Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 6, दिसंबर.07.- फरवरी, 2008)

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पत्रिका

 

 

प्रगतिशील रचनाओं और वैज्ञानिक विचारों की 'पहल'


गिरीश पंकज

 

  पहल, संपादक- ज्ञानरंजन, 101 रामनगर, आधारताल, जबलपुर-482004, मूल्य- 50 रु., वार्षिक 150 रु.

प्रख्यात कथाकार ज्ञानरंजन द्वारा संपादित पत्रिका पहल प्रगतिशील रचनाओं एवं वैज्ञानिक विचारों के लिए पहचानी जाती है। पहले के लेखों एवं कविताओं की भाषा और उसकी सोच के कारण उसने अपना विशाल पाठक वर्ग तैयार कर लिया है। पहल-86 की रचनाएं हमेशा की तरह नवोन्मेषी हैं। हिंदी के पाठकों के लिए विश्वसिनेमा के महान फिल्मकार हूंगमार बर्गमैन के बारे में राजकुमार केसवानी का लेख महत्वपूर्ण सूचनाएं देता है। स्वीडन के इस फिल्मकार की 89 साल की जीवन यात्रा के बाद मृत्यु हो गई। आम हिंदी पाठकों के बीच वर्गभेद अपरिचित से थे। उनके सत्यान्वेषी रूप को लेखक ने कुशलता के साथ अभिव्यक्त किया है। शाकिर अली की बस्तर पर केंद्रित कविताएं झकझोरती हैं। हर कविता दरअसल बस्तर की पीड़ा का, बस्तर के असली चेहरे का उद्धाटन है। कविता जब पीड़ा को ईमानदारी के साथ स्वर देती है, कोई राजनीति नहीं करती, तब वह बड़ी हो जाती है। देवी प्रसाद मिश्र की लंबी कहानी अन्य कहानियां और हेलमेट कुछ ज्यादा लंबी हो गई। दुनियाभर के विस्तार के कारण पाठक भटकाव का शिकार होता है। सिलसिलेवार यह समझ में नहीं आता कि आखिर लेखक कहना क्या चाहता है। पहले के हर अंक पर लंबे आलेख की जरूरत होती है। हर लेख पर यहां कुछ कहना संभव नहीं। विचार-विमर्श के हर लेख पठनीय है। सोचने पर मजबूर करने वाले हैं। अंक में प्रकाशित विष्णु खरे की राजनीतिक कविताएं दी गर्इं हैं, लेकिन इन्हें कविता कहें या प्रकारांतर से चाटुकारिता। इस पर भी सोचने की जरूरत है।

 

पक्षधर, त्रैमासिक, संपादक - विनोद तिवारी, बी-3314-73, कोसलेश नगरी, सुंदरपुर, वाराणसी-221005, मूल्य एक प्रति 50 रुपये

356 पृष्ठों की भारी-भरकम पत्रिका पक्षधर को देखकर सामान्य पाठक विचलित हो सकता है। लेकिन जो लोग साहित्य को जीवन की रचनात्मक खुराक मानते हैं, उन्हें आनंद की प्राप्ति होगी। पत्रिका का नाम पक्षधर है लेकिन यह पूरी तरह विपक्षी भूमिका में नजर आती है। प्रतिपक्ष की भूमिका ही साहित्यिक पत्रकारिता की सही दिशा होती है। इस लिहाज से पक्षधर के तेवर ठीक हैं। पत्रिका का नीति वाक्य ही यही है प्रतिरोध की संस्कृति का रचनात्मक हस्तक्षेप। फिदेल कास्त्रो के लघु लेख से पत्रिका का एजेंडा खुल जाता है। सचमुच विचारों का वध संभव नहीं है। कास्त्रों ने अपने लेख में बताया है कि तीन एस्टयूट पंडुब्बी के निर्माण में कितनी लागत आती है, उतने खर्च में पच्चहत्तर हजार डॉक्टर तैयार किए जा सकते हैं जो 15 करोड़ लोगों की देखभाल कर सकते हैं। आज यही विसंगति सामने हैं। विध्वंस की तैयारी में जितना धन फेंका जा रहा है, उतने से निर्धन देशों के भाग्य संवर सकते हैं लेकिन दुर्भाग्यवश अब ऐसी सोच दुर्लभ है। स्मृति शेष के तहत सत्यप्रकाश मिश्र जैसे चिंतक लेखक का लंबा साक्षात्कार प्रकाशित करने संपादक ने हजारों पाठकों पर कृपा की है। मिश्र जी के विचारों के ताप से पाठक खुद को ऊर्जावान महसूस कर सकता है। मिश्र जी के पत्र उन पर केंद्रित संस्मरण के कारण एक व्यक्तित्व व्यापक होकर हमारे सामने जैसे फिर से उपस्थित हो जाता है।

