बार और पब कल्चर के साइड्स अफेक्टस
डॉ.
कमल कुमार
यह
समय बुध्दि,
तकनीक, उपभोक्तावाद,
वैश्विक संस्कृति और बहुराष्ट्रीय कंपनियों (के वर्चस्व) की
ताकत, पूंजीवाद का है जो जीवन की दैहिक व्याख्या
करता है। जो जिंदगी में बेतुकेपन, उच्छृंखलता और
उद्दाम इच्छाओं को मान्यता देता है। बाजारवाद,
विज्ञापन की आक्रामकता और वस्तुवाद के कारण देह संस्कृति प्रमुख हो गई है। जीवन
में पूर्व और पश्चिम का रीमिक्स हो रहा है।
आज की युवा
पीढ़ी के पास पैसा है। मां-बाप के पास समय नहीं है इसलिए समय से समझौते में वे
उन्हें खूब सारी सुविधाएं और पैसा देते हैं। पब कल्चर या बार कल्चर इसी का
हिस्सा है। पांच सितारा या तीन सितारा होटलों में जाना सबके वश की बात नहीं है।
कामर्शियल जगहों में,
शापिंग मॉल में और दूसरी सस्ती जगहों पर जो बार बने हैं,
उन तक आसानी से सभी की पहुंच होती है। युवा लड़के-लड़कियां
कैमरा फोन लेकर आते हैं और एसएमएस स्कैन हो जाते हैं। अनुपम काम्पलेक्स में
'बज्ज' बार में बैठे
राजेश और उसकी मित्र नीलम ने कहा 'एक बार पी लेने पर
मध्यमवर्गीय सारे पूर्वाग्रह खत्म हो जाते हैं। फिर हम कुछ भी कर सकने की
स्थिति में आ जाते हैं।'
आजकल युवा
पीढ़ी को 'हैगराऊड'
करने के लिए कोई जगह चाहिए। 'बरिस्ता'
और 'कैफे'
की सफलता का रहस्य यही था। चार-पांच साल पहले 'काफी
कल्चर' शुरू हुई थी। 'कैफे'
और 'बरिस्ता'
श्रृंखला के काफी बार जगह-जगह खुले थे जिनमें कोई भी विशेष
रूप से युवा लड़के-लड़कियां आपसी संवाद, विचार-विमर्श
या मिल बैठने के लिए आते थे। इन्हीं की सफलता पर अब पब और बार आ रहे हैं। ये पब
कल्चर एक तरह से न्यूयार्क के पैटर्न पर है। ये बार क्योंकि अच्छा बिजनेस कर
रहे हैं इसलिए लगभग सभी आवासीय कालोनीज के कामर्शियल काम्पलेक्स में बार और पब
अपनी जगह बना रहे हैं। अनुपम कामर्शियल में 'बज्ज',
वसुंतकुंज में 'हश्श्',
न्यू फ्रेंड्स कालोनी में 'रैबल
स्ट्रीट', कनाट प्लेस में 'नर्थिंग
अथांटिक' तथा समुदाय भवनों और वे साइड में पब और बार
खुलने का सिलसिला जारी है।
पीना
'हैपकल्चर'
का हिस्सा है। एक तरह से आधुनिक होना है। अगर आपके दोस्त पी
रहे हैं तो आप भी पीएंगे ही। 'हश्श्'
में बैठे वरूण ने कहा 'हम पीअर
प्रेशर' में आ जाते हैं। पहले,
दो साल पहले तक मैं नहीं पीता था। लेकिन अब सब ठीक है। सब
चलता है। उसने कंधे उचकाए थे। वरूण के साथ बैठी उसकी मित्र निशा हार्ड किलर ले
रही थी। 'हां, मुझे इसमें
कोई रूकावट नहीं है। एक तरह से यह हमारी प्रेस्टीज का सवाल बन जाता है। हम अपने
को लड़कों से पीछे नहीं समझतीं। लगभग तीन साल पहले मैं नहीं पीती थी। मेरे मित्र
'बी कूल। कूल यार। चिल्ल मैन,
चिल्ल' कहते और गिलास मेरी तरफ
बढ़ा देते। अब सब ठीक है। अच्छा लगता है।' इसलिए
'बार' या 'पब'
'कल्चर' 'कूल कल्चर'
