पुरुषोत्तम दास मोदी नहीं रहे
डॉ. श्रीकांत सिंह
काशी ।
7अक्टूबर,
2007 की सुबह हमारे लिए एक गंभीर शोक संदेश लेकर आयी। काशी ही
नहीं देश को एक महान प्रकाशक, चिंतक,
साहित्यकार, पत्रकार एवं समाजसेवी
पुरूषोत्तमदास मोदी हमारे बीच नहीं रहे। श्री मोदी का जन्म 19
अगस्त,1928 को गोरखपुर में हुआ था।
उन्होंने पं. माखनलाल चतुर्वेदी के साथ भी पत्रकारिता की थी।
श्री मोदी
1964
में काशी आ गए और विश्वविद्यालय प्रकाशन की स्थापना की। उनका
देहावसान हिंदी जगत की अपूरणीय क्षति है। पूरे देश में उनके द्वारा संपादित
पत्रिका भारतीय वाड्मय ने एक खास स्थान बना लिया था। उनके प्रयासों से यह एक
महत्वपूर्ण पत्रिका बन गई थी। राष्ट्रहित की चेतना से सदा सजग रहकर विकासशील
भारत के लिए शिक्षा के महत्व पर वे हमेशा बल देते रहे। कार्यकुशल समाजसेवक के
रूप में उनकी भूमिका हमेशा रेखांकित की जाएगी। वे देशभर के हिन्दी साहित्यकारों,
पत्रकारों और हिन्दीसेवियों के बीच सेतु का कार्य करते थे।
मीडिया विमर्श के प्रकाशन से ही वे हमें प्रोत्साहित किया करते थे। मीडिया
विमर्श को सदैव उनका आशीर्वाद मिलता रहा। वे हमें अपने सुझाव एवं मार्गदर्शन से
सदैव प्रेरित करते थे। यह इस बात का प्रमाण है कि उनकी नजर हर स्थान से निकल
रहे प्रकाशनों पर रहती थी। शायद इसीलिए सूदूर छत्तीसगढ़ से निकलने वाली इस
पत्रिका को भी उनका स्नेह मिलता रहा। गत 29 मार्च,2007
को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा था कि- रायपुर जैसे नगर में
ऐसी पत्र चेतना देखकर प्रसन्नता होती है। मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ पत्रकारिता,
साहित्य तथा कला की दृष्टि से कितना समृद्ध और सजग है यह देखकर
हम उत्तरप्रदेश वासियों कोर् ईष्या होती है। यहां तो सिर्फ राजनीति है-सत्ता की
राजनीति।
इसी तरह
दिनांक 8
जनवरी, 2007 को भेजे अपने एक पत्र में
उन्होंने लिखा- आज मीडिया देश को दिशा प्रदान कर रहा है। ऐसे में सूचना के
अधिकार पर अंक प्रकाशित कर आपने महत्वपूर्ण कार्य किया है। इससे सूचना के
अधिकार के बारे में प्रामाणिक जानकारी मिलती है। दस्तावेज के अंतर्गत पं.
माखनलाल चतुर्वेदी का भरतपुर भाषण और डा. विजयबहादुर सिंह का दद्दा पर लेख
प्रकाशित कर आपने दद्दा का स्मरण करा दिया जिनका सानिध्य मुझे मिला था। अतीत
स्मरण हो आया। ऐसे सार्थक प्रकाशन के लिए बधाई।
हिंदी जगत के
महान साधक और सेनानी को मीडिया विमर्श परिवार नमन एवं भावभीनी श्रद्धांजलि।


