Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 6, दिसंबर.07.- फरवरी, 2008)

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कविता

 

 

बासा अखबार


कुमार अबुंज

हम सब चाहते हैं ताजा अखबार

अखबार जो रहता है ताजा

सिर्फ पढ़े जाने तक

मगर बासा अखबार चाहता है हमें

उसकी पूरी जिंदगी भर -

संफर मे पंखा झलने

अलमारी में बिछ जाने

और किताब पर चढ़ जाने से लेकर

कचरा रखकर फेंक दिये जाने तक

बासे अखबार पर कई जिंदगियां

टिकी रहती हैं ताो ढंग से

बासे अखबार के लिए

दूर-दूर से आते हैं लोग

अधिकतर बच्चे

कोटा से बीना से सागर से

भाव की गुंजाइश लिए झेलते हैं परदेश

'चार आने ज्यादा ही सही

मांजी। रद्दी लाओ तो'

पसीजती है माँजी

बाजार ले जाकर

रद्दी बेचने की इल्लत को

अखबारों पर पड़ी धूल के साथ

झाड़ते हुए माँजी

अखबारों का ढेर लाती हैं

और बच्चा यकायक तब्दील होता है

एक बड़े आदमी में

कमाया हुआ अनुभव काम में लाता है

होशियारी से तौलता है रद्दी

माँजी बड़बड़ाती हैं लगातार

निगाह रखती हैं डंडी पर

बच्चा अखबार भी तौलता है

माँजी को भी

रखता है दोनों का ख्याल

अखबार का रद्दी के रूप में बिक जाना

बासे अखबार की

लंबी कैद से मुक्ति की कहानी का

आरंभ है

ठीक यहीं से बासा अखबार

जिंदा होता है पूरी ताजगी के साथ

इस ताजगी की पहली खुराक

बच्चा और मांजी बांटते हैं

आपस में

अब बासा अखबार बनता है

दुकान की रद्दी या लिंफांफा

और ढोकर लाता है घर में

किराना मसाले फल दवाइयां......

सब कुछ सभी के लिए

लिंफांफा खाली करने के बाद

भाभी पढ़ती हैं

उसकी आधी-अधूरी खबरें

बच्चे खेलते हैं फुग्गा-फुग्गा

और आखिर में अम्मां

बच्चों से छीनकर लिंफांफा

जलाती हैं चूल्हा

ताजा आग पैदा होती है

ताजे भोजन के लिए

बासे अखबार से

जलते हुए भी बासा अखबार

पैदा करता है ताजगी

और मिलता है ताजी हवा में!

(किवाड़ कविता संग्रह से साभार)

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

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