पश्चिम के अधूरे दर्शन से निकलिए
प्रो. बृजकिशोर कुठियाला
मीडिया
के सामने उपस्थित चुनौतियों,
उसकी भूमिका, उपलब्धियों,
प्रभाव-दुष्प्रभाव आदि विषयों पर पूरे विश्व में अनेक
गोष्ठियां वे कार्यशालाएं आयोजित होती हैं परन्तु मीडिया शिक्षण के विषय में
अभी तक अधिक ध्यान नहीं गया है। इसी संदर्भ में 25 से
28 जून 2007 को सिंगापुर में
आयोजित प्रथम विश्व पत्रकारिता शिक्षण सम्मेलन एक महत्वपूर्ण पहल है। इस
सम्मेलन में विश्व भर के लगभग 36 देशों के 500
से अधिक मीडिया शिक्षकों ने भाग लिया। एशियन मीडिया,
सूचना व संचार केन्द्र (एमिक) व सिंगापुर के नानयांग
प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय दोनों ने मिलाकर इस सम्मेलन की व्यवस्थाएं संभाली।
विश्व पत्रकारिता व जनसंचार शिक्षण संघ का सहयोग इस सम्मेलन में मुख्य रूप से
रहा। इसी दौरान एमिक का वार्षिक सम्मेलन भी आयोजित हुआ जिसका विषय भी मीडिया
शिक्षण से ही संबंधित रहा। यह विषय था मीडिया शिक्षण व विकास : नवीन रचनाओं की
खोज। विश्व भर के मीडिया शिक्षकों का यह जमावड़ा पहली बार हुआ,
यह तो महत्वपूर्ण है ही परन्तु इससे भी अधिक उल्लेखनीय तथ्य यह
है कि इस सम्मेलन में युनेस्को की ओर से पत्रकरिता शिक्षण के लिए एक आदर्श
पाठयक्रम की प्रस्तुति की गई।
भारत में
मीडिया शिक्षण पिछले
5
वर्षों में अभूतपूर्व रूप से विस्तृत हुआ है। ऐसा माना जाता है कि लगभग प्रति
सप्ताह कम से कम एक ऐसा संस्थान खुलता है जिसमें मीडिया संबंधी शिक्षण की
व्यवस्था हो। 100 से अधिक विश्वविद्यालयों में
पत्रकारिता विभाग स्थापित है। देश के अनेक महाविद्यालयों में स्नातक स्तर पर
किसी न किसी रूप में मीडिया के पाठयक्रम चल रहे हैं। क्योंकि नए-नए पाठयक्रम
प्रारम्भ हो रहे हैं इसलिए इनका कोई आंकड़ा देना आज संभव नहीं है परन्तु मीडिया
शिक्षण में सबसे अधिक भूमिका पिछले वर्षों में निजी क्षेत्र की रही है।
प्रशिक्षित मीडियाकर्मियों की आवश्यकता इस विस्तार का एक कारण तो है ही परन्तु
कुल मिलाकर उच्च शिक्षा व व्यावसायिक शिक्षा एक लाभकारी उपक्रम सिध्द हो रहा
है। इसलिए जब कोई संस्था आर्थिक निवेश के विषय में सोचती है तो उच्च शिक्षा में
निवेश व उसमें भी मीडिया शिक्षण में निवेश एक आकर्षक विकल्प बनकर उभरता है।
तीन प्रकार की
रचनाएं सामने आ रही हैं- पहली मीडिया संस्थान ही मीडिया शिक्षण व प्रशिक्षण की
व्यवस्थाएं औपचारिक रूप से कर रहे हैं। द टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसकी शुरूआत की
फिर इंडियन एक्सप्रेस और फिर द हिन्दु ने भी अपने मीडिया शिक्षण संस्थान
स्थापित किए। आज अनेक समाचारपत्र समूहों व टेलीविजन वाहिनियों के प्रशिक्षण
कार्यक्रम चल रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस संस्थानों में प्रशिक्षित
युवा अन्य मीडिया संस्थानों में भी काम पा रहे हैं। दूसरा,
मीडिया प्रशिक्षण के क्षेत्र में नए खिलाड़ियों की संख्या भी
बढ़ती जा रही है। तथाकथित समाज सेवा में लगी संस्थाएं या उपभोक्ता वस्तुएं बनाने
वाली कम्पनियां या फिर नये उपक्रम मीडिया प्रशिक्षण में निवेश करते हुए दिखती
हैं। निजी क्षेत्र में तीसरा प्रयास विदेशी विश्वविद्यालयों से मिलकर मीडिया
संबंधित व अन्य पाठयक्रम चलाने का है। पहले आस्ट्रेलिया व अमेरिका के
