गुरु !
इन दिनों तो हिट है हंसी
विवेक गुप्ता
हंसी
वह वैश्विक भाषा है,
जिसे हर मनुष्य समझ और बोल सकता है,
लेकिन आधुनिक युग में एक वयस्क व्यक्ति प्रतिदिन औसतन पांच मिनट से भी कम हंसता
है। तनाव और चिंता के इस दौर में हंसी कहीं खो गई है। एकाकी होता जा रहा इनसान
हंसी के बहाने ढूंढ़ता है। हंसी की इस डिमांड को कैश करने के लिए तमाम फिल्ममेकर,
चैनलों के कर्ताधर्ता, गुरु,
बाबा, नेता,
अभिनेता और विज्ञापन निर्माता हंसी के बाजार में कूद पड़े हैं।
संसार में इन
दिनों हंसी-खुशी की बहुत कमी है। हम दूसरे देशों में झांकने से पहले क्यों न
अपने ही देश को देखें,
जहां आतंकवाद, अन्याय,
भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद,
बेइमानी और लूट-खसोट से परेशान आदमी एक अदद मुस्कान पर सब कुछ
निछावर कर देने को तैयार दिखता है। तो, जाहिर है कि जिस
चीज की कमी होगी, जिस चीज की डिमांड होगी,
बाजार उसे उपलब्ध कराने में जुट जाएगा। हंसी के साथ भी यही हो
रहा है।
काम के बोझ से
परेशान इनसान के तनाव को समाज से उसके अलगाव ने और गंभीर बना दिया है।
रिश्ते-नातों,
पड़ोसियों और अनौपचारिक तौर पर कहकहे लगा सकने वाले यारों से
दूर आज का इनसान हंसी के लिए बाजारं शरणं गच्छामि हो गया है और बाजार ने भी उसे
निराश नहीं किया है। आप हंसी में निवेश कीजिए, आपको
दोहरा-तिहरा फायदा होगा, जैसा कि राजकुमार हीरानी और
संजय दत्त के साथ हो रहा है। 'मुन्नाभाई'
सीरीज की दो कामयाब फिल्मों की इस जोड़ी को नाम और दाम के साथ
दुआएं (संजू की जेल यात्राओं के बाद भी) मिल रही हैं। 'लगे
रहो मुन्नाभाई' न सिर्फ पिछले साल की,
बल्कि दशक की सबसे बड़ी हिट साबित हुई है। जहां देखो,
वहां हंसी संक्रामक रोग की तरह फैलती जा रही है। लोग आमतौर पर
धर्म-अध्यात्म को हास्य से अलग, गंभीरता से जोड़कर देखते
हैं, पर जी जागरण चैनल ने तमाम धर्म चर्चा के साथ
'ओशो जोक्स' भी प्रसारित किए।
तमाम बाबा, गुरु और स्वामी अपने प्रवचनों को हंसी के
तड़के के साथ मनोरंजक बना रहे हैं। जो जितना हंसाता है,
जो जितना हाजिरजवाब है, उसके तंबू में उतनी ज्यादा भीड़
रहती है। हर गुरु चेलों से कह रहा है कि खुश रहो,
खिलखिलाओ और अपना जीवन सफल बना लो। हंसी मोक्ष का माध्यम बन गई है। कवि
सम्मेलनों से वीर और शृंगार रस बिसरा दिए गए हैं और अब सिर्फ हास्य रस ही बचा
रह गया है। इसलिए इंटरनेट और मल्टीप्लेक्स के जमाने में भी भोर तक चलने वाले
कवि सम्मेलन हजारों की भीड़ खींच रहे हैं। ऐसे में आप शिकायत नहीं कर सकते कि
उसे ऐसे नहीं, वैसे तरीके से हंसाना चाहिए। यह जान
लीजिए कि हंसना जितना कठिन है, हंसाना उससे कहीं ज्यादा
मुश्किल है। सो, नेता, अभिनेता
और प्रोडक्ट के विक्रेता, सभी जनता को हंसाने के
बड़े-बड़े जतन कर रहे हैं। नवजोत सिंह सिध्दू पर फूहड़ता के जितने भी इल्जाम लगें,
पर सच तो यह है कि अपने पूरे खेल जीवन में उहें जितना पैसा और
मान-सम्मान मिला, उससे कहीं ज्यादा उन्हें एक कार्यक्रम
'द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज'
दे चुका है। शेखर सुमन इसी हंसी के बल पर छोटे परदे के सुपरस्टार बन चुके हैं।
स्टार वन पहला चैनल था, जिसने हंसी के करिश्मे को
पहचानकर पहले 'द ग्रेट इंडियन कॉमेडी शो'
और फिर 'लाफ्टर चैलेंज'
शुरू किया। इस एक कार्यक्रम ने चैनल को रातोंरात लोकप्रिय बना
दिया। अब तो चौबीसों घंटे हंसने-हंसाने के कार्यक्रम प्रसारित करने वाले जी
स्माइल और सोनी सब चैनल भी बाजार में पैठ जमा चुके हैं।
जी स्माइल के
सीनियर वाइस प्रेसीडेंट नितिन वैद्य एक लंबी-चौड़ी स्माइल के साथ बताते हैं कि
