Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 6, दिसंबर.07.- फरवरी, 2008)

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मेरा समय

 

 

दिल्ली ने मुझे पकाकर तैयार किया


मनहर चौहान

 

छत्तीसगढ़ के भावप्रवण पात्रों की जो हृदयविदारक प्रस्तुति मनहर चौहान ने अपनी विख्यात कहानी 'घरघुसरा' में की है, उसकी दूसरी मिसाल ढूंढा आसान नहीं है। मनहर चौहान छत्तीसगढ़ की ही उपज हैें, जन्म एवं आरंभिक शिक्षा भाटापारा में, उच्च शिक्षा रायपुर में। दुर्गा आर्ट्स कालेज में चल रही अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़कर अचानक दिल्ली चले गए मनहर चौहान, वहां पंद्रह वर्ष बिताने के बाद, गत पैंतीस वर्षों से मुंबई में है। क्रानिक  फ्री लान्सर कहे जाने वाले मनहर जी ने जीवन एवं साहित्य क्षेत्रे में जो संघर्ष किया है, उसकी कथाएं आज भी साहित्यप्रेमियों की जुबान पर हैं। आज, जब वह जीवन के अड़सठ बसंत देख चुके हैं, मनहर चौहान अपने गुजर चुके समय का सिंहावलोकन यहां बिल्कुल पहली बार कर रहे हैं।  'मीडिया विमर्श' के लोकप्रिय स्तंभ मेरा समय में आप अबतक सर्वश्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी,बसंत कुमार तिवारी, बबनप्रसाद मिश्र, रमेश नैयर, राधेश्याम शर्मा, हसन खान के संस्मरण पढ़ चुके हैं। इस बार अपनी कहानी बता रहे हैं मनहर चौहान - - संपादक

मय को मैं दिनांकों या आंकड़ों से नहीं नाप पाता। समय मेरे लिए केवल एक विस्तार है, भूतकाल में विस्तार और भविष्यकाल में भी विस्तार। अत्यंत महत्वपूर्ण तिथियां भी मैं भूल जाता हूं। मैं समय के अनंत समुद्र में तैर रहा हूं, जहां लहरों की कोई गिनती नहीं। कतई नहीं बता सकता, मैंने किस सन् में भाटापारा छोड़ा, फिर रायपुर छोड़ा, फिर दिल्ली छोड़ा और अब मुंबई में हूं। समय का केवल एक विस्तार भर याद है कि भाटापारा में मैट्रिक पास कर, रायपुर के दुर्गा आर्ट्स कालेज में दो वर्ष पढ़ाई की, फिर दिल्ली जाकर पंद्रह वर्ष गुजारे और अब लगभग पैंतीस वर्षों से मुंबई में हूं। इस आलेख में समय से जुड़े सभी आंकड़े अपनी सुपत्नी के सौजन्य से प्रस्तुत किए हैं।