विश्वविद्यालय भारत में उच्च शिक्षा का बाजार ढूंढ रह थे अब चीन और इंग्लैड के
विश्वविद्यालय भी मैदान में आ गए हैं। हाल ही में फिलिपीन्स ने भी इस तरह के
प्रयास प्रारंभ किए हैं।
मीडिया शिक्षण
चाहे विश्वविद्यालय में हो,
महाविद्यालय में हो या निजी संस्थान में हो उसकी दशा और दिशा
तय होती है मुख्यत: उसके पाठयक्रम से व शिक्षकों की योग्यता व गुणवत्ता से।
लगभग पांच वर्ष पूर्व विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने स्नातक व स्नातकोत्तर के
लिए एक आर्दश पाठयक्रम तैयार किया था। अधिकतर विश्वविद्यालयों ने इस पाठयक्रम
को स्थानीय व क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तन करके अपना लिया था।
परन्तु पिछले पांच वर्ष में मीडिया का तो रूप-स्वरूप,
रचना लगभग सभी कुछ बदल चुका है। नए तरह के क्षेत्र उभरे हैं जिनके लिए अलग तरह
के शिक्षण-प्रशिक्षण की आवश्यकता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का इस ओर ध्यान
जाएगा, ऐसी अपेक्षा की जा सकती है।
गम्भीर प्रश्न
यह भी है कि मीडिया शिक्षण के प्रयासों का आधार क्या बने। आज तक के अधिकतर
पाठयक्रम पत्रकारिता पर केन्द्रित हैं और रिपोर्टिंग और सम्पादन के अतिरिक्त
किसी कौशल को सिखाने का प्रयास कम ही रहता है। इन पाठयक्रमों के नाम भी
पत्रकारिता तक ही सीमित है। परन्तु पिछले
20
वर्षों में बहुत से विभाग पत्रकारिता की सीमाओं को तोड़कर जनसंचार के व्यापक
क्षेत्र में प्रवेश कर गए हैं। उनके लिए पत्रकारिता के अतिरिक्त टेलीविजन
कार्यक्रम निर्माण ,जनसंपर्क व विज्ञापन में प्रशिक्षण
भी महत्वपूर्ण है। कई गोष्ठियों में यह बहस का मुद्दा रहता है कि मीडिया से
संबंधित संस्थाओं और पाठयक्रमों का नामकरण पत्रकारिता केन्द्रित हो या जनसंचार
केन्द्रित। पत्रकारिता के क्षेत्र से सीधे आए विद्वान पत्रकारिता को ही
सर्वोपरि मानते हैं और अन्य विषयों को पत्रकारिता की पूंछ मानते हैं। जबकि अन्य
विद्वान जनसंचार को एक मूल शैक्षणिक विषय मानते हुए उसकी व्यावहारिक व्यवस्थाओं
को मीडिया का नाम देते हैं। एक तीसरा समूह भी है जो और भी गहराई में जाकर मानव
संचार को मूल विषय मानकर जनसंचार को उसका आधुनिक व्यक्त,
व व्यापक कार्य मानकर शिक्षण व प्रशिक्षण की योजना बनाने का
आग्रह करता है।
प्रथम विश्व
पत्रकारिता शिक्षण सम्मेलन में भी इस तरह की बहस उठाने का प्रयास किया गया
परन्तु क्योंकि अधिकतर प्रतिभागी पत्रकारिता से संबंधित थे इसलिए बहस उस स्तर
पर उठ नहीं सकी जिसकी आवश्यकता थी। हालांकि यदि युनेस्को द्वारा प्रस्तुत मॉडल
पाठयक्रम का विश्लेषण करें तो पत्रकारिता के अतिरिक्त विषयों को भी केन्द्र
बिन्दु बनाया गया है। यह बहस जारी रहेगी और फैसला इस बात निर्भर करता है कि
मीडियाकर्मी और मीडिया शिक्षकों का नेतृत्व अपने लिए समाज में क्या भूमिका तय
करते हैं। यदि पूर्ण समाज की संचार रचना को अपना विषय मानते हैं तो मानव संचार
विषय को मूल बनाकर जनसंचार के विभिन्न व्यावहारिक कार्यों को पाठयक्रमों में
शामिल किया जाएगा और यदि वे अपने को केवल सूचनाओं के संग्रहण,
उनके प्रेषण और विश्लेषण का ही कार्य देते हैं तो सीमित भूमिका
रखकर पत्रकारिता के चारों तरफ घूमेंगे। भारत में यह बहस उठे और कुछ निर्णय पर
पहुंचे यह आवश्यक है क्योंकि पूरा विश्व, कम से कम
