Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 6, दिसंबर.07.- फरवरी, 2008)

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दिशाबोध

 

 

विकृति पर केंद्रित होती पत्रकारिता के खतरे


नारायण दत्त

 

आज हमारी पत्रकारिता मनुष्य की कृति पर, उसमें भी उसकी विकृति पर, अधिकाधिक केंद्रित होती चली जा रही है। अखबारों की तो बातें छोड़िए, पत्रिकाएं भी राजनीतिक उठापटक, भ्रष्टाचार और अपराधों की चर्चा से भरी रहने लगी है। पाठक का आत्मिक संसस्कार करने वाली, उसकी संवेदनाओं को सूक्ष्म और उसकी संवेदना को व्यापक तथा गहरा बनाने वाली और उसमें बौध्दिक कुतूहल और ज्ञान की पिपासा जगाने वाली सामग्री के लिए हमारी पत्र-पत्रिकाओं के पास स्थान की जैसी भयंकर की रहने लगी है, वह सचमुच भयजनक है।

दस-ग्यारह साल पहले अमेरिकी पत्रिका 'नेशनल ज्यॉग्राफिक' ने लम्बे शोध के आधार पर लिखा एक लेख छापा था। उसमें बताया गया कि मनुष्य के बाद हम्पबैक ह्वेल दुनिया का एकमात्र प्राणी है जो संगीत रचता है। उस अंक में ह्वेलों के संगीत का फोनोग्राफिक प्रिंट भी दिया गया है। मैंने लेख पढ़ा, प्रिंट को बजाकर सुना, मुझे रोमांच हो आया। इस विषय पर 'बीबीसी लिसनर' के एक पुराने लेख की कतरन मेरे पास थी। मैंने एक संपादक से कहा कि इस पर एक लेख बन सकता है। तपाक से उत्तर मिला ''इस विषय ें हमारे पाठकों को दिलचस्पी नहीं होगी,'' जिसका सीधा अर्थ यह था कि इस विषय पर लेख देने में मेरी दिलचस्पी नहीं है।

पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी ने एक बार बातचीत में मुझसे कहा था- ''हिंदी में पाठकों की दिलचस्पी के बारे में परम प्रमाण मानकर चलता है,'' अगल मैं इसमें यह जोड़ दूं कि प्राय: संपादक चौकीदार बनकर अनेक अच्छे विषयों को पाठक तक पहुंचने से रोक देता है, तो बात बहुत गलत न होगी। जहां संपादक अधिक जीवंत और जागरूक हो, वहां बहुधा पत्र के संचालन और प्रबंधक उसे टोकते रहते हैं। हाल में मेरे एक संपादक मित्र से प्रबंधक ने पूछा था कि हिंदी पाठक को रुमानिया और बल्गारिया से क्या लेना-देना।

पं. श्रीनारायणजी ने ही बीस-एक साल पहले लिखा था कि हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के तीन शाश्वत विषय हैं- नेता, अभिनेता और स्थान बच जाए तो देवता। क्या कुल मिलाकर आज भी स्थिति यही नहीं है? अलबत्ता खेल, अपराध और आर्थिक भ्रष्टाचार भी हमारी पत्रिकाओं में भरपूर स्थान पाने लगे हैं। मगर चूंकि खेल में राजनीति घुस गई है, राजनीति खिलवाड़ बन गई है और राजनीति और अपराध के बीच सीमा खींचना मुश्किल होने लगा है, इसलिए हम मान सकते हैं कि नेता-अभिनेता-देवता का फार्मूला आज भी हमारी पत्रिकाओं पर लागू होता है।

