Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 6, दिसंबर.07.- फरवरी, 2008)

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मेरा समय

 

 

दिल्ली ने मुझे पकाकर तैयार किया


मनहर चौहान

 

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वह लाइनो और मोनो कम्पोजिंग का जमाना था। हैण्ड-कम्पोजिंग भी खूब चलती थी। कम्पोजिंग होते ही प्रूफ निकाले जाते, जिन्हें पूरी शिद्दत से पढ़ा जाता, फिर हाथ से करैक्शन  होता। आज के फोटो -कम्पोजिंग के जमाने में कोई सोच भी नहीं सकता कि हैण्ड कम्पोजिंग और हैण्ड करैक्शन का वो काम कितना श्रमसाध्य था और समय साध्य भी। प्रूफ निकालने के लिए कागज की लंबी-लंबी पट्टियां इस्तेमाल होतीं। इन पट्टियों के चारों तरफ अनावश्यक कागज छूट जाया करता। दिल्ली प्रेस में पत्रकारिता का मेरा प्रशिक्षण इसी अनावश्यक कागज को काट कर निकाल देने से प्रारंभ हुआ था।

पीतल का लंबा, लपलपाता रूल, जो लकीरों आदि की कम्पोजिंग में काम आया करता, संपादकीय विभाग को दे दिया जाता। प्रशिक्षु पत्रकार इस लंबे रूल को प्रूफ की लंबी पट्टी के किनारे रखकर दबाता, फिर कागज के छोर को चुटकी में पकड़ कर झटका मारता। अनावश्यक कागज चर्र से कटकर अलग हो जाता, किंतु प्रूफ का रंफ मुद्रण सुरक्षित बचा रहता। इसी रफ मुद्रण को पढ़कर प्रूफ रीडर्स गलतियों की मार्किंग करते। बात हंसने जैसी लग सकती है, किंतु पीतल का रूल दबाकर कागज की लंबी पट्टियों को एक झटके में काटना, इसके लिए भी प्रशिक्षण की आवश्यकता थी। बिना प्रशिक्षिण के तो वे पट्टियां आड़ी-टेढ़ी काट जातीं या फिर स्वयं प्रूफ ही चर्र से फट जाता। लंबी पट्टी के छोर को अपनी चुटकी में किस प्रकार पकड़ें और फिर किस एंगल से, किस जोर के साथ झटका मारें, यही मुझे सब से पहले सिखाया गया। नामचीन कवि बालस्वरूप राही भी 'सरिता' की उपज हैं। उन्हें भी प्रथम प्रशिक्षण यही दिया गया था। बालस्वरूप 'राही' ने फिर 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' को जॉयन किया।

अगले चरण पर मुझे प्रूफ-रीडिंग की मार्किंग्ज सिखाई गईं। प्रूफ रीडिंग कोई छोटी-मोटी कला नहीं है। दिल्ली प्रेस में प्रूफ-रीडिंग का विभाग ही अलग हुआ करता था। पहला प्रूफ इसी विभाग में पढ़ा जाता। वर्तनी और व्याकरण के धुरंधर वहां काम किया करते, जिन्हें तरक्की मिलने पर संपादकीय विभाग में खींच लिया जाता। फाइनल प्रूफ और मशीन प्रूफ किसी वरिष्ठ पत्रकार द्वारा पढ़े जाते। आज तो प्रूफ-रीडिंग की कला ही लुप्त हो गई है। वर्तमान कंप्यूटर-युग में फोटो-कम्पोजिंग अक्सर स्वयं पत्रकार द्वारा की जाती है, जो लिखने के दौरान ही अपनी भूलें हाथ-के-हाथ ठीक करता चलता है। उस जमाने की प्रोफेशनल मार्किंग्ज के साथ प्रूफ-रीडिंग अगर आज की जाए, तो डीटीपी आपरेटर को समझ में ही न आए। कंप्यूटर ने प्रूफ-रीडिंग की कला को तो नष्ट किया ही, साथ में प्रूफ रीडिंग की जरूरत को भी नष्ट कर दिया। आज जब हर संशोधन चुटकियों में हो सकता है, तब संशोधन करना ही आवश्यक नहीं समझा जाता। अधिकांश सांध्य दैनिकों एवं द्वितीय श्रेणी के पत्रिकाओं में यही स्थिति है। डी.टी.पी. आपरेटर ने अथवा स्वयं पत्रकार ने एक झटके में जो कम्पोज कर दिया, वह नब्बे प्रतिशत तो सही होता ही है, जनता की समझ में आ ही जाता है कि अर्थ क्या है। शेष दस प्रतिशत की कसर पूरी करने की क्या जरूरत? वक्त किसके पास है? आगे बढ़ो फटाफट। हिज्जों की जितनी भूलें, शर्मनाक ढिठाई के साथ, आज छापी जा रही हैं, वैसा पहले कदापि नहीं होता था। वर्तमान का इलेक्ट्रानिक मीडिया तो, इस मामले में, प्रिंट मीडिया से भी ज्यादा ढीठ है।

