आवश्यक नैतिकता पर एक विमर्श
डॉ. श्रीकांत सिंह
लोकतांत्रिक
व्यवस्था में समाचार पत्र-पत्रिकाओं,
रेडियो एवं टेलीविजन जैसे जनसंचार माध्यमों की जनमत निर्माण
में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये जनमाध्यम शासन एवं जनता के बीच संपर्क सूत्र
का काम करते हैं।
जनमाध्यमों के
व्यापक प्रभाव को देखते हुए इनसे गंभीर एवं उत्तरदायी आचरण की अपेक्षा की जाती
है। आज जनसंचार माध्यमों की निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों के दायरे में यह भी
पूछा जा रहा है कि क्या वे अपनी आलोचना के प्रति सहिष्णु हैं क्या उन्हें
अर्ध्दसत्य या असत्य छापने और दिखाने का अनियंत्रित अधिकार प्राप्त है?
क्या उनके आतंरिक विवेक और लोकहित की कथित प्रतिबध्दता पर
भरोसा किया जा सकता है?' जैसे अनेक प्रश्नों को इस
पुस्तक में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,
भोपाल के कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्र ने बड़े ही सारगर्भित
ढंग से उठाया है। श्री हरवंश दीक्षित ने लिखा है कि मीडिया धीरे-धीरे अदालत की
भूमिका को अपनाता जा रहा है। यह समाज और मीडिया दोनों के लिए ठीक नहीं है।
उन्होंने अपने इस लेख में आगे लिखा है कि 'आचार संहिता
की सबसे बड़ी कमजोरी और कभी-कभी सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि वे आत्मनियमन के
नैतिक मार्गनिर्देश होते हैं।' सुप्रसिध्द शिक्षाविद,
साहित्यकार एवं चिंतक प्रो. नंदकिशोर आचार्य ने लिखा है कि
संचार माध्यमों की नैतिकी एवं प्रेरक प्रक्रिया कानून निरंतर परिवर्तनशील हो
सकता है जबकि नैतिकी मूलत: मूल्यबोध होने के कारण सनातन। उन्होंने कानून की
अपेक्षा नैतिकी की दृष्टि को अधिक उपयोगी माना है। श्री विजय सहगल ने 'स्टिंग
आपरेशन में नैतिकता का प्रश्न' नामक लेख में नैतिकता के
विभिन्न बिन्दुओं की चर्चा की है। उन्होंने लिखा है खबरें गलत सिध्द होने पर
भूल सुधार तथा गलती का मानना और उसे प्रकाशित करने तथा फाइनेन्सियल अखबारों के
मामले में समाचारों और विचारों के निजी हितों से दूर रखने की बात एडीटर्स गिल्ड
ने कही है।
खबरपालिका की
विश्वसनीयता का सवाल और आचार संहिता नामक अपने लेख में पुस्तक के सम्पादक श्री
विजयदत्त श्रीधर ने लिखा है कि खबरपालिका लोकतांत्रिक समाज के ढांचे में अपनी
भूमिका को एक हद तक ठीक ढंग से निभा रही है......। सम्पादक की संस्था समाप्त
प्राय है और विपणन की ताकतें हावी हो चुकी हैं। लालच ने कहीं न कहीं दायित्वबोध
और आत्म संयम के अंकुश को शिथिल किया है।
आज खबरपालिका
के लिए आचार संहिता का प्रश्न केवल भारत में ही नहीं वरन यूरोप एवं अमेरीका
जैसे अनेक देशों में भी उठ रहे हैं। यह प्रश्न आज ही नहीं वरन काफी पहले से
उठता रहा है और समय-समय पर अनेक देशों के विभिन्न पत्रकार संगठनों तथा कुछ बड़े
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों ने आचरण संहिता तैयार की है। इस पुस्तक में
देश-विदेश में तैयार की गई विभिन्न आचार संहिता का अच्छा सकंलन है। पुस्तक कुल
127
पृष्ठों की है।
पुस्तक में दो
भाषाओं हिन्दी एवं अंग्रेजी में विभिन्न विद्वानों के लेखों एवं आचरण संहिता का
संकलन है। मुख्य प्रश्न आचार संहिता का जो है वह यह है कि आचार संहिता का पालन
करायेगा कौन?
सवाल चौथे स्तंभ का है जिसका संविधान में उल्लेख नहीं किया गया
है। ऐसी स्थिति में खबर पालिका की आचरण संहिता का प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो
जाता है। यदि इन पर आत्मानुशासन द्वारा नियंत्रण हो तो खबरपालिका की सकारात्मक
भूमिका स्वयं और महत्वपूर्ण होगी। पुस्तक के सम्पादक श्री विजयदत्त श्रीधरजी ने
समकालीन प्रासंगिक विषय पर पुस्तक का सम्पादन कर एक सराहनीय कार्य किया है,
जिसके लिए साधुवाद। यह पुस्तक मीडिया कर्मियों के साथ ही साथ
पत्रकारिता एवं जनसंचार के विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी है। पुस्तक की
भूमिका में डॉ. मंगला अनुजा ने कम शब्दों में बहुत कुछ लिखा है यह उनके लेखन
कौशल को दर्शाता है।
पुस्तक -
खबरपालिका की आचार संहिता
लेखक -
विजयदत्त श्रीधर
प्रकाशक -
माधवराव सप्रे स्मृति संग्रहालय, सप्रे मार्ग, भोपाल, म.प्र - 3
मूल्य - 50 रुपये
पृष्ठ - 127