का ही हिस्सा है।
जो बहुत
प्रोफेशनल हैं,
ऊंची जगहों पर हैं। उनके पास 'हैगअरांड'
करने का समय ही नहीं है। सुधीर मल्टी नेशनल 'प्रोटेंग'
के साथ है। उसने बताया, 'कभी-कभी
अपने मित्रों के साथ हम आते हैं पर जल्दी ही कुछ खा पीकर या बातचीत करके निकल
जाते हैं। हमारे पास इतना वक्त नहीं होता। लेकिन अधिकतर युवा लड़कों और लड़कियों,
जो कालेज के, यूनिवर्सिटी के
छात्र हैं, या जो छोटी नौकरियां करते हैं उनके पास
समय गुजारने के लिए और फिर 'लड़की पटाने'
या 'लड़का फंसाने'
के लिए जगह चाहिए।' ये 'बार'
और 'पब'
बड़ी अनुकूल जगहें हैं। जहां ये बच्चे घंटों निश्चिंत होकर
बैठ सकते हैं। इस समय 'बार'
या 'पब'
का धंधा बहुत मुनाफे का धंधा माना जाता है। अपनी सेल बढ़ाने
के लिए 'हैपीआरज' के
आकर्षक पैकेज देते हैं जिसमें एक पैग के साथ दूसरा या आधा पैग मुफ्त दिया जाता
है। विज्ञापनों की अनुमति नहीं है लेकिन लिकर कंपनियां 'सैरोगेट'
विज्ञापन के माध्यम से अपनी सेल प्रमोट करती हैं। जैसे
विज्ञापन होगा, पीकर गाड़ी मत चलाओ,
नीचे एक पंक्ति में लिकर कंपनी का नाम दिया गया होगा। एक
तरह से यह कंपनी की लिकर प्रमोशन ही तो है। और भी दूसरे कई तरीकों से सेल
प्रमोशन की जाती है। जैसे कई बार या पब में खूबसूरत लड़कियों को बार गर्ल या बार
कीपर बनाया जाता है। जेसिका लाल की हत्या बीना रमानी के बार में हुई थी जेसिका
लाल बार कीपर थी। बार का समय हो चुका था उसने मनु शर्मा को ड्रिंक देने के लिए
मना किया था। मनु ने उसकी गोली मारकर हत्या कर दी थी। बीना रमानी के पालिटिकल
संपर्क थे, बात उछली,
मीडिया में हलचल हुई लेकिन हुआ कुछ नहीं। इस हादसे के बाद बार के बाहर बाउंसर
आए। अब तो बाउंसर इस बार कल्चर का जरूरी हिस्सा ही है।
एक बात
ध्यान देने की है कि क्या बार कल्चर हमारी जीवनशैली का हिस्सा बन सकती है?
हमारा समाज हिपोक्रेट (दोहरे मानदंडों वाला) समाज है। विशेष
रूप से लड़कियों को लेकर हमारे दोहरे मापदंड हैं। लड़की पब में तो अच्छी है,
स्मार्ट है पर वही लड़की घर में,
परिवार में ठीक नहीं है। यूं भी मुंबई या कर्नाटक की तरह हमारा समाज लिबरल नहीं
है। मुंबई में लिकर सबसे सस्ती है। सबसे कम कीमत पर मुंबई में लिकर उपलब्ध है
क्योंकि उस पर कोई सरचार्ज नहीं होता। मुंबई की लड़कियां अधिक विचारशील,
खुले दिलों-दिमाग वाली और प्रोफेशनल हैं। दिल्ली का समाज और
खासतौर पर लड़कियां रिटोरौगेटिव हैं। शादी से पहले कुछ समय इधर-उधर हैगराउड किया
छोटी-मोटी नौकरियां की और फिर मम्मी-पापा की आज्ञानुसार तुरंत शादी करा ली।
उनका मुख्य लक्ष्य शादी ही होता है। बेंगलूर में जगह-जगह पर पब हैं। बूज और
हैवी मैटल म्यूजिक का चलन वहां सबसे पुराना है। बेंगलूर में सबसे अधिक म्यूजिक
और रॉक कंसर्ट होती हैं। बेंगलूर के लोगों की यह एक जीवनशैली है। उनकी जिंदगी