यह माना जाता है और संपादकीय लेखों में हमें बार-बार याद भी दिलाया जाता है कि हम विज्ञान-युग में जी रहे हैं। परंतु क्या हमारी पत्र-पत्रिकाओं में इसकी कोई झलक मिलती है? हिंदी में सुबोध विज्ञान की कितनी पत्रिकाएं हैं? हिंदी के कितने पत्रों या पत्रिकाओं में विज्ञान का नियमित स्तंभ है? हां, कोई पत्र या पत्रिका ऐसी नहीं है जिसमें दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक या मासिक भविष्य का कॉलम न छपता हो। चुनावों से पहले हम मतगणनाशास्त्रियों (सेफॉलाजिस्टों) के अनुमानों की बजाय ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां ज्यादा शैक से छापते हैं। आज फलित ज्योतिष को हमारी पत्र-पत्रिकाओं ने परम विज्ञान का दर्जा दे दिया है। वे उसे भारतीय संस्कृति और भारतीय मानस के बुनियादी अंग के रूप में पेश करती है। हमारे अधिकांश पत्रकार शायद यह जानते ही नहीं और अगर जानते हैं तो पाठक को बताते नहीं कि फलित ज्योति की खिल्ली उड़ाने वाली चिंतन-परंपरा भी इस देश में सदा ही रही है। संस्कृत साहित्य से जुड़े चुटकुलों के दिलचस्प संग्रह 'भोजप्रबंध' में ये गजब के श्लोक हैं -

त्रैलोक्यनाथो रामोस्ति वसिष्ठो ब्रह्मपुत्रक:।

तेन राज्याभिषेके तु मुहूर्त: कथितोभत्॥

तन्मुहूर्तेन रामोपि वनं नीतोवनीं बिना।

सीतापहारोप्यभवत् वैरिंचिवचनं वृथा॥

(विष्णु के अवतार) राम तीनोंशोकों के स्वामी और वशिष्ठ ब्रह्माजी के सगे बेटे, उन वशिष्ठ ने उन राम के राज्याभिषेक का मुहूर्त भाखा। पर उस मुहूर्त में राम को राज्य गंवाकर वन को जाना पड़ा और बाद में तो सीता भी हर ली गईं। ब्रह्माज के बेटे का वचन बेकार हो गया।

कहते हैं, लॉर्ड कर्जन से एक बार पूछा गया कि ब्रिटेन में बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य बना देने का क्या परिणाम हुआ। उत्तर मिला कि सार्वजनिक मूत्रालयों में दीवारों पर लिखा जाने वाला साहित्य पहले की तुलना में एक फुट नीचे से शुरू होने लगा है। क्या साक्षरता के प्रसार और पत्र-पत्रिकाओं की बिक्री बढ़ने के साथ पत्र-पत्रिकाओं की सामग्री के स्तर में गिरावट आना अपरिहार्य है? यह ख्याल उदास करने वाला है।

सन 1951 में देश में साक्षरता का प्रतिशत 16.23 था। 1920 वाले दशक में यह प्रतिशत 10-11 के आसपास रहा होगा और हिंदी प्रदेश में तो और भी कम, क्योंकि साक्षरता के मामले में हिंदी प्रदेश बाकी भारत से जरा पीछे रहता आया है। फिर भी 1925 में हिंदी में 'भूगोल' नाम की पत्रिका शुय हुई, जिसमें पूरे विश्व की भौगोलिक जानकारी बड़ी सहज और स्वच्छ हिंदी में आम पाठकों को दी जाती थी। यह पत्रिका आजादी आने के बाद कालकवलित हुई। ऐसा लगता है कि आजादी आने के बाद हमने गैरमुनाफादेह पत्रिकाएं और पुस्तकें छापना सरकार का फर्ज मान लिया है। बिक्री और मुनाफा निजी प्रकाशकों के पार्वती-परमेश्वर बन गए हैं और उनके दबाव में या कई बार तो स्वेच्छा से भी संपादक पाठकों की रुचि का महत्तम समापवर्तक निकालता बैठा रहता है।