दिल्ली ने मुझे साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में पका कर तैयार किया, किंतु दिन-रात अत्यंत व्यवस्थित परिश्रम करके भी, अधिकतम प्रतिभा का परिचय देकर भी, मैं अर्थोपार्जन नहीं कर पाया। जब तक शादी नहीं हुई थी, कामचलाऊ अर्थोपार्जन से काम चल गया, मगर शादी के बाद मुझे सम्मानजनक अर्थोपार्जन की सख्त जरूरत थी। मैंने मुंबई की राह पकड़ी। यह एक दीगर बात है कि मुंबई में भी मैं ठनठन गोपाल ही बना रहा। अपनी तीन-चौथाई जिंदगी मैंने जिस आर्थिक संघर्ष में गुजारी है उसका मैं शुक्रगुजार हूं। उसने मुझे बार-बार तपाकर एक बेहतर इंसान के सांचे में ढाला। दोनों बच्चों ने मेरा उदाहरण सामने रखकर साक्षात देखा कि किस प्रकार कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी, बिना किसी नशे का सहारा लिए, हिम्मत हारने से इंकार किया जा सकता है। फलस्वरूप दोनों बच्चे, आज, शून्य से ऊपर उठकर मुंबई जैसे कठिन शहर में भी, सफलता के एक ऐसे शिखर पर विराजमान हैं, जिसकी कल्पना मैं, स्वयं अपने संदर्भ में, कभी कर ही नहीं सकता था। बिटिया वंदना आज स्टेट बैंक आफ इंडिया में असिस्टैंट मैनेजर के पद पर है और उससे छह वर्ष छोटा अमन, रिलायंस म्यूचुअल फण्ड की सिंगापुर शाखा में, कंप्यूटर पर केवल उंगलियां चलाकर, रोज चमत्कारिक रकमें उलट-पलट रहा है। मुंबई में वंदना का अपना फ्लैट है और अमन का भी अपना अलग फ्लैट है। मैं सपरिवार कभी इस फ्लैट में रहता हूं तो कभी उस फ्लैट में। लेखन कार्य के लिए मेरे पास, दहिसर में, टेबल-स्पेश जैसे एक छोटी, किंतु स्वतंत्र खोह है, जहां मेरा कंप्यूटर लगा है, तमाम फाइलें आदि भी यहीं हैं। मेरी अधिकांश जिंदगी यहीं गुजरती है। आर्थिक सफलता का वरदान मुझे डायरेक्ट नहीं मिला, न सही, बच्चों के माध्यम से भरपूर मिला है।

दिल्ली और मुंबई, दोनों शहरों में मैंने साहित्य के पापड़ कम और पत्रकारिता के पापड़ ज्यादा बेले हैं। 'युगधर्म', 'सारिका', 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान', 'सरिता', 'कादम्बिनी', 'पराग', 'नंदन' इत्यादि अनेक पत्रिकाओं एवं सभी प्रमुख अखबारों के लिए मैंने अनुवाद और रुपांतर के कार्य ही अधिक किए हैं। एक ही अंक में मेरी एकाधिक रचनाएं छपती थीं। नाम का दोहराव बचाने के लिए संपादकों ने सलाह दी कि मैं उपनामों से भी लिखूं। मैं ने 'सपनकुमार' उपनाम से बहुत लिखा। 'छिद्रान्वेषी' उपनाम से समीक्षाएं भी खूब लिखीं। रेडियो और टेलीविजन के लिए भी मैंने जमकर पत्रकारिता की। धनोपार्जन के लिए पत्रकारिता निश्चित ही साहित्यकारिता से बेहतर साबित होती है। पत्रकारिता इजाजत नहीं देती कि आप प्रेरणा का इंतजार करें। प्रेरणा की स्फूर्ति उपलब्ध हो या न हो, अगर आप पत्रकार हैं तो आप को कलम घसीटनी ही है, और आप घसीट भी लेते हैं। रात के दो बजे अगर अखबार का प्रिंट आर्डर देना है, तो दे ही देना है, इसके लिए चाहे कितना ही बड़ा समझौता करना पड़े। प्रूफ की भूलें, तथ्यों की भूलें, भाषा की भूलें, दृष्टिकोण की भूलें, ले-आऊट की कमजोरियां... सब चलेगा, किंतु प्रिंट आर्डर लेट नहीं किया जा सकता। साहित्य में 'सब चलेगा' की भला क्या गुंजाइश। सब चलना तो दूर, साहित्य में कुछ भी चलता नहीं है। यहां सभी कुछ सर्वथा सही और शुध्द चाहिए। बल्कि सर्वथा सही और शुध्द देने के बाद भी, 'और भी बहुत कुछ' चाहिए, साहित्य में स्थापित होने के लिए। साहित्य से जुड़ी असाहित्यिक शक्तियों से रू-ब-रू होने का उतना कड़क मौका मुझे सिवा दिल्ली के अन्य किसी भी शहर में, मिल ही नहीं सकता था।

