सुविचारित संचार तंत्र की जरूरत
डॉ. श्रीकांत
सिंह
विश्व
की व्यवसाय संरचना में पिछले कुछ समय में व्यापक परिवर्तन हुए है। जैसे-जैसे
समूचे विश्व का एक व्यावसायिक समूह के रूप में विस्तार हुआ है जिसे इस परोक्ष
रूप ग्लोबलाईजेशन या भूमंडलीकरण भी कहते हैं,
वैसे ही विश्व की व्यवसाय संरचना ने भी अलग-अलग तरह से करवट
ली है। प्रतिस्पर्धा का दौर बढ़ा है, साथ ही बढ़ी है
अपने व्यवसाय को श्रेष्ठतम सिध्द करने के लिए स्थापित निकायों की होड़।
प्रतिस्पर्धा और होड़ के इस दौर में इन वर्षों में सबसे तेजी से उभरने वाला
क्षेत्र है कारपोरेट क्षेत्र। यह व्यवसाय के विस्तार का उच्चांक है जो सिर्फ
बाजार या खरीददार तक सीमित नहीं है बल्कि अर्थव्यवस्था और समाज व्यवस्था के
विभिन्न घटकों का सशक्त समुच्चय है। कारपोरेट सिर्फ नफे-नुकसान तक सीमित रहने
वाली व्यापार प्रणाली न होकर जीवन शैली और संस्कृति तक को झकझोर कर रख देने
वाली जीवन पध्दति है।
जैसे-जैसे
हम या हमारा समाज ग्लोबल बनते जा रहे हैं वैसे-वैसे हम और अधिक कारपोरेट
संस्कृति की गिरफ्त में आते जा रहे हैं। यह बदलती सामाजिक संस्कृति की जो कि
बाहुलतापूर्वक अर्थनियोजन पर टिकी है की अपरिहार्यता है और इसलिए बिना किसी के
विकल्प के स्वीकारना हमारी मजबूरी भी। यह एक नया दौर है जो हमारे बिना चाहे भी
हमारे अंदर प्रवेश कर गया है। हमारे कारपोरेट होने का दौर। इसमें कोई भी अछूता
नहीं है।
कारपोरेट
क्षेत्र के इस समूचे तंत्र को सुदृढ़ और सुव्यवस्थित करने के लिए एक सुव्यवस्थित,
सुशिक्षित और सुविचारित संचार तंत्र की आवश्यकता है। ऐसा
तंत्र जो इसकी बारीकियों को समझते हुए तथा इसकी आवश्यकताओं को भांपते हुए तंत्र
के सभी घटकों, अवयवों से सार्थक संवाद स्थापित कर
सके और उसे जारी रख सके। इसे महज जनसंपर्क या बिजनेस कम्यूनिकेशन समझना एक भूल
होगी, क्योंकि यह इन सबको समाहित करता एक व्यापक
सामाजिक परिक्षेत्र है जिसके दायरे में व्यवसाय के साथ-साथ व्यवहार,
व्यक्ति और अन्य व्यंजनाएं भी समाहित हैं।
भारतीय
परिदृश्य में जहां व्यवसाय भी एक भावनात्मक रागात्मकता के बीच अब तक
पुष्पित-पल्लवित होता रहा है,
कारपोरेट क्षेत्र का एकाएक उभर कर छा जाना वैश्विक परिदृश्य
से और भी भिन्न है।
जाहिर है
कि ऐसे व्यापक परिक्षेत्र के अधिशासी के रूप में कारपोरेट कम्यूनिकेशन के सामने
आज कई विषय और चुनौतियां है। सबसे बड़ी चुनौती तो कारपोरेट कम्यूनिकेशन को एक
संपूर्ण और अत्यावश्यक विधा के रूप में संस्थित करने की है,
जिससे बहुत अधिक समय तक बचा नहीं जा सकता। विशेषज्ञता के
दौर में जिस तरह के व्यावसायिक कौशल की दरकार आज विभिन्न क्षेत्रों में है,
उसमें कारपोरेट कम्यूनिकेशन का क्षेत्र संभवत: सर्वाधिक
कौशल और रचनात्मक प्रतिभा की मांग रखता है। इस दृष्टि से इसे आज मिल रहे सम्मान
और महत्व में नि:संदेह कई गुना वृध्दि की आवश्यकता है। ऐसा करने से ही
कार्पोरेट क्षेत्र की अवधारणा को उसके सही रूप में प्रस्थापित करने में सफलता
होगी।
मीडिया
विमर्श का हमारा यह अंक कारपोरेट कम्यूनिकेशन के इस नये दौर और इस दौर में
उभरती नई चुनौतियों की गहरी पड़ताल करता आप के सामने प्रस्तुत है। इस अंक की
सामग्री का अध्ययन करने के बाद सहज ही ज्ञात हो जायेगा कि कारपोरेट कम्यूनिकेशन
का यह क्षेत्र हममें से किसी के लिए भी उतना अपरिचित अथवा अछूता नहीं है जितना
हम उसे समझ रहे हैं। लिहाजा हमारा उसमें हस्तक्षेप समयानुकूल है। नए साल -2008
की हार्दिक शुभकामनाएं।