प्रूफ-रीडिंग में दक्ष हो जाने के बाद मुझे अनुवादक के रूप में प्रशिक्षित किया गया। इसकी शुरूआत हुई, महापुरूषों के सुभाषितों के अनुवाद से। 'बेस्ट कोटेशन्स फॉर आल ऑकोन्स' पुस्तक आज से पचास बरस पहले भी उतनी ही लोकप्रिय थी, जितनी आज है। यह पुस्तक मुझे पकड़ा दी गई, इस निर्देश के साथ कि जिन सुभाषितों के सामने टिक-मार्क्स नहीं लगे हैं, उन्हें 'सरिता' में अब तक इस्तेमाल नहीं किया गया है। ऐसे अन-मार्क्ड सुभाषितों में से श्रेष्ठ सुभाषितों का चयन मुझी को करना था और फिर उनका हिन्दी रूपांतरण भी। मैं सुबह से जुट गया। शाम तक मैंने फुलस्केप के दस-ग्यारह पन्ने काले कर डाले। ये तमाम पन्ने खरे जी ने एक झटके में रद्द कर दिए। मैं सन्न रह गया। मैं जिसका मौलिक उपन्यास 'टूटा व्यक्तित्व' 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में धारावाही छप रहा है, क्या एक-एक, दो-दो वाक्यों के सुभाषितों के अनुवाद भी नहीं कर सकता? मेरा चेहरा फक देखकर खरे जी मुस्करा दिए। उन्होंने मेरे लिखे कुछ सुभाषितों को, मुझे सामने बिठाकर, स्वयं परिमार्जित किया और समझाया, कहां किस हद तक गलत जा रहा था। जल्द ही मैं 'सुभाषित-एक्सपर्ट' के रूप में उभरने लगा।

अगले चरण पर मुझे अंग्रेजी के चुटकुले दिए गए, जिन्हें हिन्दी में प्रस्तुत करना था। यह एक अलग ही प्रकार की कसौटी थी। जिस पर खरा उतरना जरूरी था। जैसा कि मुझे समझाया गया  और जिससे मैं आज भी सहमत हूं, चुटकुलों का प्राञ्जल अनुवाद करना उतना ही कठिन है, जितना कविताओं का अनुवाद। कम-से-कम शब्दों में अधिक से अधिक कह देने की कला मैंने चुटकुलों एवं सुभाषितों के अनुवाद करके ही सीखी। फिल्मों की संवाद-लेखनकला और विज्ञापनों की कापी राइटिंग सीखनी है? चुटकुलों एवं सुभाषितों के प्राञ्जल अनुवाद करिए। यदि मैं अरविंद कुमार और चंद्रमा प्रसाद खरे के संपर्क में न आया होता, तो पत्रकारिता के इस अनुपम अध्याय से अपरिचित ही रह जाता। दिलकश शीर्षक लगाना, नजर बांध लेते इंट्रो लिखना और सुंदरतम ले-आऊट बनाना, यह भी मुझे इन्हीं ने सिखाया। पत्रिका ले-आऊट और कवर-डिजाइनिंग का आज मैं जो मास्टर माना जाता हूं, उसका राज यही है कि मैंने स्वयं उनसे सीखा, जो इस कला के मास्टर थे और हैं।

