सीधा प्रसारण
कुमार अंबुज
अभिनेता सरलता
के अभिनय में मारता हुआ सबको
प्रकट कर रहा
है खुद को मार खाता हुआ
चालाकी के
जंगल में शब्दों का आखेट यह
जहां से
अविश्वसनीय हो रही है वह पूरी भाषा
जो निकाली गई
लाखों सालों के उत्खनन में
वहां राजनीति,
छल और लोकशक्ति
एक फूहड़ हंसी
में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं मुझ नागरिक का
तुच्छ जीवन के
अनुभव इतने बड़े आदर्श हुए
कि संसार को
सुधारने का उदाहरण हैं अब
विनम्रता से
उच्चरित शब्दों से टपकता है गाढ़ा लसदार दर्प
एक करूण पात्र
मंच से उतरकर
दर्शकों की
तरफ से बजाने लगता है तालियां
एक लाचार
सन्नाटे में डूब जाती है रंगशाला
वहां तब भी
बचा रहता है
बार-बार क्षमा
मांगती हुई निरीहता का एक नाटय
जो एक तानाशाह
की हिंसा से भी अधिक हिंसक
जो एक भाड़े के
सैनिक से भी अधिक क्रूर होकर
छीन लेता है
अपने लिए कुछ जगह
ऐसी याचना में
छिपी होती है एक धौंस
जिसके आगे हर
बार परास्त होता हूं मैं एक प्रेक्षक
अगले ही दिन
फिर दिखाया जाता है
हिंसक निरीहता
और मेरे आत्मसमर्पण का सीधा प्रसारण।
(काव्य
संग्रह अनंतिम से साभार)


