ज्ञान की भूखी तो हैं पर उसके
बदले कुछ दे नहीं सकतीं। विज्ञापन और प्रसार का गणित ऐसा कि आज भी अपने मीडिया
को 'असली छत्तीसगढ़' तक पहुंचाने
की चुनौती है, जो आजादी के पहले तो पहुंच गया पर आज
महानगरीय दबावों में विवश होकर अपने-आपसे जूझ रहा है।
उन्नीसवीं सदी
के अंतिम दशक में राजनांदगांव से विद्यानुरागी राजा बलराम दास के
'प्रजाहितैषी'
(1989) जैसे पत्र के प्रकाशन का भी उल्लेख मिलता है। अर्थात तब
पत्रकारिता मतलब सिर्फ रायपुर- बिलासपुर नहीं था। इसका प्रमाण है कि
1919-20 में मुंगेली से 'भानुदय'
तो चंद्रपुर (रायगढ़) से 1923 में
'छत्तीसगढ़' (मनोहर प्रसाद
मिश्र) जैसे पत्र निकले। जरूरत इस बात की है कि यहां के मीडिया में हमारे
वरिष्ठ पत्रकारों ने जिस तरह की सरोकारी एवं जन प्रतिबध्दता से जुड़ी पत्रकारिता
की नींव रखी, हम इसे आगे बढ़ाएं।
सर्वश्री
मायाराम सुरजन,
स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी, लाला
जगदलपुरी, गोविंदलाल वोरा,
गुरुदेव काश्यप, मधुकर खेर,
रामकृष्ण पांडेय, रामाश्रय उपाध्याय,
रम्मू श्रीवास्तव, रमेश नैयर,
राजनारायण मिश्रा, सत्येंद्र गुमाश्ता,
गंगा प्रसाद ठाकुर, बीआर यादव,
पीयूष कांति मुखर्जी, कुमार साहू,
श्यामलाल चतुर्वेदी, बबन प्रसाद मिश्रा,
जयशंकर नीरव, विष्णु सिन्हा,
कमल ठाकुर, तुषार कांति बोस,
ललित सुरजन, शरद कोठारी,
नंदकिशोर शुक्ल जैसे पत्रकारों ने आजादी के बाद की पत्रकारिता
में नए आयाम जोड़े। अनेक महत्वपूर्ण पत्रों के प्रकाशन से राज्य की पहचान बनी।
यह वह दौर था जब छत्तीसगढ़ के गांव मीडिया में प्रमुखता से दिखते थे। इसी तरह
सुनील कुमार, दिवाकर मुक्तिबोध,
अनुज गुप्त, हिमांशु द्विवेदी,
रूचिर गर्ग, रवि भोई, रूद्र
अवस्थी, सनत चतुर्वेदी, आसिफ
इकबाल, गिरीश पंकज, ज्ञान
अवस्थी, नथमल शर्मा, शशि
कोन्हेर, प्रवीण शुक्ला जैसे अनेक पत्रकारों ने
सरोकारों से जुड़कर खबरों को नए अंदाज में देखने का सलीका विकसित किया।
स्व. चंदूलाल
चंद्राकर,
स्व. श्रीकांत वर्मा से लेकर आज जगदीश उपासने,
सदानंद गोडबोले, विनोद वर्मा,
शुभ्रांशु चौधरी, सुधीर सक्सेना,
एम.वाय. बोधनकर, परितोष चक्रवर्ती,
सतीश जायसवाल, गिरिजाशंकर,
प्रकाश दुबे, निधीश त्यागी,
सुदीप ठाकुर, दीपक पाचपोर जैसे तमाम
नाम गिनाए जा सकते हैं, जिन्होंने छत्तीसगढ़ के बाहर भी
अपने कार्यों से मीडिया में महत्वपूर्ण जगह बनाई। आंचलिक पत्रकारिता की उजली
परंपरा तथा ग्रामीण जनजीवन से जुड़कर जैसी रिपोर्टिंग की शुरुआत छत्तीसगढ़ के
पत्रकारों ने की, वह एक गौरवशाली अध्याय है। छत्तीसगढ़