होना यह चाहिए कि हम पाठकों को लुभाकर एक-एक सीढ़ी ऊपर चढ़ाने का यत्न करें। पर हो यह रहा है कि हम पाठक से एक सीढ़ी नीचे खड़े होकर उसे नीचे उतरने को फसलाते हैं। हम उसकी बौध्दिक पाचनशक्ति बढ़ाने की बजाय घटाते हैं। नए विषयों, नए तथ्यों के अस्तित्व से उसे हम अनजान रखते हैं।

चिली के महान कवि पाब्लो नेरूदा का लिखा एक संस्मरण मुझे याद आता है। एक बार उन्हें सांतियागो की सब्जी मंडी के मजदूरों के संघ ने अपने जलसे में कविताएं पढ़ने बुलाया। असावधानी से नेरूदा अपना वह संकलन अपने साथ वहां ले गए, जिसमें उनकी सबसे कठिन समझी जाने वाली और सबसे लंबी कविताएं थीं। लाचारी में उन्होंने उन्हीं में से दो-तीन कविताएं पढ़कर सुनाईं। जब कविता पाठ पूरा हुआ तो किसी ने ताली नहीं बजाई, सन्नाटा छाया रहा। फिर दो क्षण बाद एक मजदूर उठा और उसने भर्राए गले से कहा, ''कवि, आज तक किसी ने हमें यह सब बताया ही नहीं था,'' और उसकी आंखों से आंसू बह निकले। मेरे ख्याल से हर संपादक को उस मजदूर का चित्र अपने मन की आंखों के सामने रखना चाहिए।

हिंदी पाठक में सब कुछ जानने की इच्छा है। उसमें सब कुछ समझने की शक्ति है, बशर्ते कि हम समझना जानते हों। आम आदमी की बुध्दि, शक्ति और विवेक में यह आस्था प्रजातंत्र का मूल आधार है और प्रेस स्वातंत्र्य के समर्थन में मूल दलील भी यही है। जो पत्रकारिता इसे समझती और स्वीकारती नहीं है, वह प्रजातंत्र को अंतत: कुंठित करती है। पत्रकारिता को बुध्दुओं का दिल बहलाने का धंधा मानकर चलना पत्रकारिता की जड़ काटना है और अफसोस की बात है कि यह कसूर आज बड़े पैमाने पर बेझिझक हो रहा है।

श्रेष्ठ पत्र या पत्रिका का लक्षण यह है कि वह पाठक और संपादक का साक्षा बौध्दिक और रसात्मक पराक्रम है। उसका मंत्र होता है- ''सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्य करवावहै,'' जिसे हमारे पुरखे स्वाध्याय और प्रवचन के लिए पढ़ा करते थे, आज की तरह भोजन के पहले नहीं। यह प्रबुध्द पाठक का जन्मसिध्द अधिकार है कि जब कोई पत्र या पत्रिका उसकी बौध्दिक भूख और रसात्मक प्यास को तृप्त न करे तो वह दूसरी पत्र-पत्रिकाएं तलाशे, चाहे वे दूसरी भाषा की ही क्यों न हों। संपादक की श्रेष्ठता की कसौटी यह है कि वह इसकी नौबत न आने दे।

हिंदी पत्रकारिता पर अंग्रेजी का आक्रमण एक नई स्थिति है, जिसकी चिंता की जानी चाहिए, पर की नहीं जाती है। हिंदी और भारतीय भाषाओं को समाचारों के मामले में हमेशा ही अंग्रेजी का मुंह देखना पड़ता रहा है। इसके अनेक ऐतिहासिक कारण हैं। समाचार-साधनों और समाचार-प्रेषण के व्यवसाय पर पश्चिम का वर्चस्व एक बुराई है, जिससे बाकी संसार आज जूझ रहा है। अपने देश में यह लड़ाई दुहरी है - पश्चिमी वर्चस्व के विरुध्द भी, अंग्रेजी के वर्चस्व के विरुध्द भी।