 

पत्रिका में अज्ञेय के निर्मला ठाकुर के नाम पत्र और निर्मला का संस्मरण लेख उस वक्त के साहित्यिक समय और अज्ञेय की भावधारा को समझने के लिए पर्याप्त हैं। रमेशचंद्र शाह का लेख आलोचक राष्ट्र के निर्माण का स्वप्न, आलोचना पर नई दृष्टि देता है। हिंदी आलोचना के पूर्वाग्रहों पर भी वे इशारा करते हैं। चमनलाल का गैव्रियल गार्सियां मार्खेज पर लेख अमरीकी नव साम्राज्य के बरक्सलतीनी अमरीकी राष्ट्रवाद कई सवाल खड़े करता है। दो राष्ट्रों के वर्ग चरित्र में कितना अंतर होता है। समकालीनता पर विजयमोहन सिंह एवं ओमप्रकाश वाल्मीकी के लेख माननीय है। वाल्मीकी समकालीनता की चर्चा करते हुए दलित विमर्श करने लगते हैं और बताते हैं कि कैसे धीरे-धीरे दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र विकसित हो रहा है। प्रख्यात दलित लेखक बाबूराव बागुल की कहानी आह दिल में उतर जाती है। मुक्तिबोध और नदेव मेहता की रचना प्रक्रिया पर जो विचार हुए हैं, उन्हें पढ़कर नए लेखकों को दिशा मिलती है। मुक्तिबोध की सघन रचनाशीलता के उत्स को समझने के लिए उनका लेख सहायक पाठ की तरह है। वे सूक्तियों में कहते हैं जैसे काव्य की रचना प्रक्रिया के अंतर्गत (बुध्दि, भावना, कल्पना इत्यादि) एक होते हुए भी, आंतरिक प्रभाव-संगठन उद्देश्यों की भिन्नता के साथ ही, रचना-प्रक्रिया भी वस्तुत: बदल जाती है। वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय पर भी पत्रिका ने अच्छी सामग्री दी है। कुल मिलाकर पक्षधर को समकालीन साहित्य का एक संग्रहणीय दस्तावेज कहा जा सकता है।

 

शब्द योग, संपादक - सं. सुभाषपंत (त्रैमासिक), योगदान, 922-23, फैज रोड, करोल बाग, दिल्ली 110005, मूल्य वार्षिक 100 रुपये

अनुवाद के सहारे श्रेष्ठ साहित्य को हिन्दी में लाने वाले प्रख्यात लेखक वल्लभ सिध्दार्थ पर केंद्रित 'शब्दयोग' का नवांक (अक्टूबर -07) की इसलिए सराहना की जानी चाहिए कि उसने एक ऐसे महत्वपूर्ण लेखक पर ध्यान केंद्रित किया है जिसने महत्वपूर्ण लेखन किया, मगर जिसे उसके अवदान के अनुरूप तवज्जो नहीं दी गई। वल्लभ जी ने इसकी परवाह भी नहीं की और महरानी जैसे छोटे से कस्बे में बैठकर विश्व को खंगालते रहे। साहित्यिक गुटबंदी से दूर रहते हुए सिध्दार्थ जी दुनिया को भी देख रहे हैं इसीलिए वे अपने साक्षात्कार (उर्मिला शिरीष और आर के पालीवाल) में दो टूक कहते हैं कि प्रकाशक, आईएएस अधिकारियों की सड़ी से सड़ी चीजें छापते हैं, क्योंकि वे खरीद में मदद करवा सकते हैं। गोविंद मिश्र का लेख सिध्दार्थ जी के व्यक्तित्व को और खूबसूरती से स्थापित करता है। वल्लभ जी के राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी और बृजेश कृष्ण के साथ हुए पत्र व्यवहार भी पठनीय है। पत्रिका की अन्य दीवान सिंह मुफ्तून पर भेटों एवं मदन शर्मा के संस्मरण संभवत: हिन्दी  में पहली बार प्रकाशित हुए हैं। ज्ञानेंद्र पति की कविताएं, रामचरित मानस पर विमर्श का उल्लेख भी जरूरी है। वल्लभ सिध्दार्थ की देन मार्मिक कहानियों से उनके कथाकार रूप से नया पाठक परिचत होता है।

 