धूनी रमा कर पत्रकारिता करने वाले दिल्ली में कम नहीं थे। नि:संदेह राजधानी में अपना स्थान बनाने के लिए श्रेष्ठ सृजन के अलावा भी बहुत कुछ चाहिए था, जिसे हम एक शब्द में 'मारकेटिंग' कह सकते हैं, किंतु जिनके पास ऐसा 'बहुत-कुछ' नहीं था, वे भी धूनी रमाने में किसी से कम नहीं थे। इस संदर्भ में धर्मेन्द्र गुप्त और उनके अनुज देवेंद्र गुप्त के नाम सर्वोपरि थे। दिल्ली के कीर्तिनगर में, एक बगीचे के ठीक सामने, उनके पिता ने कभी एक छोटा भूखंड खरीद रखा था, जिसे उन्होंने स्वयं के लिए मांग लिया था। वहां दोनों भाईयों ने स्वयं ही नक्शा बनाकर एक मकान खड़ा किया। नींव खोदने के लिए मजदूर बुलाए गए थे या नहीं, मैं नहीं जानता, किंतु उस मकान की एक-एक दीवार दोनों बंधुओं ने अपने हाथों से उठाई और छत भी स्वयं ही डाली। दीवारें बेशक खड़ी हो गई थीं, मगर उनकी तमाम ईंटें नंगी थीं। छत भी सरासर काम चलाऊ। धर्मेन्द्र और देवेन्द्र उस 'घर' में पुरानी खाटों पर सोते, भोजन स्वयं पकाते, बर्तन स्वयं साफ करते, कपड़े स्वयं धोते, इस्तरी भी स्वयं ही करते। दिल्ली जैसे महानगर की जबर्दस्त दूरियां वे अपनी पुरानी साइकलों से ही पार करते। पसीना बहाऊ साइकलखोरी के लिए उन्होंने संपूर्ण साहित्य-जगत् में नाम कमाया था। दोनों भाईयों ने शादी नहीं की थी। वे इलाहाबाद से दिल्ली आए थे, सिर्फ इसलिए कि साहित्य और पत्रकारिता की सेवा कर सकें। वे बाकायदा एक मासिक -पत्रिका प्रकाशित करते 'कथा-कहानी'। किसी भी स्तर पर, किसी भी कदम पर धन खर्च न करना पड़े, उनके जीवन के मूल मंत्रों में से एक था। नहीं, वे कंजूस नहीं थे, वे केवल साहित्य और पत्रकारिता के उन्नायक थे। धनाभाव से कहीं दम न फूल जाए, केवल इसी दृष्टि से वे हर कदम पर धन बचाते थे। यहां तक कि वे 'कथा-कहानी' की छपाई के लिए भी कहीं बाहर खर्च नहीं करते थे। एक छोटी ट्रेडल-मशीन उन्होंने अपने मकान के अंदर ही लगा रखी थी। यह केवल उन्हीं का बलबूता था, जो वे उस रिहायशी कालोनी में भी अपने घर के ही अंदर छपाई जैसा इण्डस्ट्रियल कार्य करते थे। हैण्ड-कम्पोजिंग का टाइप उन्होंने स्वयं भर रखा था। पत्रिका की संपूर्ण कम्पोजिंग दोनों भाई मिलकर किया करते। छपाई भी स्वयं करते, ट्रेडल के पांव-हत्थे पर हुमच-हुमच कर। बाइंडिंग भी स्वयं कर लेते। पत्रिका के वितरण के लिए भी वे स्वयं ही निकल पड़ते, उन्हीं पुरानी साइकलों पर। धर्मेन्द्र गुप्त और देवेंन्द्र गुप्त, दोनों भाई अच्चे कहानीकार थे। धर्मेन्द्र आज भी कथा-लेखन कर रहे हैं। दुर्भाग्यवश कानपुर में देवेन्द्र की अकालमृत्यु हो गई, जिसके सदमे से धर्मेन्द्र गुप्त एकदम टूट गए। 'कथा-कहानी' अनियमित होने लगी, फिर स्थगित हो गई। जिंदगी के इस पड़ाव पर पिता ने दबाव डालकर धर्मेन्द्र गुप्त की शादी कर दी। अब धर्मेन्द्र जी ने शिक्षक की नौकरी भी स्वीकार कर ली। धर्मेन्द्र गुप्त, देवेन्द्र गुप्त और 'कथा-कहानी' की संघर्ष कथा हिन्दी साहित्य एवं पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखी जानी चाहिए। दशरथ मांझी ने जीवनभर कुदाल चलाकर एक पहाड़ को काटा था, ताकि उनकी पत्नी को पानी लाने के लिए पहाड़ का चक्कर न लगाना पड़े। पूरे विश्व में यह अपने तरह की एकमात्र घटना रही। धर्मेन्द्र गुप्त ने साहित्य और पत्रकारिता की सेवा के लिए जो किया और जिस तरह किया, उसकी भी कोई मिसाल पूरे विश्व में न थी, न है, न होगी।