इस लड़ाई में हिंदी पत्रों, उनके संपादकों व मालिकों ने वह तत्परता, वीरता और सूझबूझ नहीं दिखाई है, जो उनसे अपेक्षित थी। आज भी हिंदी पत्र न केवल विदेश के बल्कि स्वदेश और यहां तक कि अपने ही प्रदेश के समाचारों का भी बड़ा भाग अंग्रेजी में पाते हैं और अनुवाद करके छापते हैं। मुख्यत: हिंदी में ही समाचार देने के लिए स्थापित की गई दो समाचार एजेंसियां पैसे की तंगी और कुप्रबंध के कारण ठप हो गईं। पीटीआई और यूएनआई की हिंदी समाचार-सेवाएं आंशिक सेवा ही दे पा रही है। मेरी राय में इसका मुख्य कारण ज्यादातर हिंदी पत्र मालिकों की यह लोभी वृत्ति है कि खबरें उन्हें सस्ती से सस्ती और हो सके तो मुफ्त में मिल जाएं। मानो वे ऐसा मानते हैं कि हिंदी चूंकि राजभाषा है, इसलिए उसमें समाचार देने में अगर समाचार-समितियों को घाटा हो तो उसकी भरपाई सरकार करे। हिंदी पत्रों ने प्राय: इसकी व्यवस्था करने पर बहुत ही कम ध्यान दिया है कि देश के गैर हिंदी भाषी इलाकों से खासकर दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत से वहां की स्थिति और समाचारों पर वहीं के सधे हुए पत्रकारों की खबर-पातियां मंगवाई जाएं। प्राय: यह काम वहां बसे हिंदी भाषियों, हिंदी के अध्यापकों और हिंदी-प्रचारकों को सौंप दिया जाता है, चाहे उनकी पत्रकारीय क्षमताएं न के बराबर हों। या इस सारे पचड़े से बचने के लिए अखबार अंग्रेजी स्तंभकारों की शरण लेते हैं।

पर जिसे अभी मैंने हिंदी पर अंग्रेजी पत्रकारिता का आक्रमण कहा, वह कुछ और ही चीज है। उसके तीन रूप है-

1. अंग्रेजी पत्रिकाओं का हिंदी अनुवाद छपना।

2. हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं के नाम अंग्रेजी में रखना।

3. हिंदी पत्रों में अंग्रेजी पत्रकारों के सिंडिकेटेड स्तंभों का नियमित रूप से छापना।

1. 'रीडर्स डाइजेस्ट' का हिंदी संस्करण 'सर्वोत्तम' शायद पहली पत्रिका थी, जिसने अंग्रेजी का अविकल अनुवाद हिंदी में परोसना शुरू किया। कुछ सय बाद टाइम्स-समूह ने अपनी फिल्ी पत्रिका 'माधुरी' को अंग्रेजी 'फिल्मफेयर' कर दिया। मगर 'इंडिया टुडे' के हिंदी संस्करण ने थोड़े ही समय में जैसी व्यापारिक सफलता अर्जित कर ली, वह चौंका देने वाली चीज थी। मेरी राय में इससे दो तथ्य उभरत हैं- एक तो यह कि किसी खास ढंग की समाचार-पत्रिका की भूख हिंदी भाषियों के एक बड़े वर्ग में थी, जिसकी पूर्ति हिंदी के संपादक और प्रकाशक नहीं कर पा रहे थे। दूसरा यह कि हम हिंदी प्रेमी राजभाषा-राष्ट्रभाषा के नाम पर नारेबाजी चाहे कितनी ही कर लें, हिंदी की अस्मिता और उसकी रक्षा से हमें बहुत कम सरोकार हैं। इसका विवेचन और विशेषण होना जरूरी है कि यह पाठक वर्ग कौन-सा है जो अंग्रेजी पत्रिकाओं का उलथा खरीदने-पढ़ने को इतना उत्सुक है और किस मानसिकता और आवश्यकता के कारण वह ऐसा करता है। जिस अन्य भारतीय भाषाओं में ऐसा हुआ है और होने वाला है, उनसे भी हमें पूछना, पता लगाना चाहिए। शायद मिल-जुलकर हम कोई उपाय और उपचार खोज सकें।