परिकथा, त्रैमासिक, सितंबर-दिसंबर-2007 (संयुक्तांक) संपादक-शंकर, 25 बेसमेंट, फेज-ए, इरोज गार्डन, सूरजकुंड रोड, नई दिल्ली-110044, इस अंक का मूल्य- 30 रुपये, वार्षिक 225 रुपये

समय और समाज की परिक्रमा करने वाली पत्रिका परिकथा के पिछले कुछ अंकों ने बौध्दिक जगत में हलचल मचाई थी। नया अंक (सितंबर-दिसंबर-07) नवलेखन अंक है। सामग्री देखकर सुकून मिलता है कि देश में नई चेतना के ताप के साथ बहुत से हरे पत्ते साहित्य के आंगन को खुशबुओं से भर रहे हैं। परिकथा में प्रकाशित कहानियों में नया लगभग हर कहानीकार संभावनाशील है। कवियों से भी अपेक्षाएं हैं। त्रासदी यह है कि इधर जो कवि आ रहे हैं वे नई कविता को बेहद आसान समझ बैठे हैं। और वह विन्यास के स्तर पर आसान लगती भी है। चाहे तो गद्य रूप में लिख दो, चाहे काव्य रूप में ऊपर-नीचे। बेहतर होता कि परिकथा में किसी नए कवि द्वारा भेजा गया कोई गीत भी छपता या गजल। संपादक जब खुद सीमा में बंद हो जाएगा तो उसे सीमा के बाहर घटित होने वाली बहुरंगी दुनिया कैसे नजर आएगी। किसी विधा को अछूत समझना रचनात्मक अन्याय है। संपादकीय बहुत अच्छा है। नव लेखकों को चिंतन के सूत्र देने वाला। चिराग और फुलझड़ी के रूपकों के सहारे रचनात्मक दिशा को अच्छे से समझाने की कोशिश की गई है। इस वक्त पत्रिकाओं के सामने प्रकाशन का संकट है। त्रैमासिक पत्रिका चला पाना कठिन हो जाता है। ऐसे समय में द्वैमासिक पत्रिका परिकथा का संयुक्तांक निकला है और उस पर संपादक यह संकेत दे कि परिकथा को मासिक किया जा सकता है, तो यह बड़े कलेजे की बात ही कही जाएगी। संपादकीय में भगवत रावत की कविता का अंश छापकर सराहनीय काम किया गया है। दिल्ली पर इतनी सटीक व्यंग्य कविता इससे पहले शायद नहीं लिखी गई है।

 

युध्दरत आम आदमी, संपादक-रमणिका गुप्ता, ए-221, डिफेंस कालोनी, दिल्ली 110024, मूल्य 20 रुपये, वार्षिक 100 रुपये।

अपने विद्रोही तेवरों के लिए प्रख्यात लेखिका रमणिका गुप्ता के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'युध्दरत आम आदमी' सही मायने में आम आदमी के पक्ष में खड़ी ईमानदार पत्रिका है। आमजन, दलित-शोषित जन की निरंतर खोज-खबर लेने वाली इस पत्रिका ने ताजा अंक (अक्टूबर-दिसंबर-07) में वैसे तो नियमित रूप से छपने वाली वैचारिक सामग्रियों को स्थान दिया है, लेकिन अगर किसी खास रचना को रेखांकित किया जाए तो वो है दत्ता भगत का मराठी नाटक अश्वक का जाक। अनुवाद किया है डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे ने। नाटक प्रतीकों में बहुत सी बात कहता है। नाटक की प्रांजल भाषा उसे उस दौर का बना देती है, जिस दौर में बुध्द का प्रभामंडल छाया हुआ था। उम्मीद है रंग जगत इस सशक्त नाटक का स्वागत करेगा। सुशीला टाकभौंरे का हिन्दी नाटक व्हील चेयर आदर्शवादी है। रूपनारायण सोनकर का आत्मकथन 'नागफनी' दहला देता है। कैसे सवर्ण कवि एक दलित कवि सेर् ईष्या करते हैं, उसे बताकर सोनकर ने अनेक महाधीशों की पोल खोल दी है। आश्चर्य है कि हमारे पेशेवर कवि बातें बड़ी-बड़ी करते हैं और आज भी वे मध्ययुगीन मानसिकता के शिकार हैं। ऐसी प्रवृत्तियां लांछित की जानी चाहिए। मूलचंद सोनकर का लेख आस्था और आतंक, वैश्विक बाजारीकरण बनाम दलित में भी कुछ मुद्दे उठाए गए हैं। बात बिल्कुल सटीक है कि दलितों को बहुप्रचारित आतंकवाद से नहीं बल्कि घरेलू आतंकवाद से खतरा है। पत्रिका में प्रकाशित कविताएं गहरी सामाजिक चिंताओं के साथ मौजूद हैं। हिंसा, स्त्री विमर्श, दलित-विमर्श के साथ ही ये कविताएं अप-संस्कृति के विरूध्द खड़ी नजर आती हैं। पुस्तक समीक्षाओं में भी ऐसी पुस्तकें  शामिल की गई हैं, जिनमें उबाऊ कलावादी संस्पर्श नहीं है, बस जीवन की कटु, सच्चाइयों का लेखा-जोखा है। कुल मिलाकर इस भीषण अराजक समय में  मनुष्य की मनुष्यता को बचाए रखने के अनिवार्य उपक्रम में लगी यह पत्रिका आस्था जगाती है कि बाजारवाद के असर के बावजूद कुछ मूल्य अभी भी सलामत हैं।