मैं इन धुरंधर बंधुओं के पड़ोस में रहता था, कीर्तिनगर में। मेरी स्थिति ऐसी थी ही नहीं कि 'कथा-कहानी' का वार्षिक शुल्क दे सकता। शुल्क देना तो दूर, मैं 'कथा-कहानी' में कुछ लिखता भी नहीं था। मैं मजबूर था, अपनी नजर लगातार पारिश्रमिक पर रखने के लिए और 'कथा-कहानी' पारिश्रमिक थोड़े ही देती थी। दोनों बंधुओं ने कभी संकेत नहीं दिया कि मुझे अपनी रचना अथवा वार्षिक शुल्क के रूप में उनके संघर्ष में सहभागिता रखनी चाहिए। उल्टे, मैं उन्हीं के यहां धंसकर अक्सर चाय पी आता, उनके हाथ के बने भोजन का स्वाद भी ले आता। उस वक्त मैं उन दोनों की सही कद्र भी नहीं कर पाया था। साहित्य के लिए उनका उस तरह धूनी रमाना मुझे कतई व्यावहारिक नहीं लगता था। आज जब मैं दिल्ली छोड़ चुका हूं, देवेन्द्र गुप्त, मेरा दोस्त, जब इस संसार में नहीं है, धर्मेन्द्र गुप्त जब कीर्तिनगर के उस भूखंड को बेचकर, दिल्ली में ही कहीं सैटल हो चुके हैं (अब तो रिटायर भी हो गए होंगे) और मेरी नजरों के सामने नहीं हैं, तब उन दोनों भाइयों को याद करते ही मैं अभिभूत होकर धन्य बोल उठता हूं। आज के पत्रकार और साहित्यकार जरा अपनी जीवन-शैली, अपनी महत्वाकांक्षाओं, अपनी लिप्साओं की तुलना धर्मेन्द्र गुप्त और देवेन्द्र गुप्त से करके देखें। फौरन समझ में आ जाएगा, दिल्ली दिल्ली क्यों है।