2. पत्र-पत्रिकाओं के नामों में अंग्रेजी का एक-आध शब्द रखने की परंपरा हिंदी में बहुत पुरानी है। स्वयं भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 1873 में 'हरिश्चंद्र मैग्जीन' नाम की पत्रिका निकाली। (बेशक उसका नाम अगले साल उन्होंने 'हरिश्चचंद्र चंद्रिका' कर दिया)। 'हिंदी पंच' और 'हिंदू पंच' दो अन्य पुरारनी हिंदी पत्रिकाओं के नाम थे। ऑक्सफोर्ड कन्साइज डिक्षनरी के हिसाब से 'मैग्जीन' शब्द फारसी के 'मखजन' शब्द से निकला है और 'पंच' हिंदी-संस्कृत के 'पंच' (यानी पांच) शब्द से। आजादी आने के पूर्व 1946 में 'नवभारत टाइम्स' निकला। उसका साथी 'दिनमान' भी 'दिनमान टाइम्स' हो गया था। 1952 में मुंबई से 'नवनीत हिंदी डाइजेस्ट' शुरू हुआ, जो अब अपने नाम से 'डाइजेस्ट' शब्द हटा चुका है। किंतु नई प्रवृत्ति हिंदी पत्र का पूरा का पूरा नाम अंग्रेजी में रखने की है। पैकेट पर 'सर्फ' नाम चाहे रोमन में लिखा जाए या देवनागरी या तमिल लिपि में, पर पैकेट के भीतर माल एक ही रहता है। इसलिए ब्रांड के नाम का यहां महत्व है। मगर जब पाठय सामग्री की भाषा और विषयवस्तु सब अलग हों तो किसी प्रतिष्ठान के दो या तीन भाषाओं के पत्रों का साझा नाम अंग्रेजी में रखने से क्या लाभ होता होगा, मैं नहीं समझ पाया हूं।

3. अंग्रेजी के आक्रमण का तीसरा रूप तो स्वयं हिंदी संपादकों का न्योता हुआ है। अंग्रेजी के दो स्तंभकारों के सिंडिकेटेड लेखों के अनुवाद हिंदी में काफी समय से छप रहे थे - श्री इंद्रजीत और श्री कुलदीप नैय्यर। किंतु इधर के वर्षों में करीबन दस नाम और इनके साथ जुड़ गए हैं। दलील यह दी जाती है कि ये सब समर्थ समाचार-विवेचक हैं।

इससे कई सवाल उठते हैं। क्या हमारे देश में सारा सार्थक और पढ़ने योग्य समाचार-विशेषण अंग्रेजी पत्रकार ही करते हैं? क्या हिंदी में अपने स्तंभकार पैदा करने की क्षमता नहीं है? अगर हमें अनुवाद ही लेना हो तो हिंदी की बहन भाषाओं में ऐसा कोई समाचार-विशेषण कम से कम अपने-अपने प्रदेश के बारे में नहीं छपता, जिसे हम अपने पाठकों को पचा सकें? एक बात और। सुनने में यह जरा ओछी भी हो सकती है। ये सब अंग्रेजी स्तंभकार बड़े-बड़े अखबारी प्रतिष्ठानों में बड़े-बड़े वेतन पाने वाले संपादक रहकर निवृत्त हुए हैं और अब अपना योगक्षेम चलाने या पत्रकार-पेशे में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए स्तंभ लिखते हैं। क्या हमने जीवन-भर प्राय: अल्प वेतनों पर हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की सेवा करके निवृत्त होने वाले सुयोग्य संपादकों और पत्रकारों के योगक्षेप की कभी चिंता की है?

