लघु पत्रिकाओं की उपयोगिता एवं संघर्ष
सुमित कुमार जैन
अंधानुकरण
के चलते,
भौतिकता की चकाचौंध में, पतन की ओर
बढ़ते कदमों ने एक बड़े वर्ग को अभिशाप, भ्रष्टता और
उपभोक्तावाद की संस्कृति में धकेल दिया है। वह अपने दायित्वों से दूर होता जा
रहा है। आज व्यक्ति का कार्य क्षेत्र बड़ा है लेकिन नैतिकता,
मानवीयता, सेवा भावना आदि से दूर बहुत
दूर होता जा रहा है। ऐसे माहौल को देख कर संवेदनशील लोगों का मन बहुत क्षुब्ध
होता है। आज साहित्य, संस्कृति के क्षेत्र में
मूल्यहीनता की छाया पड़ रही है,बढ रही है। जिसने मूल्यों
और मर्यादाओं को गहरी चोट पहुंचाई है। आज अधिकांश इस चोट से अछूते नही हैं वरन
बुरी तरह शिकार हो रहे हैं। परिणाम स्वरूप इनके मध्य से गुजरते और जूझते हुए
अनैतिक कार्यों को भी उचित मान लिया गया है।
व्यवसायिक दवाब और राजनीतिक
धारणाओं से बड़े समाचार माध्यमों के प्रभावित होने की संभावनाएं बनती जा रही
हैं। आज पत्रकारिता व्यावसायिकता के हाथों की कठपुतली बन गई है। दुनिया के
बाजारीकरण के चलते बाजारवाद की शिकार हो गयी है। विशुध्द व्यवसाय का रूप धारण
करती जा रही है। आज मात्र होड़ रह गयी है छवि निर्माण और छवि भंग करने की। इसे
देश की समृध्द,
सांस्कृतिक परंपरा और इतिहास की घोर शत्रु कहें तो कोई बड़ी बात नहीं। आज की बड़ी
पत्र-पत्रिकाओं को केवल मुनाफे से मतलब रह गया है। पूंजीवादी,
भूमण्डलीकरण की स्पर्धाओं का लाभ येन केन प्राप्त हो उनका
उद्देश्य रह गया है। केवल धन कमाने के लिए प्रगतिशीलता की छौंक में वे नैतिकता,
मानवीयता से दूर होते जाते हैं। संस्कृति,
साहित्य, धर्म के प्रति उनका नजरिया
नहीं रहा। उनकी प्रस्तुतियों से ऐसा लगता है कि उनका पूर्व इतिहास,
परंपरा और अस्तित्व से कोई सरोकार नहीं। बड़े अखबार समूह व
पूंजीपतियों से सत्ता व बाजार में दखल करने के फलस्वरूप व्यावसायिक व राजनीतिक
लाभों के निकल रहे समाचार पत्र -पत्रिकाओं में आम आदमी के सरोकारों से कोई लगाव
नहीं रहा। धन कुबेरों, उनके सरकारी प्रतिनिधियों की
चापलूसी भरी प्रशस्तियों, प्रगति के झूठे सच्चे आंकड़ों,
निरर्थक सूचनाओं, अज्ञान और अंधकार
फैलाने वाले सामग्री से संबंधित हो रहा है। पाठक वर्ग के नैतिक एवं भौतिक
उत्थान से उन्हें कोई सरोकार नहीं। विज्ञापनों में नैतिक-अनैतिक रूपों को
प्रदर्शित कर धन कमाकर अपनी पूंजी में वृध्दि करना ही उनका मुख्य लक्ष्य बनता
जा रहा है। ऐसा लगने लगा है कि उनका हृदय बंजर बन गया है। ऐसे में लेखक की
संवेदनाएं उसकी संवेदनाएं नहीं बन सकतीं। वह समाज को जीवन भर संचित अनुभवों को
रचनाओं के माध्यम से देकर भी अतिरिक्त सा रहता है। मौजूदा दौर में हमारा
साहित्य भी बहिष्कृत सा बना हुआ है तो लेखक को भी समाज कब अपना हिस्सा मानता
है। यहां तक की लेखक या कवि को सनकी या पागल कह कर खारिज कर दिया जाता है।
वस्तु स्थिति तो यह भी है कि कोई भी ईमानदार लेखक समाज या राजसत्ता के समक्ष
अपने जीवन यापन के लिए याचना का कटोरा लेकर कभी खड़ा नहीं होता। अगर लेखक को सिर
उंचा कर समाज के आम वर्गों की भांति सम्मानजनक ढंग व स्वाभिमान से जीना है,
अपने अस्तित्व का अहसास कराना है, अपनी
उपस्थिति दर्ज करानी है तो सबसे पहले अहम बात होगी कि वह संगठित हो।
संयम,
राष्ट्र निष्ठा, राष्ट्र भक्ति,
धर्म, साहित्य,
संस्कृति की प्रतिष्ठा के लिए लघु पत्र पत्रिकाओं की आवश्यकता है। लघु
पत्र-पत्रिकाएं ही इस जिम्मेवारी को बखूबी निभा सकती हैं। वे मनुष्य को एक