साहित्य और पत्रकारिता के उन्नयन के लिए अपना सर्वस्व झोंक देने वाले, दिल्ली में, आज भी अनेक मौजूद हैं। नैशनल पब्लिशिंग हाउस के निदेशक सुरेन्द्र मालिक, पराग प्रकाशन के श्रीकृष्ण और 'कथादेश' मासिक के संचालक हरिनारायण इसके केवल तीन ही उदाहरण हैं। सुरेन्द्र मलिक पाठय पुस्तकों से कमाते हैं और साहित्यिक पुस्तकों के प्रकाशन के पीछे सब फूंक देते हैं। छपे हुए शब्द के साथ उनका प्रेम अप्रतिम ही कहा जाएगा। (आत्माराम एम्ड संस के स्वामी स्व. रामलालपुरी की भी यही कहानी थी। सुरेन्द्र मलिक के पिता स्व. कन्हैयालाल मलिक भी इसी श्रेणी में आते हैं।) श्रीकृष्ण ने पराग प्रकाशन को देखते-देखते जिस ऊंचाई पर पहुंचा दिया था, उसे केवल व्यावसायिक सफलता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। श्रीकृष्ण स्वयं एक लेखक थे और लगी लगाई नौकरी छोड़कर उन्होंने स्वयं का प्रकाशन शुरू करने का रिस्क उठाया था। कालांतर में जब पुस्तकों की सरकारी खरीद आदि में घूस का और ज्यादा बोलबाला हो गया, तब भारी घाटा सहकर श्रीकृष्ण को पीछे हटना पड़ा। हरिनारायण भी एक ही संत हैं। 'कथादेश' मासिक का नियमित प्रकाशन होता रहे, सिवा इसके उनके जीवन में न तो कोई महत्वाकांक्षा है, न गतिविधि। मुझे गर्व है कि मैं सुरेन्द्र मलिक, श्रीकृष्ण और हरिनारायण का दोस्त हूं। यह सोचना गलत है कि सभी प्रकाशकों ने अपने लेखकों का केवल शोषण ही किया है।

इधर छत्तीसगढ़ में ललित सुरजन हैं, जो साहित्य और पत्रकारिता की सेवा की धूनी रमाकर, रायपुर में, अपनी आसंदी पर विराजमान हैं। उनका अखबार 'देशबंधु' मौत का समाचार भी रंगीन स्याही में छापने वाला अखबार है। 'देशबंधु' भारत का, या कहें कि यथासंभव विश्व का एकमात्र अखबार है, जिसने छत्तीसगढ़ के यशस्वी कवि हरीश वाढेर की एक लंबी कविता बाकायदा अपने संपादकीय के रूप में छापी थी और पाठकों को बार-बार आमंत्रित किया था कि वे उस कविता को न केवल पढ़ें, बल्कि समझें भी और उसके साथ सहभागिता रखें। आज जब टाइम्स आफ इंडिया जैसे अरबपति संस्थान का दैनिक 'नवभारत टाइम्स' भी, अपने लोगो के दाएं-बाएं एक-एक अर्ध्दनग्न सुंदरी के फोटो मल्टी-कलर में प्रकाशित करता हुआ ही बाजार में उतरता है, तब ललित सुरजन के सुंदरी-विहीन और हिंगलिश-विहीन अखबार 'देशबंधु' को केवल सुखद आश्चर्य के साथ ही देखा और आंका जा सकता है।

जब भी मैं अपने पुराने समय को याद करता हूं, तब श्रेष्ठ पत्रकारिता के एक और पहरुए को मन-ही-मन अवश्य प्रणाम करता हूं, रमेश नैयर, जो आज रायपुर में उपस्थित हैं। दिल्ली छोड़कर जब मैंने मुंबई की शरण ली थी और फिल्मी दुनिया में मुंहकी खाई थी, तब सिवा पत्रकारिता के मुझे और कहीं पनाह नहीं मिल सकती थी। मुंबई से मैंने लगातार अठारह वर्षों तक एक गैर राजनीतिक, साहित्यिक सिण्डीकेट 'शब्द' का संपादन-संचालन किया। शब्द सिण्डीकेट का आर्थिक संकट जब बढ़ता ही चला गया, तब मैंने हिम्मत कर सभी संपादकों को एक परिपत्र भेजा कि भविष्य 'शब्द' के आलेखों का पारिश्रमिक से कम राशि न भेजिएगा। परिपत्र की नतीजा यह हुआ कि अधिकांश संपादकों ने 'शब्द' की सामग्री छापना ही बंद कर दिया। (हालांकि हमने ऐसा पारिश्रमिक कदापि नहीं मांगा था कि जिसे अनाप-शनाप कहा जाता) ऐसे में, समग्र देश में, अकेले रमेश नैयर थे, जिन्होंने अपना दायित्व पूरी संवेदनशीलता के साथ निभाया। हर बार स्वयं 'शब्द' के ही द्वारा मांगा गया पारिश्रमिक भिजवाकर। एक रूपया भी उन्होंने कभी कम नहीं होने दिया। जिस शालीनता के साथ उन्होंने 'शब्द' के आर्थिक अधिकार की रक्षा की, उसे मैं एक असाधारण घटना ही कहूंगा। आज के प्रिंट-मीडिया में स्वतंत्र पत्रकारों के पारिश्रमिक एवं औपचारिक मान-सम्मान की भी जो दुर्दशा हो रही है, उसके साथ उपरोक्त सुंदर व्यवहार की जरा तुलना करके देखिए। रमेश नैयर उन दिनों चण्डीगढ़ के नामचीन अखबार 'दैनिक ट्रिब्यून' में फीचर प्रभारी थे। चण्डीगढ़ के बाद उन्होंने दिल्ली पहुंचकर राष्ट्रीय स्तर पर इस अंचल की पत्रकारिता का नाम रोशन किया। अब वे अपने गृहनगर रायपुर में स्थायी हुए हैं। अनुभव, आदर्श एवं दूरदृष्टि का जो अकूत खजाना उनके पास है, उससे लाभान्वित होने के लिए हर किसी को उत्सुक रहना चाहिए।