मैं भाषाई छुआछूत की भावना से प्रेरित होकर यह सब नहीं कर रहा हूं। महत्वपूर्ण समाचार या विचार किसी भी भाषा के माध्यम से आए, उसे तुरंत और सुलझे ढंग से अपने पाठकों तक पहुंचाना पत्रकार का पहलार् कत्तव्य है। फिर वैदेशिक संबंध, प्रतिरक्षा, शस्त्रास्त्र, अर्थतंत्र और वित्त व्यवस्था, विज्ञान और टेक्नालॉजी की विविध शाखाएं, कानून और संविधान आदि अनेक क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें प्रतिभा और कठोर परिश्रम से ही विशेषज्ञता अर्जित की जा सकती है। इन क्षेत्रों के विशेषज्ञ जब कोई महत्वपूर्ण बात देशवासियों से कहना चाहें तो वे भले ही किसी भी भाषा का सहारा लें, उनकी बात तुरंत अपने पाठकों तक पहुंचाने की शक्ति और तत्परता हममें होनी चाहिए। वरना हम अपने पाठकों की सच्ची सेवा नहीं कर सकते और न सच्चे पत्रकार कहला सकते हैं।

मगर रोजमर्रा की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का विशेषण और विवेचन करने के लिए तो हमारे पास अपनी भाषा और अपने मुहावरे में लिखने वाले लोग होने ही चाहिए और अगर नहीं हैं तो उन्हें तैयार करना हमारे अखबरों और उनके संपादकों की जिम्मेवारी है। ऊपर बताए गंभीर विषयों के हिंदी भाषी विद्वानों को हिंदी में लिखने के लिए फुसलाना भी हमारार् कत्तव्य समझा जाना चाहिए। हमारा हिंदी प्रेम अगर हिंदी को राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित कराने के नारे तक ही सीमित रहता है तो निश्चय ही वह खोखला है। हिंदी से प्रेम करने का अर्थ हिंदी के मुहावरे, व्याकरण के नियमों और शुध्द वर्तनों का आग्रह और आदर करना भी है। इस दृष्टि से इस समय अराजकता की सी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे किसी अनुशासनकर्ता की आवश्यकता तीव्रता से अनुभव होती है। हिंदी के अपने मुहावरे की उपेक्षा और अंग्रेजी से अनुवाद किए हुए गैर मुहावरेदार प्रयोगों की भरमार, व्याकरण के सामान्य से नियमों का उल्लंघन और वर्तनी की भद्दी भूलें आज हिंदी के अच्छे से अच्छे पत्रों और पत्रिकाओं में इतनी आम चीजें हो चली हैं कि कई बार यह पूछने की इच्छा होती है कि क्या ये पत्र-पत्रिकाएं अर्ध्दशिक्षितों द्वारा चौथाई शिक्षितों के लिए छापी जाती है?

हमें याद रखना चाहिए कि जैसलमेर से लेकर पूर्णियां और कांगड़ा से लेकर खंडवा तक के विशाल प्रदेश में हिंदी शिष्ट व्यवहार की भाषा बनी हुई है तो खड़ी बोली के व्याकरण के नियमों की बदौलत ही। भाषा सिखाने के स्तर पर गिरावट, कंपोज करने और छापने की नई विधियों की आवश्यकताओं को न समझने और प्रूफ रीडिंग के बारे में घोर उपेक्षाभाव के कारण हमारी पत्र-पत्रिकाओं में वर्तनी की कितनी गलतियां रहने लगी हैं, वे पाठकों की अगली पीढ़ियों को हिंदी शब्दों के सही स्वरूप को पहचानने में असमर्थ बना देंगी। भाषा के सही रूप और प्रयोग के प्रति जागरुकता किसी भी सभ्यता की बौध्दिक उन्नति का एक लक्षण है। उसकी उपेक्षा करना अपनी सभ्यता के बौध्दिक स्तर को नीचे उतारना है। खोजी पत्रकारिता की आज बड़ी धूम है। वह बहुत ही महिमामंडित हो गई है। वह मदिरा की तरह मादक और मनमोहक भी है। खुली अनीति और अन्याय का विरोध करने की तरह, छिपे तौर पर चल रही दुरभिसंधियों और स्वार्थ भरे दुष्कर्मों का पता लगाना और उनका परदाफाश करना पत्रकारिता का विशेषाधिकार ही नहीं, कर्त्तव्य भी है। किंतु यह प्रक्रिया शल्यक्रिया की तरह है, जिसे समाज की हितकामना से, सुलझे दिमाग और बहुत सधे हाथ से ही किया जाना चाहिए।