लेकिन मैंने एक सच्चा साहित्यकार बनने और आर्थिक कसौटी पर भी केवल साहित्य के ही जोर पर खरा उतरने के लिए रायपुर से दिल्ली पलायन किया था। साहित्य की शुचिता को लेकर मैं अत्यंत भावुक था। दिल्ली ने इस भावुकता के परखचे उड़ा दिए।

फिर भी, साहित्य की शुचिता के प्रति मेरा जो आग्रह था, उसे सदा के लिए रद्द कोई नहीं कर सकता था, न कोई बाहरी शक्ति, न स्वयं मैं। इसीलिए मैं जल्द ही उस खेमे को छोड़कर चल दिया, जिसके निर्माण में स्वयं मैंने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। मेरा संकेत सचेतन कहानी आंदोलन की ओर  है। दिल्ली में उन दिनों नई कहानी आंदोलन की तूती बोल रही थी। सरस्वती प्रेस (इलाहाबाद) की 'कहानी', राजकमल प्रकाशन (दिल्ली) की 'नई कहानियां' और टाईम्स आफ इंडिया (मुंबई) की 'सारिकाये तीनों जबर्दस्त पत्रिकाएं नई कहानी का ढोल कुछ ऐसे पीट रही थीं कि भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा, अमरकांत, आनंदप्रकाश जैन आदि अनेक समर्थ कहानीकार हाशिए पर चले गए थे। राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर ने बतौर 'नए कहानीकार' जिस त्रयी की रचना की थी, उसकी किलेबंदी दिनोंदिन मजबूत होती जा रही थी। दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, मुंबई या किसी भी अन्य शहर में किसी की हिम्मत नहीं थी, इन तीनों के विपक्ष में एक शब्द भी बोलने की।

केवल तीन व्यक्ति तमाम की जगह घेरकर बैठ जाएं, यह दृश्य मुझे बिल्कुल रास नहीं आ रहा था, और मेरे जैसे व्याकुल कहानीकारों से पूरी दिल्ली अटी पड़ी थी। अन्य शहरों में भी कमोबेश यही आक्रोश उबल रहा था। मजा यह कि समग्र साहित्य जगत में व्याकुलता होने के बावजूद सब कथाकार, सब समालोचक, सब प्रकाशक उन्हीं तीन के दरबार में अपना सलाम पहुंचाने को बेताब थे। उस मशहूर कहावत के नुकीले नाखून हर तरफ नजर आ रहे थे कि बिल्ली के गले में घंटे कौन बांधे।

यही घंटी सचेतन कहानी आंदोलन ने बांधी। साहित्य के मूल्यांकन में जो माफिया स्थापित हो चुका था, उसे बेदखल करने की हिम्मत एकमात्र सचेतन कहानी आंदोलन ने दिखाई। उससे जुड़े अनेक कहानीकार दो मोर्चों पर एक साथ लड़े। एक मोर्चा नि:संदेह यह था कि सचेतन कहानीकारों को अपने लिए जगह चाहिए थी। उन्हें नई कहानी की त्रयी को मिली जगह कतई नहीं छीननी थी लेकिन वे स्वयं के लिए भी स्थान सुनिश्चित करना चाहते थे। दूसरा मोर्चा यह कि नई कहानी में जिस तरह मानव जीवन की कुण्ठाओं की महिमा गाई जा रही थी, उससे वे सहमत नहीं थे। केवल कुण्ठित होकर, केवल तड़पकर रह जाने वाले पात्रों को वे समाज के लिए हानिकार समझते थे। वे, 'साहित्य के लिए साहित्य' नहीं, बल्कि 'बेहतर समाज के लिए साहित्य' के पक्षधर थे। वे आम जनता से उसी तरह मुखातिब होना चाहते थे, जिस तरह कभी प्रेमचंद मुखातिब हुए थे।