 

हिन्दी महफिल, संपादक- विजय बहादुर सिंह, 29 निराला नगर, दुष्यंत कुमार मार्ग, भोपाल (मध्यप्रदेश) मूल्य 20 रुपये

हिन्दी महफिल का प्रवेशांक मेरे सामने है। हिन्दी-उर्दू की साझा विरासतों के लिए समर्पित पत्रिका का पहला अंक 1857 की स्मृतियों पर केंद्रित है। जाने-माने समीक्षक कवि विजय बहादुर सिंह के कुशल संपादन में निकली यह पत्रिका संभावना जगाती है कि विचारों के लिए प्रतिबध्द रचनाकारों को न केवल मंच मिलेगा, वरन उनको दिशा निर्देशन भी प्राप्त होगा। संपादक अपने तेवरों के कारण पहचाने जाते हैं इसलिए स्वाभाविक है कि पत्रिका की सामग्री भी उनके व्यक्तित्व के अनुरूप ही होगी। 1857 को समर्पित अंक पर संपादकीय में डॉ. सिंह कहते हैं कि यह समर्पण गए गुजर मुद्दा हो चुके अतीत के प्रति नहीं, उस जीते-जागते वर्तमान के प्रति है जो न केवल हिन्दू-मुसलमान बल्कि आजाद हिंदुस्तान में अपनी-अपनी स्वाधीनताओं की तलाश में व्याकुल तमाम जातियां और धार्मिक विश्वासों के प्रति भी है, जिन्हें न केवल एक साथ रहना है बल्कि एकजुट होकर इस देश की साझा विरासतों का उनकी विविधताओं के साथ रक्षा भी करनी है। संपादक का यह कथन पत्रिका की प्रकृति को स्पष्ट कर देता है।

 

पत्रिका में 1857 को लेकर जितनी भी सामग्री प्रकाशित की गई है, वे ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। चाहे पं. सुंदरलाल के दो लेख हों, चाहे दीगर रचनाएं। सुभद्रा कुमारी चौहान की अमर रचना झांसी की रानी को पूरा पढ़ना भी सुखद है। 1857 के दिनों का बुंदेली गीत दिल को छू लेता है। उसका अर्थ गीत के मर्म को खोल देता है। 1857 के रोटी और कमल शीर्षक वाले लेख में विजय बहादुर सिंह 1857 के आंदोलन अंतनिर्हित धर्म निरपेक्षता को स्थापित करने का बड़ा काम करते हैं। अपने लेख के अंत में वे कहते हैं कि 1857 जहां हिंदू और मुसलमान दो जातियां भले रही हों पर उनकी राष्ट्रीयता एक रही हैं। गिरिराज किशोर का लेख अठारह सौ सत्तावन का घोषणा पत्र, उस वक्त अंधविश्वासों से मुक्ति की बात करने वाले राजाराममोहन राय और सर सैयद के बारे में बताता है। और बहादुर शाह जफर के घोषणा पत्र की जानकारी देता है कि उसमें किसानों-मजदूरों की सुध भी ली गई है। तात्याटोपे पर वीरनारायण शर्मा का शोधपूर्ण आलेख संग्रहणीय है। रामशरण जोशी का लेख हमें बताता है कि जिस दौर में शेयर बाजार फलफूल रहा हो, उस दौर में भी 1857 को हम क्यों याद करें। पत्रिका की अन्य सामग्री भी 1857 पर गंभीर विमर्श करते हैं।

 