का, 'लाइफ स्टाइल' है।
दिल्ली के लिए यह कल्चर नई है। यूं भी यहां की संस्कृति राजनीतिक है। मनु शर्मा
को अब तक सजा नहीं मिली। राजनीतिक संपर्क हों तो सब कुछ सध जाता है। इसलिए ऐसी
जगहों को लेकर मध्य वर्ग और उच्च वर्ग में भय भी है। लिकर माफियाओं के न सिर्फ
राजनीतिक कनैक्शन होते हैं, वे राजनीतिक पार्टियों
को आर्थिक फायदा पहुंचाते हैं, उनसे उनके नजदीकी
ताल्लुकात होते हैं। फिर विजय मालिया और किंग फिशर जैसे लिकर बैरन अब खुद ही
राजनेता बन गए हैं। संसद में आ गए हैं। संसद में बैठकर नियमों और कानून को
तोड़ना कितना आसान होता है। यह हम सब जानते हैं।
इस सबके
बावजूद भी यह सच है कि दिल्ली में अब यह कल्चर और बार और पब और बढ़ेंगे। पिछले
दो दशक में एक नियोरिच क्लास आई है। उसके पास फेंकने के लिए पैसा है। इस वर्ग
से आई युवा पीढ़ी के पास परिवार का ढेरों डिस्पोजेबल धन है। मध्य वर्ग की
शिक्षित युवा पीढ़ी आर्थिक रूप से स्वतंत्र है। आजकल कॉल सेंटर में सिर्फ
ग्रेजुएट काम कर रहे हैं। जो दस हजार से तीस-चालीस हजार रूपये महीने की तनख्वाह
ले रहे हैं। उनको कोई थ्रिल चाहिए। बदले समय में अब इतने टैबू भी नहीं रहे। समय
की बढ़ती रफ्तार और मीडिया विस्फोट इसी कल्चर को बढ़ावा दे रहे हैं। आज सबसे
ज्यादा विवाद का विषय है कि अगर वोट डालने की उम्र अठारह साल है तो पीने की
उम्र पचीस साल क्यों है?
हो सकता है शीघ्र ही पीने की उम्र भी अठारह साल कर दी जाए
क्योंकि वोट डालने की उम्र तो बढ़ाई नहीं जा सकती।
एक आखिरी
बात,
अब भी एक ऐसा वर्ग है जो इस बार या पब कल्चर के पक्ष में
नहीं है। उनके भीतर अपने युवा बच्चों को लेकर भय है। बाहर के इस वातावरण में
रहकर भी युवा लड़के-लड़कियां किस तरह अपने पक्ष में रह सके इसके लिए जरूरी है कि
घरों में माता-पिता उन्हें समय दें और निरंतर संवाद बनाए रखें। उनकी भावनात्मक
जरूरतों की तरफ ध्यान दें। सिर्फ पैसा दे देने भर से माता-पिता की जिम्मेवारी
पूरी नहीं होती। न ही यह सोचना भर से कि वे संभ्रांत परिवार के बच्चे हैं। इसी
साल एमएमएस केस में नेवल अधिकारी की लड़की और बहुत अमीर बाप का लड़का था।
जिन्होंने
खुद अपनी फिल्म शूट की और अपने दोस्तों को देखने के लिए सीडी में दी। उनके
दोस्त उसे पालिका बाजार में जाकर बेच आए। ये सारे हादसे इसी दैहिक कल्चर की बाय
प्रोडक्ट्स हैं। यह भी सच है कि यह बार या पब कल्चर आने वाले समय में रूकने
वाली नहीं है। जरूरी है कि इस कल्चर के साथ रहना सीखा जाए और इसके सकारात्मक
पक्षों से लाभ लिया जा सके। यह तभी होगा जब हमारी,
दिल्ली वालों की मानसिकता में बदलाव आएगा। चारों तरफ घट रहे
दूसरे बदलावों के साथ इस बदलाव को भी बर्दाश्त किया जाना है।
डी-38,
प्रेस एन्कलेव,
साकेत,
नई दिल्ली-17