उपरोक्त दोनों मोर्चों पर सचेतन कहानी को शानदार सफलता मिली। न केवल इतना, बल्कि सचेतनों की सफलता देखकर कतिपय अन्य कहानीकारों ने दो आंदोलन और भी खड़े किए : अ कहानी और समांतर कहानी। ऐसा तभी संभव हो पाया, जब नई कहानी की बिल्ली के गले में घंटी बांधने का दुस्साहस सचेतन कहानी दिखा चुकी थी।

मुझे सचेतन कहानी आंदोलन के प्रमुख कथाकारों में गिना जा रहा था, किंतु मैं स्वेच्छा से पीछे हट गया। इस आंदोलन में भी मैं एक नई त्रयी को जन्म दे रहा था। कथाकारों की इस नई त्रयी में मेरा स्थान नि:संदह सुरक्षित था, किंतु पुरानी तानाशाही हटा कर नई तानाशाही स्थापित करने की प्रक्रिया में साथ देना मेरे लिए संभव न हो सका। साथियों को मैंने कई बार स्पष्ट चेतावनी दी थी कि हमें यह आंदोलन कृतित्व की श्रेष्ठता पर आधारित रखना  चाहिए, अन्यथा सब बिगड़ जाएगा। वे न माने। कुछ साथी कृतित्व में नहीं, केवल उम्र में मुझसे बड़े थे। उन्होंने हुक्म चलाना चाहा, मनहर। तू हमसे छोटा है, चुपचाप हमारे कहे अनुसार चल। ऊंची कुर्सियों पर बैठे साहित्यकारों की घटिया रचनाओं की भी कस कर स्तुति करने की जो तैयारी मेरे सचेतन साथी कर रहे थे, उससे मैं सख्त नाराज हुआ। मुझे लगने लगा कि अब इस आंदोलन को समेट लिया जाना चाहिए। नई कहानी की बिल्ली के गले में घंटी बंध जाने के बाद साहित्यिक मूल्यांकन के ध्रुवीकरण का शिकन्जा टूट ही चुका था। बस, यहीं तक मैंने सचेतन कहानी आंदोलन की उपयोगिता को महसूस किया। आंदोलन सचमुच समेट लिया जाता, इसका प्रश्न ही नहीं था। यूं मेरे सामने एक ही विकल्प बचा रहा कि मैं ही पीछे हट जाऊं, जो मैंने सहर्ष किया। मेरे हटने के बाद आंदोलन कहां पहुंचा, किसी से छिपा नहीं है।

मैं जेब में शून्य रकम रखकर दिल्ली पहुंचा था। मुझे आर्थिक सहारा देने के लिए 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के संपादक बांकेबिहारी भटनागर एवं उनकी धर्मपत्नी शांति भटनागर ने जो किया, उसे मैं कभी नहीं भूल सकूंगा। इन दोनों के लिए मैं सर्वथा अजनबी था। मेरे साथ उनका कोई स्वार्थ जुड़ा हुआ नहीं था। वे पूरा अधिकार रखते थे कि मुझे एक बोझ की तरह महसूस करते। ठीक विपरीत, उन्होंने मुझे न केवल घर के व्यक्ति जैसा स्नेह दिया, बल्कि मेरी आर्थिक विडंबनाएं जब किसी भी तरह काबू में न आर्इं, तो मुझे बाकायदा अपने घर में रख लिया। मैंने उनके यहां लगभग आधा वर्ष गुजारा।