उनका पेन किलर टीवी चैनल है। वे ऐसे प्रोग्राम दिखाते ही नहीं,
जो हंसा न सकें। वैद्य का दावा है कि उनके चैनल को इतने
विज्ञापन मिलते हैं कि प्राइम टाइम पर उन्हें दिखाने का समय ही नहीं होता। सब
टीवी का तो नारा ही है 'ऑनली स्माइल्स,
नो टीयर्स।' छोटे परदे पर हर चैनल में
हंसी का बोलबाला है। 'साराभाई वर्सेस साराभाई',
'इंस्टैंट खिचड़ी', 'एलओसी', 'आफिस-आफिस',
'यस बॉस', 'फेमिली नंबर वन', 'बेचारा
बिग बी', 'फूल टू पागल है' जैसे
कॉमेडी सीरियल घर-घर में लोकप्रिय हैं। 'आफिस-आफिस'
को बेस्ट सीरियल के दर्जनों अवार्ड मिल चुके हैं। इसका प्रमुख
पात्र मुसद्दीलाल (पंकज कपूर) आम जनता का प्रतिनिधित्व करता है। वह हर आफिस में
घूसखोरी और भ्रष्टाचार के जाल में फंस जाता है। फिर उसके भोलेपन से
परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि सहज हास्य उत्पन्न होता है। यह दरअसल व्यवस्था के
खिलाफ उपजा हास्य है, जो कुछ पल के लिए ही सही,
राहत देता है। हास्य का बाजार भरपूर आवक के बावजूद अभी मंदा
नहीं पड़ा है। इसलिए नए-नए कॉमेडी सीरियल और कार्यक्रम शुरू हो रहे हैं। माना जा
रहा है कि 'ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज'
की करिश्माई सफलता को सोनी टीवी पर पिछले दिनों शुरू हुआ
'कॉमेडी सर्कस' दोहरा सकता है।
सिर्फ मनोरंजन चैनल ही नहीं, न्यूज चैनल भी अब मनोरंजन
परोस रहे हैं। स्टार न्यूज पर शेखर सुमन की एंकरिंग वाला 'पोल-खोल'
किसी सनसनीखेज खबर के कार्यक्रम से ज्यादा देखा जाता है।
एनडीटीवी पर 'गुस्ताखी माफ' है,
तो इंडिया टीवी पर 'भैया बोले'-
खबरों के मसालेदार पोस्टमार्टम और नेताओं की बेबाक खिंचाई के
कारण ये कार्यक्रम न्यूज चैनलों की टीआरपी बढ़ा रहे हैं। शेखर सुमन कहते हैं,
'हर कोई व्यवस्था से खफा है, लेकिन वह
उसे ठीक न कर पाने के कारण कसमसाता रहता है। ऐसे में जब सीरियलों में व्यवस्था
की खिल्ली उड़ाई जाती है, तो दर्शक उससे खुद को जोड़कर
देखता है। यही वजह है कि ऐसे कार्यक्रम काफी पसंद किए जाते हैं।'
बड़ा परदा भी
इस मामले में पीछे नहीं है। जारी दौर में कॉमेडी को सफलता की गारंटी समझा जा
रहा है। पिछले दो-तीन सालों में रिलीज हुईं अधिकांश कॉमेडी फिल्में हिट या
सुपरहिट रही हैं।
'मुन्नाभाई
एमबीबीएस' व 'लगे रहो मुन्नाभाई',
'नो एंट्री', 'क्या कूल हैं हम',
'हेराफेरी', 'मस्ती', 'मुझसे
शादी करोगी' ने कमाई के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।
डेविड धवन और प्रियदर्शन तो सिर्फ कॉमेडी फिल्में बनाकर ही हिट निर्देशकों की
जमात में शामिल हो गए हैं। रोमांस और एक्शन आधारित फिल्में खास वर्ग की पसंद को
ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, पर कॉमेडी हर वर्ग को
आकर्षित करती है। एक जमाने में जॉनी लीवर फिल्मों का अनिवार्य हिस्सा हुआ करते
थे। अब यह जगह बोमन ईरानी और राजपाल यादव ने हथिया ली है,
लेकिन तारीफ की बात है कि जॉनी बेरोजगार नहीं हुए हैं। वे
फिल्मों में तो आ ही रहे हैं, टीवी पर भी 'जॉनी
आला रे' के जरिए धमाल मचा रहे हैं। जॉनी 'कॉमेडी
सर्कस' में जज के रूप में एक अलग छाप छोड़ते हैं।
कॉमेडी ने देश
को नए-नए सेलीब्रिटी दिए हैं। सुनील पाल,
एहसान कुरैशी और राजू श्रीवास्तव आज घर-घर में पहचाने जाते
हैं। नवजोत सिध्दू हंसा-हंसा कर राजनीति में भी चमक गए और लालू की राजनीति तो
उनके चुटीले हास्य पर ही टिकी है। नेता हो या अभिनेता,
हास्य के करिश्मे से हर कोई वाकिफ है। यह आज के तनाव भरे युग की सबसे बड़ी दवा
है।
द्वारा : श्री बालकृष्ण गुप्ता
'गुरु'
डॉ. बख्शी मार्ग,
खैरागढ़-491881
राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)