अच्छा मनुष्य बनाने में सफल हो सकती हैं। उसकी संस्कृति को समृध्द बना सकती
हैं। पतन, गिरावट, असहिष्णुता
के माहौल को दूर करने में सहायक हो सकती हैं और यही देश व समाज के लिए शुभ
लक्षण होगा। वे अपनी कुशलता से जनता के हितों को लाभ पहुंचा सकती हैं। ये
स्वस्थ साहित्य और रचनाधर्मिता के उद्देश्य की जनहित तथा गतिशील कलात्मक
अभिरूचि का प्रतिनिधित्व करने वाली होंगी। गंभीर साहित्यिक सरोकारों से जुड़ी
होने के कारण स्वभावत: जनवादिता उसकी अपनी पहचान है।
यद्यपि कि बड़े-बड़े अखबारों के
समूह व पूंजीपतियों के दखल होने से लघु पत्र-पत्रिकाओं का टिक पाना आज कठिन
होता जा रहा है। आर्थिक दिक्कतें इसका सबसे बड़ा कारण हैं। हालांकि इस दिक्कत के
बावजूद भी लघु पत्र-पत्रिकाएं निकल रही हैं लेकिन उनका बाजार में टिक पाना एक
प्रश्नचिन्ह अवश्य बना हुआ है। ऐसे में जो संकट-समस्याएं आ रही हैं उन पर एक
नजर डालें तो स्पष्ट है -
1. उनका विक्रय मूल्य जो
रखा जाता है उसकी वास्तविक कीमत ज्यादा होती है और सदूरवर्ती क्षेत्रों के
पाठकों को डाक से भेजना और खासा मंहगा पड़ता है। उनकी वास्तविक कीमत के मुकाबले
में उनकी कीमत रखी जाए तो ग्राहक इन्हें खरीदना नहीं चाहता।
2. अधिकतर व्यक्ति मुफ्त
में पढ़ना चाहते हैं।
3. लघु-पत्र -पत्रिकाओं का
सेल काउंटरों तक न पहुंचना एक बड़ी मजबूरी है।
4. लघु पत्र-पत्रिकाएं
विज्ञापनों के लिए तरसती हैं वहीं बड़े-बड़े अखबार,
पत्रिकाएं समूह पूरे पृष्ठ के बड़े-बड़े विज्ञापन प्रकाशित कर लेते हैं।
यही कारण है लघु पत्र-पत्रिकाएं
जो जिलों और कस्बों से निकल रही हैं एक-एक कर आर्थिक मजबूरियों को झेलते,
चलते बंद हो रही हैं। प्रतिस्पर्धा के युग में उनका टिक पाना
कठिन हो गया है। राजनीतिक लोगों ने उन्हीं अखबारों,
पत्रिकाओं को महत्व दिया जो राजनीति को ज्यादा फोकस करते हैं। विकास संबंधी
मुद्दों पर काम करने वाली या लिखने वाली इन लघु पत्र-पत्रिकाओं को यह सब नहीं
मिलता। इस संकट से भी उनका अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्ति की कगार पर है।
छोटे अखबारों अथवा पत्रिकाओं के
मालिकों, संपादकों,
संवाददाताओं में एकजुटता न होने के कारण चलते एक ऐसा ताकतवर
संगठन तैयार नहीं हो पाया जो उनके सामने आए हुए संकटों से उबार सके ,
संकटों के लिए लड़ सके। इसके हितार्थ यदि कोई संगठन बने भी हैं
तो वे भी एक -दूसरे को नीचा दिखाने या अपनी ताकत का अहसास कराने तक ही सीमित
हैं। आज जब बड़े अखबार समूह व राजनीतिक दलों के बीच एक व्यावसायिक संबंध कायम हो
चुके हैं जिसके चलते कई अखबार ऐसे हैं जो राजनीतिक दलों के मुख्य पत्र के नाम
से जाने जाते हैं और सरकारी तंत्र इन्हें ही विज्ञापन देकर व समाचार पत्र अपने
इन संबंधों को निभा रहे हैं।
इन सबके उपरांत भी मजबूरियों में
भी लघु पत्र-पत्रिकाएं कठिन स्थितियों से गुजरते हुए जो प्रकाशित हो रही हैं
उन्हें सार्थक पहल कहा जा सकता है। आवश्यकता है इनके प्रोत्साहन की। ये लघु
पत्र पत्रिकाएं ही हैं जो हिन्दी साहित्य के उन्नयन और विकास में महत्वपूर्ण
भूमिका अदा करती हैं वहीं नए रचनाकारों को प्रकाशन संस्थानों की जकडबंदी से
मुक्त कर एक अपेक्षित मंच भी प्रदान करती हैं। जनता में साहित्यिक चेतना जगाने
का श्रेय तो लघु पत्र-पत्रिकाओं को ही जाता है। ठ्ठ
(लेखक
अलवर से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका 'जगमग दीप
ज्योति' के संपादक हैं)