लोकाक्षर (अक्टूबर-दिसंबर -07) संपादक-नंदकिशोर तिवारी, नेहरू चौक (तहसील कार्यालय के बाजू), बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

छत्तीसगढ़ की संस्कृति एवं साहित्य पर गंभीर विमर्श का प्रयास करने वाली पत्रिका लोकाक्षर के माध्यम से राज्य के अनेक छत्तीसगढ़ी लेखकों को अच्छा मंच मिल रहा है। पत्रिका के संपादक खुद हिन्दी छत्तीसगढ़ के लेखक हैं। अपने संपादकीय में वे छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण पर भी चिंता व्यक्त करते हैं। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा घोषित कर दिया गया है। इसलिए अब यह जरूरी है कि उसका न केवल मानकीकरण हो, वरन गद्य साहित्य भी संपुष्ट हो। पत्रिका के नए अंक (अक्टूबर-दिसंबर -07) में कहानी-कविता के साथ एक मर्मस्पर्शी नाटक आसग मया (संतोष सोनकर) छापा है। नाटक में काफी संभावना है। हरिहर वैष्णव के लक्ष्मी जागर का अनुवाद खुद नंदकिशोर तिवारी ने किया है। वैष्णव हल्बी के जाने-माने लेखक है। प्रभंजन शास्त्री छत्तीसगढ़ के पुराने रचनाकार हैं। इन पर डॉ. चितरंजन कर ने मन से लिखा है। अन्य सामग्री छत्तीसगढ़ी रंग में डूबी हुईं हैं और माटी की अस्मिता के लिए जूझती नजर आती है। छत्तीसगढ़ी साहित्य की समकालीनता से जुड़ने के लिए लोकाक्षर एक महत्वपूर्ण मंच हो सकता है।

 

वागर्थ, मासिक, संपादक - एकांत श्रीवास्तव-कुसुम खेमानी, 36-, शेक्सपीयर सरणी, कोलकाता-700017, वार्षिक -200 रुपये

भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता की पत्रिका वागर्थ की विशिष्ट प्रतिष्ठा रही है लेकिन त्रासदी यह है कि यहां कोई संपादक लंबे समय तक नहीं टिकता। हर नया संपादक अपने लेखक, अपनी टीम बनाता नजर आता है। बावजूद इसके पत्रिका में प्रकाशित सामग्री के कारण वागर्थ के पाठक कम नहीं हुए। पिछले कुछ अंकों से युवा कवि एकांत श्रीवास्तव को संपादन का दायित्व सौंपा गया है। एकांत अपनी दृष्टि एवं क्षमता के अनुरूप वागर्थ को और व्यापक करने की कोशिश में हैं। उनके आने के बाद अनेक नए नए लेखकों को भी मौका मिलने लगा है। गुटबाजी के शिकार लेखक प्रतिभा के बावजूद दरकिनार कर दिए जाते थे। समीक्षा अंक (सितंबर -07) की बहुआयामी सामग्री समकालीन साहित्य की बानगी ही पेश करती है। हर रचना पठनीय है, लेकिन सबका उल्लेख संभव नहीं है। फिर भी कुछ रचनाओं का जिक्र अपरिहार्य है, जैसे -भूतपूर्व प्रधानमंत्री के साथ सफर (विनोद दास), एक दिन राजा मर ले आसमान में (मधुरकर सिंह का उपन्यास अंश), हमारे विश्वविद्यालय (मोहन दास करमचंद गांधी), सूचना, बुध्दि और ज्ञान (प्रसन्न चौधरी) नई एवं बुध्दिनाथ मिश्र के गीत मन को हरिया देते हैं। संवेदनात्मक सत्याग्रह है साहित्य (नंदकिशोर आचार्य) चिंतनपरक है। उद्वेलित भी करता है। अधिकांश नई कविताएं निराश करतीं हैं। अनेक हिट फिल्मों में ढोलक बजाने वाले दत्ताराम जी पर शशांक दुबे का लेख संग्रहणीय है। पर्दे के पीछे बड़ा काम करने वालों के बारे में भी पता चलना चाहिए। कृष्ण कुमार अजनबी द्वारा अनूदित उड़िया कहानी (गोधूली अर्चनानायक का उल्लेख भी जरूरी है। वातामन में एकांत ने मुक्तिबोध के साहित्य कर्म में सारगर्भित आलेख दिया है। मुक्तिबोध हमारे समय के ऐसे रचनाकार हैं जिनकी एक-एक रचना लंबे विमर्श की मांग करती है।

 

जी-31, नया पंचशील नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)

 

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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