विकासशील विश्व भारत से मार्गदर्शन की अपेक्षा करता ही है।
खटकने वाली
बात यह है कि युनेस्को द्वारा जो पाठयक्रम बनाया गया उसमें विकासशील देशों का
और विशेषकर भारत का योगदान लगभग शून्य है। हालांकि युनेस्को ने घोषित किया कि
यह पाठयक्रम विकासशील देशों और उभरते हुए प्रजातंत्रों के लिए है परन्तु
पाठयक्रम के निर्माण में मुख्यत: अमेरिकी और आस्ट्रेलिया के विद्वानों का मुख्य
योगदान है। ये विद्वान विकासशील देशों के बारे में कितना भी जानते हों परन्तु
उस स्तर की समझ नहीं बना सकते जो इन देशों के अपने मीडियाकर्मियों और शिक्षकों
में है। विकास के पश्चिमी मॉडलों पर आधारित संचार और जनसंचार रचनाएं पूर्ण रूप
से असफल सिध्द हो चुकी हैं और उन्हीं को पाठयक्रमों में डालना अनुचित ही नहीं
परन्तु विरोध का मुद्दा भी होना ही चाहिए।
भारत के
अंन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मीडिया शोध विशेषज्ञ डॉ. विनोद अग्रवाल ने इस
सम्मेलन में मीडिया और संस्कृति से जुड़े मुद्दों को उठाया और उन्होंने बताया कि
किस प्रकार से शोध पर आधारित ये निष्कर्ष निकले हैं कि किसी भी समाज के मीडिया
की रचना उसके सम्पूर्ण संचार व्यवस्थाओं का अंग होती है। इसलिए पश्चिम के
अनुभवों के आधार पर विकासशील देशों में मीडिया की रचनाएं बनाना अव्यवहारिक है।
भारतीय मूल के एक अमेरिकी प्रोफेसर ने भी प्रश्न उठाए कि क्या अमेरिकी मीडिया
अपने समाज की अपेक्षाओं पर खरा उतरा है। स्वाभाविक तौर से यदि इस प्रश्न का उतर
हां हो,
तभी पश्चिम की मीडिया की रचनाएं शेष विश्व के लिए अनुकरणीय हो
सकती हैं। ऐसा लगता है कि मीडिया की सही भूमिका तय करने के लिए भारत और चीन के
उस दर्शन पर भी गंभीर दृष्टि डालनी होगी जिसका निर्माण हजारों वर्ष पूर्व हुआ
था और जिनके आधार पर प्राचीन काल में परिपूर्ण सभ्यताओं का विकास हुआ था। इस
तरह के कार्य मीडिया स्वयं तो नहीं कर पाएगा क्योंकि मीडिया तो तुरन्त का और
लगभग 24 घंटे का कार्य है। मीडिया की कार्यप्रणाली भी
इस प्रकार की है कि आत्मनिरीक्षण व नाक से दूर देखने की प्रवृतियां कम ही उपजती
हैं। मीडिया के लिए दिशा तय करने का कार्य शिक्षण संस्थाओं में कार्यरत
विद्वानों को ही करना होगा जिसके लिए आवश्यकता है कि मीडिया पाठयक्रमों में
पश्चिम की संकुचिता को तोड़कर पूर्व की व्यापकता व सम्पूर्णता लाई जाए।
आवश्यकता आज
यह है कि भारत में मीडिया शिक्षण के प्रति गंभीर और खुले मन से चर्चाएं हों और
तय किया जाए कि हमें सामाजिक संचारकों का निर्माण करना है या मुनादी करने वाले
सूचना प्रेषकों का या फिर सभ्य-असभ्य मनोरंजक या भौंडे कार्यक्रमों के निर्माता
भाटों का। यह विषय केवल मात्र मीडियाकर्मियों या मीडिया शिक्षकों का नहीं है,
पूरे समाज की सहभागिता इसमें अपेक्षित है।
हमें इस बात
से भी सावधान रहना है कि कहीं पश्चिम के सुनियोजित षडयंत्र के हम अनजाने में
निशाना तो नहीं बन रहे हैं। सर्वविदित और सर्वमान्य है कि भारत शीघ्र ही एक
विश्वशक्ति बनेगा। यह तो तय ही है परन्तु विश्व शक्ति की स्थिति तक पहुंचने में
जितना विलम्ब किया जा सके उतना ही पश्चिम को लाभ होने वाला है। हमारा संचारक व
मीडियाकर्मी भारत अनुकूल दृष्टि न बना पाए इसका प्रयास हो सकता है। पश्चिम के
हितों को हमारा मीडिया जाने-अनजाने पूर्ण करे इससे भी हमें सावधान रहना पड़ेगा।