जनहित सारी ही पत्रकारिता की तरह खोजी पत्रकारिता का भी पाट है, और न्यायबुध्दि और सत्यनिष्ठा उसके कगार हैं। इन कगारों को तोड़कर अपने पाट से बाहर बहने पर खोजीपत्रकारिता विनाश भी मचा सकती है। न्यायबुध्दि और सत्यनिष्ठा से विहीन खोजी पत्रकारिता पुलिसिया तहकीकात या निजी खुफिया एजेंसियों की खोजबीन से बहुत भिन्न नहीं रह जाती, क्योंकि तब सत्य का पता लगाना और जनहित में उसे उघाड़ना उसका उद्देश्य नहीं रह जाता है। तब तथ्यों का चयन और निरूपण करने में वह सत्य की अपेक्षा करने लगती है। ऐसी खोजी पत्रकारिता बहुत शीघ्र अखबारी आतंकवाद में परिणत हो सकती है।

सच्ची खोजी पत्रकारिता की दिलचस्पी सिर्फ अधिकार संपन्न व्यक्तियों या संगठनों के छिपे दुष्कर्मों और दुरभिसंधियों का पता लगाने और प्रमाणों के साथ उन्हें पाठकों के सामने पेश करने में नहीं होती। किसी निर्दोष पर आरोप-आक्षेप लगने पर वह उसकी रक्षा में भी अपनी खोजी वृत्ति का पूरा-पूरा उपयोग करती है। हर ड्रेफ्युस की ओर से वह एमिली जोला बनकर खड़ी होती है। खोजी पत्रकारिता का यह तेवर हमारे देश में अभी बहुत कम देखने में आया है। जिसे अमेरिका में 'चेकबुक जर्नलिनज्म' कहा जाता है, वह भी धीरे-धीरे हमारी खोजी पत्रकारिता के साथ जुड़ती जा रही है। घूस देकर, चोरी करवाकर दस्तावेज प्राप्त करना और छापना भी उसमें वर्जित नहीं समझा जाता। साधन-शुध्दता का विचार उसे दकियानूसी लगता है। इसमें दो खतरे हैं। हमारे पत्र मालिकों की थैलियां उन्हीं दस्तावेजां के लिए खुलेंगी जो ऐसे व्यक्तियों या संगठनों के खिलाफ जाते हों, जो उन्हें नापसंद हैं या उनके स्वार्थों में आड़े आते हैं। इस तरह हम अपने मालिकों के हाथों में खेल रहे होंगे। दूसरे, हम ऐसे भी दस्तावेज छाप बैठ सकते हैं जो गढ़ंत हैं और बुरी नीयत से हमें मुहैया किए गए हैं।

जनहित और न्यायबुध्दि से प्रेरित और तथ्यों को छांटने-परखने में दक्ष पत्रकार ही इन सब खतरों से बचते हुए खोजी पत्रकारिता कर सकता है। धर्म, संघ और बुध्द जिस तरह बौध्द धर्म के त्रिरत्न हैं, उसी तरह जनहित, न्यायबुध्दि और सत्यनिष्ठा सच्ची खोजी पत्रकारिता के त्रिरत्न हैं। इस त्रिरत्न की उपेक्षा करने वाली खोजी पत्रकारिता चाहे कितनी ही मादक और उत्तेजक क्यों न हो, परंतु पत्रकार और पाठक के लिए और अंतत: समाज के लिए हितकारी नहीं हो सकती।

 

 

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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