के पत्रकारों को राष्ट्रीय मंच पर स्वीकृति दरअसल उनकी इन्हीं तरह की खबरों के
नाते मिली। आंचलिक पत्रकारिता की यह उत्कृष्ठ परंपरा हमारी पहचान,
भारतीय पत्रकारिता के व्यापक संदर्भ बनाती है। खेद है कि हाल
के दौर में हम उतनी त्वरा और गंभीरता के अपने गांवों तथा उनकी समस्याओं पर नहीं
लिख पा रहे हैं। राज्य बनने के बाद पत्रकारिता से जिस जिम्मेदार रवैये की
अपेक्षा थी शायद हम वैसा नहीं कर पा रहे हैं। बिलासपुर में वरिष्ठ पत्रकार नथमल
शर्मा ने एक कार्यक्रम में कहा था : भोपाल दूर था तो हम सीएम के खिलाफ खबरें
छाप देते थे किन्तु स्थानीय थानेदार के खिलाफ लिखने से संकोच करते थे। क्योंकि
उससे रोज सामना होता था। शायद राजधानी तथा राजपुत्रों का हमारे करीब आ जाना
कहीं वह कारण तो नहीं जिससे हमारे सरोकार सिकुड़े भले न हों पर भोथरे जरूर हुए
हैं।
छत्तीसगढ़ की
पत्रकारिता की मुक्ति इसी में है कि वह अपनी जड़ों को पहचाने,
उन इलाकों को पहचाने, उन वर्गों को
पहचाने, बीमारियों को पहचाने जो वर्षों से 'छत्तीसगढ़
महतारी' का स्थायी दर्द बनी हुई हैं। सत्ता के शिखर तक
वाड्रफ नगर से लेकर सुकमा, दंतेवाड़ा,
जशपुर के ग्राम्यांचल का भी दर्द पहुंचना चाहिए। क्षेत्र में
जाकर रिपोर्टिंग करने का स्वभाव, पत्र संस्थानों में
रिपोर्टिंग पर खर्च करने का स्वभाव बढ़ना चाहिए। छत्तीसगढ़-बिलासपुर,
रायपुर में नहीं 16 जिलों के 19
हजार गांवों में बसता है। इसकी कितनी और कैसी खबर हम ले पा रहे
हैं? यह देखना होगा। मेरी चिंता का विषय यह भी है कि एक
ही कस्बे के दो सीमेंट प्लांट में लंबी हड़ताल चलती है पर किसी अखबार में यह खबर
जगह नहीं पाती। ऐसे वातावरण में हम माधवराव सप्रे जी की परंपरा के अनुयायियों
का उत्तरदायित्व बहुत बढ़ जाता है।
पं. माखनलाल
चतुर्वेदी,
श्री द्वारिका प्रसाद मिश्र जैसे बड़े संपादक एवं विद्वान भी
सगर्व यह स्वीकार करते थे कि पं. माधवराव सप्रे उनके गुरु हैं। जाहिर है,
बीसवीं सदी के पूर्वार्ध्द की मध्यवर्ती भारत की पत्रकारिता
सप्रे-परंपरा की अनुगामी रही है। अत: पत्रकारिता की संस्कारभूमि 'छत्तीसगढ़'
से लोगों की बहुत अपेक्षाएं हैं। वह अपने पारंपरिक दायित्वबोध
से लैस होकर वर्तमान की चुनौतियों को स्वीकारे और जनमुद्दों के समाधान में
सकारात्मक भूमिका निभाएं, यही ऐतिहासिक भूमिका छत्तीसगढ़
की पत्रकारिता को भारतीय पत्रकारिता के वृहत्तर संदर्भ में विशिष्ट जगह
दिलाएगी।
स्थानीय संपादक, हरिभूमि,
पुजारी पार्क के सामने, टिकरापारा,
रायपुर