उल्लेखनीय यह
भी है कि विश्व पत्रकारिता शिक्षण सम्मेलन में सबसे अधिक सहभागिता अमेरिका व
आस्ट्रेलिया के विद्वानों की थी। चीन से भी कुछ लोग आए थे परन्तु उनमें से
अधिकतर ऐसे प्रसिध्द अमेरिकी प्रोफेसर थे जो अब चीन में अध्यापन कार्य कर रहे
हैं। अमेरिका से आए कई प्रतिभागी भारतीय मूल के थे यह अपने आप में एक अलग
विश्लेषण का विषय है कि उनकी दृष्टि वैश्विक है या अमेरिकी रंग में रंगी हुई है
और भारतीय हितों का उनमें क्या स्थान है।
जिस प्रकार से
पश्चिम के जीवन का आधार भौतिकता के कारण उसमें अधूरापन है उसी प्रकार मीडिया व
जनसंचार के वैचारिक स्तम्भ भी टेढ़े-मेढ़े बने हैं। पूरी पत्रकारिता का आधार
प्रकृति के उस प्राणी से संबंधित किया जाता है जिसे कई संस्कृतियों में
अपमानजनक शब्द माना जाता है। पत्रकार को प्रारंभ से ही पढ़ाया जाता है कि यह
वाचडॉग है अर्थात वह प्रहरी न होकर प्रहर कुत्ता है। उसका काम भौंकना है।
कुत्ते के भी नकारात्मक पहलू को पत्रकरिता ने अपनाया और फिर प्रहरी कुत्तों की
भी कई किस्में हैं। कुछ कुत्ते तो हवा चलने की आवाज से ही भौंकना शुरू कर देते
हैं अन्य लैपडॉग कहलाते है अर्थात धोबी के कुत्ते। उन्हें तो जो भी गोद में
रखकर सहलाएं वे उसी के हो जाते हैं। कुत्तों की एक किस्म काटने वालों की होती
है। वे मौका-बेमौका हर किसी को काटने का ही प्रयास करते हैं। विचार का बिन्दु
यह है कि कुत्ते की वफादारी या स्वच्छता के प्रति रूचि को अपनाना पश्चिम के
पत्रकारिता के दर्शन ने क्यों नहीं अपनाया। एक अन्य बात,
बताया जाता है कि आदमी कुत्ते को काटे तो ही समाचार मानिए।
किसी भी दर्शन में इतनी नकारात्मकता कैसे सहन हो रही है। कुल मिलाकर पश्चिम का
पूरा दर्शन और पत्रकारिता के सिध्दान्त अपूर्ण व विकृत है। उनसे निकलना ही
विकासशील देशों के लिए कम से कम इस क्षेत्र में बौध्दिक स्वतंत्रता की प्राप्ति
होगा।
अपने देश में
आज राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोई संस्था नहीं है जो मीडिया शिक्षण के विषयों पर
गंभीर बहस का आयोजन कर सके। राष्ट्रीय स्तर के संस्थान अपने ही खोलों में सिमटे
हुए हैं इसलिए स्थानीय और क्षेत्रीय स्तरों पर इन बहसों को उठाना आवश्यक है।
उसके बाद इसका समन्वय राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर भी संभव हो पाएगा।
सिंगापुर में
जितने भारतीय प्रतिभागी थे उन्होंने दो सायंकाल आपस में विमर्श किया। इस बात पर
चिंता जताई गई कि विश्व पत्रकारिता शिक्षक संघ में
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देशों की सहभागिता है परन्तु भारत उस सूची में नहीं है। विचार विमर्श के बाद आम
सहमति से निर्णय लिया गया कि कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय को केन्द्र बनाकर एक
अखिल भारतीय संस्था की रचना की जाए जो न केवल भारत में मीडिया शिक्षण के विषयों
पर संवाद स्थापित करे परन्तु अपने विचार को विश्व स्तरीय संस्थाओं में भी रखने
में समर्थ हो। इसी योजना के अंतर्गत वर्ष 2008 के
प्रारंभ में कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में एक क्षेत्रीय गोष्ठी करने का निर्णय
लिया गया।
(लेखक
कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में जनसंचार एवं मीडिया प्रौद्योगिकी संस्थान के
निदेशक हैं।)