दिल्ली में पंद्रह वर्ष बिताने के बाद मुंबई में जो पैंतीस वर्ष मैंने आज तक गुजारे हैं वे भी मेरी संघर्षमय प्रयोगधर्मिता से ओतप्रोत रहे हैं। इस कालखंड की एक अलग कहानी है, जिसे लिखने का अवसर फिर कभी अवश्य आएगा। यहां, फिलहाल इतना ही कहना चाहूंगा कि आज से लगभग आधी सदी पहले जो रचनाकारिता मैंने दिल्ली में देखी थी, अजनबियों को भी गले लगाने की जिस दरियादिली से मैं दिल्ली में रूबरू हुआ था, वही रचनाकारिता, वही साहित्यिक वातावरण, वही स्नेह-सौजन्य, वही आत्मीयता आज के छत्तीसगढ़ में पनप रही है। प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक, दोनों मीडिया, आज यहां नई करवट ले रहे हैं। बहुरंगी मुद्रण की सर्वश्रेष्ठ मशीनें यहां लग चुकी हैं। लगभग हर विषय पर श्रेष्ठतम पत्रिकाएं निकल रही हैं। अखबारों की तो जैसे झड़ी ही लग गई है। रायपुर के त्रैमासिक 'मीडिया विमर्श' ने देखते-देखते राष्ट्रव्यापी पहचान बना ली है। गिरीश पंकज द्वारा संपादित- प्रकाशित त्रैमासिक 'सद्भावना दर्पण' भी अपनी राष्ट्रीय पहचान रखता है। वेबसाइट 'सृजनगाथा डॉट कॉम' के जरिए जयप्रकाश मानस इंटरनेट पर हिन्दी को जो प्रतिष्ठा दिला रहे हैं, यह छत्तीसगढ़ में ही संभव हुआ है। एक से एक बेहतरीन कहानियां, कविताएं, समालोचनाएं यहां लिखी जा रही हैं। उपन्यासों के क्षेत्र में भी कम काम नहीं हो रहा। विनोदशंकर शुक्ल का राष्ट्रीय स्तर पर बहुचर्चित उपन्यास 'नौकर की कमीज' यहीं लिखा गया। कसर है, तो केवल एक। समग्र देश में अपनी छाप छोड़ सके, ऐसा कोई पुस्तक-प्रकाशक इस क्षेत्र में नहीं है। उम्मीद रखी जा सकती है, यह कमी भी शीघ्र पूरी हो जाएगी। तब मुझ जैसे किसी जोशीले को रायपुर से भागकर दिल्ली जाने की जरूरत न होगी। मेरा जो समय दिल्ली में भूतकाल में तब्दील हो गया, उसे मैं रायपुर में वर्तमान का रूप धरते देख सकूंगा। आमीन। 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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