सूचना क्रांति का लाभ कितनों को
राजीव मिश्र
सूचना
क्रांति के डंके बज रहे हैं। नई तकनीक की बहार आई हुई है। चारों तरफ इस सब को
लेकर बल्ले-बल्ले हो रही है। परंतु जरा इस हल्ले-गुल्ले से इतर दो मिनट
मस्तिष्क को ठंडा कर भारत के परिप्रेक्ष्य में विचार कर लें,
तो तस्वीर का दूसरा रूख भी दिख जाएगा। वर्ष 2000
से सूचना क्रांति की बयार चलनी शुरू हुई मानें तो पिछले सात वर्षों में भारत के
कितने लोग इसका लाभ उठा सके, यह देखें। भारत की आबादी
एक अरब। क्या हमारी आधी आबादी भी इस क्रांति का लाभ पा सकी। उत्तर नकारात्मक ही
मिलेगा। चलो आगे बढ़ते हैं- न सही आधी तो क्या चौथी आबादी ने लाभ उठाया। पुन:
नकारात्मक ही उत्तर प्राप्त होगा।
सूचना क्रांति
के मामले में भारत की क्या स्थिति है,
यह देखने लायक है। एक ओर जहां सम्पूर्ण विश्व इंटरनेट की एकअरब
लोगों तक पहुंच पहुंचकर जश्न मना रहा है, वहीं बिजनेस
प्रोसेस आउट सोर्सिंग (बी.पी.ओ.) जैसे क्षेत्रों में सिरमौर माना जाने वाला
भारत इस मामले में बहुत ही पीछे है। इंटरनेट की पहुंच मामले में अंतराष्ट्रीय
औसत 16 प्रतिशत है, भारत में
इसकी पहुंच 5 प्रतिशत तक ही सीमित है। देश में अभी तक
कुल 5 करोड़ लोगों तक ही इंटरनेट पहुंच पाया है।
वास्तविकता तो यह है कि आज भी भारत की तीन चौथाई से अधिक आबादी सूचना क्रांति
का लाभ उठाना तो दूर उसकी परछाई तक से मरहूम है। फिर इतना शोर-शराबा क्यों?
क्या भारत में जितने लोगों ने इस क्रांति का लाभ उठाया है
मात्र वही भारत के बाशिंदे हैं। शेष आबादी जिसने सूचना क्रांति तो क्या बेसिक
फोन तक के दर्शन नहीं किए हैं। उनके बारे में न सोचा जाना क्या उनके साथ इस
सुविधा प्राप्त वर्ग की ज्यादती नहीं है। वास्तविक स्थिति यह है कि इस सूचना
क्रांति और उसके पहले आए भूमण्डलीकरण आदि की वजह से समाज में दो वर्ग बन गए
हैं। एक छोटा सा वर्ग वह है जिसको तमाम तकनीकों की सुविधा सहज ही प्राप्त है।
दूसरा बड़ा वर्ग वह है जो इन सभी सुविधाओं से वंचित है। दोनों वर्गों के बीच एक
बड़ी खाई सी बनती जा रही है। यदि इस तरफ गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो आने
वाले दिनों में बहुत बड़ा सामाजिक विस्फोट हो सकता है।
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बी, बाघम्बरी हाउसिंग स्कीम,
इलाहाबाद-211006