मैं रायपुर से निकल भागा, उससे पहले ही 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में मेरे द्वारा गुजराती से अनूदित दो किशोर उपन्यास धारावाही छप चुके थे, 'जादूगर कबीर' और 'कपि के पराक्रम'। अनूदित होते हुए भी इन उपन्यासों के धारावाही प्रकाशन ने मुझे शहर और कालेज में हीरो बना दिया था। उत्साहित होकर मैंने एक छोटा उपन्यास बड़ों के लिए भी लिखा, 'टूटा व्यक्तित्व'। मेरे आश्चर्य के बीच 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' ने इसे भी स्वीकार कर लिया। इन तीनों कृतियों को मैंने डाक से ही प्रेषित कर दिया था। भटनागर दंपत्ति के साथ रंचमात्र भी व्यक्तिगत परिचय नहीं था। उन्होंने 'टूटा व्यक्तित्व' को स्वीकार तो कर लिया, किंतु पाण्डुलिपि वापस आ गई। भटनागर जी का व्यक्तिगत पत्र साथ में था कि इस उपन्यास का कथ्य तो दमदार है, किंतु भाषा इतनी कमजोर कि संपादन भी न किया जा सके। भाषा का परिमार्जन कर यह कृति कृपया हमारे पास दुबारा भेजिए, ताकि धारावाही प्रकाशन हो सके।

उन दिनों भैरवप्रसाद गुप्त के संपादक में क्रांतिकारी कथा पत्रिका कहानी इलाहाबाद से प्रकाशित होती थी। 'कहानी' का रूतबा इतना था कि उसमें सिर्फ एक कहानी छप जाती, तो कहानीकार देशभर में जाना जाता। मेरी प्रारंभिक कहानियों में से एक 'अध्यापिका का पति' सहसा 'कहानी' में छपी, जिसके अंत में मेरा पूरा पता भी प्रकाशित हुआ। उसी आधार पर, एक दिन, रायपुर के एक पत्रकार महोदय मुझे ढूंढते हुए आ पहुंचे। मुझे सामने देखकर उन्हें यकीन ही न हुआ कि वो मैं ही हूं। जिसने 'अध्यापिका का पति' जैसी कहानी लिखी है। तब मेरी मूंछें भी ठीक से नहीं फूटी थीं। उन्होंने मुझे गले लगा लिया। यह आज से कोई पचास बरस पहले की बात है। पत्रकार महोदय ने अपना परिचय देते हुए कहा 'मैं राजनारायण मिश्र हूं। एक अर्ध्द-सरकारी साप्ताहिक 'मुक्ति' का संपादन करता हूं।'

दा के साथ प्रथम परिचय का वह दिन मेरे साहित्यिक एवं पत्रकारीय करियर का स्वर्णिम दिन था। दा ने स्वयं आकर मुझे खोज निकाला था। आज किस संपादक में इतनी संवेदनशीलता है कि वो किसी नए कृतिकार का कद्रदान बनकर, कृतिकार के मुद्रित पते पर स्वयं जाकर पूछताछ करे। वह दिन है और आज का दिन है, राजनारायण जी के साथ मेरा संपर्क कभी नहीं टूटा। 'अध्यापिका का पति' के बाद मैंने कई फालतू सी कहानियां लिखीं, किंतु दा ने मेरा महत्व कम नहीं आंका। मेरी तमाम प्रारंभिक रचनाओं के प्रथम पाठक, प्रथम समालोचक, प्रथम मार्गदर्शक दा ही रहे। 

पता ही नहीं चला, कब मुझे पत्रकारिता का प्रशिक्षण दा के हाथों मिलने लगा। समाचार को सटीक व समीचीन कैसे बनाया जाए, शीर्षक कैसे सोचा जाए, टू-कालम याने क्या और लीड स्टोरी याने क्या, यह सारी समझ मैंने दा के ही सानिध्य में विकसित की। मायाराम सुरजन उन दिनों सिलिण्डर मशीन पर दैनिक 'नई दुनिया' का प्रकाशन रायपुर से करते थे। दा के साथ मैंने 'नई दुनिया' में आना-जाना शुरू किया। कालांतर में इसी 'नई दुनिया' के स्थान पर 'देशबंधु' का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। 'देशबंधु' के वर्तमान निदेशक ललित सुरजन से मेरा पहला परिचय दा ने ही करवाया। यह परिचय शीघ्र ही हमेशा की दोस्ती में बदल गया।

