वैश्वीकरण ने बदला मीडिया का चेहरा-सचदेव
रिपोर्ट- डॉ. गोपा बागची
सामाजिक
दायित्व एवं मीडिया विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला
बिलासपुर
(छत्तीसगढ़)। वैश्वीकरण और बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव और प्रतिस्पर्धा ने
मीडिया का स्वरूप ही बदल दिया है। सनसनीखेज और भ्रामक खबरों ने मीडिया को
संवेदनहीन बना दिया है। यह समाज के लिए खतरनाक स्थिति है। ये विचार देश के
सुप्रसिध्द पत्रकार एवं लोकप्रिय पत्रिका नवनीत,
मुंबई के संपादक श्री विश्वनाथ सचदेव ने व्यक्त किए। श्री
सचदेव गुरू घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर के
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग तथा समाज कार्य विभाग द्वारा सामाजिक दायित्व एवं
मीडिया विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे
थे। श्री सचदेव ने कहा कि मीडिया में बाजारवाद का प्रभाव साफ दिख रहा है,
जिससे खबरों की विश्वसनीयता कम हो गई है। अखबारनवीसों ने
पत्रकारिता को प्रोडक्ट में बदल दिया है।
गुरू घासीदास
विश्वविद्यालय के रजत जयंती समारोह पर आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते हुए
श्री सचदेव ने कहा कि पचास साल पहले पत्रकारिता मिशन के रूप में शुरू हुई थी तब
इसकी परिभाषा में सूचना देना,
शिक्षित करना और मनोरंजन प्रदान करना बताया जाता था,
लेकिन धीरे-धीरे उसका स्वरूप ही बदल गया है। अब पत्रकारिता में
न तो सूचना है और न ही शिक्षा का भाव, इसके स्थान पर
मीडिया का प्रमुख कार्य मनोरंजन प्रदान करना ही रह गया है। सबसे खराब स्थिति
इलेक्ट्रानिक मीडिया की है क्योंकि वह ज्यादा प्रभावशाली है। टीआरपी बढ़ाने की
होड़ में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अश्लीलता परोसने का काम शुरू कर दिया है। श्री
सचदेव ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि पहले मीडिया समाज के लिए कुछ करने और
देने के माध्यम था किंतु नई परिस्थितियों में मीडिया समाज से सब कुछ छीन लेने
में जुटा हुआ है। सामाजिक मूल्यों की बात काफी पीछे छूट गई है। मीडिया में आज
जो कुछ हो रहा है वह उचित नहीं है। हमारी भूमिका जागरूक बनकर समाज के साथ जुड़ना
है तभी हम अपने दायित्व को पूरा करने में सफल होंगे। जिन आदर्शों को लेकर
मीडिया चला था, वह आज नहीं है जो चिंता का मुख्य विषय
है। सामाजिक चेतना में मीडिया की भूमिका विषय को प्रतिपादित करते हुए श्री
सचदेव ने साफ किया कि सामाजिक हितों की अनदेखी करके मीडिया सही सम्मान नहीं पा
सकता है।
कुशाभाऊ ठाकरे
पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति सच्चिदानंद जोशी ने
मुख्य अतिथि की आसंदी से कहा कि जब हम सामाजिक दायित्व की बात करते हैं,
तो सबसे पहले हमारे जेहन में यह बात आनी चाहिए कि क्या हम अपने
कार्य करते हुए गौरव का अनुभव कर रहे हैं। जब तक गौरव का यह भाव हमारे अंदर
नहीं आयेगा, तब तक हम समाज के लिए कुछ भी अच्छा नहीं कर
सकेंगे। श्री जोशी ने कहा कि समाज के लिए हममें कुछ कर गुजरने का जज्बा होना
चाहिए। सामाजिक घटनाओं और मानवीय संबंधों के सही संप्रेषण से ही मीडिया की
विश्वसनीयता बन सकती है तभी मीडिया के प्रति जो नकारात्मक सम्मान है वह
सकारात्मक सम्मान में बदल सकता है। श्री जोशी ने मीडिया में पर्याप्त प्रशिक्षण
की जरूरतों को भी स्वीकार किया।
गुरू घासीदास
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जे.एल. गुप्ता ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि
पहले हमें यह देखना होगा कि हमारे व्यक्तिगत मूल्य क्या हैं और समाज पर इन
मूल्यों का क्या प्रभाव पड़ रहा है। हमारे सामाजिक उत्तरदायित्व क्या हैं। प्रो.
गुप्ता ने कहा कि आज दिनोंदिन संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है। मीडिया एक बड़ी ताकत
है और उसका मुख्य दायित्व सामाजिक न्याय दिलाना है। कई बार मीडिया घटना से परे
जाकर जो घटित नहीं हुआ है उसे भी पाठकों तक पहुचा देता है,
ऐसा नहीं होना चाहिए। विशिष्ट अतिथि के रूप में बिलासपुर प्रेस
क्लब के अध्यक्ष शशिकांत कोन्हेर ने नये दौर में मीडिया की बदलती चुनौतियों के
बीच नया रास्ता निकालने की वकालत की। उन्होंने कार्यशाला के आयोजन को एक
महत्वपूर्ण कदम बताया। वरिष्ठ पत्रकार श्री पारितोष चक्रवर्ती ने पहले तकनीकी
सत्र की शुरूआत में सामाजिक दायित्व की समझ विषय पर विवेचना की। श्री चक्रवर्ती
ने मीडिया से आग्रह किया किया कि वे घटना की त्रासदी को सामने रखें,
किसी के सामाजिक सम्मान को हानि न पहुंचाए। आज तक केवल
व्यक्तिगत अवमानना की बात ही की जाती रही है, सामाजिक
अवमानना की बात कहीं नहीं उठाई जाती है। संवेदना स्पर्श में होती है,
अहसास में होती है, दृष्टि,
समय और विचारों में भी होती है। प्रत्येक समाचार को लिखते हुए
उसके असर को स्वयं महसूस करना चाहिए।
इस सत्र के दूसरे वक्ता दैनिक हरिभूमि,
रायपुर के स्थानीय संपादक श्री संजय द्विवेदी ने सामाजिक दायित्व से जुड़े
समाचारों के लेखन के विषय पर कहा कि समाचार एक ऐसा साधन है जिसमें कोई भी खबर
गैर सामाजिक नहीं है। हर खबर किसी न किसी व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण होती है।
श्री द्विवेदी ने मीडिया पर बाजारवाद के खतरों को खारिज करते हुए कहा कि
बाजारवाद के बीच खड़े रहने के बावजूद मीडिया समाज को एक नई दिशा दे रहा है। अब
समाचार पत्रों का जनतंत्रीकरण हो गया है और मीडिया समाज से दूर नहीं बल्कि समाज
के और करीब पहुंच रहा है।
कार्यक्रम में अहिल्या विवि के विभागाध्यक्ष डॉ. एम.एस. परमार,
डॉ. हरिसिंह गौर विवि सागर के मध्य भारती संपादक डॉ.
डी.एस. राजपूत, श्री अरविंद सिंह ने भी
अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में माखनलाल चतुर्वेदी विवि के डॉ. रंजन सिंह
ने तकनीकी सत्रों पर प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।