'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' ने जब 'टूटा व्यक्तित्व' को स्वीकृति के बावजूद वापस कर दिया, तब मैंने अपनी समस्या राजनारायण जी के सामने रखी। उन्होंने 'टूटा व्यक्तित्व' की टूटी-फूटी भाषा ठीक करने के लिए मेरे कंधे से कंधा भिड़ाकर परिश्रम किया। यूं मैंने भाषा के संपादन-परिमार्जन की कला का प्रथम गुरू प्राप्त कर लिया। 'टूटा व्यक्तित्व' के वाक्य-विन्यास इत्यादि को परिमार्जित कर मैंने उसे 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के नाम दुबारा प्रेषित कर दिया। भटनागर जी ने उसे रख लिया। कालांतर में जब मैं रायपुर से सीधा दिल्ली जा पहुंचा, तब श्रीमती शांति भटनागर ने मुझे देखते ही कहा, अरे मुन्ना, तुम कितने छोटे हो, और स्वयं भटनागर जी बोले, आजकल लोग बड़ी जल्दी जीनियस हो जाते हैं। मुझे आर्थिक बल देने के लिए भटनागर जी ने 'टूटा व्यक्तित्व' का धारावाही प्रकाशन तुरंत प्रारंभ कर दिया।

दा के मार्गदर्शन के बावजूद 'टूटा व्यक्तित्व' को वह परिपक्वता नहीं दे सका था, जो 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में धारावाही छपने के लिए आवश्यक थी। श्रीमती शांति भटनागर के निर्देशन में एक-एक किस्त का परिमार्जन मैं नए सिरे से करता जाता और एक-एक किस्त छपने के लिए रवाना होती जाती। समयचक्र घूमने के साथ 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में मेरे तीन और उपन्यास धारावाही छपे, 'हिरना सांवरी', 'सूर्य का रक्त' और 'कोई एक घर'

दिल्ली में उन दिनों पत्रकारिता के विधिवत प्रशिक्षण का सबसे प्रतिष्ठित केंद्र था, दिल्ली प्रेस, जिस का परचम पत्रिकाएं थीं हिन्दी में 'सरिता' और अंग्रेजी में 'कारवां'। संपादकीय विभाग में रहबर थे अरविंद कुमार, बाद में माधुरी के संपादक बने। कवि हृदय  अरविंद कुमार के लिए 'माधुरी' जैसी फिल्मी पत्रिका कोई सही पायदान नहीं था।  'माधुरी' को उन्होंने हर हिन्दीभाषी परिवार की प्रमुख मनोरंजन-पत्रिका बनाकर लोकप्रियता की धूम मचा दी थी, लेकिन वहां उनका मन नहीं रम पाया।  'माधुरी' छोड़ते वक्त उन्होंने मुंबई भी छोड दिया। दिल्ली लौटकर वह  'रीडर्स डाइजेस्ट' के हिन्दी संस्करण  'सर्वोत्तम' के प्रथम संपादक बने। यह काम उनके मुताबिक था, किंतु उन्हें लगातार इलहाम-सा होता रहा कि उन्हें हिन्दी में एक ऐसा वृह्द  'थेसारस' तैयार करना है, जैसा आज तक कभी न हुआ हो।  'थेसारस' याने शब्दकोश-सह-ज्ञानकोष। उन्होंने  'सर्वोत्तम' भी छोड़ दिया और अपने  'थेसारस' के लेखन में जुट गए। ऐसा था वह दौर, जब पत्रकारों को मैंने शुध्द समाजसेवियों की तरह काम करते देखा। वे बड़े से बड़े वेतन को भी ठोकर मार सकते थे। आज कहां ऐसे पत्रकार। अभी हाल में ब्रिटेन की  'पेंगुइन बुक्स' ने अरविंद कुमार का जो हिन्दी-अंगरेजी-हिन्दी (डबल-इंडैक्स) 'थेसारस' प्रकाशित किया है, वह अपनी तरह का विश्व का सबसे बड़ा शब्दकोश-सह-ज्ञानकोश है। उसका वजह है लगभग दस किलो और मूल्य है रुपए चार हजार।

ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी अरविंद कुमार को, दिल्ली में, अपने प्रशिक्षण के रूप में पाकर मैं धन्य हो गया। उन्होंने मुझे हर तरह से संवारा। उनके संपर्क  में आने का अवसर मुझे यूं मिल गया कि उनके प्रमुख सहयोगी चंद्रमा प्रसाद खरे, जो हिन्दी विभाग के प्रभारी थे और 'सरिता' का संपादकीय संचालन करते थे, को मेरे हालात के बारे में कथाकार धर्मेन्द्र गुप्ता से पता चला। मैं स्वयं अपने हालात का रोना किसी के सामने नहीं रोता था, मगर हालात ऐसे थे भी नहीं कि छिप सकते। खरे जी ने मुझे अंगरेजी कतरनों के आधार पर हिन्दी आलेख लिख देने का कार्य नियमित देना शुरू किया। मुझे उनका विश्वास जीतते देर न लगी। उन्होंने मुझे शीघ्र ही 'सरिता' के स्टाफ में रख लिया। इससे मैं खरे जी के साथ-साथ अरविंद कुमार के भी संपर्क में आ गया। रायपुर में राजनारायण मिश्र, दिल्ली के बांकेबिहारी भटनागर व श्रीमती शांति भटनागर, फिर अरविंद कुमार व चंद्रमा प्रसाद खरे। और भला मैं क्या चाह सकता था। बतौर पत्रकार मेरी पापड़-बेलाई शुरू हो गई। प्रखर पत्रकारीय प्रशिक्षण ने मुझे एक साहित्यकार के रूप में भी बहुत निखारा। मेरी निश्चित राय है कि हर साहित्यकार को पत्रकारीय प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

'सरिता' में मैंने आधे वर्ष तक काम किया। दिल्ली में वो मेरी पहली और आखिरी नौकरी थी। शुरूआत मैंने 125 रुपये के मासिक वेतन से की थी। छह माह बाद जब इस्तीफा दिया, तो 150 का वेतन आफर किया गया, किंतु मैं केवल पत्रकार बनकर नहीं रह जाना चाहता था। वेतनभोग का चस्का पड़ गया, फिर तो कभी नहीं छूट पाऊंगा नौकरी से। मैंने आफर अस्वीकार कर सबको आश्चर्य में डाल दिया। तब तक मैं दिल्ली के उमेश प्रकाशन के संपर्क में आ चुका था। मुझे उम्मीद थी कि महीने के 150 तो मैं अकेले इस प्रकाशक से ही पा लूंगा। उमेश प्रकाशन ने मुझे कभी निराश नहीं किया। मेरा पहला उपन्यास, या कहें कि लघ उपन्यास 'टूटा व्यक्तित्व' जो 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में धारावाही छपकर लोकप्रिय हो चुका था, वहीं से पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। 'सीमाएं' सहित बाद के अधिकांश उपन्यासों, कहानी संग्रह 'बीस सुबहों के बाद' एवं अनेक किशोर-उपन्यासों का प्रकाशन भी वहीं से हुआ। उमेश प्रकाशन के निदेशक रमेश संत एवं उनके अनुज विश्व संत ने मुझे पूरी तरह अपनी छत्रछाया में खींच लिया। मेरी कलम उन्हें इतनी रास आ गई कि मैं जो भी लिखता, वे प्रकाशित कर देते। संत बंधुओं के साथ मेरे रिश्ते की एक स्वतंत्र कहानी है, जो फिर कभी। अभी तो मैं दुबारा दिल्ली प्रेस की ही चर्चा पर लौटना चाहूंगा, जहां से मैं आधे ही वर्ष में सरक गया था, ताकि बतौर साहित्यकार अपने पंख फड़फड़ा सकूं।

क्रमश...

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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